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अगर कोई व्यक्ति किसी की आय पर निर्भर था, तो वह मुआवजा पाने का अधिकारी होगा, चाहे वह रिश्ते में कोई भी हो- सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में कहा है कि सड़क हादसे में मुआवजा मृतक पर आर्थिक तौर पर निर्भर हर मेंबर को मिलेगा। इस मामले में कानूनी रिप्रेजेंटेटिव की संकीर्ण व्याख्या नहीं की जा सकती है। जो लोग आर्थिक तौर पर मृतक पर निर्भर थे उन्हें दावेदारों की कैटिगरी से बाहर नहीं किया जा सकता है। अदालत ने हाल के फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि कानूनी प्रतिनिधि वह व्यक्ति होता है जो सड़क दुर्घटना में किसी शख्स की मृत्यु के कारण पीड़ित होता है और यह जरूरी नहीं कि केवल पत्नी, पति, माता-पिता या संतान ही हो। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने उस मामले की सुनवाई की जिसमें मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (Motor Accident Claims Tribunal – MACT) ने मुआवजा प्रदान करते समय मृतक के पिता और बहन को आश्रित नहीं माना था। MACT ने माना कि मृतक के पिता उनकी आय पर निर्भर नहीं थे और चूंकि पिता जीवित थे, इसलिए छोटी बहन को भी आश्रित नहीं माना जा सकता था। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने MACT के इस फैसले को बरकरार रखा जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट के सामने आया। सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले को रद्द करते हुए माना कि निचली अदालतों ने अपीलकर्ताओं को मृतक का आश्रित मानने से इनकार करके गलती की थी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि मुआवजा केवल पति-पत्नी, माता-पिता या बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि उन सभी व्यक्तियों तक विस्तार होता है जो मरने वाले के कारण प्रभावित हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजा राशि 17 लाख 52 हजार 500 तय कर दी। क्या है मामला? ग्वालियर में 25 सितंबर 2016 को 24 साल के धीरज सिंह तोमर ऑटो में जा रहे थे। ड्राइवर तेज रफ्तार से ऑटो चला रहा था। लापरवाही के कारण ऑटो दुर्घटनाग्रस्त हो गया और धीरज की मौके पर ही मृत्यु हो गई। एमएसीटी ने मामले में कुल 9,77,200 मुआवजे भुगतान का आदेश दिया गया। मृतक के परिजनों को यह रकम भुगतान किए जाने का निर्देश दिया। लेकिन साथ ही कोर्ट ने मृतक के पिता और बहन को दावेदार नहीं माना और अन्य दावेदारों को यह रकम दिए जाने को कहा गया था। यह फैसला आगे का रास्ता तय करेगा सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ताओं जिनमें मृतक के पिता और बहन को मृतक का आश्रित माना और उन्हें मुआवजा प्रदान किया। यह फैसला भविष्य के मामलों में महत्वपूर्ण प्रभाव डालेगा, क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि मोटर वाहन दुर्घटनाओं में मुआवजा केवल मृतक के पारंपरिक उत्तराधिकारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उन सभी लोगों को मिलेगा जो उसकी आय पर निर्भर थे।  

हाईकोर्ट ने किया बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निराकरण, मां के साथ बेटियां तो अवैध हिरासत नहीं

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने कहा कि बेटियां अपनी मां के साथ हैं, तो अवैध हिरासत नहीं मानी जा सकती। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ पिता की ओर से दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका निरस्त कर दी। कोर्ट ने साफ किया कि यह प्रकरण अवैध हिरासत का नहीं, बल्कि वैवाहिक विवाद का है। राजधानी भोपाल अंतर्गत नवीन नगर निवासी लोकेश पटेल ने आरोप लगाया था कि ससुराल पक्ष से रूपेश चौरसिया सहित अन्य ने पत्नी नेहा पटेल व दो नाबालिग बेटियों को बंधक बना लिया है। लिहाजा, मुक्त कराया जाए। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान भोपाल पुलिस को दोनों नाबालिग बेटियों को पेश करने के निर्देश दिए थे। पुलिस ने दोनों नाबालिग बेटियों को उनकी मां के साथ न्यायालय में पेश किया। पत्नी नेहा ने हाई कोर्ट को बताया कि कुछ व्यक्तिगत मुद्दों के कारण वह याचिकाकर्ता पति के साथ रहने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने खुद ही दोनों बेटियों के साथ पति का घर छोड़ दिया है। वह अपने पति के घर नहीं जाना चाहती हैं। हाई कोर्ट ने अनावेदक पत्नी के जवाब को रिकॉर्ड में लेते हुए अपने आदेश में कहा कि यह अवैध हिरासत का नहीं, बल्कि वैवाहिक विवाद का मामला है। याचिकाकर्ता को वैवाहिक मुद्दों के लिए कानून के अनुसार उचित कार्यवाही की स्वतंत्रता है।

हाईकोर्ट का आदेश बिना मान्यता के छात्रों को एडमिशन देने वाली यूनिवर्सिटी-कॉलेज पर केस दर्ज करो

