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HC से IPS जीपी सिंह को राहत, अब केंद्रीय एजेंसी की जांच को निरस्त करने का आदेश दिया

 बिलासपुर. हाईकोर्ट ने आईपीएस जीपी सिंह के खिलाफ केंद्रीय एजेंसी की उस प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट (ECIR) को निरस्त करने का आदेश दिया है, जिसमें उन पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का आरोप है। इसके साथ ही हाईकोर्ट चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस रवींद्र अगवाल की डिवीजन बेंच ने पहले जारी किए गए दोनों नोटिस को भी रद्द कर दिया है।बता दें कि नई दिल्ली की हेड इन्वेस्टिगेटिंग यूनिट ने जीपी सिंह के खिलाफ मामला दर्ज किया था। आईपीएस जीपी सिंह पर राजद्रोह और आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने का मामला दर्ज किया गया, तब उन पर यह आरोप लगा था कि उन्होंने अपनी पत्नी मनप्रीत कौर के नाम पर संपत्ति बनाई है। इसी मामले में एसीबी के अलावा नई दिल्ली की हेड इन्वेस्टिगेटिंग यूनिट ने धनशोधन अधिनियम के तहत आईपीएस जीपी सिंह के खिलाफ ईसीआईआर दर्ज किया था, जिसके बाद उन्हें नोटिस जारी कर उनकी पत्नी मनप्रीत कौर के नाम पर अर्जित की गई संपत्ति का ब्यौरा मांगा था। जीपी सिंह ने राज्य सरकार की तरफ से दर्ज आपराधिक प्रकरणों के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया था। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने आय से अधिक संपत्ति सहित अन्य सभी मामलों को खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने नई दिल्ली द्वारा दर्ज ईसीआईआर को निरस्त करने की मांग को लेकर याचिका दायर की थी।

कौन से कानून के तहत सीएम के कार्यक्रम में निगमायुक्त डीजल भरवाए? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का सवाल

जबलपुर  मध्य प्रदेश में मोहन यादव सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री का सम्मान कार्यक्रम जबलपुर में रखा गया था, जिसमें बसों के डीजल का मामला कोर्ट पहुंच गया है. दरअसल, सीएम के सम्मान कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित की गई बसों में भरे गए डीजल का अबतक भुगतान नहीं किया गया है, जिसके बाद एक पेट्रोल पंप संचालक ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की है. सीएम के कार्यक्रम के लिए 6 लाख का डीजल दरअसल, जबलपुर के आईएसबीटी बस स्टैंड के पास स्थित पेट्रोल पंप के संचालक सुगम चंद्र जैन ने ये याचिका दायर की है. याचिका में कहा गया था कि 3 जनवरी 2024 को मुख्यमंत्री के सम्मान कार्यक्रम का आयोजन जबलपुर में किया गया था. कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित बसों में डीजल भरने के लिए नगर निगम के खाद्य अधिकारी ने व्यक्तिगत रूप से आकर निर्देश दिए थे. उन्होंने कहा था कि निगमायुक्त ने उक्त निर्देश दिए थे. कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित बसों में लगभग 6 लाख रु का डीजल उनके पेट्रोल पंप से भरा गया था. बिल भुगतान कराने के लिए की कई बार की मांग अगस्त 2024 में याचिकाकर्ता ने बिल भुगतान के लिए संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त से संपर्क किया. इसके अलावा कलेक्टर कार्यालय से निगमायुक्त को राशि भुगतान के संबंध में आदेश जारी किए गए थे, पर भुगतान नहीं हुआ. एकलपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता से पूछा कि अधिग्रहित बस में डीजल भरने के लिए प्रशासन की ओर से पीओएल जारी किया गया था या नहीं? याचिकाकर्ता ने इसपर जवाब दिया कि सिर्फ मौखिक आदेश जारी किए गए थे. बिना पीओल कैसे भर दिया बसों में डीजल? एकलपीठ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए अपने आदेश में कहा है कि बिना किसी प्राधिकरण के याचिकाकर्ता ने बसों में कैसे डीजल भरा? इसके साथ ही कोर्ट ने संयुक्त कलेक्टर, जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त से एसोसिएशन व उसके सदस्य को पीओएल की प्रतिपूर्ति करवाने के निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने कलेक्टर से मांगा जवाब कोर्ट ने इसके अलावा कलेक्टर से जवाब मांगा है कि किस कानून में यह लिखा है कि निगमायुक्त का दायित्व है कि वह मुख्यमंत्री की रैली में लगी बसों में डीजल भरवाए? एकलपीठ ने अपने आदेश में कहा है कि प्रथम दृष्टया यह सार्वजनिक धन के बड़े पैमाने पर गोलमाल का मामला प्रतीत हो रहा है. इस संबंध में एकलपीठ ने जिला कलेक्टर को हलफनामे में जवाब पेश करने के आदेश जारी किए हैं. एकलपीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि याचिकाकर्ता अब याचिका वापस लेने का हकदार नहीं होगा. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशीष रावत ने पैरवी की. पेट्रोल पंप से भरवाया गया छह लाख का डीजल याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता आशीष रावत ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि आइएसबीटी बस स्टैंड के समीप याचिकाकर्ता का पेट्रोल पंप है। मुख्यमंत्री के सम्मान में तीन जनवरी, 2024 को जबलपुर में कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। कार्यक्रम के लिए अधिग्रहित बसों में डीजल भरने के लिए नगर निगम आयुक्त ने खाद्य अधिकारी को व्यक्तिगत रूप से भेजा था। अधिग्रहित बसों में लगभग छह लाख रुपये का डीजल उनके पेट्रोल पंप से भरा गया था। डीजल का भुगतान न होने के कारण उन्होंने निगमायुक्त से संपर्क किया। निगमायुक्त द्वारा बताया गया कि संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी के कार्यालय की ओर से बसों में डीजल भरवाने कहा गया था। याचिकाकर्ता अब याचिका वापस लेने का हकदार नहीं याचिकाकर्ता ने अगस्त, 2024 को बिल भुगतान के लिए संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त से संपर्क किया। इसके बाद कलेक्टर कार्यालय से निगमायुक्त को राशि भुगतान करने के संबंध में लिखित निर्देश दिए गए थे। शपथ पत्र के जरिए जवाब प्रस्तुत करें संयुक्त कलेक्टर व जिला आपूर्ति अधिकारी व निगमायुक्त ने पीओएल की प्रतिपूर्ति करवाने का निर्देश दिए। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस संबंध में जिला कलेक्टर शपथ पत्र के जरिए जवाब प्रस्तुत करें। इसके अलावा यह भी बताएं कि किस कानून में निगमायुक्त का दायित्व है कि वह मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में लगी बसों में डीजल भरवाए। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि याचिकाकर्ता अब याचिका वापस लेने का हकदार नहीं होगा।

