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राजस्थान-मेवाड़ विश्वविद्यालय के डिप्टी कंट्रोलर और सेक्शन ऑफिसर को फर्जी डिग्री मामले में किया गिरफ्तार

जयपुर. राजस्थान लोक सेवा आयोग की हिंदी लेक्चरर भर्ती परीक्षा का फॉर्म फर्जी डिग्री के जरिए भरने के मामले में एसओजी ने एक बार फिर मेवाड़ विश्वविद्यालय गंगरार पर शिकंजा कसा है। स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप ने परीक्षा कंट्रोलर और सेक्शन ऑफिसर को गिरफ्तार किया है. इससे पहले इस मामले में विश्वविद्यालय के डीन सहित पांच लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप अजमेर के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मुकेश सोनी के नेतृत्व में यह कार्रवाई की गई है। विश्वविद्यालय के डिप्टी कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन सुशील शर्मा को रिमांड पर लिया गया है। आरोपियों से पूछताछ में सामने आया है कि इस गिरोह के तार दिल्ली तक जुड़े हैं। मामले में विश्वविद्यालय के और भी कर्मचारियों की गिरफ्तारी हो सकती है। सोनी ने बताया कि डिप्टी कंट्रोलर शर्मा दिल्ली से ये फर्जी डिग्री तैयार करवाता था और 20 मार्च को गिरफ्तार हुई कैंडिडेट का भाई सेक्शन ऑफिसर राजेश सिंह के संपर्क में था। दोनों ही डिग्री खरीद कर लाए थे. राजेश के जरिए ही सुशील शर्मा और यूनिवर्सिटी के डीन कौशल किशोर चंदरुल तक कांटेक्ट होता था। बाद में सुशील ही दिल्ली से ही फर्जी डिग्री तैयार करवाता था। इस पूरे फर्जीवाड़ में एक बड़ा नेटवर्क है जिसमें जल्द ही अन्य लोगों की गिरफ्तारी होगी। फर्जी डिग्री मामले में विश्वविद्यालय के दो और अधिकारियों की गिरफ्तारी के साथ ही विश्वविद्यालय के अन्य कर्मचारियों में खलबली मची है। बता दें कि इस मामले में 20 मार्च को एसओजी ने दो महिला कैंडिडेट कमल और ब्रह्म कुमारी के बाद मेवाड़ यूनिवर्सिटी के डीन कौशल किशोर चंदरुल सहित पांच आरोपियों को गिरफ्तार किया था।

राजस्थान सरकार के सामने अभ 5 विधानसभा के उपचुनावों की नई चुनौती

दौसा. लोकसभा चुनावों के बाद राजस्थान की नई भजनलाल सरकार को इसी साल 3 चुनावों का सामना और करना है। इनमें एक राज्यसभा सीट, विधानसभा उपचुनाव और स्थानीय निकाय चुनाव इसी साल होने की संभावना है। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल के लोकसभा सांसद चुने जाने के बाद अब राजस्थान में उनकी राज्यसभा सीट खाली हो रही है। हालांकि बहुमत के आधार पर अब यह सीट बीजेपी के खाते में जाती दिख रही है। वहीं राजस्थान में राज्यसभा चुनाव के अलावा विधानसभा उपचुनाव और लोकल बॉडी चुनाव भी इसी साल होने हैं। लोकसभा चुनावों में 11 सीटें हार चुकी प्रदेश की नई भजनलाल सरकार के लिए अब इन चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करने का भारी दबाव रहेगा। इन 5 सीटों पर होने हैं उपचुनाव राजस्थान में खींवसर, दौसा, चौरासी, झुंझुनू और देवली उनियारा में विधानसभा उपचुनाव होने हैं क्योंकि यहां के विधायक अब लोकसभा सांसद बन चुके हैं। इनमें से कोई भी सीट बीजेपी के पास नहीं है। यहां तक कि जिन लोकसभा सीटों में ये विधानसभाएं आती हैं, वहां भी बीजेपी इस चुनाव में हार गई। खींवसर से आरएलपी के हनुमान बेनीवाल, दौसा से कांग्रेस के मुरारी मीणा, चौरासी से बीएपी के राजकुमार रोत, झुंझुनू से कांग्रेस के बृजेंद्र ओला और देवली उनियारा से कांग्रेस के हरीश मीणा विधायक थे। अब ये पांचों सांसद बन चुके हैं। इसलिए इन सीटों पर उपचुनाव होने हैं। लोकल बॉडी चुनाव सबसे बड़ी चुनौती विधानसभा उपचुनाव और लोकल बॉडी चुनाव लगभग आसपास ही होंगे। उपुचनावों के नतीजे भले ही सरकार पर कोई असर नहीं डालने वाले लेकिन इससे सरकार के पक्ष में या खिलाफ माहौल जरूरत बनता है। वहीं यदि उपचुनाव पहले होते हैं तो इसका असर लोकल बॉडी इलेक्शन पर भी पड़ना तय है।