जबलपुर रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के अंतर्गत सेंट्रल लॉ कॉलेज के छात्रों को मान्यता न होने के चलते बार काउंसिल में रजिस्ट्रेशन ना होने के मामले में अब कॉलेज सहित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय पर भी गाज गिर सकती है। हाईकोर्ट ने इसे छात्रों के साथ धोखाधड़ी करार देते हुए भोपाल कमिश्नर को जांच के लिए आदेशित किया है। बार काउंसिल में एनरोलमेंट ना होने का मामला जबलपुर हाईकोर्ट में व्योम गर्ग,रागिनी गर्ग, शिखा पटेल एवं अन्य के ने स्टेट वॉर काउंसिल में होने वाले स्टूडेंट्स के एनरोलमेंट नहीं किए जाने पर याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में बताया कि स्टेट वॉर काउंसिल और यूनिवर्सिटी ने एफिलेटेड कॉलेज से लॉ की डिग्री प्राप्त किए जाने के बावजूद भी एनरोलमेंट नहीं किए। साथ ही याचिकार्ताओं ने हाईकोर्ट से मामले में दखल दिए जाने की गुहार लगाई। कोर्ट के द्वारा पिछली सुनवाई के दौरान लगाई गई थी फटकार इस याचिका में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की मुख्य बेंच ने राज्य सरकार को याचिका में मौजूद कॉलेज एवं यूनिवर्सिटी समेत उन सभी कॉलेजों पर जो बिना मान्यता के संचालित हो रहे हैं उन पर कार्रवाई कर उसकी रिपोर्ट को अगली सुनवाई में पेश करने के निर्देश दिए गए थे। जिस पर राज्य सरकार के द्वारा रिपोर्ट पेश नहीं किए जाने पर कोर्ट ने फटकार लगाई। राज्य सरकार में उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना का नोटिस भी कोर्ट ने जारी किया। राज्य सरकार ने अपना पल्ला झाड़ा इस याचिका में हुई पूर्व की सुनवाई में सभी प्रतिवादियों की ओर से जवाब दाखिल किया गए। जिसमें बार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा कॉलेज(सेंट्रल इंडिया लॉ कॉलेज) के द्वारा मान्यता शुल्क न दिए जाने की वजह से उसे मान्यता नहीं दिए जाने की बात कही गई है। जिस पर सरकार की तरफ से कोर्ट में बताया गया कि इस पूरे मामले में संबंधित यूनिवर्सिटी के द्वारा गलती की गई है। यूनिवर्सिटी ने कॉलेज का वेरिफिकेशन क्यों नहीं किया। जिस पर यूनिवर्सिटी ने यह तर्क दिया गया की बार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा 2021-22 के लिए जारी कॉलेज की सूची में इस कॉलेज को व्यक्तिगत तौर पर अमान्य नहीं बताया गया था। कोर्ट ने बताया एडमिनिस्ट्रेटिव फैलियर अमान्य घोषित नहीं होने की वजह से इसे पोर्टल पर अपलोड किया गया और कॉलेज के द्वारा खुद को एफिलेटेड बताते हुए बच्चों के एडमिशन किए जाने का जवाब कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट के द्वारा सभी तर्कों के आधार पर इस पूरे मामले को एडमिनिस्ट्रेटिव फैलियर माना। हालांकि फिर भी राज्य की तरफ से खुद को गलत ना ठहराते हुए मामले से पल्ला झाड़ता की कोशिश की गई। चीफ जस्टिस की बेंच ने की सुनवाई इस याचिका पर सुनवाई चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने की। जिसमें सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आए कि नियम अनुसार नए कॉलेजों को प्रोविजनल मान्यता 3 सालों के लिए एवं रेगुलर कॉलेज को यह मान्यता 5 सालों के लिए दी जा सकती है। इसके बाद भी वार काउंसिल ऑफ इंडिया के द्वारा कई मामलों में 20 साल बाद भी पूर्वाधार पर मान्यता दी गई है। जिसे कोर्ट ने छात्रों के साथ सीधी तौर पर धोखाधड़ी बताया। उच्च शिक्षा विभाग की ओर से कोर्ट में वीसी के माध्यम से प्रस्तुत हुए उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अनुपम राजन को भी कोर्ट ने फटकार लगाई। भोपाल कमिश्नर को जांच के आदेश कोर्ट ने कहा कि अब तक आप लोग क्या कर रहे थे। इसके साथ ही को कोर्ट ने भोपाल कमिश्नर को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए हैं और इस जांच में बार काउंसिल को भी भोपाल कमिश्नर की पूरी सहायता करने साथ ही जांच की रिपोर्ट को कोर्ट के समक्ष दो हफ्तों में पेश किए जाने के निर्देश जारी करते हुए इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को तय की गई है। इसके बाद जांच रिपोर्ट के आधार पर कॉलेज सहित रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय पर भी आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जा सकता है।

राजस्थान :हाईकोर्ट का फैसला, 13 साल की रेप पीड़िता को मिला गर्भपात का अधिकार

जयपुर राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच ने 13 साल की नाबालिग रेप पीड़िता को गर्भपात की इजाजत दे दी है. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि पीड़िता को जबरन बच्चे को जन्म देने के लिए मजबूर किया गया तो उसे जीवन भर मानसिक और शारीरिक पीड़ा झेलनी पड़ेगी. इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. जस्टिस सुदेश बंसल की अदालत ने महिला चिकित्सालय सांगानेर (जयपुर) की अधीक्षक को निर्देश दिया है कि मेडिकल बोर्ड गठित कर गर्भपात की प्रक्रिया पूरी की जाए. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भ्रूण जीवित मिलता है तो उसे जिंदा रखने की पूरी व्यवस्था की जाएगी और उसका पालन-पोषण राज्य सरकार के खर्च पर होगा. वहीं, अगर भ्रूण जीवित नहीं पाया जाता है तो उसकी डीएनए रिपोर्ट के लिए टिश्यू को संरक्षित किया जाएगा. 13 साल की रेप पीड़िता को गर्भपात की इजाजत पीड़िता की वकील सोनिया शांडिल्य ने बताया कि पीड़िता 27 हफ्ते 6 दिन की गर्भवती थी और उसके माता-पिता भी गर्भपात के पक्ष में थे. उन्होंने कोर्ट में तर्क दिया कि इससे पहले भी देश में ऐसे कई मामलों में गर्भपात की अनुमति दी गई है, यहां तक कि 28 हफ्ते की गर्भवती पीड़िताओं को भी कोर्ट ने राहत दी है. पीड़िता के माता-पिता भी गर्भपात के पक्ष में थे पिछली सुनवाई में कोर्ट ने तीन विशेषज्ञों की मेडिकल रिपोर्ट मंगवाई थी, जिसमें बताया गया था कि गर्भपात में जोखिम जरूर है, लेकिन इसे किया जा सकता है. कोर्ट ने मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी एक्ट 1971 का हवाला देते हुए कहा कि बलात्कार के कारण हुए गर्भ से पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुंचेगी. इसलिए गर्भपात की अनुमति दी जाती है.