SC ने बांग्लादेशियों उनके देश भेजने के बजाय सुधार गृहों में रखने के संबंध में केंद्र सरकार से जवाब मांगा

नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने भारत में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की अनिश्चितकालीन हिरासत पर सवाल उठाया है। अदालत ने इन्हें उनके देश भेजने के बजाय पूरे भारत के सुधार गृहों में लंबे समय तक हिरासत में रखने के संबंध में केंद्र सरकार से जवाब मांगा। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने इस बात पर बल दिया कि जब किसी अवैध बांग्लादेशी प्रवासी को पकड़ा जाता है और विदेशी अधिनियम 1946 के अंतर्गत उसे दोषी ठहराया जाता है, तो उसकी सजा पूरी होने के तुरंत बाद उसे निर्वासित किया जाना चाहिए। पीठ ने पूछा कि विदेशी अधिनियम के अंतर्गत अपनी सजा पूरी करने के बाद फिलहाल कितने अवैध आप्रवासियों को विभिन्न सुधार गृहों में हिरासत में रखा गया है? शीर्ष अदालत ने लगभग 850 अवैध प्रवासियों की अनिश्चितकालीन हिरासत पर चिंता व्यक्त की। एससी ने 2009 के परिपत्र के खंड 2 (v) का पालन करने में सरकार की विफलता पर सवाल उठाया, जो निर्वासन प्रक्रिया को 30 दिनों में पूरा करने का आदेश देता है। न्यायालय ने इस बात पर भी केंद्र से ठोस स्पष्टीकरण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए पश्चिम बंगाल सरकार से क्या कदम अपेक्षित हैं। ‘सजा पूरी होने के बाद सुधार गृहों में कैद’ माजा दारूवाला बनाम भारत संघ का मामला 2013 में कलकत्ता उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय में भेजा गया था। यह मामला मूल रूप से 2011 में शुरू हुआ जब एक याचिकाकर्ता ने अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की दुर्दशा पर प्रकाश डाला, जिन्हें उनकी सजा पूरी होने के बाद भी पश्चिम बंगाल सुधार गृहों में कैद रखा गया था। शीर्ष अदालत में स्थानांतरित होने से पहले कलकत्ता एचसी ने इस मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लिया था। पीठ ने कहा कि ये प्रथाएं मौजूदा दिशा-निर्देशों के विपरीत हैं, जो तेजी से निर्वासन प्रक्रियाओं की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं। मामले की अगली सुनवाई 6 फरवरी को होगी।

मध्यप्रदेश हाइकोर्ट ने सिंगरौली जिले के 4 अधिकारियों को अवमानना का नोटिस थमाया

सिंगरौली मध्यप्रदेश हाइकोर्ट ने सिंगरौली जिले के 4 अधिकारियों को अवमानना का नोटिस थमाया है। इनमें सिंगरौली कलेक्टर, SDM देवसर, सरई तहसीलदार और नायब तहसीलदार (सर्किल खनुआ) शामिल हैं। हाइकोर्ट ने एक सप्ताह में सभी अधिकारियों से हलफनामा पेश करने को कहा है। अधिवक्ता ब्रहमेन्द्र पाठक के माध्यम से दायर जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए जबलपुर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुरेश कुमार कैत और न्यायाधीश विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने यह फैसला सुनाया है। ये है पूरा मामला इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से उच्च न्यायालय में पैरवी कर रहे अधिवक्ता ब्रहमेन्द्र पाठक ने बताया कि ईएमआईएल बंधा कोल माइंस ने पचौर बंधा सहित कुछ अन्य गांवों के विस्थापितों के पुनर्वास के लिए लामीदह में जिस शासकीय भूमि को चिन्हित किया है उस भूमि पर कई दर्जन आदिवासी समाज के लोग निवासरत हैं जिन्हें  प्रशासन के द्वारा बिना मुआवजा दिए जबरन हटाया जा रहा है। अधिवक्ता ब्रहमेंद्र पाठक की ओर से पूर्व में इस मामले में दायर जनहित याचिका में दिए गए तर्क को सही मानते हुए उच्च न्यायालय ने विस्थापितों के पुनर्वास के लिए चिन्हित की गई सिंगरौली जिले की लामीदह गांव की शासकीय भूमि में निवासरत लोगों को हटाने की कार्यवाही पर रोक लगाते हुए कलेक्टर को 4 सप्ताह के भीतर मामले का निराकरण करने के लिए निर्देशित किया था।

भोजशाला विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश, प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट से जुड़ेगा मामला, सुनवाई अब सीजेआई करेंगे