देश-दुनिया के खाने का जायका बढ़ा रहा राजस्थानी जीरा

Rajasthani cumin is enhancing the taste of food in the country and the world, due to this farmers are facing loss. राजस्थान के जीरे की महक देश विदेश के खानों से आती है. इसकी पूरी दुनिया में भारी डिमांड है. प्रदेश में प्रोसेसिंग यूनिट और बिकवाली नहीं होने से किसान को काफी परेशानी होती है. पश्चिमी राजस्थान के खेतों में पैदा होने वाला जीरा देश और विदेश के खानों स्वाद और खुशबू बढ़ाता है. यहां के जीरे की अपनी एक अलग पहचान है. खाने का जायका बढ़ाने और स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होने की वजह से इसकी खूब डिमांड है. यही वजह है कि हर साल किसान 6 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का व्यपार करते हैं. जीरे की पैदावार प्रदेश के जोधपुर, पाली, जैसलमेर, बाड़मेर, जालौर और सांचौर में सबसे ज्यादा होती है. खास बात यह है कि प्रदेश में जीरे की पैदावार का 80 फीसदी इन्हीं जिलों में पैदा होता है. उसके बाद बिकने के लिए गुजरात जाता है. औसतन 5 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि में इसकी बुवाई होती है. जीरा किसानों को इस वजह से होता है नुकसानकृषि भूमि के एक बड़े क्षेत्र में जीरे की अच्छी खासी पैदावार के बावजूद प्रदेश में इसके लिए प्रोसेसिंग यूनिट और बिकवाली को कोई उचित जरिया नहीं है. इसकी वजह से किसानों जीरे की प्रोसेसिंग और बिकवाली के लिए गुजरात की उंझा मंडी पहुंचते हैं. जिससे किसानों का अतिरिक्त व्यय होने से उन्हें आर्थिक नुकसान भी उठाना पड़ता है. गुजरात के उंझा मंडी में एग्रीकल्चर नेटवर्क बना हुआ है. स्थानीय स्तर पर 60 से 70 फीसदी किसान जीरे की फसल बेचने के लिए उंझा मंडी पहुंचते हैं. वहां उनकी उपज का हाथों-हाथ दाम भी मिल जाता है. प्रदेश में अभी इतने ट्रेडर्स तैयार नहीं हुए हैं. जोधपुर में प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित नहीं हुई है. स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित हो तो किसानों को फायदा मिल सकता है. सरकार को हो सकता है फायदा?पश्चिमी राजस्थान के खेतों में सबसे अधिक जीरे की पैदावार बाड़मेर, जालौर, सांचौर, जोधपुर, पाली और जैसलमेर में होती है, यहां से लगभग पूरा जीरा गुजरात की उंझा मंडी जाता है. हर किसान को अपना जीरा बेचने के लिए लंबा सफर तक करना पड़ता है, जिसकी अतिरिक्त लागत आती है. अगर सरकार स्थानीय स्तर पर भी बड़ी मंडी के साथ प्रोसेसिंग यूनिट स्थापित कर दे तो किसानों को मुनाफा होने के साथ प्रदेश को भी फायदा पहुंचेगा. जीरे की इन जिलों होती है बंपर पैदावारबाड़मेर जिले के एक बड़े क्षेत्र में जीरे की बुवाई और बंपर पैदावार होती है. बाड़मेर जिले में जीरे की कुल बुवाई का क्षेत्रफल 1 लाख 80 हजार से 2 लाख हेक्टेयर है. करीब 1 लाख 60 हजार किसान इस फसल के उत्पादन और व्यपार से जुड़े हुए हैं. यहां पर हर साल जीरे का कुल उत्पादन 68.40 लाख टन है. जोधपुर जिले के किसानों ने जीरे के उत्पादन में बहुत कम समय में अपनी पहचान बनाई है. यहां करीब 1 लाख 50 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि पर जीरे की बुवाई होती है. यहां पर एक लाख से अधिक किसान जीरे की खेती से जुड़े हुए हैं. जालौर सांचौर जिले में भी 1 लाख 35 हजार हेक्टेयर क्षेत्र से अधिक भू भाग पर जीरे की औसतन हर साल बुवाई होती है. यहां पर प्रतिवर्ष 7 हजार मीट्रिक टन जीरे का उत्पादन होता है. जैसलमेर जिले में इस साल 76 हजार हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में किसानों ने जीरे की खेती की है. यहां पर करीब 80 से 85 हजार किसान जीरे की खेती करते हैं.