मध्य प्रदेश में 62 प्रजाति के पेड़ काटने पर जबलपुर हाईकोर्ट का बैन

जबलपुर  हाईकोर्ट की लार्जर बेंच ने 62  प्रजातियों के पेड़ों की कटाई और परिवहन के लिए प्रदान की गई छूट को निरस्त कर दिया है. चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत,जस्टिस एस ए धर्माधिकारी और जस्टिस विवेक जैन की लार्जर बेंच ने अपने आदेश में कहा है कि साल 2015 में जारी विवादित अधिसूचना और साल 2017 में किए गए संशोधन वन अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है. इसके अलावा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 48-ए का उल्लंघन करते हैं. लार्जर बेंच ने विवादित अधिसूचना तथा उसमें किये गये संशोधन को निरस्त करते हुए ट्रांजिट पास नियम 2000 में छूट प्राप्त सभी पेड़ों की प्रजातियों पर तत्काल प्रभाव से लागू की जाये. लार्जर बैंच ने पेड़ों की कटाई को लेकर पुष्पा फिल्म समेत कई उदाहरण देते हुए कार्यपालिका को कड़ी फटकार लगाई. आम आदमी से समन्वय स्थापित करने के लिए वन विभाग ने साल 2015 और 2017 में 62 प्रजातियों पर टीपी की अनिवार्यता समाप्त कर दी थी। इसके बाद से मध्य प्रदेश में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई चल रही थी। सड़क किनारे खेतों में खड़े आम, बबूल, शू-बबूल, इमली, जामुन, अमरूद सहित अन्य प्रजातियों के पेड़ों को धड़ल्ले काटा जा रहा था। साल 2024 में अवैध रूप से पेड़ काटने के 10 हजार 688 प्रकरण दर्ज हुए हैं। साल 2023 में 50 हजार 180 प्रकरण दर्ज हुए थे। यह स्थिति तब है। जब हाईकोर्ट साल 2019 में 62 प्रजातियों को टीपी मुक्त करने की अधिसूचना पर स्थगन दे चुका है। जिस पर अब फैसला आया है। स्थगन के दौरान नहीं दिया ध्यान 62 प्रजातियों को टीपी मुक्त करने की अधिसूचना पर 5 साल पहले स्थगन आया था, पर वन विभाग के अधिकारियों ने इस पर ध्यान नहीं दिया। तभी तो अभी तक सड़क किनारे या दूरदराज के इलाकों में निजी भूमि पर खड़े पेड़ों को काटा जा रहा था। अकेले भोपाल की बात करें तो आरा-मशीनों पर रोज 50 गाड़ियां लकड़ी आती हैं। प्रदेश के अन्य शहरों में भी ऐसे ही हालात हैं। 10 हजार के जुर्माने पर छोड़ रहे इस मामले में हालत यह है कि, पहले तो मैदानी वन अधिकारी और कर्मचारी लकड़ी परिवहन करने वालों को पकड़ ही नहीं रहे और जिन्हें पकड़ते हैं। उनका 10 हजार रुपए का चालान बनाकर छोड़ देते हैं। जबकि ऐसे मामलों में वाहन में मौजूद लकड़ी के बाजार मूल्य की दो गुनी राशि लेने का प्रावधान है। हाईकोर्ट में 2 लोगों ने की थी याचिका दायर गढ़ा जबलपुर निवासी विवेक कुमार शर्मा और एक अन्य की तरफ से दायर अलग-अलग याचिका में कहा गया था कि प्रदेश सरकार ने सितम्बर 2015 में जारी अधिसूचना के माध्यम से वृक्षों की 53 प्रजातियों को हटाने के अलावा मध्य प्रदेश परिवहन (वनोपज) नियम, 2000 के नियम 4(2) का प्रावधान भी हटा दिया गया है. जिसके परिणामस्वरूप निजी भूमि पर स्थित वृक्षों को काटने या परिवहन करने के लिए कोई अनुमति प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं है. लोगों के द्वारा उपयोग के लिए अधिक वृक्षों को काटने से पर्यावरण पर दुष्प्रभाव पड़ेगा. पर्यावरण संतुलन बिगड़ने से मानव स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है. जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुल्कपाद बनाम भारत संघ के मामले में जारी आदेश के विपरीत है. लार्जर बेंच ने फैसले में पुष्पा फिल्म का किया जिक्र लार्जर बेंच ने अपना फैसला सुनाते हुए पुष्पा फिल्म का जिक्र किया. बेंच ने कहा कि “फिल्म पुष्पा में व्यापारियों और सिंडिकेट को उजागर किया है. जो आंध्र प्रदेश के शेषाचलम के घने हरे-भरे जंगलों में लाल चंदन के अवैध परिवहन, व्यापार और बिक्री में लगे हुए हैं. तस्करों और व्यापारियों का सिंडिकेट इतना प्रभाव और दबदबा बनाने लगता है कि पुलिस ,वन विभाग, नीति निर्माताओं और अंततः विधायकों तक शासन का कोई भी हिस्सा अछूता नहीं रह जाता. यह दर्शाता है कि कैसे वन उपज के अवैध व्यापार का परिवहन कर माफिया घने जंगलों में घुस सकता है और राज्य मशीनरी के साथ मिलीभगत करके जंगल की प्राकृतिक संपदा को लूट सकता है. कार्यपालिका वन उपज के ऐसे विक्रेताओं के प्रभाव और दबदबे के आगे झुक जाती है.” ‘एक जलाशय दस कुएं के समान और दस पुत्र एक पेड़ के समान’ लार्जर बेंच ने अपने आदेश में कहा कि “1 जलाशय 10 कुएं के समान होते हैं और 10 जलाशय 1 पुत्र के समान होते हैं और 10 पुत्र 1 पेड़ के समान होता है. लार्जर बेंच ने 2019 से 2023 तक की एफएसआई रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि मध्य प्रदेश में वन क्षेत्र में 420 वर्ग किलोमीटर की शुद्ध कमी आई है.” ‘ऐसे ही पेड़ कटे तो 50 साल में आधा वन क्षेत्र हो जाएगा खत्म’ इस आंकड़े में अति सघन वन क्षेत्र में 363 वर्ग किलोमीटर की वृद्धि और इसी अनुपात में लगभग 630 वर्ग किलोमीटर की भारी और तीव्र कमी और मध्यम सघन वन एवं खुले वन क्षेत्र में लगभग 104 वर्ग किलोमीटर की कमी शामिल है. जिससे शुद्ध आंकड़ा 420 वर्ग किलोमीटर हो जाता है. ये आंकड़े इस बात की ओर स्पष्ट संकेत करते हैं कि हर वर्ष वन क्षेत्र तेजी से कम हो रहे है. मध्य प्रदेश में वन क्षेत्र में कमी इसी गति से होती रही तो अगले 50 वर्षों में अधिसूचित वनों से वर्तमान वन क्षेत्र का लगभग आधा हिस्सा मिट जाएगा. ‘कोर्ट ने कहा इंदौर वन विभाग के पत्रों ने चौंकाया’ वर्तमान मामलों के 1500 से ज्यादा पेजों में दस्तावेज रिकॉर्ड का हवाला देते हुए लार्जर बैंच ने अपने आदेश में कहा है कि “पर्यावरणविद राजवीर सिंह हुरा और एनजीओ पर्यावरण प्रहरी के पदाधिकारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी. जिसमें पेश किये गये दस्तावेजों ने हमें चौंका दिया. दस्तावेज में इंदौर के वन प्रभाग के अधिकारियों और वन विभाग के भीतर आंतरिक रूप से आदान-प्रदान किए गए पत्राचार शामिल हैं. वन संरक्षक इंदौर द्वारा अप्रैल 2017 में वन मंडल अधिकारी, इंदौर को संबोधित पत्र में बड़े पैमाने पर हरे-भरे और फलों से लदे पुराने पेड़ों की अवैध कटाई और इंदौर की मंडी में भारी मात्रा में उनके व्यापार का उल्लेख किया गया है. इसके अलावा यह भी कहा गया कि रोजाना लगभग 100-150 वाहन बाजारों में 1000-1500 टन लकड़ी और वन उपज अवैध रूप लेकर पहुंच रहे हैं. … Read more