धार  हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने धार्मिक स्थलों पर चल रहे विवादों की सभी कार्यवाही पर रोक लगाने का फैसला सुनाया था। इस हालिया फैसले के मद्देनजर, सुप्रीम कोर्ट ने  आदेश दिया कि एमपी के धार जिले में भोजशाला मंदिर-कमल मौला मस्जिद परिसर पर चल रही कानूनी लड़ाई को पूजा स्थल अधिनियम की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ जोड़ा जाए और सुना जाए। इस मामले में सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ सुनवाई कर रही है। पिछले साल अप्रैल में, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को साइट का सर्वेक्षण करने की अनुमति दी थी। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि बिना उसकी अनुमति के सर्वेक्षण रिपोर्ट के आधार पर कोई कार्रवाई नहीं की जाए। इसने एएसआई को परिसर में ऐसी कोई भी खुदाई नहीं करने का भी निर्देश दिया, जिससे संरचना के चरित्र में बदलाव हो सकता है। सुनवाई में ये हुई चर्चा सुनवाई की शुरुआत में, जस्टिस हृषिकेश रॉय और एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा कि इस मामले को पूजा स्थल अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए। इन याचिकाओं में सीजेआई की अध्यक्षता वाली पीठ ने किसी भी पूजा स्थल के स्वामित्व और शीर्षक को चुनौती देने वाले नए मुकदमे दायर करने या अगले आदेश तक विवादित धार्मिक स्थलों के सर्वेक्षण का आदेश देने पर रोक लगाने का आदेश पारित किया था। वकील के तर्क पर क्या बोली पीठ? हिंदू पक्ष की ओर से पेश हुए अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि यह विवाद पूजा स्थल अधिनियम से संबंधित नहीं है और उन्होंने न्यायालय से मामले की सुनवाई कर निर्णय देने का आग्रह किया। पीठ ने संकेत दिया कि यदि वह मामले की सुनवाई करती है, तो उसके आदेश का उल्लंघन करने के लिए अवमानना नोटिस जारी करना होगा। न्यायालय ने कहा कि याचिका के साथ दायर की गई तस्वीरों से पता चलता है कि उसके आदेश के बावजूद खुदाई की गई और पक्षों को पहले अवमानना नोटिस का जवाब देना होगा। इसके बाद न्यायालय ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि वह मुख्य न्यायाधीश से निर्देश प्राप्त करने के बाद मामले को अन्य याचिकाओं के साथ जोड़ दे। यह है विवाद 11वीं शताब्दी का यह स्मारक हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विवाद का केंद्र है। हिंदुओं का मानना है कि यह देवी वाग्देवी का मंदिर है, जो देवी सरस्वती का अवतार हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है। 11 मार्च को मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एएसआई को छह सप्ताह में भोजशाला परिसर का ‘वैज्ञानिक सर्वेक्षण’ करने का निर्देश दिया था।

मुख्य न्यायाधीश के बंगले से मंदिर हटाने की खबर निराधार: हाई कोर्ट

 जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट प्रशासन ने हाल ही में मुख्य न्यायाधीश एस.के. कैत के आधिकारिक बंगले से मंदिर हटाए जाने के दावे वाली खबरों का खंडन किया है। प्रशासन ने यह साफ किया है कि ऐसी खबरें पूरी तरह से आधारहीन, झूठी और गुमराह करने वाली हैं। कोर्ट ने इसे न्याय के काम में दखल मानते हुए गलत कहा है, मीडिया और लोगों से ऐसी बातें न फैलाने की अपील भी की है। यह भी कहा है कि ऐसी बातें न्यायपालिका की इज्जत को ठेस पहुंचाने की कोशिश है। मुख्य न्यायाधीश के बंगले से मंदिर हटाने की खबरें झूठी इस मामले में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के रजिस्ट्रार जनरल धर्मिंदर सिंह ने एक बयान में मुख्य न्यायाधीश के बंगले से मंदिर हटाई जाने वाली खबरों को झूठा ठहराया है। उन्होंने बताया है कि लोक निर्माण विभाग ने भी पुष्टि की है, की मुख्य न्यायाधीश की आवास पर कोई भी मंदिर नहीं था। इस तरह की अफवाहें और खबरें सिर्फ और सिर्फ जनता को गुमराह करने की कोशिश करती हैं, और न्यायपालिका की छवि को खराब करने के लिए फैलाई जा रही है। हाई कोर्ट ने अपने बयान में कहा है कि न्यायपालिका के खिलाफ झूठी और गुमराह बातें फैलाने का प्रयास न केवल कानून व्यवस्था को कमजोर करता है, बल्कि न्यायिक स्वतंत्रता और उसकी गरिमा को भी ठेस पहुंचाता है।     मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के बंगले के अंदर मंदिर की खबरें झूठी, भ्रामक और निराधार, रजिस्ट्रार जनरल ने किया खंडन रिपोर्ट्स का खंडन इन निराधार रिपोर्ट्स का सिर्फ और सिर्फ एक ही उद्देश्य लगता है, और वह है न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना। जबकि हमारी न्यायपालिका निष्पक्षता और पारदर्शिता के साथ न्याय देने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। इसी तरह अदालत ने मीडिया संगठनों और आम जनता से अपील की है कि वे ऐसी अपमानजनक और झूठी जानकारी को फैलाने से बचें और न्यायपालिका की गरिमा को बनाए रखने में मदद करें।

हाईकोर्ट में अहमदााबद पूर्व सैनिक ने लगाई गुहार, इस्कॉन मंदिर के कुछ पुजारियों पर लगाए गंभीर आरोप

