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तमिलनाडु में एआईएडीएमके के साथ हो सकता है BJP का गठबंधन, अमित शाह के दौरे से पहले अटकलें तेज

नई दिल्ली भारतीय जनता पार्टी (BJP) और एआईएडीएमके के बीच फिर से गठबंधन की अटकलें तेज हो रही हैं। इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस महीने के अंत में तमिलनाडु का दौरा करेंगे। अमित शाह का यह दौरा आगामी बिहार चुनावों और पश्चिम बंगाल के 2026 में होने वाले चुनावों से पहले की रणनीति के तहत तय किया गया है। ऐसी संभावना जताई जा रही है कि गृह मंत्री एआईएडीएमके के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात कर सकते हैं। मार्च में एआईएडीएमके नेता एदप्पादी के पलानीस्वामी ने दिल्ली में अमित शाह से मुलाकात की थी, जिससे यह अटकलें तेज हो गईं कि दोनों पुराने सहयोगी विधानसभा चुनावों से पहले एक बार फिर गठबंधन कर सकते हैं और द्रविड़ मुनेत्र कझगम (DMK) के खिलाफ एक मजबूत मोर्चा बना सकते हैं। एक सूत्र ने कहा, “उनकी मुलाकात संघ विचारक एस गुरुमूर्ति और कुछ पार्टी कार्यकर्ताओं से भी हुई, लेकिन क्या एआईएडीएमके नेताओं से बातचीत हो रही है, इस पर कोई टिप्पणी नहीं की गई।” केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव राज्य के कुछ नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व पर दबाव डाला है कि वह एआईएडीएमके के साथ फिर से गठबंधन करें, जिससे पार्टी को राज्य में अपनी पकड़ बढ़ाने और एंटी-डीएमके भावना का लाभ उठाने का मौका मिलेगा। एक पार्टी कार्यकर्ता ने कहा, “दोनों दलों के नेताओं के बीच गठबंधन की संभावना को लेकर कई दौर की बातचीत हो चुकी है। हमें उम्मीद है कि राज्य में संगठनात्मक फेरबदल के बाद इस बारे में जल्द ही कोई घोषणा की जाएगी।” नए प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव पर नजरें प्रदेश अध्यक्ष के पद से के. अन्नामलाई के इस्तीफे के बाद सबकी नजरें इस बात पर हैं कि पार्टी किसे उनका उत्तराधिकारी चुनेगी। क्योंकि गठबंधन इस पर निर्भर करेगा कि प्रदेश के नेता आपस में कैसे तालमेल बैठाते हैं। अन्नामलाई और एआईएडीएमके के बीच विरोधाभासी रुख गठबंधन टूटने का एक प्रमुख कारण था। जल्द ही नए राज्य अध्यक्ष की घोषणा की जा सकती है। गठबंधन की संभावनाएं भाजपा और एआईएडीएमके के कई नेताओं का मानना है कि दोनों दलों का गठबंधन राज्य में डीएमके को सत्ता से बाहर करने में ज्यादा सफल हो सकता है। एआईएडीएमके ने 2023 में एनडीए से बाहर निकलने का एलान किया था, क्योंकि अन्नामलाई द्वारा की गई टिप्पणियों पर दोनों गठबंधन सहयोगियों के बीच मतभेद हो गए थे। 2021 के चुनावों में डीएमके ने 234 में से 133 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, जबकि एआईएडीएमके की सीटों की संख्या 136 से घटकर 66 रह गई थी। भाजपा ने 4 सीटें और पीएमके ने 5 सीटें जीती थीं। शाह का बिहार और पश्चिम बंगाल दौरा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की आगामी यात्रा में बिहार का होने वाला है। प्रदेश के एक नेता ने बताया, “मार्च में अपनी पिछली यात्रा के दौरान अमित शाह ने राज्य के कार्यकर्ताओं से मुलाकात की और पार्टी की स्थिति के बारे में जानकारी ली थी। आगामी दो दिवसीय यात्रा के दौरान मंत्री चुनावी रणनीति के लिए दिशा-निर्देश देंगे।” पश्चिम बंगाल का दौरा भी जल्द घोषित किया जाएगा, जिसका उद्देश्य पार्टी कार्यकर्ताओं को सशक्त करना और आगामी चुनावी अभियान की रणनीति तय करना है। शुक्रवार को भाजपा के सांसदों ने राज्य में शिक्षक भर्ती में गड़बड़ी और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का मुद्दा उठाया था। शाह का जम्मू और कश्मीर दौरा अमित शाह 6 अप्रैल से जम्मू और कश्मीर का तीन दिवसीय दौरा करेंगे, जहाँ वह सुरक्षा स्थिति की समीक्षा करेंगे और विकास परियोजनाओं का उद्घाटन करेंगे। इसके अलावा, वह जम्मू में पार्टी के विधायकों से मुलाकात करेंगे और पार्टी के संगठनात्मक मुद्दों पर चर्चा करेंगे। केंद्रीय गृह मंत्री का यह दौरा भाजपा की रणनीतिक तैयारियों का हिस्सा है, जो आने वाले चुनावों के लिए पार्टी की दिशा तय करेगा।

अगले सप्ताह प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के चुनाव की तारीख की घोषणा

भोपाल    भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद का चुनाव जल्द किया जा सकता है। संसद का सत्र शुक्रवार को समाप्त हो गया। ऐसे में अब प्रदेश अध्यक्ष पद के चुनाव की तारीख की घोषणा की जा सकती है। पार्टी सूत्रों के अनुसार भाजपा की योजना इसी माह के पहले पखवाड़े में प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव कराने की है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का भी चुनाव होना है और इससे पहले मध्य प्रदेश समेत अन्य राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों की नियुक्ति होना है। ऐसे में अब चर्चा है कि अगले सप्ताह प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव की तारीख की घोषणा हो सकती है, जिसके बाद प्रदेश अध्यक्ष के नाम घोषित किया जा सकता है। मध्य प्रदेश में दो महीने पहले जिला अध्यक्षों के चुनाव हो चुके हैं। सामान्य प्रक्रिया के अनुसार, प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव जिला अध्यक्षों के चुनाव के तुरंत बाद किया जाना था, लेकिन दिल्ली विधानसभा चुनाव समेत कई कारणों से इसे टाल दिया गया। अब प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव जल्द होने की बात कही जा रही है। ऐसे में दावेदारों के नामों को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। प्रदेश अध्यक्ष की रेस में पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा, अरविंद भदौरिया, बैतूल से विधायक हेमंत खंडेलवाल, सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते और राज्यसभा सदस्य सुमेर सिंह सोलंकी समेत अन्य नेताओं के नाम चर्चा में हैं। आदिवासी नेता को मिल सकता है मौका भाजपा संगठन आदिवासी चेहरे को भी मौका दे सकता है, क्योंकि लंबे समय से आदिवासी नेता को प्रदेश भाजपा की कमान नहीं सौंपी गई है। एससी वर्ग से सत्यनारायण जटिया प्रदेश अध्यक्ष बने, लेकिन आदिवासी वर्ग को प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका। इसका एक कारण जातिगत समीकरण को ध्यान में रखते हुए आदिवासी वर्ग को मौका देना भी माना जा रहा है। प्रदेश में ओबीसी वर्ग से मुख्यमंत्री होने के अलावा डिप्टी सीएम राजेंद्र शुक्ल ब्राह्मण और जगदीश देवड़ा एससी वर्ग से आते हैं। वीडी शर्मा सामान्य वर्ग से आते हैं। इस बार आदिवासी नेता को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की अटकलें है। इसमें राज्यसभा सांसद सुमेर सिंह सोलंकी, खरगोन से सांसद गजेंद्र पटेल, मंडला से सांसद फग्गन सिंह कुलस्ते के नाम चर्चा में है। हेमंत खंडेलवाल- बैतूल से विधायक और पूर्व सांसद हेमंत खंडेलवाल का नाम भी प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में शामिल है। वह प्रदेश संगठन में लंबे समय से काम कर रहे है। संगठन के ही वरिष्ठ नेताओं ने उनका नाम बढ़ाया है। खंडेलवाल को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और संघ की पसंद भी बताया जा रहा है। नरोत्तम मिश्रा- पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा की दावेदारी काफी मजबूत मानी जा रही है। वे सवर्ण वर्ग से आते हैं और राज्य की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं। उनकी केंद्रीय नेतृत्व से भी अच्छी ट्यूनिंग मानी जाती है। वीडी शर्मा– वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा का नाम भी रेस में हैं, क्योंकि उनके कार्यकाल में बीजेपी ने विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया था। पार्टी एक बार फिर उनके नाम पर विचार कर सकती है। अरविंद भदौरिया– पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया संगठन के एक कुशल रणनीतिकार माने जाते हैं। हालांकि, वह 2023 के विधानसभा चुनाव में हार गए थे, लेकिन पार्टी उन्हें एक बार फिर सक्रिय करना चाहती है।

तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष के अन्नामलाई ने किया साफ, वह किसी भी तरह की ‘रेस’ में शामिल नहीं हैं, सियासी हलचल तेज

कोयंबटूर तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष के अन्नामलाई ने शुक्रवार को साफ किया कि वह प्रदेश अध्यक्ष पद की दौड़ में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी में किसी तरह की प्रतिस्पर्धा की कोई गुंजाइश नहीं होती और यह पद सर्वसम्मति से तय किया जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि वह किसी भी तरह की ‘रेस’ में शामिल नहीं हैं। इस बयान के बाद बीजेपी पद से उनके इस्तीफे के कयास लगाए जा रहे हैं। कोयंबटूर में मीडिया से बातचीत के दौरान जब अन्नामलाई से पूछा गया कि क्या वह तमिलनाडु बीजेपी अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार हैं, तो उन्होंने कहा, “मैं नए प्रदेश अध्यक्ष पद की दौड़ में नहीं हूं। मैं किसी भी प्रतिस्पर्धा में नहीं पड़ता।” अन्नामलाई से यह भी पूछा गया कि क्या एआईएडीएमके 2026 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी के साथ गठबंधन करने की शर्त के रूप में उन्हें पद से हटवाना चाहती है? इस पर उन्होंने कहा कि वह इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करना चाहते। हालांकि, उन्होंने यह जरूर कहा कि बीजेपी आने वाले दिनों में अच्छा प्रदर्शन करेगी और नए अध्यक्ष के चुनाव के वक्त इस पर बात होगी। वक्फ विधेयक पर दिया बड़ा बयान अन्नामलाई ने वक्फ विधेयक का स्वागत करते हुए कहा कि इससे गरीब मुसलमानों को फायदा पहुंचेगा। उन्होंने दावा किया कि 1913 से 2013 तक देशभर में 18 लाख एकड़ जमीन वक्फ के अधीन थी, लेकिन 2013 से 2025 के बीच 21 लाख एकड़ और जुड़ गई है। यानी अब कुल 39 लाख एकड़ जमीन वक्फ के अधीन हो गई है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के तिरुचेंदुरई में पूरे शहर को वक्फ घोषित कर दिया गया था और मंदिरों की जमीन को भी वक्फ संपत्ति बताने की कोशिश की गई थी। लेकिन संशोधन विधेयक से अब इन सभी विवादित मामलों का समाधान निकल आया है। वक्फ संपत्तियों पर अतिक्रमण का आरोप अन्नामलाई ने दावा किया कि कई जगहों पर वक्फ की संपत्तियों पर अवैध कब्जा कर लिया गया है। उन्होंने कहा, “पिछले साल वक्फ की 126 करोड़ रुपए की आय हुई थी। लेकिन कई जगहों पर कब्जा होने के कारण आय में गिरावट आई है। अब चार साल इंतजार करिए और देखिए कि वक्फ कितना पैसा कमाएगा और यह गरीब मुसलमानों को मिलेगा।” टीवीके के विरोध पर तंज वक्फ विधेयक के खिलाफ अभिनेता विजय की पार्टी टीवीके के विरोध प्रदर्शन पर सवाल उठाते हुए अन्नामलाई ने कहा कि क्या उन्होंने इस मुद्दे पर संयुक्त संसदीय समिति के समक्ष कोई आधिकारिक आपत्ति दर्ज कराई थी? उन्होंने कहा, “टीवीके आखिर विरोध किस चीज़ का कर रही है? कानून में क्या गलत है? उन्हें खुद भी नहीं पता कि वे किस चीज़ का विरोध कर रहे हैं।” एनईईटी मुद्दे पर डीएमके को घेरा अन्नामलाई ने डीएमके सरकार पर एनईईटी परीक्षा को लेकर “नाटक” करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि अब यह मामला पूरी तरह से खत्म हो चुका है। राष्ट्रपति द्वारा राज्य के विधेयक को खारिज कर दिए जाने के बाद अब डीएमके सरकार के पास कोई विकल्प नहीं बचा है। उन्होंने डीएमके सरकार को चुनौती देते हुए कहा, “अगर आपमें हिम्मत है तो सुप्रीम कोर्ट जाइए। लेकिन डीएमके सुप्रीम कोर्ट नहीं जाएगी, क्योंकि एनईईटी परीक्षा को लागू करने का फैसला भी सुप्रीम कोर्ट ने ही दिया था।” मुरुगन मंदिर के अभिषेक पर विवाद मरुदामलाई भगवान मुरुगन मंदिर में हुए अभिषेक समारोह पर अन्नामलाई ने कहा कि जिस तरह से यह आयोजन हुआ, उससे यह संदेह पैदा हुआ कि यह ‘कुंभाभिषेकम’ था या “डीएमके सम्मेलन”। उन्होंने आरोप लगाया कि जबकि आम भक्तों को अनुमति नहीं दी गई, डीएमके के 750 खास लोगों को विशेष दर्शन पास दिए गए।

सुप्रीम कोर्ट में वक्फ विधेयक को चुनौती देगी कांग्रेस, जल्द खटखटाएगी अदालत का दरवाजा