हाईकोर्ट ने उमरिया कलेक्टर पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया, शहडोल संभाग आयुक्त को लगाई फटकार

जबलपुर.  मध्य प्रदेश के जबलपुर हाईकोर्ट ने उमरिया कलेक्टर पर 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है. इतना ही नहीं उमरिया की रहने वाली माधुरी तिवारी के जिला बदर करने का आदेश भी निरस्त कर दिया है. दरअसल, जिला बदर करने के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी. इसके साथ ही शहडोल संभागायुक्त को भी फटकार लगाई है. पूरा मामला 2024 का है. दरअसल, उमरिया कलेक्टर ने माधुरी तिवारी के खिलाफ जिला बदर का आदेश जारी किया गया था. बताया जा रहा है कि माधुरी पर 6 आपराधिक मामले दर्ज थे. इनमें से 2 धारा 110 के तहत थे. फिर 2 मामले मारपीट और 2 एनडीपीएस से जुड़ा केस था. हालांकि किसी भी मामले में महिला को सजा नहीं हुई थी. फिर जिला बदर के आदेश को माधुरी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. कोर्ट ने क्यों रद्द किया आदेश जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकल बेंच में इस मामले की सुनवाई हुई. इसके बाद कोर्ट ने जिला बदर का आदेश भी निरस्त कर दिया है. कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि शहडोल संभागायुक्त अपने विवेक का प्रयोग करें. डाक घर की ओर से काम नहीं करें. कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि कलेक्टर ने एसएसओ के बयान के आधार पर आदेश जारी कर दिया था. जांच में सामने आया कि माधुरी को 1 एनडीपीएस के केस में महज 1 दूसरे आरोपी के बयान के आधारपर फंसाया गया था. उनके कब्जे से कोई प्रतिबंधित पदार्थ बरामद नहीं किया गया था. इतना ही नहीं एसएचओ ने भी माना कि महिला से किसी का कोई विवाद नहीं था. इतना ही नहीं पाली के किसी भी व्यक्ति ने यह नहीं कहा था कि माधुरी के यहां रहने से उन्हें कोई खतरा है. फिर हाईकोर्ट ने कलेक्टर और संभाग आयुक्त के आदेश को गलत बताया. फिर कलेक्टर पर जुर्माना भी लगाने का निर्देश दिया.

