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महिला और पुरुष वयस्क हैं और उनकी आपस में शादी नहीं हुई है, तब भी वे साथ रह सकते हैं, यह उनका अधिकार है :HC

प्रयागराज यदि महिला और पुरुष वयस्क हैं और उनकी आपस में शादी नहीं हुई है, तब भी वे साथ रह सकते हैं। यह उनका अधिकार है और पुलिस को उन्हें सुरक्षा प्रदान करनी होगी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अलग-अलग मजहबों से ताल्लुक रखने वाले महिला पुरुष के लिव इन में रहने के मामले में यह फैसला सुनाया है। अदालत ने यह फैसला महिला और पुरुष के एक साल 4 महीने के बच्चे की अर्जी पर दिया। बच्चे के माता-पिता का धर्म अलग है और दोनों ही 2018 से साथ रह रहे हैं। याचिका में बच्चे की ओर से कहा गया कि मेरी मां संबंधित व्यक्ति के साथ रह रही है क्योंकि उनके पहले पति की मौत हो गई थी। अब वे दोनों साथ हैं और उनसे ही मेरा जन्म हुआ है। ऐसी स्थिति में उनका साथ रहना मेरे लिए जरूरी है। इस पर जस्टिस शेखर सर्राफ और जस्टिस विपिन चंद्र दीक्षित की बेंच ने कहा, ‘हमारे विचार से संविधान में जो पैरेंट्स की परिभाषा है, उसके तहत दो वयस्क लोग साथ रह सकते हैं। भले ही उन लोगों की शादी न हुई हो।’ दरअसल याचिका में कहा गया कि महिला और युवक को परेशान किया जा रहा है, लेकिन पुलिस ने अब तक एफआईआर भी दर्ज नहीं की है। इस पर अदालत ने संभल के एसपी को आदेश दिया कि एफआईआर दर्ज होनी चाहिए। इसके अलावा बेंच ने कहा कि यदि ये दोनों पुलिस के पास पहुंचते हैं तो उन्हें सुरक्षा प्रदान की जाए। उनके बच्चे को भी जरूरी सिक्योरिटी मिलनी चाहिए। बेंच ने कहा कि पुलिस को हमारे फैसले के अनुसार ही काम करना होगा। दरअसल इस मामले में महिला का आरोप है कि उसके ससुराल पक्ष की ओर से धमकियां मिल रही हैं। उन्हें कई बार मारने-पीटने का प्रयास भी किया गया, लेकिन प्रशासन ने कोई ऐक्शन नहीं लिया। इसके अलावा पुलिस ने एफआईआर तक दर्ज नहीं की। पति की मौत के बाद शुरू हुआ लिव इन और बच्चे का जन्म अर्जी में कहा गया कि पति की मौत के बाद महिला नए रिश्ते में आई और अब लिव इन रिलेशनशिप में रह रही है। इसी रिलेशनशिप के दौरान बच्चे का जन्म हुआ। अब बच्चे के आधार पर ही महिला और पुरुष ने साथ रहने का अधिकार मांगा है। इसके अलावा धमकी देने वालों से सुरक्षा दिलाने की भी गुहार की है। इस मामले में हाई कोर्ट का यह फैसला कई अन्य मसलों के लिए भी नजीर बन सकता है।

प्रदेश में स्वीकार नहीं होगा दूसरे राज्यों का ‘जाति प्रमाण-पत्र’, हाईकोर्ट का फैसला

इंदौर  किसी अन्य राज्य से जारी जाति प्रमाण-पत्र मध्यप्रदेश में उस जाति से जुड़े लाभ के लिए उपयोग नहीं किया जा सकता। न ही अन्य राज्य के जाति प्रमाण-पत्र के आधार पर मप्र में किसी तरह की पात्रता उसे मिलती है। मप्र हाईकोर्ट जस्टिस विवेक रुसिया की खंडपीठ ने ये अहम फैसला सुनाया।  वर्ष 2015 में उज्जैन नगर निगम महापौर पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित था। यहां महापौर पद के लिए प्रीति गेहलोद ने नामांकन दाखिल किया था। उन्होंने नामांकन के साथ राजस्थान से जारी अनुसूचित जाति वर्ग का प्रमाणपत्र लगाया था। इसे निर्वाचन अधिकारी ने अमान्य करते हुए उनका फॉर्म निरस्त कर दिया था। इस पर उन्होंने उज्जैन जिला न्यायालय में याचिका लगाई थी। कोर्ट ने निर्वाचन अधिकारी के फैसले को सही बताते हुए उसे खारिज कर दिया था। इस पर गेहलोद ने हाईकोर्ट में अपील की थी। नहीं मिलेगी सुविधा तर्क दिया था कि चूंकि बैरवा जाति राजस्थान और मध्यप्रदेश दोनों ही राज्यों में अनुसूचित जाति वर्ग में है, इसलिए उनका जाति प्रमाण-पत्र सही नहीं मानना गलत निर्णय है। इस पर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा 2014 में जारी आदेश के आधार पर ये बात मानी कि आरक्षण सुविधा उसी राज्य में उपलब्ध होगी, जहां से जाति प्रमाण-पत्र जारी किया गया। राज्य सरकार ने स्पष्ट किया है कि मप्र द्वारा जारी जाति प्रमाण-पत्र के अभाव में मप्र में आरक्षण सुविधा उपलब्ध नहीं होगी। इस आधार पर कोर्ट ने चुनाव याचिका खारिज किए जाने के फैसले को सही बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने OBC वर्ग के 27 फीसदी रिजर्वेशन के खिलाफ स्पेशल लीव पिटीशन खारिज कर दी