अहमदाबाद  एक पूर्व सैनिक ने गुजरात हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके अपनी बेटी की कस्टडी की मांग की है। सेवानिवृत्त सैनिक पिता ने कोर्ट में कहा है कि मेरी बेटी सरखेज-गांधीनगर हाईवे पर स्थित इस्कॉन मंदिर के पुजारियों के कब्जे में है। पुजारियों ने उसे कथित तौर पर ब्रेनवॉश किय है। उसे राेज ड्रग्स दिया जाता है। पूर्व सैनिक की अपील पर गुजरात हाईकोर्ट ने अहमदाबाद पुलिस को नोटिस जारी करके लड़की को हाजिर करने को कहा है। पिता का आरोप है कि बेटी पिछले छह महीने लापता हो गई थी। याचिकाकर्ता पूर्व सैनिक ने कहा है कि बेटी को जान होने की आशंका भी व्यक्त की है। ब्रेनवॉश करने का आरोप याचिकाकर्ता पिता द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण आवेदन की सुनवाई के दौरान कोर्ट में कहा कि मेरी बेटी नियमित रूप से दर्शन और पूजा-भक्ति के लिए एसजी हाईवे पर प्रसिद्ध इस्कॉन मंदिर जाती थी। उसी दौरान वह इस्कॉन मंदिर के उक्त पुजारियों के संपर्क में आई। इसी दौरान इस्कॉन मंदिर के पुजारियों ने पूरी तरह से ब्रेनवॉश किया और उसे प्रभावित किया। पिता ने आरोप लगाया है कि इसके बाद बेटी मंदिर के पुजारी के साथ 23 तोला सोना और 3.62 लाख रुपये नकद लेकर घर से भाग गई। पहले दिया शादी का आदेश पिता का आरोप है मंदिर के पुजारी सुंदर मामा ने याचिकाकर्ता की बेटी की शादी अपने एक शिष्य से करने का आदेश दिया था। हालांकि याचिकाकर्ता ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि उन्हें अपनी बेटी की शादी अपने समाज में करनी है। उसके बाद उन्हें धमकियां मिलीं और अंततः उनकी बेटी को मथुरा से एक शिष्य के साथ भगा दिया गया। पिता का आरोप है कि पुजारी कहते थे कि वह कृष्ण रूप हैं। 600 लड़कियां गोपियां हैं। याचिकाकर्ता पिता ने यह भी आरोप लगाया कि इस्कॉन मंदिर में लड़कियों का ब्रेनवॉश किया जा रहा है और धर्म के नाम पर उन पर अत्याचार किया जा रहा है। परिवार से टूट जाता है मोह पूर्व सैनिक ने याचिका में कहा है कि सुंदर मामा सहित पुजारी मंदिर में आने वाले भक्तों का इस हद तक ब्रेनवॉश करते हैं कि गुरु माता-पिता से अधिक महत्वपूर्ण हैं और मंदिर में रहने वाली 600 लड़कियाँ गोपियाँ हैं और उन्हें यह मानने के लिए मजबूर किया जाता है कि वे कृष्ण रूप हैं। पिता का आरोप है कि उनकी बेटी मंदिर के पुजारी अवैध हिरासत और कारावास में हैं। बेटी को नियमित रूप से ड्रग्स और मारिजुआना दिया जा रहा है। पिता का आराेप है कि बार-बार शिकायत करने और गुहार लगाने के बावजूद पुलिस द्वारा उनकी बेटी को ढूंढने के लिए कोई प्रभावी प्रयास नहीं किया। पुलिस को हाईकोर्ट की नोटिस पिता की याचिका पर सुनवाई करने के बाद हाईकोर्ट की जस्टिस संगीता और जस्टिस संजीव ठाकर की पीठ ने राज्य सरकार, शहर के पुलिस आयुक्त, मेघानीनगर पुलिस स्टेशन के पीआई को नोटिस जारी करके कहा है कि लड़की को हाईकोर्ट में पेश किया जाएगा। हाईकोर्ट ने इसके अलावा इस्कॉन मंदिर के प्रबंधन से जुड़े लोगों को भी नोटिस जारी किया है। कोर्ट ने इस मामले में आगे की सुनवाई 9 जनवरी को तय की गई है। इस्कॉन की तरफ से इस मामले में कोई भी बयान जारी नहीं किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एनसीआर क्षेत्र में राजस्थान के हिस्से में भी पटाखों पर पूर्ण बैन होना चाहिए

नई दिल्ली  सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली की तरह ही यूपी और हरियाणा को पटाखे पर पूर्ण बैन लगाने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एएस ओका की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि हम इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि पटाखे पर बैन तभी प्रभावी हो सकेगा, जब एनसीआर राज्यों में भी इसी तरह का बैन लागू किया जाए। कोर्ट में दिल्ली सरकार की ओर से बताया गया कि पटाखे पर पूरे साल के लिए बैन किया है। कोर्ट ने कहा कि एनसीआर इलाके में आने वाले राजस्थान के हिस्से में भी इसी तरह का बैन होना चाहिए। हम फिलहाल उत्तर प्रदेश और हरियाणा को निर्देश देते हैं कि दिल्ली द्वारा 19 दिसंबर, 2024 को लगाए गए प्रतिबंध की तरह वे भी प्रतिबंध लागू करें। कोर्ट में एमसी मेहता की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई के दौरान उक्त आदेश पारित किया। जस्टिस ओका की अगुवाई वाली बेंच दिल्ली और एनसीआर में एयर पल्यूशन से निपटने के उपाय को लेकर सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान पटाखों पर साल भर के लिए बैन, जीआरएपी और सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट के अमल को लेकर विचार हुआ। दिल्ली सरकार का क्या पक्ष? दिल्ली सरकार की ओर से सीनियर वकील शादान फरासत ने अदालत को बताया कि दिल्ली में पटाखों के निर्माण, स्टोरेज और बिक्री के साथ वितरण और उपयोग पर व्यापक बैन लगाया गया है। लेकिन ये उपाय तभी प्रभावी हो सकेंगे, जब एनसीआर राज्य भी ऐसे बैन लगाएं। क्योंकि इन राज्यों से पटाखे दिल्ली में लाए जा सकते हैं। अदालत को बताया गया कि राजस्थान के एनसीआर इलाकों में पटाखों पर पूर्ण बैन लगाया गया है। साथ ही, हरियाणा में ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल की इजाजत दी गई है। अदालत ने कहा कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 5 के तहत शक्तियों का उपयोग करते हुए, दिल्ली सरकार ने एनसीटी दिल्ली में सभी प्रकार के पटाखों के निर्माण, भंडारण, बिक्री, ऑनलाइन मार्केटिंग प्लैटफॉर्म के माध्यम से डिलिवरी और फोड़ने पर तत्काल प्रभाव से पूरे वर्ष के लिए पूर्ण प्रतिबंध लगाया है। अदालत ने कहा कि एक बार के लिए हम सुझाव देते हैं कि दिल्ली मॉडल का पालन किया जाए। मामले की अगली सुनवाई 15 जनवरी 2025 को होगी, जिसमें पटाखों के प्रतिबंध पर अतिरिक्त निर्देशों पर विचार किया जाएगा। क्या है मामला सुप्रीम कोर्ट ने पहले दिल्ली-एनसीआर में पटाखों पर प्रतिबंध लागू करने में कमी पर चिंता व्यक्त की थी। 12 दिसंबर को कोर्ट ने दिल्ली सरकार और एनसीआर राज्यों को पटाखों के निर्माण, भंडारण, बिक्री, वितरण, और उपयोग पर पूरे वर्ष के लिए प्रतिबंध लगाने का निर्णय लेने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने जोर देकर कहा था कि यह प्रतिबंध वायु और ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है। पहले कोर्ट ने यह भी कहा था कि कोई भी धर्म प्रदूषण फैलाने वाली गतिविधियों को बढ़ावा नहीं देता और नागरिकों के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार को ध्यान में रखते हुए प्रतिबंध को सख्ती से लागू करने का आह्वान किया था।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने अंकिता और हसनैन के अंतरधार्मिक विवाह को वैध करार दिया, विशेष विवाह अधिनियम 1954 के तहत विवाह करने का अधिकार