आईएएस शिल्पा गुप्ता की बढ़ी मुश्किलें, गिरफ्तारी वारंट जारी, कोर्ट के आदेशों का नहीं किया पालन

जबलपुर  आईएएस अधिकारी और मध्य प्रदेश लोकशिक्षण संचनालय की कमिश्नर शिल्पा गुप्ता की मुश्किलें बढ़ गईं हैं. कन्टैंप्ट ऑफ कोर्ट के मामले में जबलपुर हाईकोर्ट ने डीपीआई कमिश्नर शिल्पा गुप्ता के खिलाफ जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया है. हाईकोर्ट ने शिल्पा गुप्ता को 23 मार्च को कम्प्लाइंस रिपोर्ट के साथ कोर्ट में हाजिर होने के निर्देश दिए हैं. दरअसल जबलपुर हाईकोर्ट ने डीपीआई कमिश्नर शिल्पा गुप्ता को 4 महीने पहले याचिकाकर्ताओं को शिक्षा विभाग में नियुक्ति देने के आदेश दिए थे, लेकिन उन्होने कोर्ट के इस आदेश का पालन करना तो दूर अपना जवाब भी नहीं दिया. हाईकोर्ट ने शिक्षक भर्ती परीक्षा में आरक्षित वर्ग के मैरिटोरियस उम्मीदवारों को उनकी चॉइस फिलिंग के मुताबिक शिक्षा विभाग में नियुक्ति देने के आदेश दिए थे, लेकिन शिक्षा विभाग ने उन्हें ट्राइलब वैलफेयर विभाग में ही बरकरार रखा. ऐसे में उम्मीदवारों की ओर से दायर अवमानना याचिका पर हाईकोर्ट ने सुनवाई की. आईएएस शिल्पा गुप्ता की बढ़ीं मुश्किलें कोर्ट को बताया गया कि आईएएस शिल्पा गुप्ता के खिलाफ हाईकोर्ट में कंटैंप्ट ऑफ कोर्ट के करीब 200 मामले लंबित हैं, जिनसे समझा जा सकता है कि वो अदालत के आदेशों का पालन नहीं करतीं. ऐसे में हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाते हुए डीपीआई कमिश्नर शिल्पा गुप्ता के खिलाफ 10 हजार रुपयों का जमानती गिरफ्तारी वारेंट जारी कर दिया. हाईकोर्ट ने शिल्पा गुप्ता को ये आदेश दिया है कि वो 23 मार्च को कोर्ट के आदेश का पालन करने की रिपोर्ट के साथ हाईकोर्ट में हाजिर रहें.

60 साल के व्यक्ति ने पत्नी और बच्चों पर घर से निकालने, मारपीट व जासूसी करने का आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी लगाई

भोपाल एक 60 साल के व्यक्ति ने अपनी पत्नी और बच्चों पर घर से निकालने, मारपीट करने और जासूसी करने का आरोप लगाते हुए तलाक की अर्जी लगाई है। यह मामला फैमिली कोर्ट में चल रहा है। 30 साल से शादीशुदा यह जोड़ा पिछले 10 सालों से अलग रह रहा है। व्यक्ति अपनी बुजुर्ग मां के साथ रहता है, जबकि पत्नी अपनी तीन बेटियों और दामाद के साथ रहती है। दोनों घर आदमी के नाम पर हैं। 1995 में हुई इस शादी में अक्सर झगड़े होते रहते थे। आदमी सरकारी फैक्ट्री में काम करता था और पत्नी पापड़ बनाती थी। पत्नी और बच्चों ने घर से निकाल दिया एक दिन झगड़े के बाद पत्नी और बच्चों ने आदमी को घर से निकाल दिया। उनका कहना था कि शराब पीकर वह मारपीट और गाली-गलौज करता है। दो घर होने की वजह से वह आदमी अपनी मां के साथ दूसरे घर में रहने लगा। इसके बावजूद पत्नी और बच्चे उस पर नजर रखते थे। पत्नी ने अपने दामाद को बुर्का और सैंडल पहनाकर पति की जासूसी करने भेजा। पड़ोसियों ने दामाद को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले करने से पहले उसकी पिटाई कर दी। तलाक का केस दायर किया इस जासूसी की घटना के बाद आदमी ने तलाक का केस दायर कर दिया। फैमिली कोर्ट काउंसलर शैल अवस्थी इस केस को देख रही हैं। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए कहा कि पहले वह तलाक के बारे में नहीं सोच रहा था। वह अपनी बुजुर्ग मां के साथ खुशी से रह रहा था। पत्नी ने पति से गुजारा भत्ता भी मांगा है। लंबे समय से चल रहा झगड़ा आदमी और उसकी पत्नी के बीच लंबे समय से अनबन चल रही थी। रोजमर्रा के झगड़ों ने उनके रिश्ते को कमजोर कर दिया था। शराब पीकर मारपीट करने का आरोप गंभीर है। पत्नी और बच्चों ने उसे घर से निकाल दिया।

हाईकोर्ट ने सूचना आयुक्त पर ठोका जुर्माना

जबलपुर जबलपुर में सूचना आयुक्त पर HC ने ठोंका 40 हजार रुपये का जुर्माना. आवेदक को 2 लाख 38 हजार की जानकारी मुफ्त देने के आदेश. हाईकोर्ट ने कहा कि सूचना आयुक्त सरकार के एजेंट के रूप में काम ना करे. भोपाल के फ़िल्म मेकर नीरज निगम की याचिका पर HC ने दिया आदेश. आवेदक को 30 दिनों के अंदर नही दी गई थी RTI की जानकारी. 30 दिनों के बाद जानकारी के बदले आवेदक से मांगे गए थे 2 लाख 38 हजार रुपये. HC के आदेश के बाद भी सूचना आयुक्त ने ख़ारिज कर दी थी RTI अपील.