भोपाल  मध्य प्रदेश में लंबे समय से ओबीसी को आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी किए जाने का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा था। इस पर अब बड़ी खबर सामने आई है। एमपी ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का फैसला लागू रहेगा सुप्रीम कोर्ट ने एमपी हाई कोर्ट के फैसले को सही माना है। साथ ही यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में लगाई स्पेशल लीव पिटीशन खारिज कर दी है। दरअसल, साल 2019 में कमलनाथ सरकार ने ओबीसी वर्ग का आरक्षण 14 फीसदी से बढ़ाकर 27 फीसदी कर दिया था। विधानसभा में इसका विधेयक पास हो गया। 2 सितंबर 2021 के दिन सामान्य प्रशासन विभाग ने ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण देने का सर्कुलर जारी कर दिया। हालांकि इसके साथ ही यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई। हाईकोर्ट ने निरस्त की चुनौती वाली याचिका यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन की तरफ से लगाई याचिका में सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने 28 जनवरी 2025 को याचिका खारिज कर दी। इसके बाद इस संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल की। इस पर सोमवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आ गया। उन्होंने याचिका खारिज करते हुए कहा कि 27 फीसदी ओबीसी को आरक्षण लागू होने में मध्य प्रदेश में कोई न्यायिक अड़चन नहीं है। 27 प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता साफ इस मामले में हाईकोर्ट भी यूथ फॉर इक्वलिटी की याचिका खारिज कर चुका है। हाईकोर्ट ने 28 जनवरी को दो याचिकाएं खारिज की थीं। यूथ फॉर इक्वलिटी की याचिका में ओबीसी के 27 प्रतिशत आरक्षण के सर्कुलर को चुनौती दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट में लगी एसएलपी खारिज कराने के लिए ओबीसी एडवोकेट वेलफेयर एसोसिएशन ने अपना पक्ष दमदारी से रखा। यूथ फॉर इक्वलिटी की याचिका खारिज होने के साथ ही एमपी में ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का रास्ता साफ हो गया है। आरक्षण पर कोई कानूनी रोक नहीं ‘यूथ फॉर इक्वलिटी’ की याचिका पर महत्वपूर्ण सुनवाई में मध्यप्रदेश सरकार की ओर से पक्ष प्रस्तुत करने कोई प्रतिनिधि मौजूद नहीं हुआ। इससे सरकार द्वारा मामले को जानबूझकर लटकाने की कोशिश करने की आशंका उत्पन्न हुई। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ने न केवल याचिका को खारिज कर दिया बल्कि ये भी साफ कर दिया है कि ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण पर कोई कानूनी रोक नहीं है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति राजेश बिंदल ने मामले की सुनवाई की। एडवोकेट वरुण ठाकुर एवं एडवोकेट रामकरण ने ओबीसी महासभा की ओर से पक्ष रखा। ओबीसी महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में यह केस लड़ने के लिए समुदाय ये एक-एक रुपए एकत्रित किए थे। ओबीसी को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण एमपी में कांग्रेस की तत्कालीन कमलनाथ सरकार द्वारा ओबीसी को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया गया था। 2019 में लिए गए इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका लगाई गई थी जिसे खारिज कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट में यह एसएलपी यूथ फॉर इक्वेलिटी संगठन द्वारा दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में एमपी हाईकोर्ट के आदेश को उचित बताते हुए स्पष्ट किया कि ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण में कोई न्यायिक अड़चन नहीं हैं। गौरतलब है कि फरवरी माह में ही एमपी हाईकोर्ट जबलपुर के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैथ और न्यायाधीश विवेक जैन की युगलपीठ ने ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण के कानून का पालन करने का आदेश दिया था। पीठ ने यह भी कहा था कि 27 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर किसी प्रकार की रोक नहीं है। वायरल हुआ पूर्व सीएम कमलनाथ का बयान मध्यप्रदेश में ओबीसी वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने में कोई न्यायिक अड़चन नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को सही मानते हुए यह स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण पर कोई रोक नहीं हैं। उन्होंने आगे लिखा कि अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल में 2019 में मैंने प्रदेश के ओबीसी वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण देने का कानून बनाया था। उसके बाद से बनी भाजपा की सरकार असंवैधानिक रूप से षडयंत्र रचकर लगातार ओबीसी को आरक्षण से वंचित कर रही है। पहले माननीय मध्य प्रदेश हाईकोर्ट और अब सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट कर दिया है कि OBC को 27 प्रतिशत आरक्षण देने वाले क़ानून पर कोई रोक नहीं है। बीजेपी को अब मध्य प्रदेश के ओबीसी समाज से माफी मांगनी चाहिए और तत्काल प्रभाव से प्रदेश में ओबीसी को 27% आरक्षण देना चाहिए।

भोज विश्वविद्यालय में नियुक्तियों के मामले में HC ने नियुक्तियां कीं निरस्त का दिए आदेश

भोपाल मध्य प्रदेश भोज मुक्त विश्वविद्यालय में की गई नियुक्तियों को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की युगलपीठ ने मनमानी और दूषित करार देते हुए निरस्त कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश श्री सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति विवेक जैन की खंडपीठ ने चयनित अभ्यर्थियों के पक्ष में जारी एकलपीठ के आदेश को रद्द करते हुए नई नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। मध्य प्रदेश शासन और भोज मुक्त विश्वविद्यालय द्वारा दायर अपील में कहा गया था कि वर्ष 2015 में प्रोफेसर, असिस्टेंट प्रोफेसर समेत अन्य पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की गई थी। लेकिन चयन प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं बरती गईं। अपील में यह भी बताया गया कि चयन समिति में संबंधित विषयों के विशेषज्ञों को शामिल नहीं किया गया था, बल्कि अन्य विषयों के विशेषज्ञों से चयन कराया गया, जो नियमों के खिलाफ था। इसके अलावा, चयन समिति ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया। अपील में यह भी उल्लेख किया गया कि अभ्यर्थियों के शैक्षणिक दस्तावेजों की न तो ठीक से जांच की गई और न ही उनका निष्पक्ष मूल्यांकन किया गया। अंकों के कई कॉलम बिना किसी स्पष्टीकरण के खाली छोड़ दिए गए थे। साक्षात्कार में कुछ अभ्यर्थियों को अत्यधिक अंक देकर अन्य अधिक योग्य उम्मीदवारों की अनदेखी की गई, जिससे चयन प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण प्रतीत होती है। इसके साथ ही, विज्ञापनों में महिलाओं और दिव्यांगों के लिए आरक्षण का उल्लेख नहीं किया गया था और न ही आरक्षण रोस्टर उच्च शिक्षा विभाग के निर्देशानुसार तैयार किया गया था। इन अनियमितताओं के कारण चयन प्रक्रिया को निरस्त कर दिया गया था। इसके विरुद्ध चयनित अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिस पर एकलपीठ ने उनके पक्ष में राहतकारी आदेश दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए यह अपील दायर की गई थी।

उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश घोषित करेंगे अपनी संपत्ति, ‘सभी जज पब्लिक करेंगे अपनी संपत्ति का ब्योरा’

नई दिल्ली  न्यायपालिका में पारदर्शिता और लोगों का विश्वास बनाए रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के सभी जजों ने पदभार ग्रहण करने के दौरान ही अपनी संपत्ति का ब्योरा पब्लिक करने का फैसला किया है। सुप्रीम कोर्ट की तरफ से यह फैसला 1 अप्रैल को की गई फुल कोर्ट मीटिंग में लिया गया है। इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित किया गया और यह भावी जजों पर भी लागू होगा। जजों ने यह भी कहा कि संपत्तियों से जुड़ी जानकारी सुप्रीम कोर्ट की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड की जाएगी। हालांकि, वेबसाइट पर संपत्ति की घोषणा करना स्वैच्छिक होगा। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर कहा गया है, ‘सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर संपत्ति की घोषणा करना स्वैच्छिक आधार पर होगा।’ रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना समेत सुप्रीम कोर्ट के 30 जजों ने अपनी संपत्ति का घोषणा पत्र कोर्ट में दिया है। वकीलों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का किया स्वागत वरिष्ठ वकील आदिश अग्रवाल ने समाचार न्यूज एजेंसी एएनआई से बातचीत में कहा, ‘मैं सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का स्वागत करता हूं जिसमें जजों को अपनी संपत्ति आधिकारिक वेबसाइट पर घोषित करने को कहा गया है। इसकी वजह से जनता का भरोसा बहाल होगा, जो पिछली घटनाओं के कारण थोड़ा कम हुआ है। मुझे उम्मीद है कि हाई कोर्ट के जज भी इसका अनुसरण करेंगे। इससे न्यायपालिका में पारदर्शिता और विश्वास सुनिश्चित होगा। जबकि 1977 में इसी तरह के प्रस्ताव पर विचार किया गया था, लेकिन इसे पूरी तरह से लागू नहीं किया गया था।’ जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े विवाद के बाद में आया है। शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने बिल्कुल साफ किया कि जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के तौर पर अपना नया पदभार संभालने के बाद कोई ज्यूडिशियल काम नहीं सौंपा जाएगा। बता दें कि भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने पहले जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर करने की सिफारिश की थी। कॉलेजियम ने साफ किया कि यह ट्रांसफर उनके खिलाफ चल रही जांच से बिल्कुल अलग है। कमेटी ने पुलिस अधिकारियों के बयान दर्ज किए पिछले हफ्ते सीजेआई खन्ना ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यों की कमेटी का गठन किया है। टॉइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के आयोग ने कथित तौर पर दिल्ली पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा और कुछ अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का बयान दर्ज किया है। ऐसा माना जा रहा है कि अरोड़ा ने आयोग को बताया कि स्टोर रूम एक गार्ड रूम से सटा हुआ था, जहां सीआरपीएफ के जवान तैनात थे और स्टोर रूम को बंद रखा जाता था। अरोड़ा ने आयोग को यह भी बताया कि उन्होंने 15 मार्च को शाम करीब 4.50 बजे सुप्रीम कोर्ट को घटना के बारे में सूचित किया था। उन्होंने आयोग को बताया कि जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने दिल्ली हाई कोर्ट के नाम से रजिस्टर फोन नंबर से पीसीआर कॉल की थी और सचिव ने कहा कि उन्हें जज के आवास पर मौजूद एक नौकर ने आग के बारे में सूचित किया था।

रीवा गैंगरेप केस :नवविवाहित महिला से हुई थी हैवानियत; गैंगरेप के आठों दरिंदो को उम्रकैद

रीवा  रीवा जिला न्यायालय ने एक बहुचर्चित गैंगरेप के मामले में 8 आरोपियों को कठोर सजा से दंडित करने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. 6 माह पहले नवदंपती को बंधक बनकर आरोपियों ने गैंगरेप की हैवानियत की थी. इस अपराध को अदालत ने जघन्य माना. सभी आरोपियों को आजीवन कारावास के साथ 2 लाख 30 हजार रुपए के अर्थदंड से भी दंडित किया है. पूरा मामला नवदंपती से हुई हैवानियत से जुड़ा हुआ है. रीवा जिले के गुढ़ थाना इलाके में 21 अक्टूबर 2024 को एक नवदंपति भैरव बाबा की पहाड़ी स्थित मंदिर के दर्शन कर लौट रहा था. तभी आरोपियों ने पति-पत्नी को बंधक बना लिया. आरोपी घटनास्थल पर शराब पार्टी कर रहे थे. आरोपियों ने नवदंपती के साथ मारपीट की और जान से मारने की धमकी देकर महिला से गैंगरेप की वारदात को अंजाम दिया था. वारदात को अंजाम देने की बाद सभी आरोपी फरार हो गए थे. जानकारी मिलते ही पुलिस ने 8 आरोपियों पर BNS 70(1), 127(2), 115, 190, 351(3), 238 का मामला दर्ज किया. पुलिस की अलग-अलग टीमों ने आरोपियों की धरपकड़ के लिए कई जगह दबिश देकर सभी आरोपियों को हिरासत में लिया. लोक अभियोजक अधिवक्ता विकास द्विवेदी ने बताया कि इस मामले को फास्ट ट्रैक में चलाया गया था. 6 महीने के अंदर जिला न्यायालय में चतुर्थ अपर सत्र न्यायाधीश पदमा जाटव की अदालत ने तथ्य प्रमाणित पाए जाने के बाद गैंगरेप के सभी 8 आरोपी रामकिशन, गरुड़ कोरी, राकेश गुप्ता, सुशील कोरी, रजनीश कोरी, दीपक कोरी, राजेंद्र कोरी और लवकुश कोरी आजीवन कारावास की सजा सुनाई है. साथ ही प्रत्येक आरोपियों को 2 लाख 30 हजार के अर्थदंड से भी दंडित किया है. इन्हें आखिरी सांस तक जेल की सलाखों के पीछे रहना होगा.