जबलपुर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने  एक प्रेमी जोड़े को अंतरधार्मिक विवाह करने की इजाजत दे दी है। चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की डिवीजन बेंच ने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत जोड़े को विवाह करने की अनुमति दी है। बेंच ने अपने आदेश में कहा है कि दोनों की शादी बिना किसी विवाद के संपन्न कराई जाए। शादी के बाद उन्हें एक महीने तक सुरक्षा मुहैया कराई जाए। इसके बाद पुलिस अधीक्षक उनकी सुरक्षा के संबंध में विचार कर निर्णय लें। इंदौर की एक युवती और जबलपुर के एक पुरुष ने पुलिस सुरक्षा की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि उन्होंने स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत विवाह के लिए कलेक्टर जबलपुर कार्यालय में आवेदन किया था। हालांकि, युवती के पिता ने हाईकोर्ट में सिंगल जज बेंच के आदेश को रोकने के लिए अपील दायर की थी, जिसमें 12 नवंबर को उन्हें शादी करने की अनुमति दी गई थी और युवती को अपने फैसले पर विचार करने के लिए शेल्टर होम में रहने के लिए भी कहा गया था। अपील में कहा गया था कि स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत की गई शादी मुस्लिम एक्ट के तहत मान्य नहीं होगी। मुस्लिम समाज में अग्नि और मूर्ति की पूजा करने वालों से शादी मान्य नहीं है। मुस्लिम एक्ट में चार शादियों को मान्यता दी गई है, जबकि हिंदू मैरिज एक्ट में सिर्फ एक शादी को मान्यता दी गई है। अपील पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने शादी पर रोक लगा दी थी। डिवीजन बेंच ने गुरुवार को अपील पर सुनवाई के बाद इसे खारिज कर दिया और अपने आदेश में कहा कि स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 4 के तहत हर जोड़े को धर्म, जाति या समुदाय से अलग विवाह करने का संवैधानिक अधिकार है। हाईकोर्ट ने कहा, “पर्सनल लॉ एक्ट विशेष विवाह अधिनियम पर बाध्यकारी नहीं है। विवाह में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। विवाह का विरोध करने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। पुलिस को शादी के एक महीने बाद तक सुरक्षा मुहैया कराने का निर्देश दिया गया है। इसके बाद पुलिस अधीक्षक को उनकी सुरक्षा के संबंध में निर्णय लेने का आदेश दिया गया है।” इसके साथ ही हाईकोर्ट ने मैरिज रजिस्ट्रार को बिना किसी देरी या बाधा के विवाह की कार्यवाही आगे बढ़ाने का भी निर्देश दिया।