हाई कोर्ट ने महिला न्यायाधीश को बकाया वेतन की 50 प्रतिशत राशि का भुगतान किये जाने के आदेश जारी किये

जबलपुर  हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत तथा जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने महिला न्यायाधीश को बकाया वेतन की 50 प्रतिशत राशि का भुगतान किये जाने के आदेश जारी किये हैं. युगलपीठ ने इसके अलावा वरिष्ठता सूची को संशोधित करते हुए याचिकाकर्ता महिला जज को सभी उचित लाभ दिए जाने के निर्देश भी जारी किए. सिविल जज 2007 में घोषित रिजल्ट पर विवाद मामले के अनुसार वर्तमान में नीमच में पदस्थ महिला न्यायाधीश ने साल 2013 में हाई कोर्ट जबलपुर में याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया “सिविल जज 2007 में घोषित रिजल्ट की प्रतीक्षा सूची में वह पहले स्थान में थी. वह अनुसूचित जाति वर्ग की उम्मीदवार थी. अनुसूचित जाति वर्ग के दो अन्य वर्ग के अभ्यर्थियों को चयन किया गया. इस कारण पात्र होने के बावजूद उसका चयन नहीं हुआ.” इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई. हाई कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया. हाई कोर्ट के आदेश पर महिला की नियुक्ति हाई कोर्ट के आदेश पर महिला को साल 2009 में नियुक्ति प्रदान की गयी. नियुक्ति प्रदान करने के बाद उन्हें वरिष्ठता व वेतन का लाभ नहीं मिला. युगलपीठ ने याचिका का निराकरण करते हुए आदेश में कहा “यह निर्विवाद है कि रामसुजन वर्मा और रामानुज सोंधिया अनुसूचित जनजाति वर्ग नहीं थे. इसके बावजूद उनका चयनित अनुसूचित जाति वर्ग में किया गया. याचिकाकर्ता पद के लिए पात्र थी परंतु उनका चयन नहीं हुआ. गलत रूप से चयनित दोनों व्यक्ति को बाद में हटा दिया गया. इस पूरी प्रक्रिया में याचिकाकर्ता की कोई गलती नहीं थी.” महिला जज को अन्य लाभ भी देने के निर्देश युगलपीठ ने याचिकाकर्ता के पक्ष में आदेश जारी करते हुए बकाया वेतन का 50 प्रतिशत राशि का भुगतान 4 सप्ताह में करने के आदेश जारी किए. इसके अलावा युगलपीठ ने संशोधित वरिष्ठता सूची जारी करते हुए वरिष्ठता के आधार पर सभी लाभ देने के भी आदेश जारी किये. याचिकाकर्ता की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता शशांक शेखर ने पैरवी की.

आदेश के बाद नहीं किया आरआरसी का निष्पादन, भोपाल कलेक्टर के खिलाफ जमानतीय वारंट जारी

भोपाल /जबलपुर  मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने अवमानना याचिका की सुनवाई करते हुए भोपाल कलेक्टर के खिलाफ जमानती वारंट जारी किया है. साथ ही व्यक्तिगत रूप से तलब किया है. हाईकोर्ट जस्टिस विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने पाया कि हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद कलेक्टर भोपाल बिल्डर के खिलाफ जारी आरआरसी का निष्पादन नहीं करवा सके. एकलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई 12 मार्च को निर्धारित की है. आदेश के बाद भी बिल्डर के खिलाफ कार्रवाई नहीं याचिकाकर्ता प्रताप भानु सिंह की तरफ से दायर अवमानना याचिका में कहा गया “रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण मध्य प्रदेश ने कलेक्टर भोपाल के माध्यम से 23,26,363 रुपये प्रतिवर्ष 10 प्रतिशत ब्याज के साथ बिल्डर के खिलाफ आरसीसी अक्टूबर 2020 में जारी की थी. कलेक्टर भोपाल द्वारा 3 साल का समय गुजर जाने के बावजूद बिल्डर के खिलाफ जारी आरआरसी का निष्पादन नहीं करवाया गया.” इसके खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की. कलेक्टर को व्यक्तिगत रूप से पेश होना होगा हाई कोर्ट ने जुलाई 2023 में कलेक्टर भोपाल को 3 माह में आरसीसी का निष्पादन करवाने के आदेश जारी किये थे. हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद कलेक्टर भोपाल ने निर्धारित समय सीमा में आरआरसी का निष्पादन नहीं करवाया. इस कारण अवमानना याचिका दायर की गयी. एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि अवमानना याचिका फरवरी 2024 में दायर की गयी थी. हाई कोर्ट के आदेश बावजूद कलेक्टर भोपाल ने आरआरसी के निष्पादन करने की कार्रवाई नहीं की. एकल पीठ ने भोपाली कलेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से उपस्थिति के लिए जमानती वारंट जारी किया. याचिकाकर्ता की तरफ से अधिवक्ता कपिल दुग्गल तथा अधिवक्ता ध्रुव वर्मा ने पैरवी की.

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा एमपी हाईकोर्ट का फैसला, कहा- गवाह की कोई न्यूनतम उम्र नहीं

भोपाल /नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि बच्चे की गवाही भी किसी अन्य गवाह की तरह ही मान्य है। शीर्ष अदालत ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए एक व्यक्ति को अपनी पत्नी की हत्या का दोषी ठहराया और उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला खास इसलिए है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल की बच्ची की गवाही को आधार बनाया, जिसने अपनी मां की हत्या होते देखी थी। सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया कि गवाह के लिए कोई न्यूनतम उम्र नहीं होती और बच्ची के बयान को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि वह 7 साल की है। मां की हत्या, बच्ची की गवाही से पिता को उम्रकैद सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे के बयान की जांच सावधानी से करनी चाहिए क्योंकि उन्हें आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने एमपी हाईकोर्ट के फैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने बच्ची के बयान को खारिज कर दिया था और आरोपी को बरी कर दिया था। गवाह की न्यूनतम उम्र तय नहीं- SC सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एविडेंस एक्ट में गवाह की न्यूनतम उम्र तय नहीं है। इसलिए, बच्ची की गवाही को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता। शीर्ष अदालत ने कहा कि अगर बच्चा गवाही देने के लिए सक्षम है, तो उसकी गवाही किसी अन्य गवाह की तरह ही मानी जाएगी। लेकिन, अदालत को बच्चे के बयान की जांच बहुत ध्यान से करनी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चे जल्दी बहकावे में आ सकते हैं। ‘बच्ची की गवाही को सिरे से खारिज नहीं कर सकते’ सर्वोच्च कोर्ट ने आगे कहा कि इसका मतलब यह नहीं कि छोटी-सी गलती पर बच्चे की गवाही को खारिज कर दिया जाए। बल्कि, बच्चे के बयान को बहुत सावधानी से परखा जाना चाहिए। इस मामले में, सर्वोच्च कोर्ट ने बच्ची की गवाही को विश्वसनीय मानते हुए उसके पिता को उम्रकैद की सजा सुनाई। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों में एक मिसाल का काम करेगा। ये निर्णय बच्चों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह सुनिश्चित करता है कि बच्चों की आवाज भी सुनी जाए और उन्हें न्याय मिले। यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में बच्चों की भूमिका को मजबूत करता है।