राजस्थान: हाईकोर्ट ने सरकार से 6,759 ग्राम पंचायतों के चुनावों के स्थगन पर लगाई फटकार

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट ने भजनलाल सरकार से 6,759 ग्राम पंचायतों के चुनावों के स्थगन को लेकर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने सरकार से स्पष्ट रूप से पूछा है कि राज्य में पंचायत चुनाव आखिर कब कराए जाएंगे? जस्टिस इंद्रजीत सिंह की खंडपीठ ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को निर्देश दिए हैं।  दरअसल, जस्टिस इंद्रजीत सिंह की खंडपीठ ने इस मामले में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए सरकार को निर्देश दिया कि 4 फरवरी 2025 के आदेश की पालना करते हुए पंचायत चुनाव का स्पष्ट शेड्यूल प्रस्तुत किया जाए। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख 7 अप्रैल 2025 तय की है। याचिकाकर्ता ने सरकार के जवाब को बताया अपूर्ण याचिकाकर्ता गिरिराज सिंह देवंदा की ओर से पेश अधिवक्ता प्रेमचंद देवंदा ने अदालत में आपत्ति जताई कि सरकार ने पिछले आदेशों के बावजूद पंचायत चुनावों की कोई स्पष्ट समय-सीमा तय नहीं की है। उन्होंने कहा कि सरकार को कोर्ट के आदेश का अनुपालन करना चाहिए था, लेकिन इसके हलफनामे में किसी निश्चित चुनाव कार्यक्रम का उल्लेख नहीं किया गया। सरकार ने चुनाव स्थगित करने के लिए दिए तीन तर्क राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में प्रस्तुत अपने जवाब में चुनाव स्थगन को उचित ठहराने के लिए तीन प्रमुख कारण बताए हैं। पहला तो ये कि प्रदेश में नगरीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव एक साथ कराने पर विचार किया जा रहा है। इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जाएगा, जो यह अध्ययन करेगी कि एक साथ चुनाव कराने से धन, श्रम और समय की कितनी बचत होगी और इससे स्थानीय निकायों को कैसे सशक्त किया जा सकता है। वहीं, दूसरा तर्क बताया कि पिछली सरकार ने कई नए जिले बनाए थे, जिनमें से 9 जिलों को वर्तमान सरकार ने समाप्त कर दिया। अब पूरे प्रदेश में पंचायतों का पुनर्गठन और नगरीय निकायों का परिसीमन किया जा रहा है, इसलिए चुनावों को अभी स्थगित किया गया है। इसके अलावा सरकार का कहना है कि उसने राजस्थान पंचायत राज अधिनियम, 1994 की धारा 95 के तहत प्रशासकों की नियुक्ति की है। यह प्रावधान वैकल्पिक है, जिससे सरकार यह तय कर सकती है कि प्रशासकों की नियुक्ति कैसे की जाए। बताते चलें कि हाईकोर्ट का रुख अब और सख्त हो सकता है, क्योंकि सरकार ने पूर्व आदेशों का स्पष्ट अनुपालन नहीं किया है। यदि अगली सुनवाई 7 अप्रैल को सरकार चुनावों की कोई निश्चित तिथि प्रस्तुत नहीं करती, तो कोर्ट द्वारा कड़ा रुख अपनाया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं का आरोप- संविधान का उल्लंघन याचिकाकर्ताओं के वकील प्रेमचंद देवंदा का कहना है कि राज्य सरकार ने 16 जनवरी 2025 को एक अधिसूचना जारी कर 6,759 पंचायतों के चुनाव स्थगित कर दिए, जो संविधान के अनुच्छेद 243ई, 243के और राजस्थान पंचायत राज अधिनियम 1994 की धारा 17 का उल्लंघन है। उन्होंने तर्क दिया कि सरकार ने लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई और ग्रामीण संस्थाओं को अस्थिर कर दिया है और राज्य में ग्राम पंचायतों के चुनाव रोककर लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया है। सरपंचों को प्रशासक बनाने का फैसला विवादों में सरकार ने जनवरी में चुनाव कराने की जगह मौजूदा सरपंचों को ही प्रशासक नियुक्त कर दिया। पंचायतों में प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरपंचों की सहायता हेतु एक प्रशासकीय समिति गठित की गई, जिसमें उप सरपंच और वार्ड पंच सदस्य शामिल होंगे। यह मॉडल भाजपा शासित मध्य प्रदेश की तर्ज पर लागू किया गया है, जहां पहले भी इसी तरह से सरपंचों को प्रशासक नियुक्त किया गया था। हालांकि, इस फैसले के बाद विपक्ष और पूर्व पंचायत प्रतिनिधियों ने कड़ी आपत्ति जताई है।

