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पूर्व IAS अनिल टुटेजा और कारोबारी अनवर ढेबर को HC से मिली बड़ी राहत, रायपुर सेंट्रल जेल में ट्रांसफर का आदेश

बिलासपुर  पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा और अनवर ढेबर को रायपुर सेंट्रल जेल से अन्य जेल ट्रांसफर करने का विशेष न्यायाधीश का फैसला हाईकोर्ट ने पलट दिया है। जेल अधीक्षक रायपुर के आवेदन पर विशेष अदालत ने दोनों को कांकेर और अंबिकापुर जेल शिफ्ट कर दिया गया था। इसके खिलाफ उन्होंने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। जस्टिस अरविंद वर्मा की सिंगल बेंच में हुई सुनवाई में अदालत से दोनों को वापस रायपुर सेंट्रल जेल ट्रांसफर करने के निर्देश दिए हैं। 2 हजार करोड़ के शराब घोटाले मामले में पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा और अनवर ढेबर को ईडी ने गिरफ्तार किया था। तब से दोनों रायपुर सेंट्रल जेल में बंद है। उन पर रायपुर जेल में वीआईपी सुविधाएं लेने का आरोप है। इसके अलावा सिंडिकेट बनाकर जेल में शांति भंग का भी आरोप दोनों पर लगा कर रायपुर जेल अधीक्षक ने विशेष न्यायाधीश ईडी निधि शर्मा की अदालत में आवेदन दिया था। आवेदन के आधार पर दोनों को अलग-अलग कांकेर और जगदलपुर जेल शिफ्ट करने का आदेश दिया गया था। आदेश के बाद दोनों को वहां शिफ्ट कर दिया गया था। आदेश को दोनों ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में चुनौती दी थी जिसमें उन्होंने बताया था कि उनके मामले की सुनवाई रायपुर में चल रही है इसलिए पेशी में उन्हें उपस्थित होना पड़ता है और उनके अधिवक्ता भी रायपुर जेल में उनसे वकील मुलाकात करते हैं साथ ही उनका परिवार भी रायपुर में निवास रथ है जिससे परिवार के लोगों को भी जेल में मिलने में सुविधा होती है। जेल अधीक्षक के आवेदन पर रायपुर विशेष न्यायाधीश ने बगैर उनके पक्ष सुने एकपक्षीय आदेश जारी किया गया है। सुनवाई के बाद जस्टिस अरविंद वर्मा की सिंगल बेंच ने दोनों को तत्काल रायपुर जेल शिफ्ट करने के निर्देश दिए। आबकारी घोटाला मामले में आरोपी अनवर ढेबर को अंबिकापुर और अनिल टुटेजा को कांकेर जेल शिफ्ट किया गया था, जबकि ए.पी. त्रिपाठी को जगदलपुर जेल भेजा गया था। कस्टम मिलिंग घोटाले के आरोपी मार्कफेड के पूर्व एमडी मनोज सोनी को दंतेवाड़ा जेल और कोयला घोटाले के मुख्य सरगना सूर्यकांत तिवारी को जगदलपुर जेल ट्रांसफर किया गया था।

मुस्लिम कानून के तहत, ससुर को अपने मृत बेटे की विधवा को गुजारा भत्ता देने की जरूरत नहीं – हाईकोर्ट

भोपाल  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक ससुर की याचिका पर सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला सुनाया है और बड़ी टिप्पणी की है. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर पीठ ने दोहराया है कि मुस्लिम कानून के तहत, ससुर को अपने मृत बेटे की विधवा को वित्तीय सहायता करने की जरूरत नहीं है. ऐसा करते हुए हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और सत्र अदालतों के आदेशों को रद्द कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता ससुर को उसकी मृत्यु के बाद अपनी बहू को मासिक गुजारा भत्ता देने का निर्देश दिया गया था. शिवपुरी की अदालत ने ससुर के खिलाफ दिया था फैसला दरअसल, शिवपुरी की एक अदालत ने आदेश दिया था कि ससुर अपनी विधवा बहू को हर महीने 3000 रुपये का गुजारा भत्ता देंगे. पूरा मामला शरीफ बनाम इशरत बानो का है. इशरत की शादी साल 2011 में 14 जून को हुई थी. साल 2015 में 30 जून को शरीफ की मौत हो गई. इसके बाद इशरत ने अपने ससुर बशीर खान के खिलाफ शिवपुरी की मजिस्ट्रेट कोर्ट में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत केस दर्ज कराया. बहू ने मांगे थे 40 हजार रुपए प्रतिमाह इशरत ने अपने ससुर से 40 हजार रुपये हर महीने गुजारा भत्ता देने की मांग की थी. साल 2021 में 9 फरवरी को मजिस्ट्रेट कोर्ट ने अपने फैसले में बशीर खान को अपनी विधवा बहू को 3,000 रुपये हर महीने देने को कहा. इसके बाद बशीर खान ने एडीजे कोर्ट में अपील की, जहां 2022 में 21 जनवरी को निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा गया. इसके बशीर खान हाईकोर्ट पहुंचे. बशीर के वकील अक्षत जैन ने कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के मुताबिक एक पिता को अपने बेटे की विधवा को भरण-पोषण देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है. क्या कहता है हिंदू मैरिज एक्ट हालांकि हिंदू मैरिज एक्ट में यह कानून ठीक उलटा है. एक्ट के तहत विधवा बहू अपने ससुर से भरण-पोषण का दावा कर सकती है. लेकिन इसके लिए कुछ शर्त भी हैं. जैसे कि विधवा बहू अपनी कमाई या संपत्ति से अपना भरण-पोषण ना कर पाती हो. विधवा बहू के पास कोई संपत्ति ना हो. विधवा बहू के पति, पिता या माता की संपत्ति हो. विधवा बहू का कोई बेटा या बेटी हो. हिंदू महिला को दूसरी शादी के बाद भी संपत्ति का हक इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुताबिक अगर विधवा बहू अपने ससुराल में नहीं रहती है तो भी वह ससुर से भरण-पोषण का दावा कर सकती है. इसके अलावा आपको बता दें कि हिंदू विधवा महिला यदि दूसरी शादी भी कर लेती है तो उसका अपने पहले पति की संपत्ति का पूरा अधिकार होगा. कर्नाटक हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया था. कोर्ट का कहना था कि अगर कोई विधवा महिला दोबारा शादी करती है तो अपने मृत पति के संपत्ति से उसका हक खत्म नहीं होगा.