नई दिल्ली वक्फ संशोधन विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी होने लगी है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के बाद अब कांग्रेस ने शुक्रवार को कहा कि वह संसद में पारित वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 की संवैधानिकता को बहुत जल्द सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। विधेयक को शुक्रवार सुबह संसद ने मंजूरी दी थी। इसे पहले लोकसभा फिर राज्यसभा ने भी इसे मंजूरी दे दी थी। विधेयक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाए DMK इससे पहले वक्फ विधेयक को लेकर स्टालिन ने अदालत का दरवाजा खटखटाने का एलान कर दिया था। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम के स्टालिन ने गुरुवार को कहा था कि उनकी पार्टी इस विधेयक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाएगी। लोकसभा से विधेयक पारित होने के विरोध में स्टालिन विधानसभा में काली पट्टी बांधकर पहुंचे थे। इस दौरान उन्होंने कहा था कि भारत में बड़ी संख्या में दलों के विरोध के बावजूद कुछ सहयोगियों के इशारे पर रात दो बजे संशोधन को अपनाना संविधान की संरचना पर हमला है। ‘सरकार के सभी हमलों का विरोध करना जारी रखेंगे’ ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में एआईसीसी महासचिव जयराम रमेश ने कहा, ‘कांग्रेस बहुत जल्द ही वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2024 की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी।’ उन्होंने कहा, ‘हमें पूरा भरोसा है। हम भारत के संविधान में निहित सिद्धांतों, प्रावधानों और प्रथाओं पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के सभी हमलों का विरोध करना जारी रखेंगे।’ कांग्रेस ने गिनाए मामले , जिसे सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती जयराम रमेश ने कहा कि सीएए, 2019 को कांग्रेस की ओर से चुनौती दिए जाने पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। आरटीआई अधिनियम, 2005 में 2019 के संशोधनों को लेकर भी कांग्रेस की चुनौती पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। चुनाव संचालन नियम (2024) में संशोधनों की वैधता को लेकर कांग्रेस की चुनौती पर भी सुनवाई जारी है। ऐसे ही पूजा स्थल अधिनियम, 1991 की मूल भावना को बनाए रखने के लिए कांग्रेस के हस्तक्षेप पर सुप्रीम कोर्ट में मामला लंबित है। स्टालिन खटखटाएंगे अदालत का दरवाजा लोकसभा में पास हुए वक्फ विधेयक को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अदालत का दरवाजा खटखटाने का एलान कर दिया है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री और डीएमके अध्यक्ष एम के स्टालिन ने गुरुवार को कहा कि उनकी पार्टी इस विधेयक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाएगी। लोकसभा से विधेयक पारित होने के विरोध में स्टालिन विधानसभा में काली पट्टी बांधकर पहुंचे। इस दारान उन्होंने कहा कि भारत में बड़ी संख्या में दलों के विरोध के बावजूद कुछ सहयोगियों के इशारे पर रात दो बजे संशोधन को अपनाना संविधान की संरचना पर हमला है। ‘यह धार्मिक सद्भाव को बिगाड़ने वाला काम’ मुख्यमंत्री ने सदन को बताया कि यह धार्मिक सद्भाव को बिगाड़ने वाला काम है। इसे उजागर करने के लिए हम आज विधानसभा की कार्यवाही में काली पट्टी बांधकर भाग ले रहे हैं। स्टालिन ने कहा, ‘मैं आपको सूचित करना चाहूंगा कि द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) की ओर से इस विवादास्पद संशोधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मामला दायर किया जाएगा। तमिलनाडु केंद्र सरकार के उस कानून के खिलाफ लड़ेगा, जो वक्फ बोर्ड की आजादी को नष्ट करता है और अल्पसंख्यक मुस्लिम आबादी को खतरे में डालता है।’ ‘विधेयक पारित कराने के तरीका निंदनीय’ उन्होंने बताया कि राज्य विधानसभा ने प्रस्तावित संशोधन के खिलाफ 27 मार्च को एक प्रस्ताव पारित किया था, क्योंकि यह अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय पर असर डालेगा। यह भारत के धार्मिक सद्भाव को गंभीर रूप से प्रभावित करेगा। उन्होंने कहा कि यह बेहद निंदनीय है कि वक्फ अधिनियम में संशोधन को लोकसभा में 232 सांसदों के विरोध में वोट देने के बावजूद पारित कर दिया गया। यह कोई सामान्य संख्या नहीं है। यह संख्या बढ़ भी सकती है। केवल 288 सदस्यों ने ही इसके पक्ष में मतदान किया।

संजय विनायक जोशी की मुख्यधारा की राजनीति में वापसी जल्द !क्यों चर्चा में हैं आए पुराने ‘साथी’, जानिए संयोग

मुंबई/नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संघ मुख्यालय के दौरे और संसद सत्र के खत्म होने के बाद बीजेपी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक बेंगलुरु में हाेने की संभावना है। यह बैठक अप्रैल के तीसरी हफ्ते में प्रस्तावित है। इस बैठक में बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के ऐलान की संभावना व्यक्त की जा रही है। इससे पहले अप्रैल बीजेपी का इस हफ्ते 6 अप्रैल को स्थापना दिवस है। बीजेपी के स्थापना दिवस के दिन ही रामनवमी का पर्व है। बीजेपी द्वारा इस मौके को बड़े पैमाने पर सेलिब्रेट किए जाने की उम्मीद है, तो वहीं दूसरी तरफ कभी बीजेपी के कद्दावर संगठन मंत्री रह चुके संजय जोशी का जन्मदिन भी 6 अप्रैल को है। 6 अप्रैल से है अनूठा संयोग पीएम मोदी के नागपुर दौरे के बाद संजय जोशी के नाम की चर्चा एक बार फिर हो रही है। उनके करीबियों को भरोसा है कि ऐसे में जब इसी साल अक्तूबर को संघ की स्थापना को 100 साल पूरे हो रहे हैं। उससे पहले संजय विनायक जोशी की मुख्यधारा की राजनीति में वापसी हो सकती है। कुछ स्थानों पर संजय जोशी के जन्मदिन की बधाई देने वाले पोस्टर भी सामने आए हैं। संजय जोशी की उम्र अभी 62 साल है। ऐसे में 75 साल उम्र सीमा को देखते हुए उनके पास अभी वापसी का समय बचा हुआ है। यही वजह है कि संजय जोशी को पसंद करने वालों ने पीएम मोदी की नागपुर यात्रा के बाद नई उम्मीदें बांध ली है। जोशी के करीबियों का कहना है कि भले ही संजय जोशी राष्ट्रीय अध्यक्ष न बने लेकिन उनकी सक्रियता बढ़ेगी। सात सालों तक साथ किया काम 6 अप्रैल, 1962 को जन्में संजय जोशी लंबे समय से एक सीमित भूमिका में सक्रिय हैं। वह भी पीएम मोदी की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक प्रचारक रह चुके हैं। जोशी 2001 से लेकर 2005 तक बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री का दायित्व संभाल चुके हैं। नागपुर में जन्मे और वहां कुल साल तक प्रोफेसर रहे जोशी गुजरात में भी काम कर चुके हैं। पीएम मोदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बीजेपी में 1987 में आए थे। इसके एक साल बाद जोशी को संघ ने बीजेपी गुजरात में भेजा था। इसके बाद उन्होंने नरेंद्र मोदी के साथ 1988 से 1995 तक लगातार काम किया था। 1995 में पहली बार बीजेपी को गुजरात में सत्ता का स्वाद चखने को मिला था। तब देना पड़ा था इस्तीफा संजय जोशी को आखिरी बार नितिन गडकरी ने अध्यक्ष रहते हुए 2011 में जोशी को विधानसभा चुनावों की जिम्मेदारी सौंपीं थी लेकिन तब उनकी वापसी को बीजेपी में स्वीकार नहीं किया था। चुनावों के बाद उन्हें मई में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी से और एक महीने बाद पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा था। ऐसे में जोशी जोशी पिछले 12 सालों से अज्ञातवास में हैं। ऐसे में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के 27 सितंबर, 2025 को 100 पूरे होंगे और इसी महीने में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 75 साल की आयु पूरी करेंगे, क्या उसके पहले संजय जोशी की वापसी हो पाएगी? यह एक बड़ा सवाल बना हुआ है। पीएम मोदी की बेहद अच्छे माहौल में संघ मुख्यालय की यात्रा के बाद समर्थकों को उम्मीद है कि नई शुरुआत हो सकती है।

चिराग और पशुपति पारस में खींचतान!, रामविलास पासवान के 2 मंजिला घर के बहाने सीट की लड़ाई