दिल्ली पुलिस के SHO CL मीणा की वकीलों ने पिटाई की, पुरानी रंजिश का मामला

नई दिल्ली  राजधानी दिल्ली के कड़कड़डूमा कोर्ट परिसर में  सुबह दिल्ली पुलिस के SHO की पिटाई होने की खबर आग की तरह सोशल मीडिया पर फैली। मगर अधिकारिक तौर पर मामले में किसी ने कुछ नहीं कहा। यहां तक की पीड़ित खुद भी कुछ बोलने के लिए तैयार नहीं हुआ। सबसे पहले अपने पाठकों को बताने जा रहा है कि आखिरकार उस दिन कोर्ट में हुआ क्या था। सान्ध्य टाइम्स संवाददाता के हाथ इस मामले में दर्ज हुई एफआईआर की कॉपी लगी है। जिसमें SHO की आपबीती दर्ज है। SHO मारपीट में जमीन पर गिरे एफआईआर के मुताबिक, 54 वर्षीय पीड़ित इंस्पेक्टर सीएल मीणा इन दिनों सेंट्रल डिस्ट्रिक्ट के कमला मार्केट थाने में तैनात हैं। सोमवार सुबह वह साल 2014 में शकरपुर थाने में दर्ज हुए धोखाधड़ी के एक मामले में सुनवाई पर आए थे। कोर्ट नंबर 32 में सुनवाई के बाद वह करीब 11:30 बजे वापस लौट रहे थे। आरोप है कि वह अभी कोर्ट कॉम्प्लेक्स बिल्डिंग, पोस्ट ऑफिस के सामने पहुंचे ही थे कि तभी उन्हें आरोपी वकील और उसके साथियों ने घेर लिया। मुख्य आरोपी उनका हाथ खींचकर उन्हें घसीटने लगा और कहने लगा आज हम तुझे छोड़ेंगे नहीं। इसके बाद सभी ने SHO को लात-घूंसे मारने शुरू कर दिए। इस दौरान कई वकील उन्हें घेरे खड़े रहे। वकीलों ने पिटाई कर उनकी वर्दी तक फाड़ दी। SHO जमीन पर गिर गए। फिर भी आरोपी रुके नहीं। आरोपी ने पर्स भी छीना आरोपी उन्हें पीटते रहे और गालियां देते रहे। मुख्य आरोपी ने उनका पर्स भी छीन लिया। जिसमें पीड़ित का आधार कार्ड, सीजीएचएस कार्ड, दिल्ली पुलिस का आईडी कार्ड और करीब सात हजार रुपये कैश थे। पीड़ित के दोनों मोबाइल भी वहां गिर गए। अब कुछ और वकील आए और उन्होंने SHO को भीड़ से बचाकर कोर्ट के गेट नंबर-4 से बाहर किया। एक वकील ने उनके दोनों मोबाइल लौटाए। वकील ने बोला, ये उसे जमीन पर पड़े मिले थे। इसके बाद SHO ने पुलिस कंट्रोल रूम को कॉल की। हेडगेवार अस्पताल में मेडिकल करवाया और फिर थाने में जाकर आरोपियों के खिलाफ शिकायत दी। जिस पर मुख्य आरोपी के खिलाफ नामजद एफआईआर दर्ज की गई। SHO से पुरानी रंजिश वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का कहना है कि SHO की आरोपियों से कोई पुरानी रंजिश है। किसी गाड़ी को लेकर इनके बीच थाने में बहसबाजी हुई थी। उसी का बदला लेने के लिए मारपीट की गई। गैर जमानती धाराओं में केस दर्ज हुआ है। मगर उन धाराओं में सात साल से कम सजा होने का प्रावधान है। इस कारण आरोपी को गिरफ्तार नहीं किया गया है। पुलिस बार को आरोपी के खिलाफ शिकायत देगी। वहीं इस पूरे मामले पर पीड़ित SHO से बातचीत करने का प्रयास किया तो उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि मैं कुछ नहीं बोल पाउंगा।