मनमानी फीस वसूली और फर्जी पुस्तकों के मामले में हाईकोर्ट ने सरकार को स्टेटस रिपोर्ट पेश करने का दिया आदेश

जबलपुर प्रशासन द्वारा मनमानी फीस वसूली और फर्जी पुस्तकों को पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने की जांच में सख्त कार्रवाई न किए जाने के मामले में आधा दर्जन निजी स्कूल प्रबंधनों ने जबलपुर हाईकोर्ट का रुख किया। याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की युगलपीठ के समक्ष शासन की ओर से स्टेटस रिपोर्ट पेश की गई। युगलपीठ ने रिपोर्ट को संतोषजनक नहीं पाया और एक नई स्टेटस रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए हैं। याचिकाकर्ता रॉयल सीनियर सेकेंडरी स्कूल, लिटिल किंगडम, स्मॉल वंडर्स, नचिकेता हायर सेकेंडरी स्कूल, स्टेम फील्ड इंटरनेशनल सहित अन्य निजी स्कूल प्रबंधनों की ओर से दायर अपील में कहा गया है कि मनमानी फीस वृद्धि और फर्जी पुस्तकों को पाठ्यक्रम में शामिल करने की जांच जबलपुर जिला प्रशासन द्वारा की जा रही है। पूर्व में कई स्कूल प्रबंधनों के खिलाफ मामले दर्ज कर प्राधिकारियों को गिरफ्तार किया गया था। स्कूल प्रबंधन जांच में सहयोग करने को तैयार हैं, लेकिन उन्हें आशंका है कि दीवाली अवकाश के दौरान प्रशासन उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई कर सकता है। युगलपीठ ने याचिका की प्रारंभिक सुनवाई के दौरान आरोपी स्कूल संचालकों और स्टाफ के खिलाफ कोई कड़ी कार्रवाई न करने के आदेश दिए थे। युगलपीठ ने याचिकाकर्ता स्कूल प्रबंधन को निर्देशित किया है कि वे जिला समिति की जांच में पूरा सहयोग करें और अपेक्षित दस्तावेज प्रस्तुत करें। साथ ही युगलपीठ ने जिला प्रशासन से कार्रवाई के संबंध में जवाब मांगा था। प्रशासन की रिपोर्ट को संतोषजनक न पाते हुए युगलपीठ ने उक्त आदेश जारी किए। याचिका पर अगली सुनवाई 13 नवंबर को होगी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अंशुमान सिंह ने पैरवी की।

हिंदू युवती-मुस्लिम युवक की शादी के मामले में हाई कोर्ट की अंतरिम रोक, DGP-कलेक्टर को भेजा नोटिस

जबलपुर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने हिन्दू-मुस्लिम कपल को झटका दिया है। हाई कोर्ट ने एकलपीठ के उस आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी जिसमें एक हिंदू युवती और मुस्लिम युवक की शादी की अनुमति दी गई थी। इस मामले पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सुरेश कुमार कैत, जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ ने इस मामले प्रदेश के डीजीपी, जबलपुर के कलेक्टर, मैरिज ऑफिसर और एसपी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। दरअसल, एकल पीठ के आदेश के खिलाफ युवती के पिता इंदौर निवासी हीरालाल राठौर ने डिवीजन बेंच में अपील पेश की। अपीलाकर्ता ओर से अधिवक्ता अशोक ललवानी ने दलील दी कि युवक ने लड़की का ब्रेनवॉश कर दिया है। उसे ‘लव-जिहाद अभियान’ के तहत निशाना बनाया गया है। उन्होंने कहा कि युवती को उसके परिवार वालों से मिलने नहीं दिया जा रहा है। यह दलील भी दी गई कि मुस्लिम लॉ के तहत मूर्ति पूजक या अग्नि की पूजा करने वाले से शादी अवैध कहलाती है। 22 अक्टूबर को इंदौर की हिंदू युवती अंकिता और जबलपुर के मुस्लिम युवक हसनैन अंसारी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर सुरक्षा की मांग की थी। दोनों की ओर से कोर्ट में कहा गया था कि वे दोनों एक-दूसरे को पिछले 4 साल से जानते हैं। पिछले एक साल से वे लिव-इन में रह रहे हैं और अब दोनों शादी करना चाहते हैं। दोनों ने पुलिस सुरक्षा की मांग की है। युवती का कहना है कि परिवार वाले उसे जबरन अपने साथ ले जाना चाहते हैं और दोनों की जान को खतरा है। एकलपीठ ने युवती को 11 नवंबर तक शास्त्री ब्रिज स्थित राजकुमारी बाई बाल निकेतन भेजने के निर्देश दिए थे। वहीं युवक को फिलहाल किसी अज्ञात स्थान पर रखने और स्थिति अनुकूल होने पर उसके घर भेजने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने कहा था कि इस दौरान दोनों एक दूसरे से संपर्क नहीं करेंगे। कोर्ट ने कहा था कि 12 नवंबर को युवती को नारी निकेतन से मैरिज रजिस्ट्रार के यहां ले जाएं और शादी के पहले उसके बयान दर्ज कराएं।