खगड़िया शहरबन्नी स्थित एक दो मंजिला मकान को लेकर शुरू हुआ पासवान परिवार (चिराग पासवान और पशुपति पारस) का विवाद राजनीतिक रंग ले चुका है। इस मकान में दशकों से चिराग पासवान की बड़ी मां राज कुमारी देवी रह रही हैं। फिलहाल, राज कुमारी देवी पासवान परिवार की राजनीतिक विवाद में केंद्र बिंदु के रूप में उभरी हैं।   अपनी दोनों देवरानियों (पशुपति पारस की पत्नी शोभा देवी और स्व. रामचंद्र पासवान की पत्नी सुनैना देवी) के बहाने रालोजपा सुप्रीमो पशुपति पारस पर हमलावर हैं। चिराग ने इस पर अभी कुछ नहीं कहा है, लेकिन माना जा रहा है कि यह अलौली विधानसभा सीट की लड़ाई है।   अलौली सीट पर चाचा-भतीजे की नजर अलौली और खगड़िया की राजनीति पर नजर रखने वाले कहते हैं- घर के बहाने सीट (अलौली सुरक्षित विधानसभा) पर लोजपा (रामविलास) सुप्रीमाे चिराग पासवान और राष्ट्रीय लोजपा सुप्रीमो पशुपति पासवान की नजर है। बताते चलें कि यह सीट पासवान परिवार से वर्षों से दूर हैं और अब चाचा-भतीजा दोनों की नजर इस सीट पर गड़ी हुई है। चिराग हर हाल में यह सीट अपनी पार्टी के नाम करना चाहते हैं। दूसरी ओर, यहां से सात बार एमएलए रहे पशुपति कुमार पारस अपने पुत्र यशराज पासवान उर्फ मुस्कान को यहां से चुनावी मैदान में उतारना चाह रहे हैं।यशराज की फिल्डिंग महीनों से जारी है। इधर, राष्ट्रीय लोजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्रवण अग्रवाल ने दैनिक जागरण से कहा है कि चिराग पासवान अपने खास व्यक्ति को अलौली से चुनाव लड़ाना चाह रहे हैं, इसलिए बड़ी मां राज कुमारी देवी को आगे कर षड्यंत्र रच रहे हैं। चिराग पासवान को राजनीति में इमोशनल कार्ड का इस्तेमाल करने में महारथ हासिल है। वहीं, सूत्रों की माने तो चिराग पासवान अपने एक निकटतम रिश्तेदार को चुनाव लड़ाना चाह रहे हैं। यशराज के सवाल पर रालोजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता कहते हैं कि यशराज पासवान के खून में ही राजनीति है और एक बड़े राजनीतिक परिवार से आते हैं। वे कहते हैं- यशराज पासवान का गांव-घर शहरबन्नी है। वे यहां घूम नहीं सकते? यह तो उनकी पारंपरिक सीट है। इधर, श्रवण अग्रवाल ने कहा है कि शहरबन्नी असामाजिक तत्व पहुंच रहे हैं। राज कुमारी देवी को बिहार सरकार और खगड़िया एसपी सुरक्षा प्रदान करे।     वहीं, लोजपा(रा) के खगड़िया जिलाध्यक्ष शिवराज यादव ने कहा है कि जो लोग श्रद्धेय रामविलास पासवान को अपना ‘राम’ कहते रहे, उनके द्वारा उनके परिवार के खिलाफ अनर्गल टिप्पणी करना गलत है। उन्होंने कहा कि लोजपा (रा) भी राज कुमारी देवी की सुरक्षा की मांग पुलिस-प्रशासन से करती है। हमारी यह भी मांग है कि पुलिस-प्रशासन असामाजिक तत्वों को चिह्नित कर कड़ी कार्रवाई करे। इधर, गुरुवार को राज कुमारी देवी की छोटी बेटी आशा पासवान और दामाद साधु पासवान भी शहरबन्नी पहुंचे। साधु पासवान ने कहा कि यह पारिवारिक मामला है। घर के बड़े बुजुर्ग बैठ जाएं और फैसला करे लें। सुलह कर लें। चिराग जी, माता जी (राज कुमारी देवी) और चाचा जी (पशुपति पारस) आपस में बैठें। उन्होंने कहा, घर में ताला नहीं लगना चाहिए। राज कुमारी देवी सबसे बड़ी हैं और उनका सम्मान होना चाहिए। मालूम हो कि दोनों देवरानियों ने राजकुमारी देवी का सामान घर के कमरों से बाहर निकालकर ताला लगा दिया था। इस मामले को लेकर राजकुमारी देवी ने थाने में केस भी किया है। गुरुवार काे राज कुमारी देवी ने कहा कि चिराग आ रहा है। उनके आने के बाद ही आगे की कोई बात होगी।

फडणवीस सरकार में उपमुख्यमंत्री शिंदे कद बढ़ा, हर फाइल भी शिंदे के पास जाएगी!

मुंबई महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस तीन प्रमुख दलों के गठबंधन के बीच “शक्ति राजनीति” में संतुलन बनाए रखने के लिए अधिकारों का समान वितरण सुनिश्चित किया है. आजतक के जिस सरकारी आदेश की कॉपी है उसे 18 मार्च, 2025 को मुख्य सचिव सुजाता सौनिक ने जारी किया है. इस आदेश में कहा गया है कि वित्त और योजना विभाग, जो वर्तमान में अजित पवार के अधीन है, उसकी हर फाइल अब अंतिम मंजूरी के लिए सीएम देवेंद्र फडणवीस तक पहुंचने से पहले उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से होकर गुजरेगी. इसे सियासी संतुलन बनाए रखने के लिए एक रणनीतिक कदम के रूप में देखा जा रहा है. महा विकास अघाड़ी (एमवीए) सरकार के दौरान जब उद्धव ठाकरे सीएम थे और अजित पवार के पास वित्त विभाग था. तब शिंदे के शिवसेना गुट ने पवार पर पक्षपात का आरोप लगाया था. उन्होंने दावा किया कि पहले एनसीपी, फिर कांग्रेस और अंत में शिवसेना को पैसा आवंटित किया गया, जो एमवीए के पतन का एक प्रमुख कारण बन गया. शिंदे के सीएम रहने के दौरान भी ऐसा ही था नियम राजनीतिक बदलाव के बाद एकनाथ शिंदे सीएम बने और फडणवीस डिप्टी सीएम बने और एक साल के भीतर ही शिंदे के नेतृत्व में अजित पवार भी डिप्टी सीएम बन गए. हालांकि पवार ने वित्त विभाग अपने पास रखा, लेकिन अंतिम फैसले का अधिकार शिंदे के पास ही रहा.तब भी 2023 में आदेश जारी किया गया था कि फाइलें तत्कालीन डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस के माध्यम से अंतिम मंजूरी के लिए सीएम एकनाथ शिंदे के पास भेजी जाएंगी. हालांकि, अब वित्त विभाग को सत्ता संतुलन को बाधित होने से रोकने के लिए फडणवीस ने फाइल अनुमोदन प्रक्रिया को पहले ही बदल दिया और उनके पास फाइल पहुंचने से पहले दोनों उप मुख्यमंत्रियों के पास जाएगी. राजनीतिक हलकों में इसे सीएम फडणवीस का “मास्टरस्ट्रोक” बताया जा रहा है. महायुति में हुआ था विवाद तीनों महायुति दलों के नेता पहले भी लगातार कहते रहे हैं कि उनके बीच “कभी कोई विवाद नहीं था”. हालांकि, अजित पवार को अब अपनी फाइलों के लिए शिंदे की मंजूरी की जरूरत होगी. इससे शिंदे की शिवसेना को एनसीपी पर बढ़त मिल गई है, जो पहले टकराव का कारण बनी थी. इस निर्णय के माध्यम से एकनाथ शिंदे को सशक्त बनाकर, फडणवीस ने सुनिश्चित किया है कि शिंदे का गुट फंड आवंटन और निर्णय लेने से संतुष्ट रहे. वहीं इस कदम के जरिए अजित पवार को भी नियंत्रण में रखा जा सके. इस कदम को महायुति के भविष्य को सुरक्षित करने की दिशा में एक मजबूत कदम के रूप में देखा जा रहा है.  

बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष में अब और देरी नहीं होगी, अप्रैल महीने में चेहरे से सस्पेंस खत्म हो जाएगा

नई दिल्ली  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संघ मुख्यालय के दौरे के बाद अब बीजेपी के नए राष्ट्रीय के ऐलान को काफी अहम माना जा रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष में अब और देरी नहीं होगी। अप्रैल महीने में नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चेहरे से सस्पेंस खत्म हो जाएगा। संसद के बजट सत्र के बाद बीजेपी के संगठन चुनावों में तेजी की उम्मीद है। संसद का बजट सत्र 4 अप्रैल को खत्म हो रहा है। संघ के सूत्रों की मानें तो नए अध्यक्ष के चयन में संघ, पीएम मोदी और अमित शाह के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी की भूमिका अहम हो सकती है। 2009 से 2013 तक बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे नितिन गडकरी अभी भी संघ नेतृत्व की गुडबुक में बने हुए हैं। नागपुर दौरे में नितिन गडकरी पूरे दौरे में फडणवीस के साथ पीएम और संघ नेताओं के साथ मौजूद रहे थे। कब हो सकता है ऐलान? बीजेपी ने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के ऐलान की यूं तो कई डेडलाइन निकल चुकी हैं। अप्रैल महीने में 6 अप्रैल को बीजेपी का स्थापना दिवस है लेकिन 6 अप्रैल तक ऐलान हो पाएगा। इसकी संभावना बेहद कम है। इसके बाद बीजेपी ने 18 अप्रैल को राष्ट्रीय कार्यकारिणी परिषद (BJP National Executive Council Meet) की बैठक रखी है। इस बैठक में नए अध्यक्ष का ऐलान हो सकता है। अगर कुछ देरी होती है तो भी अप्रैल में जेपी नड्‌डा के उत्तराधिकारी का ऐलान हो जाएगा। सूत्रों से मिली जानकारी में कहा गया है कि अगले कुछ दिनों में संगठन चुनाव पूरा हो जाएगा। 13 राज्यों में अध्यक्षों का ऐलान हो चुका है। 19 राज्यों में ऐलान बाकी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए 19 राज्यों के प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव होना जरूरी है। कैसे नड्‌डा बने थे अध्यक्ष? 2019 में अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद जेपी नड्‌डा बीजेपी के कार्यकारी अध्यक्ष बने थे। छह महीने बाद 30 जनवरी 2020 को उन्हें सर्वसम्मति से राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया था। नड्‌डा का कार्यकाल जनवरी 2023 में खत्म हो गया था, लेकिन लोकसभा चुनावों के लिए उन्हें जून, 2024 तक एक्सटेंशन दे दिया गया था। इसके बाद भी नड्‌डा एक्सटेंशन पर हैं। ऐसे में बतौर अध्यक्ष लंबी पारी खेल चुके हैं। नड्‌डा वर्तमान में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री भी हैं। नए अध्यक्ष की अगुवाई में 12 चुनाव सूत्रों का कहना है कि बीजेपी का जो भी नया अध्यक्ष होगा उसके सामने 2025 में बिहार, फिर 2026 में तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के साथ असम और केरल में मोर्चा संभालना होगा। इसके बाद 2027 में पांच राज्यों के चुनाव के साथ राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव भी होंगे। ऐसे में अगले तीन साल के कार्यकाल में कुल 12 अहम चुनाव होंगे। सूत्रों की मानें तो बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी परिषद की बैठक में बेंगलुरु में 18 अप्रैल से 20 अप्रैल तक प्रस्तावित है। राष्ट्रीय अध्यक्ष का ऐलान इसमें हो सकता है। अगर ये बैठक की तारीखें थोड़ी आगे भी खिसकती हैं तो भी अप्रैल के अंत तक बीजेपी को राष्ट्रीय अध्यक्ष मिलने की पूरी संभावना है।

कांग्रेस के दिग्गज नेता राशिद अल्वी ने कहा- सरकार में आते ही कांग्रेस वक्फ संशोधन बिल को रद्द कर देगी

नई दिल्ली संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने बुधवार को लोकसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक पेश किया। कांग्रेस के दिग्गज नेता राशिद अल्वी ने बुधवार मीडिया से बात करते हुए दावा किया कि हमारी सरकार बनते ही वक्फ कानून को रद्द कर देंगे। राशिद अल्वी ने कहा, “लोकसभा में मैंने मंत्री का भाषण सुना। उन्होंने पूरे देश को गुमराह करने का काम किया है। आज का दिन भारत के इतिहास में काला दिन माना जाएगा। भाजपा और आरएसएस ने मिलकर जिस दिन बाबरी मस्जिद ढहाई थी, वो भी काला दिन था। एक बार फिर भाजपा की सरकार मुस्लिम दुश्मनी पर आमादा है। इतिहास में यह सरकार मुस्लिम दुश्मनी पर आमादा सरकार कहलाएगी। एनडीए में शामिल नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू अगर इस बिल का साथ देते हैं, तो वो भी मुस्लिम दुश्मनी में भाजपा के साथ खड़े कहलाएंगे।” वक्फ संशोधन बिल से मुसलमानों को कोई नुकसान नहीं होने वाले सरकार के दावों पर राशिद अल्वी ने पूछा, “क्या मंदिरों की कम्युनिटी में मुस्लिम शामिल होंगे? ऐसा एक कानून बनाइए, जिससे मंदिर की कम्युनिटी में मुस्लिम भी शामिल होंगे और मुस्लिम की कम्युनिटी में हिंदू शामिल होंगे।” उन्होंने आरोप लगाया, “वक्फ के अंदर भाजपा और आरएसएस के लोग शामिल होंगे और वक्फ की संपत्ति को हड़पने का काम करेंगे।” राशिद अल्वी ने दावा किया, “कानून पास होने के बाद प्रदर्शन करने का कोई मतलब नहीं रह जाता। भाजपा चाहती है कि मुसलमान प्रदर्शन करें और सड़कों पर उतरें। वो देश में शाहीन बाग जैसे हालात बनाना चाहते हैं, जिससे उन्हें ताकत मिलती है। भाजपा की सरकार जब तक है, वो प्रदर्शन करने वालों की बात नहीं सुनेगी। 2029 में हमारी सरकार आएगी और हम इस कानून को रद्द कर देंगे।” सरकार के कांग्रेस पर मुसलमानों को गुमराह करने के आरोपों पर अल्वी ने कहा, “अगर कांग्रेस गुमराह कर रही है तो क्या टीएमसी, डीएमके और सपा समेत कई पार्टियां गुमराह कर रही हैं? क्या वक्फ बिल का विरोध करने वाली सारी पार्टियां भटका रही हैं? कांग्रेस पर आरोप लगाने की भाजपा की आदत रही है। कुछ सालों का मामला है, कांग्रेस की सरकार आते ही ‘वक्फ संशोधन बिल’ को हम पलट देंगे।”

सारी जमीनें हड़प ली गईं, जब वक्फ पर लालू यादव ने संसद में की थी कड़ा कानून बनाने की मांग

