Donations worth crores, yet helpless devotees: Collector Preeti Yadav’s negligence and the secretary’s lethargy have left the Nalkheda temple a hotbed of chaos.
संवाददाता चंदा कुशवाहा
नलखेड़ा (आगर मालवा) । कहते हैं कि प्रशासनिक कुर्सी पर बैठे अधिकारियों का काम जनता और श्रद्धालुओं की सहूलियत देखना होता है, लेकिन आगर मालवा जिले में उलटी गंगा बह रही है। विश्व प्रसिद्ध मां बगलामुखी मंदिर में आए दिन जो बदइंतजामी देखने को मिल रही है, उसने यह साफ कर दिया है कि जिला कलेक्टर प्रीति यादव के लिए मंदिर की जिम्मेदारी अब सिर्फ कागजी और औपचारिक बनकर रह गई है।
रविवार का ही नजारा देख लीजिए। छुट्टी का दिन था, तो दूर-दूर से भक्त मां बगलामुखी के दर्शनों की आस लेकर पहुंचे थे। लेकिन मंदिर पहुंचने से पहले ही उन्हें प्रशासनिक नाकामी का शिकार होना पड़ा।
2 घंटे का जाम और सड़कों पर तड़पते श्रद्धालु
गाड़ियों का रेला ऐसा लगा कि लोग करीब 2 घंटे तक भीषण जाम में फंसे रहे। पार्किंग की कोई सुध लेने वाला नहीं था, जहां जिसकी मर्जी हुई, उसने गाड़ी खड़ी कर दी।गाड़ियों के इस कबाड़खाने के बीच सबसे बुरा हाल बच्चों और बुजुर्गों का हुआ। भीषण गर्मी में लोग पीने के पानी के लिए तरसते नजर आए, लेकिन मंदिर परिसर से लेकर बाहर तक पीने के पानी का कोई ढंग का इंतजाम नहीं था।
जब सब पता है, तो प्रशासन सो क्यों रहा है?
अब सवाल यह उठता है कि क्या रविवार को भीड़ पहली बार आई थी? या क्या प्रशासन को नहीं पता कि नवरात्रि चल रही है?
तहसीलदार और मंदिर के सचिव प्रियंक श्रीवास्तव, जिनकी सीधी जिम्मेदारी इन व्यवस्थाओं को दुरुस्त रखने की है, वे सब जानकर भी अनजान बने हुए हैं। नगर की व्यवस्था देखना और मंदिर के हर इंतज़ाम पर पैनी नजर रखना सचिव का काम है, लेकिन धरातल पर सब ‘शून्य’ नजर आता है। ऐसा लगता है मानो अधिकारी कुंभकर्णी नींद सो रहे हैं और उन्हें श्रद्धालुओं की परेशानी से कोई लेना-देना नहीं है।
करोड़ों के दान का हिसाब क्या?
मां बगलामुखी मंदिर में देश-विदेश से श्रद्धालु आते हैं और हर साल करोड़ों रुपये का दान मंदिर के खजाने में जमा होता है। भक्त जो कीमती साड़ियां, चुनरी और चढ़ावा माता के चरणों में अर्पित करते हैं, आरोप हैं कि उन्हें आम जनता के हित में इस्तेमाल करने के बजाय रसूखदारों और अधिकारियों की जी-हुजूरी में बांट दिया जाता है। VIPs को तो पलक-पावड़े बिछाकर अलग से दर्शन करा दिए जाते हैं, और जो आम श्रद्धालु घंटों लाइन में धक्का खाता है, उसे सुविधाएं तो छोड़िए, पानी तक नसीब नहीं होता।
अब सवाल सीधे कलेक्टर साहिबा से है
जब तहसील स्तर पर सचिव प्रियंक श्रीवास्तव अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हों, तो नजरें जिले की मुखिया यानी Collector Priti Yadav पर टिकती हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि कलेक्टर मैडम का रुख भी इस पूरे मामले में बेहद ढीला और औपचारिक नजर आ रहा है।
अगर जिले के सबसे बड़े अधिकारी ही आंखें मूंद लें, तो नीचे के कर्मचारियों से क्या उम्मीद की जाए?