नशीली सिरप की तस्करी करने वाले आरोपियों को न्यायालय ने कड़ी सजा सुनाई, 10 -10 साल सश्रम कारावास

रीवा रीवा शहर में नशीली सिरप की तस्करी करने वाले आरोपियों को न्यायालय ने कड़ी सजा सुनाई है। आरोपी शहर में नशीली प्रतिबंधित सिरप की सप्लाई करते थे। नशे की खेप लाने के लिए कार का इस्तेमाल करते थे।  फिर शहर के कबाड़ी मोहल्ले स्थित अपने गोदाम से नशे का नेटवर्क संचालित करते थे। मामले में आरोपियों को सजा विशेष सत्र न्यायाधीश एनडीपीएस एक्ट केशव सिंह की अदालत से सुनाई गई है। लोक अभियोजन ने बताया कि नशा तस्कर इरशाद खान और अनुराग त्रिपाठी को 10-10 साल की सजा सुनाई गई है। इसके साथ ही एक लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया है। इरशाद लंबे समय से नशा तस्करी में जुड़ा हुआ था, पुलिस ने इसके घर में भी एक बार छापा मारा था। जहां से भारी मात्रा में नशीली कफ सिरप तहखाने से बरामद हुई थी। पुलिस को सूचना मिली थी 25 मई 2023 को कुछ लोग नशे की खेप लेकर रीवा के करहिया मार्ग से होकर लाडली लक्ष्मी मार्ग के रास्ते रीवा शहर में प्रवेश करेंगे। पुलिस ने लाड़ली लक्ष्मी मार्ग पर चेकिंग अभियान शुरू किया। वहां पुलिस को एक अल्टो कार आती हुई नजर आई। पुलिस ने कार की चेकिंग की कार के दौरान अंदर से 2160 सीसी नशीली कफ सिरप बरामद की। पुलिस ने एनडीपीएस एक्ट के तहत मामले को कोर्ट में पेश किया। जहां सुनवाई के बाद दोनों आरोपी अनुराग त्रिपाठी और इरशाद को 10 साल की सजा सुनाई। एक लाख रुपए का जुर्माना ना अदा करने पर अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। वर्तमान में जिस तरीके से पूरा रीवा शहर में नशा छाया हुआ है। उसको देखकर माना जा रहा है यह नशे के खिलाफ एक बड़ा प्रहार है।

‘LMV लाइसेंस धारक 7500 KG तक वजन वाले ट्रांसपोर्ट वाहन चलाने का अधिकार ‘, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

नई दिल्ली वाणिज्यिक वाहन चालकों को राहत देते हुए उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि हल्के मोटर वाहन (एलएमवी) का लाइसेंस धारक व्यक्ति 7,500 किलोग्राम तक वजन वाले परिवहन वाहन चला सकता है। प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ का फैसला बीमा कंपनियों के लिए एक झटका है। बीमा कंपनियां उन दावों को खारिज कर देती थीं, जो एक विशेष वजन के परिवहन वाहनों से होने वाली दुर्घटनाओं से संबंधित होते थे और चालक कानूनी शर्तों के अनुसार उन्हें चलाने के लिए अधिकृत नहीं थे। पीठ के लिए सर्वसम्मति से फैसला लिखने वाले न्यायमूर्ति ऋषिकेश रॉय ने कहा कि ऐसे कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं जो यह दर्शाते हों कि देश में सड़क दुर्घटनाओं में वृद्धि के लिए एलएमवी लाइसेंस धारक जिम्मेदार हैं। उन्होंने कहा कि एलएमवी लाइसेंस धारक, जो अधिकतम समय वाहन चलाते हैं, न्यायालय से जवाब मांग रहे हैं और उनकी शिकायतों को तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। प्रधान न्यायाधीश और न्यायमूर्ति रॉय के अलावा पीठ में न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा, न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं। पीठ ने 21 अगस्त को इस जटिल कानूनी मुद्दे पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था, जब केंद्र की ओर से अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने दलील दी थी कि मोटर वाहन (एमवी) अधिनियम, 1988 में संशोधन के लिए विचार-विमर्श ‘‘लगभग पूरा हो चुका है।’’ शीर्ष अदालत ने केंद्र से कानून में संशोधन की प्रक्रिया जल्द से जल्द पूरी करने को कहा। पीठ ने उस कानूनी पहलू का समाधान किया कि क्या हल्के मोटर वाहन (एलएमवी) का लाइसेंस धारक व्यक्ति 7,500 किलोग्राम तक वजन वाले परिवहन वाहन चलाने का भी हकदार है। इस मुद्दे ने एलएमवी लाइसेंस धारकों द्वारा चलाए जा रहे परिवहन वाहनों से जुड़े दुर्घटना मामलों में बीमा कंपनियों की तरफ से दावों के भुगतान को लेकर विभिन्न विवादों को जन्म दिया है। बीमा कम्पनियां आरोप लगाती रही हैं कि मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) और अदालतें हल्के मोटर वाहन ड्राइविंग लाइसेंस के संबंध में उनकी आपत्तियों की अनदेखी करते हुए उन्हें बीमा दावों का भुगतान करने के लिए आदेश पारित करते हैं।  बीमा कम्पनियों ने कहा कि बीमा दावा विवादों पर निर्णय करते समय अदालतें बीमाधारक का पक्ष लेती हैं।    