हाई स्कूल शिक्षक भर्ती पर जबलपुर हाईकोर्ट 19 दिसंबर को करेगा अगली सुनवाई

जबलपुर मध्यप्रदेश में हाई स्कूल शिक्षक भर्ती पर जबलपुर हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि सरकार 2 दिनों में भर्ती नियमों में सुधार करे। साथ ही कोर्ट कोर्ट को सूचित भी करे। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि प्रदेश में करीब 18 हजार हाई स्कूल शिक्षकों के रिक्त पदों में से 12 हजार पदों पर नियुक्तियां की गईं हैं लेकिन इनमें उम्मीदवारों के सेकेंड डिवीजन क्राईटेरिया को लेकर बड़ा विरोधाभास है। कोर्ट ने कहा-काउंसिलिंग नए सिरे से करवाई जानी चाहिए मामले में सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैथ और जस्टिस विवेक जैन की युगलपीठ ने राज्य सरकार को सेकेंड डिवीजन मार्क्स क्राईटेरिया का नियम 2 दिनों के भीतर सुधारकर कोर्ट को सूचित करने के निर्देश दिए हैं। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि ऐसे उम्मीदवार जिन्हें क्राइटेरिया के मुताबिक मिनिमम मार्क्स होने पर भी सिलेक्ट नहीं किया गया, क्या उन्हें बचे हुए पदों पर भर्ती किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा नहीं किया जाता है तो 50 फीसदी से कम मार्क्स वाले सभी उम्मीदवारों की भर्ती रद्द कर हाईस्कूल शिक्षक भर्ती की काउंसिलिंग नए सिरे से करवाई जानी चाहिए। मामले पर अगली सुनवाई 19 दिसंबर को तय कर दी है। इसलिए लगाई गई थी याचिका दरअसल, शिक्षा विभाग ने 448 ऐसे उम्मीदवारों को सेकेंड डिवीजन मानकर भर्ती किया है जिनके ग्रेजुएशन में मार्क्स 45 से 50 फीसदी के भीतर हैं। दूसरी तरफ ऐसे कई उम्मीदवार हैं जिन्हें थर्ड डिवीजन मानकर भर्ती नहीं किया है। जबकि ग्रेजुएशन में उनके भी मार्क्स 45 से 50 फीसदी के बीच हैं। एनसीटीई यानी नेशनल काउंसिल फॉर टीचर्स एजुकेशन के नियमों के मुताबिक उम्मीदवारों की एलिजिबिलिटी यानी पात्रता, ग्रेजुएशन में सेकेंड डिवीजन तय की गई थी, लेकिन कई यूनिवर्सिटी 45 से 50 फीसदी अंक लाने वालों को सेकेंड डिवीजन तो कई यूनिवर्सिटी थर्ड डिवीजन मानती हैं। ऐसे में जब शिक्षा विभाग ने अंकों की जगह सिर्फ मार्क शीट में सेकेंड या थर्ड डिवीजन देखकर भर्तियां की हैं तो पूरी भर्ती प्रक्रिया सवालों में है।

प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों में जूनियर नहीं बनेंगे डीन, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

इंदौर राजधानी भोपाल और प्रदेश के 18 मेडिकल कॉलेजों में डीन की सीधी भर्ती को लेकर चल रहे विवाद में हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने अहम फैसला सुनाया है। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला ने साफ तौर पर कहा कि किसी सीनियर प्रोफेसर को जूनियर के तहत काम करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। हाईकोर्ट का सरकार से सवाल     दरअसल, हाई कोर्ट ने इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज के लिए वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. वेद प्रकाश पांडे को डीन नियुक्त करने का आदेश भी दिया। दरअसल, डॉ. पांडे की डीन पद पर सीधी भर्ती को चुनौती देने वाली याचिका पर 10 दिसंबर को सुनवाई हुई थी। इस मामले में जस्टिस शुक्ला ने सरकार से पूछा कि डॉ. पांडे से जूनियर प्रोफेसर डॉ. अशोक यादव को डीन का प्रभार क्यों सौंपा गया, जबकि सरकार कोई ठोस जवाब या दस्तावेज पेश नहीं कर पाई। हाई कोर्ट ने वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ. वेद प्रकाश पांडे को एमजीएम मेडिकल कॉलेज, इंदौर का डीन नियुक्त करने का आदेश भी दिया। दरअसल, प्रो. डॉ. वेद प्रकाश पांडे की इंदौर में डीन के पद पर सीधी भर्ती से नियुक्ति को चुनौती देने वाली याचिका पर 10 दिसंबर को सुनवाई हुई। इसमें जस्टिस शुक्ला ने सरकार से स्पष्टीकरण मांगा कि डॉ. पांडेय से जूनियर डॉ. अशोक यादव को किस आधार पर डीन का प्रभार सौंपा गया। कोर्ट ने यह पाया कि सरकार ने कोई तथ्य या दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए हैं। अन्य मेडिकल कॉलेजों की सुनवाई 7 जनवरी को सरकार के वकील ने तर्क दिया कि प्रोफेसरों की गोपनीय रिपोर्ट डीन नहीं, बल्कि कमिश्नर व संचालक लिखते हैंं। हालांकि, इस दावे के समर्थन में कोई दस्तावेज पेश नहीं दे सके। कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में विस्तृत जवाब 7 जनवरी तक मांगे हैं। अन्य मेडिकल कॉलेजों में डीन की सीधी भर्ती के मामलों की सुनवाई भी इसी दिन निर्धारित की गई है। 7 जनवरी को फिर सुनवाई वहीं इस पर सरकार के वकील ने तर्क दिया कि डीन की गोपनीय रिपोर्ट कमिश्नर और संचालक लिखते हैं, न की प्रोफेसर। हालांकि, इस दावे का समर्थन करने के लिए कोई दस्तावेज पेश नहीं किया गया। कोर्ट ने सरकार से इस मामले में विस्तृत जवाब 7 जनवरी तक देने को कहा है, और अन्य मेडिकल कॉलेजों में डीन की सीधी भर्ती से जुड़े मामलों की सुनवाई भी उसी दिन होगी।