नई दिल्ली मोदी सरकार बुधवार को लोकसभा में वक्फ संशोधन विधेयक 2025 लेकर आई है। एनडीए के सांसद जहां इस बिल के समर्थन में है तो पूरा विपक्ष एकजुट होकर बिल का विरोध कर रहा है। कांग्रेस के अलावा, आरजेडी, टीएमसी समेत तमाम दलों ने बिल लाने पर सरकार की आलोचना की है। इन सबके बीच, आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद यादव का एक पुराना वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें वे वक्फ के खिलाफ कड़ा कानून बनाने की मांग कर रहे हैं। लालू ने साल 2010 में संसद में वक्फ के खिलाफ कानून बनाने की मांग की थी। वीडियो में लालू प्रसाद यादव संसद में कहते हुए दिख रहे हैं, ”कड़ा कानून बनाना चाहिए। सारी जमीनें हड़प ली गई हैं। चाहे सरकारी हो या कोई और। पटना के डाक बंगला पर जितनी प्रॉपर्टी थी, इन सब पर अपार्टमेंट बना लिया गया है। लूट हुई है। बिल लेकर आइए, इसे हम लोग पास कर देंगे। आगे से कड़ाई से प्रक्रिया बनानी चाहिए।” बिहार के डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने भी लालू यादव का यह वीडियो शेयर किया है। उन्होंने लिखा, ”लालू यादव जी ने 2010 में संसद में स्वीकार किया था कि वक्फ बोर्ड में जमीन कब्जा के नाम पर भारी लूट-पाट चल रहा है।” इसके अलावा, एनडीए के कई अन्य नेताओं ने भी यह वीडियो शेयर किया है। जीतन राम मांझी ने भी वीडियो शेयर करते हुए विपक्ष पर निशाना साधा है। उन्होंने लिखा, ”वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध कुछ लोग सिंर्फ इसलिए कर रहें हैं क्योंकि यह कानून नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व वाली सरकार ला रही हैं। वैसे 2010 में लालू प्रसाद यादव जी ने वक्फ के कड़े कानून बनाए जाने की बात कही थी। मेरा INDI गठबंधन वालों से आग्रह है कि लालू जी के बातों को ध्यान से सुनें और सदन में वक्फ संशोधन बिल 2025 के पक्ष में मतदान करें।” लोकसभा में वक्फ बिल पेश केंद्रीय अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रीजीजू ने बुधवार को लोकसभा में वक्फ (संशोधन) विधेयक, 2025 को चर्चा और पारित कराने के लिए पेश करते हुए कहा कि पूर्ववर्ती यूपीए सरकार ने वक्फ कानून में बदलावों के जरिये इसे अन्य कानूनों से ऊपर कर दिया था, इसलिए इसमें नये संशोधनों की जरूरत पड़ी। रीजीजू ने सदन में विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि आपने उन मुद्दों पर लोगों को गुमराह करने की कोशिश की, जो वक्फ विधेयक का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने विधेयक को लेकर विपक्षी दलों द्वारा जताई जा रही चिंताओं को दूर करने की कोशिश करते हुए कहा कि सरकार किसी भी धार्मिक संस्था में हस्तक्षेप नहीं करने जा रही। उन्होंने कहा, ”यूपीए सरकार ने वक्फ कानून में बदलावों के जरिए इसे अन्य कानूनों से ऊपर कर दिया था, इसलिए इसमें नये संशोधनों की आवश्यकता पड़ी।”

भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने वक्फ बिल की वकालत करते हुए बताया कि ‘बाबा साहब का संविधान चलेगा, मुगलिया फरमान नहीं’

नई दिल्ली लोकसभा में वक्फ संशोधन विधेयक 2024 (Waqf Amendment Bill) पेश हो गया है। बिल पर चर्चा करते हुए भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने वक्फ बिल की वकालत करते हुए बताया कि आखिर सरकार की ओर से ये बिल क्यों लाया गया। भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने कहा, “यह विधेयक नहीं बल्कि उम्मीद (एकीकृत वक्फ प्रबंधन सशक्तिकरण, दक्षता और विकास) है। इस उम्मीद में सशक्तिकरण, दक्षता और विकास है। इसे देखते हुए देश के लोग इसका समर्थन कर रहे हैं। कैथोलिक बिशप कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया, चर्च ऑफ भारत, केरल काउंसिल ऑफ चर्चेज और केरल कैथोलिक बिशप काउंसिल, ऑल इंडिया सूफी सज्जादानशीन काउंसिल और मुस्लिम राष्ट्रीय मंच जैसे कई संगठनों ने इसका समर्थन किया है। मैं इन सभी संस्थानों को धन्यवाद देता हूं। वक्फ भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है: अनुराग ठाकुर अनुराग ठाकुर ने आगे कहा,” वक्फ में संशोधन करने का समय आ गया है क्योंकि यह अत्याचार और भ्रष्टाचार का अड्डा बन गया है। इसे खत्म करने और संशोधित करने का समय आ गया है। भारत को वक्फ के डर से मुक्ति चाहिए क्योंकि कांग्रेस के शासन में बने वक्फ कानून का मतलब था ‘खाता न बही, जो वक्फ कहे वही सही”। अनुराग ठाकुर ने कहा कि आपको तय करना है कि वक्फ के साथ रहना है या बाबा साहब के संविधान के साथ। ये वक्फ बिल इस बात का साफ संदेश है कि यहां बाबा साहब का संविधान चलेगा, मुगलिया फरमान नहीं। ये बिल तुष्टिकरण की राजनीति का अंतिम संस्कार करने वाला है। ये बिल मुस्लिम विरोधी नहीं: ललन सिंह बता दें कि एनडीए के सभी सांसदों ने इस बिल की पैरवी की है। जेडीयू सांसद ललन सिंह ने कहा कि ये बिल मुसलमान विरोधी नहीं है। ऐसा नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है। मोदीजी को कोस रहे हैं, उनका चेहरा पसंद नहीं आ रहा है तो मत देखिए उनकी तरफ। 2013 में आपने जो पाप किया था, उसे समाप्त करके पारदर्शिता लाने का काम किया है।

इसी माह बीजेपी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष का होगा ऐलान

नई दिल्ली  कौन होगा भारतीय जनता पार्टी का अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष? यह सवाल लंबे समय से राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। जेपी नड्डा का कार्यकाल समाप्त होने के बावजूद, अब तक नए अध्यक्ष की घोषणा नहीं की गई है, और वह अभी भी एक्सटेंशन पर पार्टी की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इस बीच, खबरें थीं कि बीजेपी और आरएसएस नए अध्यक्ष को लेकर एकमत नहीं थे। बीजेपी चाहती थी कि नेतृत्व ऐसा हो, जिसने नड्डा की तरह संगठन को सफलता दिलाई हो, जबकि आरएसएस की प्राथमिकता संगठन से जुड़े, विचारधारा से मजबूत और उसकी नीतियों को आत्मसात करने वाले नेता की थी। हालांकि, 30 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की नागपुर में हुई मुलाकात के बाद अटकलें तेज़ हो गई हैं कि जल्द ही बीजेपी को नया अध्यक्ष मिल सकता है। सूत्रों के अनुसार, बीजेपी इस महीने अपने नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के नाम की घोषणा कर सकती है। संभावना जताई जा रही है कि अप्रैल के तीसरे हफ्ते तक यह फैसला सार्वजनिक हो जाएगा।वहीं, 4 अप्रैल को संसद सत्र समाप्त होने के बाद इस प्रक्रिया में तेजी आने की उम्मीद है। सिर्फ राष्ट्रीय अध्यक्ष ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों के बीजेपी प्रदेश अध्यक्षों के नामों का ऐलान भी अगले कुछ हफ्तों में हो सकता है। कौन बनेगा अध्यक्ष? बीजेपी में राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव सिर्फ एक औपचारिक नियुक्ति नहीं होती, बल्कि यह लोकसभा चुनाव 2029 और आने वाले राज्य चुनावों की रणनीति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