सहकारी बैंक अब बीमा राशि और वाद व्यय के तौर पर एक-एक लाख किसानों चुकाने होंगे

 खरगोन  खरगोन का जिला सहकारी बैंक किसानों का समूह बीमा करने के बाद दावे के भुगतान के समय मुकर गया। उसने जिस बजाज एलियांज बीमा कंपनी से पॉलिसी ली थी, उसने भी किसानों को अपात्र बताकर राहत देने से इन्कार कर दिया। 26 किसानों ने 13 वर्ष तक कानूनी लड़ाई हासिल कर न्याय हासिल किया है। राज्य उपभोक्ता आयोग ने सहकारी बैंक और बीमा कंपनी दोनों को आदेश दिया है कि वे किसानों को बीमा राशि और वाद व्यय के तौर पर एक-एक लाख रुपये का भुगतान करें। यह है मामला। किसानों की ओर से पैरवी कर रही अधिवक्ता मोना पालीवाल ने बताया कि वर्ष 2006-07 में खरगोन के जिला सहकारी बैंक ने कृषक समूह बीमा योजना के तहत बैंक से कर्ज लेने वाले किसानों का बीमा किया था। इसके लिए किसानों के खाते से 563 रुपये का प्रीमियम काटा गया। यह बीमा पॉलिसी प्रतिवर्ष ऑटो रिन्युअल थी। इसके तहत यह उल्लेख था कि खातेदार किसानों के लिए जारी बीमा पॉलिसी 18 वर्ष से 59 वर्ष तक के आयु वालों खातेदार किसानों के लिए जारी की गई थी। इस दौरान अगर किसी किसान की मृत्यु हो जाती है तो उसके नॉमिनी को 75 हजार रुपये की बीमा राशि का भुगतान किया जाना था। वर्ष 2007 में भीकनगांव के सेल्दा गांव निवासी बीमित किसान रामलाल यादव की मौत हो गई। परिवार ने बैंक के पास बीमित राशि के लिए दावा किया। लेकिन बैंक ने कोई भुगतान नहीं किया। इस बीच कई बीमित किसानों की मौत के बाद बीमा दावे का भुगतान लटकाया गया। 2011 में किसानों के वारिसों ने जिला उपभोक्ता आयोग में मामला दायर कर बीमा राशि की मांग की। 2023 में जिला उपभोक्ता आयोग ने किसानों का दावा खारिज कर दिया। उनके आदेश में कहा गया कि बैंक ने अपात्र होने की वजह से किसानों का प्रीमियम बीमा कंपनी को भेजा ही नहीं था। ऐसे में उनका बीमा नहीं हुआ। किसानों ने उन्हें अपात्र ठहराने का विरोध भी नहीं किया था। ऐसे में उनको बीमित नहीं माना जा सकता। इस फैसले के खिलाफ किसान राज्य उपभोक्ता आयोग पहुंचे थे। बैंक और बीमा कंपनी का यह बहाना था सुनवाई के दौरान जिला सहकारी बैंक का कहना था कि कृषक समूह बीमा पॉलिसी 18 से 59 वर्ष तक के किसानों के लिए थी। जिन किसानों का बीमा दावा आया है, वे 59 वर्ष की सीमा पार कर चुके थे। वहीं बीमा कंपनी का कहना था कि बैंक ने उनको दावेदारों का प्रीमियम भेजा ही नहीं था। इसलिए वे उनको भुगतान करने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। इन दस्तावेजों से मजबूत हुआ किसानों का पक्ष     – सितम्बर 2008 में बैंक ने बीमा कंपनी को एक पत्र लिखकर लंबित दावों के निपटारे का अनुरोध किया था। इस पत्र में 52 किसानों की सूची थी, जिनकी मृत्यु के बाद भुगतान रुका हुआ था। इस सूची में किसानों का नाम था।     – बैंक ने किसानों की उम्र 59 वर्ष से अधिक होने के आधार पर अपात्र बताया था, लेकिन बैंक उनकी उम्र का कोई प्रमाण नहीं दे पाया, जिसके आधार पर उसने उन्हें उम्र सीमा पार कर लेना तय किया।     – 2012 में बैंक ने एक किसान को दिये लिखित जवाब में कहा था कि बीमा कंपनी ने क्लेम नहीं भेजा है। उसके मिलते ही बीमा राशि का भुगतान कर दिया जाएगा। इससे साबित हुआ कि बैंक ने बीमा भेजा था।     – बीमित किसानों ने प्रीमियम कटने की रशीद, बैंक से हुए पत्राचार और मृत्यु प्रमाणपत्र आदि पेश किये। चार प्रतिशत ब्याज की दर से भुगतान का आदेश मामले की सुनवाई के बाद राज्य उपभोक्ता आयोग के कार्यवाहक अध्यक्ष एके तिवारी और सदस्य श्रीकांत पांडेय ने जिला उपभोक्ता आयोग का आदेश अमान्य कर दिया। उन्होंने किसानों के पक्ष में निर्णय सुनाया और 26 किसानों द्वारा ली गई ऋण राशि 7500 रुपयों को चार प्रतिशत ब्याज की दर से दो महीने के भीतर भुगतान का आदेश दिया। इसके साथ ही तीन हजार रुपये की क्षतिपूर्ति राशि देने का आदेश दिया।