एमपी हाईकोर्ट ने दुष्कर्म मामले में आरोपी की मां को मन सह-आरोपी, जाने काया कहा

भोपाल भोपाल रेप के एक मामले पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने इस फैसले में उकसावे की परिभाषा को स्पष्ट करते हुए कहा कि भले ही कोई महिला रेप की आरोपी नहीं हो सकती लेकिन वह रेप के लिए उकसाने की आरोपी हो सकती है। ऐसे में रेप के लिए उकसाने वाली महिला को आईपीसी की धारा 109 के तहत बलात्कार के लिए उकसाने के अपराध में दोषी ठहराया जा सकता है। जानकारी के लिए बता दें कि यह पूरा मामला भोपाल के छोला मंदिर इलाके का है। इसमें रेप की वारदात को अंजाम देने वाला आरोपी के साथ उकसाने के मामले में उसकी मां और भाई के खिलाफ भी मामला दर्ज किया गया। वर्ष 2022 में दर्ज करवाया रेप का मामला पीड़िता ने 21 अगस्त 2022 में भोपाल के छोला मंदिर थाने में रेप की शिकायत दर्ज करवाई थी। पीड़िता ने शिकायत में बताया कि उसके पड़ोसी ने उसके परिवार में शादी का प्रस्ताव रखा था। उसी पर सहमति देने के लिए वह उनके घर गई थी। युवक की मां और उसके भाई ने उसे जबरन आरोपी के कमरे में भेज दिया, जहां उसने पीड़िता के साथ संबंध बनाए। पीड़िता ने बताया कि सगाई के बाद कई बार आरोपी ने उसके साथ संबंध बनाए और उसके बाद शादी करने से इनकार कर दिया। आरोपी की मां पर रेप के लिए उकसाने का आरोप पीड़िता ने अपनी शिकायत में यह भी बताया कि आरोपी की मां ने कहा था कि शादी से पहले संबंध बनाना आम बात है। पीड़िता के अनुसार, पहली बार आरोपी ने 8 जुलाई 2021 को अपने घर पर पीड़िता का रेप किया था। रेप के लिए उकसावे को बताया अपराध मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में रेप मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल और जस्टिस प्रशांत गुप्ता ने अपने निर्णय में कहा है कि भले ही कोई महिला रेप नहीं कर सकती लेकिन आईपीसी धारा 109 के तहत रेप के लिए उकसाने का अपराध कर सकती है। हाईकोर्ट ने कहा कि आईपीसी धारा 376 एक पुरुष से शुरू होती है। लेकिन अपराध केवल एक पुरुष द्वारा नहीं किया जा सकता। इसलिए आईपीसी की धारा 109 के तहत रेप के लिए उकसाने के लिए महिला को दोषी ठहराया गया है। इसके साथ ही जानबूझकर अपराध में सहायता करने को आईपीसी धारा 107 के तहत परिभाषित करते हुए महिला और पुरुष दोनों रेप के लिए उकसाने का दोषी ठहराया। पीड़िता का आरोप पीड़िता ने 21 अगस्त 2022 को भोपाल के छोला मंदिर थाने में रेप की शिकायत दर्ज करवाई थी. उसने आरोप लगाया था कि आरोपी अभिषेक गुप्ता ने शादी का झांसा देकर उसके साथ रेप किया. इतना ही नहीं, आरोपी की मां और भाई भी इस घटना में शामिल थे. पीड़िता के अनुसार, 8 जुलाई 2021 को पहली बार उसे आरोपी के घर बुलाया गया, जहां उसके साथ रेप किया गया. सगाई के बाद भी आरोपी ने कई बार शारीरिक संबंध बनाए और फिर शादी से मुकर गया. पीड़िता ने यह भी आरोप लगाया कि आरोपी की मां ने उसे समझाया था कि शादी से पहले संबंध बनाना आम बात है. MP हाईकोर्ट का रुख हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि रेप के लिए उकसाने वाले भी उतने ही दोषी हैं, जितना कि मुख्य आरोपी. इस आधार पर आरोपी की मां और भाई पर भी कड़ी कार्रवाई के आदेश दिए गए हैं. कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और साफ किया कि रेप के मामलों में उकसाने वालों के खिलाफ भी कठोर दंड दिया जाएगा. हाईकोर्ट में आरोपी ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती बता दें कि पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने धारा 376 (बलात्कार), 376 (2) (एन), 190, 506 और 34 के तहत एफआईआर दर्ज की थी। निचली अदालत ने आरोपी को दोषी पाया था। सरकारी वकील सीएम तिवारी ने बताया की आरोपी ने निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जिसमें आरोपी के साथ कोर्ट ने परिवार के लोगों भी रेप के लिए उकसाने का दोषी ठहराया है औरयाचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा हुक्म : अब पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना आसान नहीं

सुप्रीम कोर्ट का आदेश, पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का संरक्षण सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, पत्रकारों की स्वतंत्रता को मिला संरक्षण सुप्रीम कोर्ट का बड़ा हुक्म : अब पत्रकारों पर मुकदमा दर्ज करना आसान नहीं सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार की आलोचना के आधार पर किसी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता। यह फैसला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अहम है। नई दिल्ली  पत्रकारों की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकार की आलोचना के आधार पर किसी भी पत्रकार के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। इस अधिकार के तहत किसी भी पत्रकार को सरकार की आलोचना करने का पूरा हक है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ सरकार के खिलाफ बोलने या नीतियों पर सवाल उठाने के आधार पर किसी पत्रकार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, “स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यदि सरकार की आलोचना करने पर पत्रकारों को प्रताड़ित किया जाएगा तो इससे प्रेस की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाएगी। सरकार को आलोचना सहन करने की क्षमता विकसित करनी होगी।” पत्रकारों की स्वतंत्रता पर सकारात्मक संदेश सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को पत्रकारों की स्वतंत्रता के लिए एक बड़ी जीत माना जा रहा है। इस फैसले से साफ संकेत मिलता है कि सरकार की आलोचना करना किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और इस अधिकार पर अंकुश लगाने की कोशिश लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। भारतीय प्रेस परिषद (PCI) ने भी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है। PCI ने कहा कि यह फैसला प्रेस की स्वतंत्रता को मजबूत करेगा और पत्रकारों को बिना डर के सच को सामने लाने की प्रेरणा देगा। राजनीतिक हलकों में हलचल सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में भी हलचल मच गई है। विपक्षी दलों ने इस फैसले का स्वागत किया है और इसे लोकतंत्र के लिए सकारात्मक कदम बताया है। वहीं, सरकार के प्रवक्ताओं ने कहा है कि वे इस फैसले का सम्मान करते हैं और कानूनी प्रक्रिया के तहत आगे की रणनीति तैयार करेंगे। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारत में पत्रकारिता की स्वतंत्रता को नया आयाम देगा। इससे पत्रकारों को सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने और जनहित के मुद्दों को उठाने का हौसला मिलेगा। अभिव्यक्ति की आज़ादी का यह संरक्षण न केवल लोकतंत्र की बुनियाद को मजबूत करेगा, बल्कि सरकार को भी अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाएगा।