देश में डर का माहौल; हमारा सरकार से मोहभंग – स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का बड़ा बयान

An atmosphere of fear in the country; Our disillusionment with the government – Swami Avimukteshwaranand Saraswati’s big statement अलवर ! ज्योतिष पीठाधीश्वर जगदगुरू शंकराचाय स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने आरोप लगाया है कि अभी देश में डर का माहौल है, लोकतंत्र को चलने नहीं दिया जा रहा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में गौसेवक प्रत्याशी को चुनाव लड़ने से रोका जा रहा है, प्रशासन की ओर से उनके प्रस्तावकों को डराया जा रहा है। वहां के मेयर रात के दो बजे प्रस्तावकों के दरवाजे खटखटा कर उन्हें प्रस्तावक से नाम वापस लेने के लिए दबाव डाल रहे हैं। जगदगुरू शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती बुधवार को अलवर में पत्रकारों से बातचीत में केन्द्र की मोदी सरकार, भाजपा, कांग्रेस व आप सहित अन्य पार्टियों पर भी खूब बरसे। उन्होंने कहा कि इस बार वाराणसी में गौसेवक आंध्र प्रदेश के पोलीसती के शिवकुमार ने सबसे पहले नामांकन दाखिल किया है। वे गौमाता गठबंधन में शामिल हैं और उनके अधिकत प्रत्याशी हैं। अब वाराणसी के मेयर उनके प्रस्तावकों को डरा उनसे हटने के लिए दवाब डाल रहे हैं। भाजपा का प्रयास है कि प्रस्तावकों को हटाकर गौसेवक शिवकुमार का नामांकन खारिज कराने का है। उन्होंने कहा कि गौमाता की रक्षा के लिए उनकी ओर से देश में कई जगह प्रत्याशी खड़े किए गए हैं। उन्होंने कहा कि गौहत्या पर रोक लगाने के लिए पांच महीने पहले भाजपा, कांग्रेस, आप सहित अन्य बड़ी पार्टियों से शपथ देने को कहा था, लेकिन किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। देश में एक लोकसभा चुनाव ही नहीं, हर रोज होते हैं कोई न कोई चुनावजगदगुरू शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने कहा कि हम लोग गौमाता की रक्षा की बात उठा रहे हैं। यह प्रयास कोई लोकसभा चुनाव के लिए नहीं है, बल्कि हर रोज कोई न कोई चुनाव होते हैं। इस कारण हम देश में 35 करोड़ मतदाताओं को गौमाता की रक्षा के लिए संकल्पित कर रहे हैं। खूब धमकियां मिल रही, लेकिन पीछे नहीं हटेंगेशंकराचार्य ने कहा कि उन्हें खूब धमकियां मिल रही है, उन्हें बोलने से रोका जा रहा है, मारने की बात कही जा रही है, मठ उजाड़ने, नकली शंकराचार्य खड़े करने की बात हो रही है, लेकिन देश में गोमाता की रक्षा के कार्य से वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। उन्होंने कहा कि वे किसी पार्टी के खिलाफ नहीं है। भाजपा के हारने या जीतने से उन्हें कुछ नहीं मिलेगा। वे केवल गौहत्या का कानून चाहते हैं, राजनीति से उनका कोई सरोकार नहीं है। वे चाहते हैं कि उनके अनुयायियों के माथे पर लग रहा गौहत्या का पाप हटे। कारण है कि उनके वोट से सरकार बनती है और फिर वही सरकार गायों को कटवाने का कार्य करती है। देश में सच्चे हिंदुत्व की जरूरतशंकराचार्ज ने कहा कि देश में सच्चे हिंदुत्व की जरूरत है, न कि राजनीतिक हिंदुत्व की। दस साल सरकार में रहकर भी गायों को कटने से रोकने का कानून नहीं बना पाए, वे राजनीतिक हिन्दू हैं। उन्होंने कहा कि सच बोलने वालों का विरोध होता है, हमें भी लाखों लोगों ने गालियां दी हैं। राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा नहीं, केवल इवेंट हुआजगदगुरू शंकराचाय स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने आरोप लगाया कि अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हुई है, बल्कि एक इवेंट हुआ है। शास्त्रों में उल्लेखित है कि जब तक मंदिर का निर्माण पूरा नहीं हो जाता, तब तक भगवान की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। अयोध्या में अभी राम मंदिर का केवल 30 प्रतिशत कार्य पूरा हुआ है, इस कारण वहां मंदिर निर्माण पूरा होने पर ही प्राण प्रतिष्ठा कराई जाएगी, अभी तो केवल इवेंट हुआ है।