पत्नी की हत्या के मामले में उसके पति को आजीवन कठोर कारावास

 खंडवा  खंडवा जिले के ग्रामीण अंचल में अपनी पत्नी की दराती से हत्या करने वाले पति को अब आजीवन जेल की सलाखों के पीछे रहना पड़ेगा। खालवा थाना क्षेत्र में हुई इस घटना में आरोपी को अपर सत्र न्यायाधीश, तहसील हरसूद ने ढाई साल पुराने इस मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। इसके साथ ही उसे 1,000 रुपये के जुर्माने से भी दंडित किया गया है। खंडवा जिले के हरसूद तहसील न्यायालय ने पत्नी की हत्या करने वाले दुलीचंद पिता कैलाश को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। दुलीचंद, जो सिरपुर थाना खालवा का निवासी है, ने अपनी पत्नी को पेट और हाथ में दराती मारकर उसकी हत्या कर दी थी। उसे भारतीय दंड संहिता (भादवि) की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास और 1,000 रुपये के जुर्माने की सजा दी गई है। इस मामले में अभियोजन की ओर से पैरवी सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी अनिल चौहान ने की थी। पति ने पेट पर किया था वार अभियोजन अधिकारी अनिल चौहान ने बताया कि मृतका ने मृत्यु पूर्व दिए गए बयान में कहा था कि वह ग्राम सिरपुर में रहकर घरेलू कामकाज के साथ मजदूरी करती थी। 16 मई की रात को वह अपने परिवार के साथ खाना खाकर सो रही थी। उसके सास-ससुर अगले कमरे में सो रहे थे और वह अपने पति दुलीचंद और अपनी बेटी के साथ अंदर के कमरे में सो रही थी। इस दौरान उसके दो बच्चे मौसी के घर इंदौर गए हुए थे। उसी रात करीब 8:45 बजे उसके पति ने दराती से उसके पेट पर वार किया। इसके अलावा, उसने उसके बाएं हाथ की कोहनी, दाहिने कंधे और गले के पास भी दराती से वार किया, जिससे उसे गंभीर चोटें आईं। वह चिल्लाई, तो उसके सास-ससुर अंदर आए और उन्होंने पुलिस को सूचना दी। मृतका ने बताया कि उसका पति पहले भी उससे विवाद करता था और उस रात उसने उसे जान से मारने की कोशिश की। चोटों के कारण बाद में उसकी मृत्यु हो गई।

जेजे अस्पताल के मेडिकल बोर्ड ने गर्भपात के खिलाफ अपने विचार रखे थे, HC ने दे दी 29 हफ्ते का गर्भ गिराने की इजाजत

मुंबई बॉम्बे हाई कोर्ट ने 14 साल की एक रेप पीड़िता को मेडिकल बोर्ड के ओपीनियन के खिलाफ 29 हफ्ते का गर्भ गिराने की इजाजत दे दी है। जेजे अस्पताल के मेडिकल बोर्ड ने गर्भपात के खिलाफ अपने विचार रखे थे। जस्टिस सारंग कोटवाल और नीला गोखले की बेंच ने कहा, पीड़िता की सुरक्षा और इच्छा किसी अन्य चीज से ज्यादा महत्वपूर्ण है। बता दें कि पीड़िता की प्रेग्नेंसी 24 सप्ताह की सीमा को पार कर चुकी थी। इसके बाद पीड़िता की मां ने हाई कोर्ट का रुख किया। पीड़िता के मां-बाप दिहाड़ी मजदूर हैं। पीड़िता ने आरोप लगाया था कि एक जानने वाले शख्स ने ही जुलाई में उसके साथ रेप किया था। 1 अक्टूबर को भारतीय न्याय संहिता की संबंधित धारा और पॉक्सो के तहत केस दर्ज किया गया था। उस वर्क वह 27 हफ्ते की प्रेग्नेंट थी। 9 अक्टूबर को डॉक्टरों के बोर्ड ने पाया कि 19.1 हफ्ते के बाद भ्रूण में कोई समस्या नहीं थी। बोर्ड ने कहा कि अगर नाबालिग का गर्भपात किया जाता है तो उसके स्वास्थ्य को नुकसान हो सकता है। ऐसे में फिजिकली और मेंटली फिट रहने के लिए गर्भपात करवाना सही नहीं है। वहीं पीड़िता की मां के वकील ने कोर्ट में कहा कि प्रेग्नेंसी पूरी होने में अभी 8 से 9 सप्ताह का वक्त है। ऐसे में संभव है कि बच्चा स्वस्थ और जीवित पैदा हो। उन्होंने पैदा होने वाले बच्चे को लेकर भी चिंता जताई और कहा कि उसके स्वस्थ्य रहने की भी संभावना कम है। जजों ने इस बात पर गौर किया। कोर्ट ने कहा कि अगर प्रेग्नेंसी बनाए रखने से पीड़िता के स्वास्थ्य को खतरा है तो गर्भपात सही है। कोर्ट ने यह भी देखा कि पीड़िता गरीब परिवार से है और अभी बच्चे की परवरिश भी उसके लिए मुश्किल काम है। ऐसे में वह भी गर्भपात करवाने के ही पक्ष में है। जजों ने कहा, पीड़िता की सुरक्षा सबसे बड़ा निर्णायक बिंदु है। कोर्ट ने राज्य सरकार को भी निर्देश दिए हैं कि अगर बच्चा जिंदा पैदा होता है तो उसकी परवरिश का इंतजाम किया जाए और फिर किसी को गोद दे दिया जाए।