हाईकोर्ट ने सुनाई ख़ास सजा, दोषी युवक को रोपने होंगे स्वदेशी प्रजाति के 50 पौधे

 जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के प्रशासनिक न्यायाधीश संजीव सचदेवा व न्यायमूर्ति विनय सराफ की युगलपीठ ने न्यायालय के विरुद्ध अनर्गल टिप्पणी वाली पोस्ट इंटरनेट मीडिया पर डालने के आपराधिक अवमानना प्रकरण में आरोपित युवक को दोषी पाते हुए सजा बतौर 50 स्वदेशी प्रजाति के पौधे रोपने के आदेश दिए हैं। इसके लिए 15 दिन की समय-सीमा निर्धारित की है। हाई कोर्ट ने यह भी कहा है कि वन विभाग के अनुविभागीय अधिकारी आरोपित को बताएंगे कि वह कहां पर किस प्रजाति के पौधे लगा सकता है। इसके साथ ही युवक को चेतावनी दी कि वह भविष्य में ऐसी गलती न दोहराए। मुरैना जिले के संबलगढ़ न्यायालय का मामला प्रकरण मुरैना जिले के संबलगढ़ न्यायालय द्वारा हाई कोर्ट को भेजे गए पत्र से संबंधित था। इसमें अवगत कराया गया था कि राजस्थान के जयपुर जिले के त्रिवेणी नगर निवासी आरोपित राहुल साहू के विरुद्ध प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी अभिषेक कुमार के न्यायालय में भरण-पोषण का मामला विचाराधीन था। राहुल की पत्नी पूजा राठौर वादी है। सात मई, 2024 को पूजा ने न्यायालय को सूचित किया कि राहुल ने उसके और न्यायालय के विरुद्ध अनर्गल टिप्पणी वाली पोस्ट सोशल मीडिया पर अपलोड की है। पूजा ने उस पोस्ट का साक्ष्य भी न्यायालय में प्रस्तुत किया। युगलपीठ ने सजा के सिलसिले में सुझाव मांगा न्यायालय ने इस जानकारी को अभिलेख पर लेकर आरोपित राहुल को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया, लेकिन न तो आरोपित की ओर से जवाब प्रस्तुत किया गया और न ही वह उपस्थिति हुआ। इस रवैये को पर आपराधिक अवमानना प्रकरण चलाने के लिए न्यायालय ने हाई कोर्ट को पत्र भेज दिया। प्रकरण हाई कोर्ट में सुनवाई में आया तो कोर्ट रूम में उपस्थित अधिवक्ता आदित्य संघी से युगलपीठ ने सजा के सिलसिले में सुझाव मांगा। अधिवक्ता ने कहा कि सुझाव दिया कि आरोपित की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उसे सुधारात्मक रूप से प्रतीकात्मक सजा दी जा सकती है। इसके अंतर्गत समाज सेवा करना बेहतर होगा। मसलन, भंवरताल पार्क में पौधारोपण कराया जाए। हाई कोर्ट को यह सुझाव पसंद आया।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आदेश जारी कर 11 जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों के तबादले कर दिए

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने देर रात आदेश जारी कर 11 जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों के तबादले कर दिए हैं। इसके साथ ही साथ जजों के फैमिली कोर्ट के खाली पदों में भी ट्रांसफर हुए हैं। यह तबादला भारत के संविधान के अनुच्छेद 235 और मध्य प्रदेश सिविल कोर्ट अधिनियम, 1958 की धारा 8 की उपधारा (1) के तहत दिए गए अधिकारों का प्रयोग करते हुए किया गया है। इस आदेश के तहत कुल 18 जजों का तबादला किया गया है। इन जजों को मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों में रिक्त पदों पर पदस्थापित किया गया है, जिसमें 11 डिस्ट्रिक्ट जज और 7 फैमिली कोर्ट के प्रिंसिपल जज शामिल हैं। जिला सेशन कोर्ट में इन जजों का हुआ तबादला     अयाज मोहम्मद, द्वितीय जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पन्ना को जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, इंदौर तबादला किया गया।     नवीर अहमद खान, अध्यक्ष, मध्य प्रदेश राज्य वक्फ ट्रिब्यूनल, भोपाल को VIII जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, हरदा नियुक्त किया गया।     सुरेखा मिश्रा, XIII जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, इंदौर से III जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, विदिशा बनाई गईं।     रघुवेंद्र सिंह चौहान, द्वितीय जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, अमरपतन (सतना) को जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सोनकच्छ (देवास) भेजा गया।     शिप्रा पटेल, जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, अस्था (सीहोर) को XXI जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, इंदौर के रिक्त पद का दायित्व सौंपा गया।     शिवलाल केवट, जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सांवर (इंदौर) को जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जैसिंहनगर (शहडोल) बनाया गया।     उषा तिवारी, अतिरिक्त न्यायाधीश, प्रथम जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जावरा (रतलाम) के न्यायालय से जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, नसरुल्लागंज (सीहोर) भेजा गया।     उमेश कुमार पटेल, द्वितीय जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, अस्था (सीहोर) अब XXX जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, इंदौर कोर्ट संभालेंगे।     कपिल सोनी, IV जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, खरगोन (मंडलेश्वर) से XV जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, ग्वालियर बने हैं।     श्वेता तिवारी, XXI जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जबलपुर को V जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश,के प्रभार के साथ रतलाम भेजा गया।     विजय कुमार पांडेय (जूनियर), III जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, शहडोल अब II जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, सिरोंज (विदिशा) बनाए गए हैं। फैमिली कोर्ट में रिक्त पदों पर 7 प्रिंसिपल जजों की पदस्थापना की गई है     रामा जयंत मित्तल, विशेष न्यायाधीश एससी/एसटी (पी.ए.) अधिनियम, सीधी अब माया विश्वालाल की जगह अतिरिक्त प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, इंदौर होंगी।     मनोज कुमार लढिया, जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, निवास, जिला मंडला अब फैमिली कोर्ट, अनूपपुर के प्रिंसिपल जज होंगे।     अरविंद कुमार (जैन) जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, छतरपुर को फैमिली कोर्ट, रायसेन का प्रिंसिपल जज बनाया गया है।     अरुण प्रताप सिंह, XVI जिला एवं अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जबलपुर अब फैमिली कोर्ट, उमरिया के प्रिंसिपल जज होंगे।     रामा जयंत मित्तल, अतिरिक्त प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, इंदौर को प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, इंदौर बनाया गया है।     अवधेश कुमार (गुप्ता), प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, डिंडोरी अब प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट, शाजापुर होगा।     मुन्नालाल राठौर को जिला सेशन जज निवारी टीकमगढ़ से डिंडोरी फैमिली कोर्ट का प्रिंसिपल जज बनाया गया है।

जन्मदिन की पार्टी में हंगामा करने चार युवकों को अनूठी सजा दी गई। प्रतिबंधात्मक कार्रवाई