अगर किसी की पत्नी गैर मर्द से प्यार करती है तो यह व्यभिचार नहीं है : हाई कोर्ट

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी की पत्नी गैर मर्द से प्यार करती है तो यह व्यभिचार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि इसे तब तक व्यभिचार नहीं कहा जा सकता जब तक कि वह किसी और मर्द के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाती है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया ने कहा कि व्यभिचार तभी होता है जब शारीरिक संबंध होते हैं। पति ने कोर्ट में दावा किया था कि उसकी पत्नी किसी और से प्यार करत है। ऐसे में वह मेंटिनेंस की हकदार नहीं है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144 (5) और सीआरपीसी की धारा 125 (4) में कहा गया है कि अगर पत्नी पर व्यभिचार के आरोप सही साबित होते हैं तब ही उसे गुजारे भत्ते से वंचित किया जा सकता है। कोर्ट ने फैसले में कहा, व्यभिचार साबित करने के लिए शारीरिक संबंधों को सबित करना जरूरी है। अगर पत्नी किसी से प्यार करती है और शारीरिक संबंध नहीं रखती है तो इसे व्यभिचार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। बता दें कि फैमिली कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि पति को हर महीने 4 हजार रुपये का गुजारा भत्ता देना होगा। पति वॉर्ड बॉय की तौर पर का करता था और महीने में 8 हजार उसकी इनकम है। पति ने हाई कोर्ट में याचिका फाइल की और दावा किया कि उसकी पत्नी किसी और से प्यार करती थी। कोरक्ट ने कहा कि सेक्शन 24 के तहत आदेश के बाद पत्नी को पहले से ही 4 हजार का गुजारा भत्ता मिल रहा था। कोर्ट ने यह भी कहा कि अस्पताल से दिया गया सैलरी सर्टिफिकेट वेरिफाइ नहीं किया गया है। कोर्ट ने कहा, सैलरी सर्टिफिकेट पर इसे जारी करने का स्थान और तारीख ही नहीं दी गई है। ऐसे में कोर्ट के लिए यह निर्णय करना मुश्किल है कि यह सर्टिफिकेट सही है या फर्जी है। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया था कि वह एक सक्षम व्यक्ति नहीं है। कोर्ट ने कहा कि कम इनकम इस बात का आधार नहीं हो सकता कि वह मेंटिनेंस नहीं देगा। अगर पति को पता था कि वह उसकी रोजाना की जरूरत भी नहीं पूरी कर सकता तो इसके लिए वह खुद जिम्मेदार है। उसे पत्नी की जिम्मेदारी उठाने के लिए कमाना चाहिए था। पति ने यह भी दावा किया था कि उसकी पत्नी ब्यूटी पार्लर चलाती है। कोर्ट ने कहा कि पति को 4 हजार रुपये का मासिक गुजारा भत्ता देना ही होगा।

राहत : हाईकोर्ट ने दी EWS के अभ्यर्थियों को 5 साल की छूट, अब 45 साल तक के अभ्यर्थी कर सकते हैं आवेदन

जबलपुर  मप्र हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने ईडब्ल्यूएस उम्मीदवारों के पक्ष में राहतकारी आदेश जारी किया है। डबल बेंच ने अपने अंतरिम आदेश में माध्यमिक और प्राथमिक शिक्षक चयन परीक्षा 2024 में उन्हें आयु सीमा में 5 साल की छूट प्रदान करने के अंतरिम आदेश दिया है। रीवा निवासी ने दायर की थी याचिका रीवा निवासी पुष्पेंद्र द्विवेदी और अन्य की तरफ से दायर याचिका में कहा गया था कि शिक्षक चयन परीक्षा की रूल बुक की कंडिका 7.1 और 7.2 में ईडब्ल्यूएस को आरक्षित वर्ग माना गया था। रूल बुक की कंडिका 6.2 में अन्य आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) को आयु सीमा में छूट दी गई थी। आरक्षित ईडब्ल्यूएस वर्ग को उम्र में किसी प्रकार की छूट प्रदान नहीं गयी है। याचिका में भर्ती नियम की संवैधानिकता को चुनौती दी गयी थी। क्या है EWS में उम्र की सीमा का मामला? दरअसल, रीवा निवासी पुष्पेंद्र द्विवेदी व अन्य की ओर से दायर याचिका में कहा गया था कि शिक्षक चयन परीक्षा की रूल बुक की कंडिका 7.1 और 7.2 में ईडब्ल्यूएस को आरक्षित वर्ग माना गया था. रूल बुक की कंडिका 6.2 में अन्य आरक्षित वर्गों (एससी, एसटी, ओबीसी) को आयु सीमा में छूट दी गई थी. वहीं ईडब्ल्यूएस वर्ग को उम्र में किसी प्रकार की छूट प्रदान नहीं गई थी. आयू सीमा में छूट की मांग याचिकाकर्ताओं की तरफ से पैरवी करते हुए अधिवक्ता अधिवक्ता धीरज तिवारी और ईशान सोनी ने तर्क दिया गया कि ईडब्ल्यूएस वर्ग को आयु सीमा में छूट न देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार और अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता का उल्लंघन है। ईडब्ल्यूएस कोटा को आरक्षित वर्ग में रखे जाने के कारण उम्र सीमा में भी उम्मीदवारों को छूट प्रदान की जानी चाहिए। डबल बेंच ने सुनवाई पश्चात उक्त ईओडब्ल्यू वर्ग के उम्मीदवारों के लिए राहतकारी अंतरिम आदेश जारी किए। युगलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में शिक्षक भर्ती के लिए आवेदन की अंतिम तारीख 11 फरवरी है। कोर्ट के फैसले के बाद 45 की उम्र तक के ईडब्ल्यूएस अभ्यर्थी फॉर्म भर सकेंगे। कोर्ट में दिए गए ये तर्क याचिका में कहा गया कि ईडब्ल्यूएस वर्ग को आयु सीमा में छूट न देना भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार और अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार में अवसर की समानता का उल्लंघन है. याचिका में भर्ती नियम की संवैधानिकता को भी चुनौती दी गई थी. याचिका में राहत चाही गई थी कि ईडब्ल्यूएस कोटा को आरक्षित वर्ग में रखे जाने के कारण उम्र सीमा में भी उम्मीदवारों को छूट प्रदान की जानी चाहिए. हजारों EWS कैंडिडेट्स को होगा फायदा युगल पीठ ने सुनवाई के बाद अपने अंतरिम आदेश में ईओडब्ल्यू वर्ग के उम्मीदवारों के लिए आयु सीमा में पांच साल की छूट प्रदान करने के आदेश जारी किए हैं. इस आदेश के बाद 45 वर्ष तक के EWS कैंडिडेट भी शिक्षक चयन परीक्षा में शामिल हो सकेंगे, जिससे हजारों कैंडिडेट्स को फायदा होगा. युगलपीठ ने याचिका पर अगली सुनवाई दो सप्ताह बाद निर्धारित की है. याचिकाकर्ताओं की तरफ से अधिवक्ता धीरज तिवारी व ईशान सोनी ने पैरवी की.

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