ट्रांसपोर्ट कंपनी पर कोर्ट ने लगाया एक करोड़ से अधिक राशि का जुर्माना

भोपाल दिसंबर 2018 में इंदौर भोपाल हाईवे पर एक निजी बस ने स्कॉर्पियो गाड़ी को टक्कर मारी थी. इस हादसे में गाड़ी में सवार महिला व बाल विकास परियोजना के अधिकारी रंजीत धर्मराज की मौके पर मौत हो गई थी. जिसके बाद परिजनों ने न्याय के लिए न्यायलय का रुख किया था. अब 5 साल बाद इस मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया गया है. कंपनी परिजनों को एक करोड़ से अधिक राशि का करें भुगतान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता राजेश खंडेलवाल ने सुनवाई के दौरान कहा कि रंजीत धर्मराज महिला व बाल विकास विभाग में परियोजना अधिकारी के पद पर पदस्थ थे और अपनी स्कॉर्पियो गाड़ी से इंदौर से भोपाल जा रहे थे. इसी दौरान रास्ते में सोनकच्छ के पास वर्मा ट्रेवल्स की बस ने उनकी गाड़ी को टक्कर मार दी. इस हादसे में उनकी मौके पर ही मौत हो गई. इस मामले में कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए परिजनों को एक करोड़ से अधिक की मुआवजा राशि देने के नोटिस जारी किया है. न्यायालय ने कहा कि गलती बस का संचालन कर रही निजी कंपनी की है. इस स्थिति में क्षतिपूर्ति के रूप में बीमा कंपनी परिजनों को भुगतान करें. बिना परमिट इंदौर-भोपाल रूट पर दौड़ रही थी निजी कंपनी की बस बता दें कि जब अधिकारी रंजीत धर्मराज की स्कॉर्पियो गाड़ी को वर्मा बस ने टक्कर मारी थी, उस दौरान बस में परमिट नहीं था और परमिट के इस बस का संचालन किया जा रहा था. इतना ही नहीं रूट परमिट ना होने के बाबजूद ये बस इंदौर-भोपाल रूट पर दौड़ रही थी.

धार कलेक्टर सहित दो अधिकारियों के खिलाफ कोर्ट ने गिरफ्तारी वारंट जारी …

इंदौर  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने धार जिले के कलेक्टर प्रियांक मिश्र और जिला पंचायत के मुख्य तत्कालीन कार्यपालन अधिकारी शृंगार श्रीवास्तव के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने का आदेश दिया है। अदालत के आदेश का पालन नहीं करने पर यह आदेश जारी किया गया है। इस मामले में याचिकाकर्ता के अधिवक्ता प्रसन्ना भटनागर ने बताया कि याचिकाकर्ता मिथुन चौहान ग्राम पंचायत नालछा जिला धार में ग्राम रोजगार सहायक के पद पर पदस्थ था। 25 फरवरी 2017 को स्वास्थ खराब होने के कारण वह एक दिन कार्य पर उपस्थित नहीं हो सका। एक दिन की अनुपस्थिति को कदाचरण बताते हुए, बिना जांच किए और बिना सुनवाई का अवसर दिए उसे हटा दिया गया। हाईकोर्ट में लगाई थी रिट याचिका उक्त आदेश को चुनौती देते हुए ग्राम रोजगार सहायक ने अपील प्रस्तुत की, लेकिन अपील भी निरस्त कर दी गई। जिसके बाद उसने 2019 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में रिट याचिका प्रस्तुत की। इसके बाद हाईकोर्ट ने इसे स्वीकार करते हुए 22 अगस्त 2023 को उसकी सेवा समाप्ति के आदेश को निरस्त कर दिया गया था। इसके साथ ही यह आदेश भी दिया गया कि ग्राम रोजगार सहायक को 50 प्रतिशत पिछले वेतन सहित वापस नौकरी पर रखा जाए। हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया इस आदेश को चुनौती देते हुए शासन के द्वारा अपील प्रस्तुत की गई, लेकिन 3 जुलाई 2024 को अपील भी निरस्त हो गई। अपील निरस्त होने के बाद भी हाईकोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया।याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका प्रस्तुत की जिसमें दिनांक 20 सितंबर 2024 को शासन को यह निर्देश दिए कि वह आदेश का पालन करें। इसके साथ ही 4 अक्टूबर 2024 को न्यायालय के समक्ष उपस्थित रहें। इसके बाद भी आदेश का पालन नहीं किया गया और न ही उक्त दोनों अधिकारी हाईकोर्ट में उपस्थित रहे। इसलिए न्यायालय द्वारा कलेक्टर और मुख्य कार्यपालन अधिकारी के विरुद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिए गए हैं।