SC ने HC के देश पर रोक लगा दी जिसमें कहा गया था कि ‘ब्रेस्ट पकड़ना’ और पजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार का प्रयास नहीं

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित आदेश पर रोक लगा दी जिसमें कहा गया था कि ‘ब्रेस्ट पकड़ना’ और पजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार या बलात्कार का प्रयास नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश का स्वत: संज्ञान लिया था. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस फैसले में संवेदनशीलता की कमी दिखाई देती है. जस्टिस भूषण आर गवई ने सुनवाई के दौरान कहा कि हमें एक जज द्वारा ऐसे कठोर शब्दों का प्रयोग करने के लिए खेद है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हमने हाईकोर्ट के आदेश को देखा है. हाईकोर्ट के आदेश के कुछ पैराग्राफ जैसे 24, 25 और 26 में जज द्वारा संवेदनशीलता की पूर्ण कमी को दर्शाता है. ऐसा भी नहीं है कि फैसला जल्द में लिया गया है. इस मामले में सुनवाई पूरी होकर निर्णय रिजर्व होने के 4 महीने बाद निर्णय सुनाया गया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की मां ने भी अदालत का दरवाजा खटखटाया है. उसकी याचिका को भी इसके साथ ही जोड़ा जाए. उससे दोनों पर साथ सुनवाई आगे बढ़ेगी. दरअसल,  इलाहाबाद हाईकोर्ट के 17 मार्च को दिए विवादित फैसले पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सुनवाई हुई. जस्टिस बी आर गवई और जस्टिस ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की बेंच ने इस मामले पर सुनवाई के दौरान कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज की कुछ टिप्पणियों पर रोक लगाई. सुप्रीम कोर्ट ने सॉलिसिटर जनरल और अटॉर्नी जनरल को सुनवाई के दौरान कोर्ट की सहायता करने को कहा है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हम केंद्र, उत्तर प्रदेश को नोटिस जारी करते हैं. कोर्ट ने कहा कि हम दो हफ्ते बाद मंगलवार को इस पर सुनवाई करेंगे. इलाहाबाद कोर्ट ने क्या फैसला सुनाया था? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि पीड़ित के ब्रेस्ट को पकड़ना, और पाजामे के नाड़े को तोड़ने के आरोप के चलते ही आरोपी के खिलाफ रेप की कोशिश का मामला नहीं बन जाता. फैसला देने वाले जज जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा ने 11 साल की लड़की के साथ हुई इस घटना के तथ्यों को रिकॉर्ड करने के बाद यह कहा था कि इन आरोप के चलते यह महिला की गरिमा पर आघात का मामला तो बनता है. लेकिन इसे रेप का प्रयास नहीं कह सकते. पहले क‍िया था इनकार इससे पहले नाबालिग लड़की के साथ रेप की कोशिश से जुड़े फैसले को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार किया था. याचिका में जजमेंट के उस विवादित हिस्से को हटाने की मांग की गई है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि ‘इस केस में पीड़ित के ब्रेस्ट को पकड़ना,और पजामे के नाड़े को तोड़ने के आरोप के चलते ही आरोपी के खिलाफ रेप की कोशिश का मामला नहीं बन जाता’. याचिका में क्या था इलाहाबाद हाई कोर्ट के 17 मार्च को दिए विवादित फैसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जनहित में सुप्रीम कोर्ट से जजमेंट के विवादित हिस्से को हटाने की मांग की गई थी। याचिका में मांग की गई थी कि कोर्ट केन्द्र सरकार/ हाई कोर्ट रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दे कि वो फैसले के इस विवादित हिस्से को हटाया जाए। इसके साथ ही याचिका में मांग की गई थी कि जजों की ओर से की जाने वाली ऐसी विवादित टिप्पणियों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट अपनी ओर से दिशानिर्देश जारी करें। क्यों की खारिज समाचार एजेंसी एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी और प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि न्यायालय इस पर विचार करने के लिए इच्छुक नहीं है। याचिकाकर्ता के वकील ने “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” योजना का हवाला देते हुए अपनी दलीलें शुरू कीं, तो न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने उन्हें बीच में ही रोक दिया। उन्होंने कहा कि इस विषय पर अपने मामले पेश करने वाले वकीलों को “लेक्चरबाजी” नहीं करनी चाहिए। इसके बाद न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी। क्या है मामला यह फैसला पवन और आकाश नामक दो लोगों से जुड़े एक मामले पर आया है, जिन्होंने कथित तौर पर नाबालिग के स्तनों को पकड़ा, उसके पायजामे का नाड़ा फाड़ दिया और उसे एक पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की। शुरुआत में, उन पर आईपीसी की धारा 376 (बलात्कार) और यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (POCSO) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे। हालांकि, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि उनका कृत्य बलात्कार या बलात्कार के प्रयास के रूप में योग्य नहीं था, बल्कि यह गंभीर यौन हमले के कम गंभीर आरोप के अंतर्गत आता है, जो कि भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (बी) और पोक्सो अधिनियम की धारा 9 (एम) के तहत दंडनीय है।  

अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद भी जैन कपल हिन्दू मैरिज एक्ट के तहत तलाक ले सकते हैं?