राजस्थान सरकार के मंत्रियों को विभागों का बंटवारा

Distribution of departments to the ministers of Rajasthan government राजस्थान सरकार के मंत्रियों को विभागों का बंटवारा: गृह विभाग सीएम भजनलाल के पास, दीया को वित्त, बैरवा को परिवहन; किरोड़ीलाल ग्रामीण विकास मंत्री राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने मंत्रियों को विभागों का बंटवारा कर दिया है। गृह विभाग मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने खुद अपने पास रखा है। डिप्टी सीएम दीया कुमारी को वित्त के साथ छह विभाग दिए हैं। डिप्टी सीएम प्रेमचंद बैरवा को परिवहन के साथ चार विभागों का जिम्मा सौंपा गया हैं। कैबिनेट मंत्री किरोड़ी लाल मीणा को कृषि और ग्रामीण विकास, आपदा प्रबंधन और जन अभाव अभियोग विभाग दिया हैं। मदन दिलावर को शिक्षा विभाग की जिम्मेदारी दी गई है। प्रारंभिक शिक्षा और संस्कृत शिक्षा भी उनके पास रहेगी। बाबूलाल खराड़ी को जनजाति क्षेत्रीय विकास विभाग और हीरालाल नागर को ऊर्जा विभाग दिया गया हैं। दरअसल, 30 दिसंबर शनिवार को 22 मंत्रियों ने शपथ ली थी। इसके बाद से विभाग के बंटवारे को लेकर एक्सरसाइज शुरू कर दी गई थी।

एक बंधक मजदूर की तमिलनाडु से हुई सकुशल घर वापसी।

A bonded laborer returns home safely from Tamil Nadu. कलेक्टर की पहल पर श्रम विभाग ने की कार्यवाही। विशेष संवाददाता रायपुर  कांकेर।  कलेक्टर डॉ. प्रियंका शुक्ला के निर्देशानुसार श्रम विभाग की टीम द्वारा जिले के एक बंधक श्रमिक को नामक्कल तमिलनाडु से वापस लाया गया। कलेक्टर डॉ. शुक्ला द्वारा जिले के दुर्गूकोन्दल विकासखण्ड के ग्राम कराकी निवासी  अजय कुमार जाड़े पिता  धर्मेन्द्र कुमार जाड़े को बंधक बनाने के संबंध में शिकायत प्राप्त होने पर संवेदनशीलता के साथ कार्यवाही करते हुए गठित टीम द्वारा बंधक श्रमिक को मुक्त कराने हेतु एस.एस.बी. पोल्ट्री फार्म जिला नाकक्कल तमिलनाडु के लिए रवाना किया गया था। जिसमें पाया गया कि पिछले  6 महीनों से 14 श्रमिकों को बिना मजदूरी दिये काम कराया जा रहा था। उक्त संबंध में जिला गठित टीम द्वारा व स्थानीय प्रशासन तमिलनाडु के माध्यम से 14 श्रमिकों को मुक्त कराने की कार्यवाही की गई, जिसमें छत्तीसगढ़ के 06 मजदूर-कांकेर जिले के 01, बीजापुर-01, दंतेवाड़ा-04 व अन्य राज्य झारखंड, मध्यप्रदेश व पश्चिम बंगाल के श्रमिकों को बंधक बनाकर रखे थे। उक्त श्रमिकों को एस.एस.बी. पोल्ट्री फार्म जिला नामक्कल तमिलनाडु से कुल मजदूरी राशि 05 लाख 18 हजार 314 रूपये का नगद भुगतान कराया गया तथा स्थानीय प्रशासन द्वारा 30 हजार के मान से सभी श्रमिकों को तत्कालिक सहायता राशि व विमुक्ति प्रमाण-पत्र प्रदाय किया गया। उक्त टीम में शामिल श्रम विभाग के उप निरीक्षक  विवेक साव दल प्रभारी, चाईल्ड लाईन महिला एवं बाल विकास विभाग कांकेर के सुपरवाईजर  महेश साहू, सहायक उप निरीक्षक रक्षित केन्द्र कांकेर  जयकरन शोरी व आरक्षक रक्षित केन्द्र कांकेर  ईश्वर साहू द्वारा कलेक्टर के समक्ष जिले के 01 अवमुक्त श्रमिक अजय कुमार जाड़े को उनके पिता  धमेन्द्र कुमार जाड़े को सकुशल सौंपा गया।