इंदौर  जन्मदिन की पार्टी में हंगामा करने चार युवकों को अनूठी सजा दी गई। प्रतिबंधात्मक कार्रवाई में एसीपी कोर्ट में पेश हुए चारों से चार घंटे साफ-सफाई करवाई गई। जमानती धाराओं में प्रकरण दर्ज होने के कारण युवक थाने से जमानत पर छूट गए थे। द्वारकापुरी थाना अंतर्गत परिवहन नगर में सोमवार रात दो पक्षों में झगड़ा हुआ था। चंदननगर में रहने वाले रिजवान, रेहान, अमान और शिब्बू एक युवती की जन्मदिन की पार्टी में पहुंचे और आधी रात को हंगामा किया। रहवासियों द्वारा आपत्ति लेने पर युवकों ने चाकू और डंडों से हमला कर दिया। वाहनों में की थी तोड़फोड़ रहवासियों ने आरोप लगाया कि दो व चार पहिया वाहनों में भी तोड़फोड़ की गई। हिंदू संगठन के सक्रिय होने के बाद पुलिस ने प्रकरण दर्ज किया, लेकिन कमजोर धाराओं के कारण जमानत मिल गई। पुलिस ने रिजवान, रेहान, अमान और शिब्बू पर प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की और एसीपी कोर्ट के माध्यम से जेल भेज दिया। जमानत न होने पर आरोपितों के स्वजन एसीपी के समक्ष पहुंचे और रिहाई की अपील की। दोपहर को एसीपी ने सशर्त जमानत दी। एसीपी ने पाबंद करते हुए आदेश दिया कि उन्हें कार्यालय में हाजिरी देना होगी। इसके बाद आरोपितों ने चार घंटे तक परिसर में साफ-सफाई की। चारों तरफ झाड़ू भी लगाई और घास काटी। लसूड़िया थाना क्षेत्र में गुरुवार रात दो नशेड़ी युवकों की शामत आ गई। युवतियों के साथ अश्लील हरकत करने पर भीड़ ने उनकी सार्वजनिक रूप से पिटाई कर दी। घटना का वीडियो इंटरनेट मीडिया पर बहुप्रसारित हो रहा है। भीड़ की पिटाई से युवकों के कपड़े तक फट गए। हालांकि शिकायत नहीं मिलने के कारण पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। पुलिस के मुताबिक घटना गुरुवार देर रात स्कीम-78 में ब्रोडेड कैफे के समीप की है। नशे की अवस्था में दो युवकों 21 वर्षीय नीरज गुलसईया और 19 वर्षीय आयुष सिंह सोलंकी दोनों निवासी रघुनंदन बाग कालोनी ने युवतियों का हाथ पकड़ लिया। अभद्रता देखकर लोग इकट्ठा हो गए अपशब्दों का प्रयोग किया और विवाद करने लगे। युवतियों से अभद्रता करते हुए देखकर लोग इकट्ठा हो गए और युवकों को पकड़ लिया। जैसे ही युवतियों ने चप्पल से पिटाई शुरू की, भीड़ भी हाथ साफ करने में जुट गई। लोगों ने दोनों को सड़क पर लेटाकर खूब पीटा। आरोपित नशे में थे और भाग भी नहीं पा रहे थे। युवतियों ने बताया युवक उनके आगे आकर गिरे थे। चोट का पूछा तो उनसे ही अभद्रता करने लग गए। टीआई तारेश सोनी के मुताबिक दोनों युवकों को गिरफ्तार कर लिया है।

लेफ्टिनेंट कर्नल पर शोषण का आरोप लगाने वाली महिला मेजर को कोर्ट से राहत नहीं, जानें-क्या है पूरा मामला

 जबलपुर मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) की जबलपुर हाई कोर्ट (Jabalpur High Court) पीठ ने शोषण के आरोप लगाने वाली महिला मेजर की याचिका को खारिज कर दिया. महिला मेजर को कोर्ट से किसी तरह की राहत मिलती हुई नजर नहीं आ रही है. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की जांच पूरी हो चुकी है और उसके नतीजे याचिकाकर्ता के खिलाफ हैं. ऐसे में अदालत इसमें कोई दखल नहीं देगी. महिला मेजर ने दायर की थी ये याचिका महिला मेजर ने अपनी याचिका में कहा था कि 2020 में उनकी पोस्टिंग सीओडी में हुई थी. जनवरी 2021 से 8 नवंबर 2021 तक एडवांस मटेरियल मैनेजमेंट कोर्स के दौरान वहां तैनात लेफ्टिनेंट कर्नल ने अभद्र टिप्पणियां की और अनुचित व्यवहार करते हुए उनका हाथ पकड़ने की कोशिश की थी. उनका कहना था कि उनकी शिकायत करने पर भी मामले में कोई कार्रवाई नहीं की गई. समिति ने दिया था ये फैसला महिला मेजर ने अपनी याचिका में शिकायत की थी कि 7 अप्रैल 2021 की शाम एक परीक्षा के दौरान, जब फैकल्टी रूम में केवल लेफ्टिनेंट कर्नल मौजूद थे, उन्होंने फिर से याचिकाकर्ता के साथ अनुचित बातें की. इसके बाद महिला ने आंतरिक शिकायत समिति को घटना की जानकारी दी. जांच के बाद 31 दिसंबर 2021 को समिति ने महिला मेजर को ही दोषी ठहराते हुए जांच के आदेश दिए थे. कोर्ट ने महिला की याचिका की खारिज इस पूरे मामले की चार्जशीट को याचिकाकर्ता महिला ने आर्म्ड फोर्स ट्रिब्यूनल में चुनौती दी थी, लेकिन वहां से भी उन्हें राहत नहीं मिली. इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा. यहां सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार का पक्ष डिप्टी सॉलिसिटर जनरल पुष्पेंद्र यादव ने रखा. सभी तथ्यों पर विचार करने के बाद हाई कोर्ट ने महिला मेजर की याचिका खारिज कर दी और किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार कर दिया.    

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