इंदौर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने सोमवार को अपने एक फैसले के जरिये स्पष्ट किया कि अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद भी जैन समुदाय हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के दायरे में बरकरार है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणियों के साथ इंदौर के फैमिली कोर्ट के एक अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के आठ फरवरी के बहुचर्चित फैसले को रद्द कर दिया। इस फैसले में अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने जैन समुदाय के 37 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर और उसकी 35 वर्षीय पत्नी के आपसी सहमति से तलाक लेने की अर्जी को हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। फैमिली कोर्ट ने किया था खारिज अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश ने अपने फैसले में कहा था कि जैन समुदाय को 2014 में अल्पसंख्यक का दर्जा मिलने के बाद इस धर्म के किसी अनुयायी को ‘‘उसके धर्म से विपरीत मान्यताओं वाले किसी धर्म’’ से संबंधित व्यक्तिगत कानून का लाभ दिया जाना उचित प्रतीत नहीं होता है। सॉफ्टवेयर इंजीनियर ने फैमिली कोर्ट के इस फैसले को हाई कोर्ट की इंदौर बेंच में अपील दायर करके चुनौती दी थी। अपील पर सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में दलील दी कि उन्होंने हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था। हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस संजीव एस. कलगांवकर ने सॉफ्टवेयर इंजीनियर की अपील मंजूर कर ली। इस मामले में हाईकोर्ट ने क्या कहा? हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश के इस निष्कर्ष को ‘‘गंभीर रूप से अवैध’’ और ‘‘स्पष्ट तौर पर अनुचित’’ करार दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधान जैन समुदाय के लोगों पर लागू नहीं होते हैं। बेंच ने अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश को निर्देश भी दिया कि वह जैन समुदाय के दम्पति की तलाक की याचिका पर कानून के अनुसार कार्यवाही करें। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केंद्र सरकार द्वारा जैन समुदाय को अल्पसंख्यक के रूप में मान्यता देने के लिए 11 साल पहले जारी की गई अधिसूचना किसी भी मौजूदा कानून के प्रावधानों को न तो संशोधित या अमान्य करती है, न ही इन प्रावधानों का स्थान लेती है। बेंच ने कहा कि भारतीय संविधान के संस्थापकों और विधायिका ने अपने साझा विवेक के जरिये हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख समुदायों को हिंदू विवाह अधिनियम के दायरे में रखकर एकता के सूत्र में पिरोया है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि जैन समुदाय के दम्पति के मौजूदा मामले में फैमिली कोर्ट के अतिरिक्त अपर प्रधान न्यायाधीश के लिए कानून के स्पष्ट प्रावधानों के विरुद्ध अपने विचार और धारणाएं प्रस्तुत करने का कोई अवसर नहीं था। बेंच ने यह भी कहा कि अगर फैमिली कोर्ट ने इस सवाल पर विचार किया था कि जैन समुदाय के लोगों पर हिंदू विवाह अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं या नहीं, तो वह इस मामले को हाई कोर्ट भेजकर अदालत की राय जान सकता था। यह है मामला इंदौर फैमिली कोर्ट के सामने एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की तरफ से तलाक की याचिका दायर की गई थी। याचिकाकर्ता की शादी 2017 में हुई थी। साल 2024 में दंपती ने फैमिली कोर्ट में हिंदू विवाह अधिनियम (हिंदू मैरिज एक्ट) की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक की मांग की। महिला ने अपने पति के खिलाफ क्रूरता का आरोप लगाया था। हालांकि, सुनवाई में कोर्ट ने यह कहते हुए याचिका वापस कर दी कि वर्ष 2014 में जैन समाज अल्पसंख्यक हो चुका है ऐसे में हिंदू मैरिज एक्ट 1955 के तहत अब जैन समाज इसका लाभ नहीं ले सकता। फैमिली कोर्ट ने कहा कि 27 जनवरी 2014 को केंद्र सरकार जैन समुदाय को अल्पसंख्यक का दर्जा देने की अधिसूचना जारी कर चुकी है। इस धर्म के अनुयायियों को अब हिंदू विवाह अधिनियम के तहत राहत पाने का कोई अधिकार नहीं है। जैन समुदाय परिवार न्यायालय अधिनियम की धारा 7 के तहत अपने वैवाहिक विवादों को समाधान के लिए पेश करने के लिए स्वतंत्र है।

सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा, जिससे लोगों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा, अतिक्रमण के कारण राज्यमार्ग की चौड़ाई हुई कम

जबलपुर  सरकारी जमीन पर अतिक्रमण किये जाने के कारण राजमार्ग की चौड़ाई कम होने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी. मामले में हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की डबल बेंच ने बुरहानपुर कलेक्टर को याचिकाकर्ता के दावे की जांच कर चार सप्ताह में अतिक्रमण हटाने के आदेश जारी किए हैं. बुरहानपुर निवासी समाजिक कार्यकर्ता हर्ष चौकसे ने दायर की है याचिका बुरहानपुर निवासी समाजिक कार्यकर्ता हर्ष चौकसे की तरफ से दायर की गई याचिका में कहा गया है कि बुरहानपुर-अमरावती मार्ग पर डायफूडिया ग्राम की शासकीय भूमि पर लोगों ने अतिक्रमण कर लिया है. जिसकी वजह से राजमार्ग की चौड़ाई काफी कम हो गई है और राहगीरों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. याचिका में कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायाल का स्पष्ट आदेश है कि अतिक्रमणकारियों को किसी प्रकार का बिजली कनेक्शन न दिया जाए. इसके बावजूद बिजली कंपनी ने अतिक्रमणकारियों को बिजली कनेक्शन दे दिए हैं. इस संबंध में जिला कलेक्टर व बिजली कंपनी के अधिकारियों से शिकायत की गई थी. शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण उक्त याचिका दायर की गई है. जिला कलेक्टर होते हैं जिला स्तर पर गठित सार्वजनिक भूमि संरक्षण प्रकोष्ठ के चेयरमैन युगलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि अतिक्रमण संबंधी मामले के लिए जिला स्तर पर सार्वजनिक भूमि संरक्षण प्रकोष्ठ (पीएलपीसी) का गठन किया गया है, जिसके चेयरमैन जिला कलेक्टर होते हैं. युगलपीठ ने कलेक्टर को निर्देश दिया है वह आवेदक के अभ्यावेदन पर जांच करें और यदि अतिक्रमण पाया जाता है तो उसे चार सप्ताह के भीतर हटाएं. याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता धर्मेन्द्र सोनी ने पैरवी की.