सीपीएम को जमीनी स्तर पर वैचारिक काम को मजबूत करने की जरूरत: प्रकाश करात

नई दिल्ली  सीपीएम के सीनियर नेता प्रकाश करात ने बीजेपी और आरएसएस की तारीफ की है। उन्होंने कहा कि हम बीजेपी-आरएसएस से लड़ने की बात करते हैं, लेकिन चुनाव के समय। आरएसएस सांस्कृतिक, सामाजिक क्षेत्रों में काम करता है। करात ने अपनी पार्टी की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए बीजेपी और संघ की संगठनात्मक रणनीति से सबक लेने की जरूरत पर जोर दिया। अपनी पार्टी की रणनीति पर उठाए सवाल इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में करात ने स्पष्ट किया कि उनका यह बयान भाजपा-आरएसएस की तारीफ नहीं, बल्कि सीपीएम की कमियों को उजागर करने और उसका मुकाबला करने की रणनीति पर आत्म-चिंतन है। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब वामपंथी दल देश में घटते प्रभाव और पश्चिम बंगाल व केरल जैसे अपने गढ़ों में भी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ‘RSS कई स्तरों पर सक्रिय, हम कहां’ करात ने कहा, “हम भाजपा, आरएसएस और हिंदुत्व ताकतों से लड़ने की बात करते हैं। लेकिन वे कैसे बढ़े हैं? हम ज्यादातर पार्टियों की तरह चुनाव के समय ही संगठन और लड़ाई पर ध्यान देते हैं। आरएसएस सांस्कृतिक और सामाजिक क्षेत्रों में काम करता है, कई स्तरों पर सक्रिय है। हम कहां हैं?” ‘RSS का मुकाबला करने के लिए करना होगा काम’ उनका यह बयान सीपीएम की उस पुरानी आलोचना को पर जोर देता है, जिसमें कहा जाता है कि पार्टी वैचारिक स्तर पर सक्रियता के बजाय चुनावी राजनीति में उलझी रहती है। हालांकि, करात ने साफ किया कि इसका मतलब यह नहीं कि उनकी पार्टी को आरएसएस की नकल करनी चाहिए, बल्कि उसका मुकाबला करने के लिए प्रभावी ढंग से काम करना चाहिए। ‘वामपंथ लोगों की आस्था का विरोधी नहीं’ बिहार और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले करात का यह बयान काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव में पार्टी का खाता भी नहीं खुला, जबकि केरल में वह सत्ता में बनी हुई है। करात का यह बयान 2022 में हुए पार्टी कांग्रेस के उस प्रस्ताव से भी जुड़ा है, जिसमें धार्मिक आस्थावानों के बीच काम करने और उन्हें यह समझाने का निर्देश दिया गया था कि वामपंथ उनकी आस्था का विरोधी नहीं, बल्कि धर्म के राजनीतिक दुरुपयोग का खिलाफ है। करात ने माना कि इस दिशा में पार्टी नाकाम रही है। उन्होंने आगे कहा, “हमें लोगों को यह बताना होगा कि हम उनकी धार्मिक भावनाओं के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि धर्म को हथियार बनाने के खिलाफ हैं।” करात का मानना है कि अगर सीपीआईएम को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखनी है, तो उसे चुनावी लड़ाई से इतर जमीनी स्तर पर वैचारिक काम को मजबूत करना होगा। माना जा रहा है कि करात का यह बयान वामपंथी आंदोलन में एक नई बहस को जन्म दे सकता है। जहां एक ओर यह पार्टी के भीतर आत्म-आलोचना की परंपरा को दर्शाता है, वहीं यह सवाल भी उठता है कि क्या सीपीएम अपनी पुरानी रणनीति में बदलाव के लिए तैयार है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या करात के इस आह्वान का असर पार्टी की कार्यशैली पर पड़ता है या यह महज एक सैद्धांतिक चर्चा बनकर रह जाता है।

संघ-भाजपा में तालमेल से जुड़े सुखद संकेत, नागपुर में हुआ संघ-भाजपा का महासंगम

नई दिल्ली प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रविवार को नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय का दौरा बहु प्रतिक्षित था. पिछले साल बीजेपी और संघ के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बाद इस यात्रा पर पूरे देश की निगाहें थीं. हालांकि जिस तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले कुछ समय में आरएसएस की तारीफों की पुल बांधे हैं उससे पहले से स्पष्ट था कि संघ और बीजेपी के बीच में अब कोई कटुता नहीं रह गई है. हेडगेवार स्मृति मंदिर जो आरएसएस के पहले दो सरसंघचालकों के.बी. हेडगेवार और एम.एस. गोलवलकर की स्मृति में बना है, वहां मोदी का जाना खुद संघ के लोगों के लिए अप्रत्याशित रहा. इसे भाजपा और आरएसएस के बीच संबंधों को सुधारने और एकता प्रदर्शित करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है. पर मोदी नागपुर में डॉ. आंबेडकर से संबंधित पवित्र दीक्षाभूमि जाना नहीं भूले. ये वही जगह है जहां डॉ. आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. आइये मोदी की इस यात्रा के राजनीतिक पहलुओं की चर्चा करते हैं. 1-समझना होगा प्रयागराज महाकुंभ के बाद नागपुर के घटनाक्रम को प्रयागराज में कुंभ हर 12 साल पर लगता रहा है. पर इस बार जिस तरह की भीड़ उमड़ी और जिस तरह का उत्साह पूरे देश में देखने को मिला वह अभूतपूर्व था. इसके पीछे हिंदुत्व की उभार से इनकार नहीं किया जा सकता है. पूरा उत्तर भारत कुंभ के दौरान चोक हो गया था. करीब 65 करोड़ लोग अगर कुंभ पहुंचे तो इसका मतलब है कि देश में रहने वाला हर दूसरा आदमी कुंभ आया. जात-पात से परे जाकर हिंदुओं ने संगम स्‍नान किया. यह एक हिंदू पुनर्जागरण जैसी चीज थी. जाहिर है कि इसके पीछे संघ की दशकों की मेहनत थी. इतना ही नहीं संघ के कार्यकर्ताओं ने इस आयोजन को सफल बनाने के लिए जबरदस्त मेहनत की थी. कुंभ की व्यवस्था केवल सरकारी अधिकारियों के वश की बात नहीं थी. शायद यही कारण है कि पीएम मोदी ने अपनी नागपुर दौरे में  स्वयंसेवकों के प्रयागराज के महाकुंभ मेले में निभाई गई भूमिका के लिए सराहना की. और इससे यह भी साबित हो रहा है कि बीजेपी के कोर एजेंडे में संघ की भूमिका महत्वपूर्ण हो रही है. क्‍योंकि, मोदी की खा‍स बात यह है कि वह हवा के रुख को बखूबी पहचानते हैं. और संघ भी यह समझ रहा है कि हिंदुत्‍व की बहती हवा में वह भाजपा से अलग खड़ा नहीं रह सकता. 2-क्‍या संदेश है संघ के लिए आम तौर पर ऐसी चर्चा चल रही थी बीजेपी और आरएसएस में एक दूरी आ गई है. साल 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा के खराब प्रदर्शन के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत की कुछ टिप्पणियों को पार्टी नेतृत्व और प्रधानमंत्री मोदी की सीधी आलोचना के रूप में भी देखा गया था. माना जा रहा था कि बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा का एक बयान संघ को बहुत नागवार लगा था. जिसके बाद संघ लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टो को सपोर्ट देने से पीछे हट गया था. लोकसभा चुनाव से पहले, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा था कि भाजपा अब उस दौर से आगे निकल चुकी है जब उसे संघ की जरूरत थी, और अब वह सक्षम है तथा अपने फैसले खुद लेती है. इसके बाद बीजेपी और संघ के बीच कुछ दूरियां देखने को मिलीं. पर हरियाणा,  महाराष्ट्र और दिल्ली विधानसभा चुनावों की जीत में आरएसएस की बहुत बड़ी भूमिका निकल कर सामने आई. देखने को यह भी मिला कि जो आरएसएस पहले पर्दे के पीछे से बीजेपी के लिए काम करती थी अब वो खुलकर अपने कार्यों के बारे में मीडिया को भी बताने लगी थी. जैसे हरियाणा विधानसभा और दिल्ली विधानसभा चुनावों में संघ की पूरी स्ट्रैटजी अखबारों में छपने लगी. पर असली खेल महाकुंभ के बाद हुआ है. महाकुंभ में जिस तरह पूरे देश से हिंदू उमड़े हैं वह एक तरीके से हिंदुओं का पुनर्जागरण ही है. जाहिर है कि इसके पीछे कहीं न कहीं आरएसएस की बरसों से चल रही साधना है. मोदी की यात्रा से यह साफ हो गया है कि संघ अब केवल वैचारिक और सांस्कृतिक संस्था ही नहीं है.  बीजेपी में उसकी भूमिका ऊपर उठ चुकी है.  3-क्‍या संदेश है भाजपा के लिए भाजपा के नेताओं ने पूर्व में बहुत सावधानी बरतते हुए सरकार और संघ के बीच एक क्लीयर रेखा खींच दी थी. पर नरेंद्र मोदी कई मौकों पर संघ की तारीफ करने में नहीं चूकते हैं. इसके बारे में कहा जाता है कि खुद नरेंद्र मोदी आरएसएस के प्रचारक रहे हैं इसलिए उन्हें किसी प्रकार की हिचक नहीं होती है. इसके पहले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी इस तरह की तारीफ से बचते रहे.अभी कुछ दिन पहले मोदी ने एक पॉडकास्ट में अपने जीवन को सही मार्गदर्शन देने के लिए संघ का आभार जताया था.  प्रधानमंत्री ने आरएसएस की तारीफ नागपुर में भी आरएसएस को एक ऐसे संगठन के रूप में संदर्भित किया जिसने समर्पण और सेवा के उच्चतम सिद्धांतों को कायम रखा. मोदी ने संघ की राष्ट्र निर्माण और विकास में रचनात्मक भूमिका को रेखांकित करके अपनी 2047 तक विकसित भारत की योजनाओं में संघ की भूमिका के महत्व को भी दर्शाया. जाहिर है कि बीजेपी में बनने वाले नए अध्यक्ष और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उत्तराधिकारी को ढूंढने और उसे तैयार करने की भूमिका में संघ की अब महत्वपूर्ण भूमिका होने वाली है. 4-क्‍या संदेश है हिंदू एकता के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संघ मुख्यालय के दौरे के साथ ही डॉ. भीमराव आंबेडकर के जीवन से संबंधित दीक्षाभूमि का भी दौरा कर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. आरएसएस पर हिंदू धर्म का एक तबका आरोप लगाता रहा है कि संघ अभी भी वर्ण व्यवस्था का पोषक है. संघ का कोई प्रमुख दलित या पिछड़ी जाति का शख्स नहीं बन सका. पर पीएम मोदी ने अपनी छवि एक पिछड़े नेता ओर दलितों के शुभचिंतक के रूप में बना ली है. शायद यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने संघ मुख्यालय में दिये गये अपने संबोधन में भी बाबा साहेब को याद किया और भारतीय संविधान की भरपूर प्रशंसा की.बीजेपी और संघ दोनों के लिए दलितों के बीच पैठ बनाना आज पहली प्राथमिकता है. दीक्षाभूमि वही जगह है जहां आंबेडकर ने 1956 में अपने हजारों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था. मोदी … Read more