कोर्ट ने अधिवक्ता से पूछा अधिकारी सेवानिवृत्ति की कगार पर पहुंच चुके, लिफाफा खोलकर क्यों पदोन्नति का लाभ नहीं दे रहे

 जबलपुर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति द्वारिकाधीश बंसल ने अवमानना प्रकरण पर सुनवाई करते हुए ओपन-कोर्ट में अपनी तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि प्रशासनिक अधिकारी छह माह में भी आदेश का पालन नहीं करा सकते तो पद से त्यागपत्र दे दें। कोर्ट ने यह कटाक्ष गृह विभाग के तत्कालीन एसीएस और वर्तमान में जीएडी के एसीएस संजय दुबे पर किया। साथ ही चेतावनी दी कि यदि 14 अक्टूबर तक आदेश का पालन सुनिश्चित नहीं किया गया तो अनावेदक अधिकारी अवमानना कार्रवाई के लिए तैयार रहें। यदि उन्हें आदेश अनुचित लगे तो अपील करने स्वतंत्र होंगे। मामले की अगली सुनवाई 16 अक्टूबर को नियत की गई है। ऑर्डर शीट अभी नहीं आई अवमानना याचिकाकर्ता पुलिस अधिकारी विजय पुंज की ओर से अधिवक्ता मनोज चंसोरिया ने पक्ष रखा। उन्होंने अवगत कराया कि फिलहाल इस मामले की ऑर्डर-शीट बाहर नहीं आई है। किंतु ओपन कोर्ट में जताई गई नाराजगी उल्लेखनीय है। पदोन्नति का लिफाफा खोलकर लाभ प्रदान किया जाए कोर्ट ने मौखिक आदेश में साफ कर दिया है कि अवमानना याचिकाकर्ता की पदोन्नति का लिफाफा खोलकर लाभ प्रदान किया जाए। दरअसल, हाई कोर्ट ने मार्च में पुंज की याचिका पर सुनवाई करते हुए राहतकारी आदेश पारित किया था। कैबिनेट से समन्वय नहीं बना पाए लेकिन छह माह बीतने के बावजूद राज्य शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता यह तर्क दे रहे हैं कि मामले में कैबिनेट से समन्वय किया जाना है इसलिए देरी हो रही है। इस दलील को गंभीरता से लेकर कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी कर दी कि ऐसे अधिकारी को इस्तीफा दे देना चाहिए जो छह माह बीतने के बावजूद कैबिनेट से समन्वय नहीं बना पाए हैं। 31 अक्टूबर को सेवानिवृत्त हो रहा अवमानना याचिकाकर्ता अधिवक्ता मनोज चंसोरिया ने अवगत कराया कि अवमानना याचिकाकर्ता पुंज इसी वर्ष 31 अक्टूबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। लिहाजा, राज्य शासन के वकील की ओर से एक माह की मोहलत मांगना बेमानी है। यह सुनते ही कोर्ट ने शासकीय अधिवक्ता से पूछा आप कारण बताइए कि क्यों आपके अधिकारी सेवानिवृत्ति की कगार पर पहुंच चुके अवमानना याचिकाकर्ता के प्रकरण में लिफाफा खोलकर पदोन्नति का लाभ नहीं दे रहे हैं।

सनातन और योगी आदित्यनाथ के खिलाफ की थी आपत्तिजनक टिप्पणी, हाईकोर्ट ने कहा-नहीं होगी FIR निरस्त

जबलपुर भगवान राम, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और हिंदू धर्म के बारे में कथित तौर पर आपत्तिजनक इंस्टाग्राम पोस्ट के मामले में मोहम्मद बिलाल मध्य प्रदेश हाईकोर्ट से झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। मोहम्मद बिलाल ने सतना के एक पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 294, 153ए, 295ए और एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1) और 3(2) के तहत उसके खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने के लिए याचिका दायर की थी। बिलाल ने अपनी याचिका में दावा किया था कि कुछ लोगों ने दो दिन पहले उसका इंस्टाग्राम अकाउंट हैक कर लिया और आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड कर दिया। जस्टिस जीएस अहलूवालिया की सिंगल जज बेंच ने कहा, “एफआईआर से यह स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता ने याचिकाकर्ता से पूछा था कि उसके इंस्टाग्राम अकाउंट पर आपत्तिजनक पोस्ट क्यों अपलोड की गई है। यह बताने के बजाय कि वह पोस्ट उसका अकाउंट हैक करके किसी और ने अपलोड की है, उसने (याचिकाकर्ता) शिकायतकर्ता को गाली देना और अपमानित करना शुरू कर दिया और उसकी धार्मिक भावनाओं को भी ठेस पहुंचाई।” पिछले महीने के हाईकोर्ट के आदेश में कहा गया था, “याचिकाकर्ता का यह आचरण दर्शाता है कि उसके इंस्टाग्राम अकाउंट पर किसी और द्वारा आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड करने का बचाव गलत है। चूंकि याचिकाकर्ता ने खुद अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर आपत्तिजनक पोस्ट अपलोड करने की बात स्वीकार की है, इसलिए उसे शिकायतकर्ता के साथ जिस तरह से प्रतिक्रिया की गई, उस तरह से प्रतिक्रिया करने का कोई अधिकार नहीं है।” जस्टिस अहलूवालिया ने कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप सही हैं या नहीं, इस पर इस समय विचार नहीं किया जा सकता। आदेश में कहा गया है कि इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि संबंधित एफआईआर में संज्ञेय अपराध का खुलासा किया गया है, हस्तक्षेप करने का कोई मामला नहीं बनता है।