पांच हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश

Recommendation for appointment of Chief Justices in five High Courts, Collegium suggested names of these judges. राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति मनींद्र मोहन श्रीवास्तव, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति शील नागू, गौहाटी हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई, इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और झारखंड हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति बीआर सारंगी के नाम की सिफारिश की गई है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने राजस्थान हाईकोर्ट, इलाहाबाद हाईकोर्ट समेत पांच उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए पांच न्यायाधीशों के नामों की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी है। राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति मनींद्र मोहन श्रीवास्तव, पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति शील नागू, गौहाटी हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई, इलाहाबाद हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और झारखंड हाईकोर्ट के लिए न्यायमूर्ति बीआर सारंगी के नामों की अनुशंसा की गई है। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम में जस्टिस संजीव खन्ना और बीआर गवई सदस्य हैं। जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह के सुप्रीम कोर्ट में पदोन्नत होने के बाद राजस्थान हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश का पद खाली हो गया था। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के वरिष्ठतम न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनींद्र मोहन श्रीवास्तव को राजस्थान हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश बनाए जाने की सिफारिश की है। एक प्रस्ताव में कहा गया है कि मनींद्र मोहन श्रीवास्तव के नाम पर विचार करते समय सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इस तथ्य को भी ध्यान में रखा कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट (जो उनका मूल उच्च न्यायालय है) का देश के उच्च न्यायालयों में कोई मुख्य न्यायाधीश नहीं है। 27 दिसंबर को जारी प्रस्ताव में न्यायमूर्ति नागू के संबंध में कॉलेजियम ने कहा कि वह एक योग्य न्यायाधीश हैं और उनमें उच्च न्यायिक पद पर आसीन होने के लिए जरूरी उच्च स्तर की सत्यनिष्ठा और आचरण है। न्यायमूर्ति नागू के नाम की अनुशंसा करते समय कॉलेजियम इस तथ्य पर विचार किया कि न्यायमूर्ति शील नागू पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए सभी मानकों पर फिट और उपयुक्त हैं। न्यायमूर्ति बिश्नोई की अनुशंसा के संबंध में कॉलेजियम ने कहा कि उन्होंने बार और बेंच में पेशेवर नैतिकता का उच्च स्तर बनाए रखा है और उनका आचरण और सत्यनिष्ठा पर कोई दाग नहीं है। कॉलेजियम ने कहा कि न्यायमूर्ति भंसाली ने राजस्थान हाईकोर्ट में न्याय देने का व्यापक अनुभव हासिल किया है।

भाजपा: अचर्चित चेहरों के हाथ कमान सौंपने में जोखिम मे नि:संदेह.