वक्फ बिल पर वोटिंग के लिए भाजपा ने जारी की व्हिप, लोकसभा में सभी सांसद हाजिर रहें

नई दिल्ली लोकसभा में बुधवार को वक्फ संशोधन विधेयक पर वोटिंग होनी है। इसके लिए भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने कमर कस ली है। यहां तक कि भाजपा ने मंगलवार को ही व्हिप जारी कर दी है और अपने सभी सांसदों से लोकसभा में मौजूद रहने को कहा है। पार्टी की ओर से जारी व्हिप में कहा गया कि बुधवार को सदन में अति महत्वपूर्ण विधायी कार्य है। उन्हें पारित करने के लिए सभी लोग पार्टी का समर्थन करें और वोटिंग करें। व्हिप में सभी सांसदों से पूरे दिन सदन में ही मौजूद रहने को कहा गया है। भाजपा के पास लोकसभा में 240 सांसद ही हैं। सरकार जेडीयू और टीडीपी पर निर्भर है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि इस विधेयक को लेकर किस दल का क्या रुख रहेगा। अब तक चिराग पासवान की पार्टी लोजपा-आर ने खुलकर समर्थन नहीं किया है, लेकिन विपक्ष को मुसलमानों को डराने से बचने की नसीहत दी है। इसी तरह जेडीयू का स्टैंड भी क्लियर नहीं है। ललन सिंह ने कहा कि हम लोकसभा में ही अपना रुख स्पष्ट करेंगे। इसके चलते सस्पेंस भी बढ़ गया है कि आखिर क्या होगा। वहीं संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने दावा किया है कि सरकार को अपने सहयोगी दलों के अलावा विपक्ष के भी कुछ सांसदों का समर्थन हासिल है। सूत्रों ने मंगलवार को बताया कि विधेयक पर सदन में आठ घंटे की प्रस्तावित चर्चा के बाद अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रीजीजू जवाब देंगे। इस विधेयक को पारित कराने के लिए सदन की मंजूरी लेंगे। सूत्रों ने बताया कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की अध्यक्षता में कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में इस मुद्दे पर चर्चा हुई। पिछले साल विधेयक पेश करते समय सरकार ने इसे दोनों सदनों की एक संयुक्त समिति को भेजने का प्रस्ताव किया था। समिति द्वारा रिपोर्ट प्रस्तुत किये जाने के बाद उसकी सिफारिश के आधार पर केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मूल विधेयक में कुछ बदलावों को मंजूरी दी थी। बहस के बाद मीटिंग छोड़ आए विपक्ष के नेता कार्य मंत्रणा समिति की बैठक में विपक्ष ने विधेयक पर चर्चा के लिए 12 घंटे का समय आवंटित करने की मांग की, जबकि सरकार ने कम समय रखने पर जोर दिया ताकि अन्य विधायी कामकाज निपटाया जा सके। इस मुद्दे पर बीएसी बैठक में सरकार और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हुई और विपक्षी दलों के नेता बैठक छोड़कर बाहर आ गए। हालांकि बाद में रीजिजू ने संसद परिसर में मीडिया से कहा कि कुछ दल चार से छह घंटे की चर्चा चाहते थे, वहीं विपक्ष 12 घंटे की चर्चा कराने पर अड़ा रहा। चर्चा के लिए स्पीकर ने तय किया 8 घंटे का वक्त उन्होंने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष ने चर्चा के लिए आठ घंटे निर्धारित किए हैं और सदन की भावना के अनुरूप इस अवधि को बढ़ाया जा सकता है। रीजिजू ने इस बात पर हैरानी जताई कि विपक्ष ने बीएसी की बैठक से वॉकआउट क्यों किया? रीजिजू ने कहा कि वह बुधवार को 12 बजे निचले सदन में प्रश्नकाल समाप्त होते ही विधेयक को चर्चा और पारित कराने के लिए रखेंगे। उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए दावा किया कि कुछ दल चर्चा से बचने के लिए बहाने बना रहे हैं।

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