हाई स्कूल शिक्षक भर्ती को लेकर HC का बड़ा फैसला, 2 महीने के अंदर होगी टीचरों की भर्ती!

जबलपुर  मध्य प्रदेश में हाई स्कूल शिक्षक भर्ती परीक्षा 2018 को दोबारा कराने के निर्देश हाईकोर्ट ने दिए हैं। हाईकोर्ट की जबलपुर बेंच ने यह अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने सरकार को नियमों को संशोधन कर दोबारा भर्ती करने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा कि पद नहीं है तो अतिरिक्त पद क्रिएट कर याचिकाकर्ताओं की भर्ती की जाए। 2 महीने के अंदर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश बता दें कि हाईकोर्ट ने स्कूल शिक्षा विभाग को 2 महीने के अंदर भर्ती प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए। दरअसल,हाई स्कूल शिक्षक भर्ती प्रक्रिया में SC, ST, OBC और हैंडिकैप्ड को कोई भी छूट नहीं दी गई थी। जबकि ऐसा प्रावधान नियमों में था। इसी को लेकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी। नियमों का उल्लंघन इसके अलावा याचिका में ये भी आरोप लगाया गया था कि SC, ST और OBC उम्मीदवारों को शैक्षणिक योग्यता में छूट नहीं दी गई थी जो कि संविधान और संबंधित नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। याचिका में यह भी कहा गया कि NCT के नियमों का उल्लंघन किया गया है। जिनके अनुसार 2011 से पहले पास होने वाले उम्मीदवारों के लिए 45% अंक का प्रावधान है जबकि SC, ST और OBC उम्मीदवारों को 5% की छूट दी जानी चाहिए।

बिलासपुर कोर्ट ने कहा कि प्राइवेट बस वाले किस टैरिफ पर चला रहे , बसों में किराया भी डिस्प्ले करने को कहा

बिलासपुर प्रदेश में संचालित इंटर सिटी बसों और सिटी बसों के मामले में  हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। शासन ने बताया कि सभी रूट्स पर किराया राउंड फिगर में कर दिया गया है। डीबी ने शासन को सिटी बसों की वर्तमान स्थिति की जानकारी देने के भी निर्देश दिए हैं। उल्लेखनीय है कि बिलासपुर में सिटी बसों की जर्जर स्थिति और प्रदेश में चल रही अंतर नगरीय बस सेवा की खराब हालत पर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया था। इसके बाद से जनहित याचिका के रूप में सुनवाई शुरू कर दी गई थी। काफी पहले हुई सुनवाई में कोर्ट ने पूछा था कि खटारा होती जा रही बसों को लेकर शासन क्या कर रहा है? शासन की ओर से कहा गया था कि केंद्र से ई-बसें बहुत बड़ी संख्या में आ रहीं हैं, इससे खस्ताहाल बसों की समस्या नहीं रह जाएगी। कोर्ट ने इस बात की पूरी जानकारी देने को कहा था कि प्राइवेट बस वाले किस टैरिफ पर चला रहे हैं। बसों में किराया भी डिस्प्ले करने को कहा गया था। सोमवार को चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा, जस्टिस रविन्द्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई सुनवाई में अतिरिक्त महाधिवक्ता ने बताया कि पूर्व में न्यायालय ने राउंड फिगर में जाने का निर्देश दिया था। शासन ने उस पर अमल करते हुए सभी बसों का किराया राउंड फिगर में कर दिया है। इससे अब किसी भी रूट पर किराया दशमलव में नहीं होगा और यात्रियों को भी परेशानी नहीं होगी। डिवीजन बेंच ने शासन से कहा कि अभी सिटी बसों की स्थिति क्या है, इसमें कितनी सही और कितनी जर्जर हैं, इसकी जानकारी अगली सुनवाई में दें।

मदद प्राप्त निजी स्कूलों के शिक्षकों को प्रबंधन सरकार की अनुमति बगैर नौकरी से नहीं हटा सकते

 इंदौर  अनुदान प्राप्त निजी स्कूलों के शिक्षकों को स्कूल प्रबंधन शासन की अनुमति बगैर नौकरी से नहीं हटा सकते। इस टिप्पणी के साथ हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने माहेश्वरी हायर सेकंडरी स्कूल की अपील निरस्त कर दी। मामला जीवविज्ञान संकाय के शिक्षक एसके व्यास का है। नवंबर 1974 में उन्हें स्कूल में उच्च श्रेणी शिक्षक के पद पर नियुक्ति मिली थी। वर्ष 1991 में उन्हें शासन के नियमों के तहत लेक्चरर पद पर पदोन्नति दे दी गई। नौकरी से हटा दिया था व्यास को यह पदोन्नति मप्र अशासकीय शिक्षण संस्था अधिनियम के तहत दी गई थी। वर्ष 2005 में स्कूल ने अचानक व्यास को यह कहते हुए नौकरी से हटा दिया कि स्कूल में कक्षा 11वीं और 12वीं में जीवविज्ञान संकाय में कोई एडमिशन नहीं हुआ है, इसलिए स्कूल को उनकी आवश्यकता नहीं है। स्कूल प्रबंधन के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की व्यास ने स्कूल प्रबंधन के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की। वर्ष 2007 में इसका निराकरण करते हुए कोर्ट ने व्यास को दोबारा नियुक्ति के आदेश दिए, लेकिन स्कूल ने इस फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में अपील कर दी। न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति गजेंद्रसिंह की युगलपीठ ने स्कूल की अपील को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि स्कूल प्रबंधन ने बगैर शासन से अनुमति प्राप्त किए शिक्षक को नौकरी से हटाया, यह सही नहीं है।

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