हाईकोर्ट ने कहा कोविड से मौत पर नहीं मिला परिवार को क्लेम, सरकार ने निगम के सहायक दरोगा को अपात्र बताया, ब्याज समेत मुआवजा देने के आदेश

इंदौर  मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने कोविड के दौरान नगर निगम में कार्यरत कर्मचारी की मृत्यु के मामले में उसकी पत्नी को मुख्यमंत्री कोविड 19 योद्धा कल्याण योजना का लाभ देने का आदेश दिया है। योजना के अंतर्गत मिलने वाली राशि पर शासन को बैंक दर से ब्याज भी देना होगा। मामला निगमकर्मी जगदीश करोसिया का है। 10 जुलाई 2020 को नगर निगम ने उन्हें सुपरवाइजर के रूप में नियुक्ति दी थी। उनके जिम्मे कोरोना संक्रमित क्षेत्र में सैनिटाइजर इत्यादि से छिड़काव करवाने की जिम्मेदारी थी। काम के दौरान 29 अगस्त 2020 को उनकी कोरोना से मृत्यु हो गई। यह भी पढ़ें जगदीश की पत्नी अलका ने शासन को आदेश देकर मुख्यमंत्री कोविड 19 योद्धा कल्याण योजना का लाभ दिए जाने की गुहार लगाई, लेकिन डिप्टी रिलीफ कमिश्नर ने नियमों का हवाला देते हुए इस आवेदन को निरस्त कर दिया। उनका कहना था कि वे योजना के लिए पात्र नहीं हैं। इस पर एडवोकेट आयुष अग्रवाल के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति सुबोध अभ्यंकर ने शासन को आदेश दिया कि वह जगदीश की पत्नी को योजना का लाभ दे। कोर्ट ने योजना के तहत मिलने वाली सहायता राशि पर बैंक दर से ब्याज भी दिलवाया है। कर्बला मैदान मामले में हाई कोर्ट में दायर हुई अपील कर्बला मैदान मामले में 13 सितंबर को आए जिला न्यायालय के फैसले को चुनौती देते हुए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में अपील दायर हुई है। यह अपील पंच मुसलमान कर्बला मैदान कमेटी लालबाग रोड इंदौर की ओर से दायर हुई है। अपील में निगमायुक्त, मध्य प्रदेश वक्फ बोर्ड भोपाल और अन्य को पक्षकार बनाया गया है। गौरतलब है कि 13 सितंबर को पंद्रहवें जिला न्यायाधीश नरसिंह बघेल ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि नगर निगम इंदौर कर्बला मैदान की खसरा नंबर 1041 की 6.70 एकड़ जमीन का स्वामी है। उक्त अपील इसी फैसले को चुनौती देते हुए दायर की गई है।

पति की हत्या के आरोप में 12 साल से जेल में बंद पत्नी को ओडिशा हाईकोर्ट ने बरी कर दिया

भुवनेश्वर  पति की हत्या के आरोप में 12 साल से जेल में बंद पत्नी को ओडिशा हाईकोर्ट ने बरी कर दिया। महिला को निचली अदालत ने पति की हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अब हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसलो को न्याय का दुरुपयोग बताते हुए फैसला पलटा दिया है। हाईकोर्ट ने 64 साल की हो चुकी महिला को बरी कर दिया है। साथ ही निचली अदालत को उसले फैसले पर फटकार भी लगाई है। बता दें कि सुनिता मुंडारी नामक यह महिला 64 साल की हो चुकी हैं। आरोपी पक्ष के अनुसार 28 नवंबर, 2011 को सुंदरगढ़ के झिरपानी गांव में सुनीता ने अपने पति मंगल पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी थी। राउरकेला की एक सत्र अदालत ने 20 दिसंबर, 2014 को उसे दोषी ठहराया था। सुनीता ने उसी साल हाईकोरट में में अपील की थी। गुरुवार को जस्टिस एस के साहू और चित्तरंजन दास की HC बेंच ने अपने आदेश में कहा कि आरोपी सुनीता के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं है। हाई कोर्ट ने निचली अदालत को लगाई फटकार बेंच ने कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद हालात यह निष्कर्ष निकालने के लिए पूरी कड़ी नहीं जोड़ते कि महिला ने ही अपराध किया था। बेंच ने कहा कि निचली अदालत के फैसले जायज़ नहीं हैं। अपीलकर्ता के पक्ष में मौजूद बातों को नरअंदाज किया गया है और इस तरह यह न्याय का दुरुपयोग है। महिला की रिहाई के आदेश दिए हाईकोर्ट ने IPC की धारा 302 (हत्या) के तहत निचली अदालत द्वारा सुनीता को दी गई सज़ा को रद्द करते हुए उनकी रिहाई का आदेश दिया। बेंच ने कहा कि निचली अदालत बिना किसी सीधे सबूत के इस नतीजे पर पहुंच गई थी कि सुनीता ने हत्या की है। बेंच ने कहा कि परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित मामलों में हमेशा यह खतरा बना रहता है कि अनुमान या संदेह कानूनी सबूत की जगह ले सकते हैं।

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