BJP: Taking the risk in entrusting key responsibilities to lesser-known faces without hesitation. उदित नारायण इन अप्रत्याशित फैसलों के भीतर कई राजनीतिक संदेश छुपे हैं, जो भाजपा के स्वयंभू नेताओं के लिए तो हैं ही, उन विपक्षी नेताओं के लिए भी हैं, जो मात्र सीट बंटवारे और वोटों के कागजी गणित के भरोसे आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी को पटखनी देने का अरमान पाले हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी और उसके शीर्ष नेतृत्व ने हिंदी भाषी तीन राज्यों में भारी जीत के बाद जिन अचर्चित चेहरों के हाथों में सत्ता की कमान सौंपी है, उससे ‘चौंकना’ शब्द भी फीका लगने लगा है। यह कुछ वैसा ही था कि कोई जादूगर अपनी जेब में हाथ डाले और नोट किसी भीड़ में छिपे शख्स की जेब से निकले।मोदी- शाह ने मीडिया के तमाम अटकलों को बेकार साबित कर दिया है। लेकिन इन अप्रत्याशित फैसलों के भीतर कई राजनीतिक संदेश छुपे हैं, जो भाजपा के स्वयंभू नेताओं के लिए तो हैं ही, उन विपक्षी नेताओं के लिए भी हैं, जो मात्र सीट बंटवारे और वोटों के कागजी गणित के भरोसे आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी को पटखनी देने का अरमान पाले हुए हैं। विधानसभा चुनावों में भाजपा के जीते हुए मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ राज्यों में ‘कौन बनेगा मुख्यमंत्री’ की रेस असली हार्स रेस से भी ज्यादा रोमांचक होने लगी थी। दावेदारी और राजयोग में अदृश्य मुकाबला चल रहा था। मीडिया की आंखें और राजनीतिक भविष्यवाणियां उन्हीं चंद चेहरों के आसपास मंडरा रही थीं, जिन्हें परंपरागत रूप से कुर्सी की दौड़ में प्रथम पंक्ति में माना जाता रहा था। ऐसे कुछ नाम जो सीएम या फिर वो भी नहीं तो कम से कम डिप्टी सीएम पद की शपथ लेने के लिए नए सूट सिलवा चुके थे। लेकिन हाय री किस्मत!भाजपा आलाकमान ने इन फैसलों से छह संदेश दिए हैं। पहला तो कोई खुद को पार्टी से ऊपर न समझे, दूसरा भाजपा में संघ अभी भी पूरी तरह ताकतवर है, तीसरा भाजपा में कोई साधारण कार्यकर्ता भी शीर्ष पद तक पहुंच सकता है, चौथा भाजपा ने आने वाले 15 साल तक राजनीति करने वाले नए खून की फौज तैयार कर दी है, पांचवां सोशल इंजीनियरिंग में भाजपा सभी राजनीतिक दलो से मीलों आगे है और छठा, इस बदलाव के जरिए भाजपा ने आगामी लोकसभा चुनाव की जमीन भी तैयार कर दी है और तकरीबन मुद्दे भी तय कर दिए हैं। मप्र में डा. मोहन यादव, छग में विष्णुदेव साय और राजस्थान में भजनलाल शर्मा बाकी दुनिया के लिए भले ही अचर्चित चेहरे रहे हों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा को उनकी कार्यक्षमता पर भरोसा है। अब यह इन तीनो पर है कि मिले हुए अवसर को कामयाबी में वो कितना बदल पाते हैं। खुद को कितना साबित कर पाते हैं। हालांकि यह जोखिम तो हर उस प्रयोग में रहता है, जो राजनीति की प्रयोगशाला में पहली बार किया जाता है। मप्र में जब पहली बार शिवराज को मुख्यमंत्री पद की कमान सौंपी गई थी तब कई लोगों ने उनकी नेतृत्व क्षमता और देसी छवि पर तंज कसा था, लेकिन वक्त के साथ शिवराज ने खुद को न सिर्फ साबित किया बल्कि अपरिहार्य बन गए। उन्होंने अपनी राजनीति की नई इबारत लिखी। इमोशनल पॉलिटिक्स का नया सिलेबस तय किया और पूरे 18 साल तक सीएम पद पर जमे रहे।हालांकि, पहली पारी के सीएम शिवराज और चौथी पारी के सीएम शिवराज में काफी अंतर था । उनका अपना आभा मंडल और काकस तैयार हो गया था। इस दौरान उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों को भी यथासंभव किनारे लगाया और शायद इसकी इंतिहा हो चुकी थी। यही स्थिति राजस्थान में वसुंधरा राजे की थी। राजे तो पहले से राज परिवार से हैं। लिहाजा कुर्सी पर विराजना उनके लिए नैसर्गिक अधिकार था। उन्होंने खुद को पार्टी और राज्य का भाग्य विधाता मान लिया था। अलबत्ता छग के 15 साल सीएम रहे और बाद में भाजपा में ही हाशिए पर डाल दिए गए डॉ रमनसिंह ने खुली बगावत के रास्ते पर जाने से खुद को बचाया और कुछ बेहतर पाने की आस जिंदा रखी।कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा में इस तरह क्षत्रप संस्कृति को समाप्त पर ‘ एक हाईकमान कल्चर’ को लागू कर भाजपा ने बहुत बड़ा जोखिम लिया है, जो भविष्य में आत्मघाती भी हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर ही पार्टी का पूरी तरह आश्रित हो जाना संगठन की आंतरिक कमजोरी को दर्शाता है। यानी जब मोदी भी नहीं रहेंगे, तब क्या होगा? इसके अलावा इन तीन राज्यों में बिल्कुल ताजा चेहरों की ताजपोशी के साथ राजनीतिक और जातीय समीकरण भी साधने की कोशिश है। छग में आदिवासी चेहरे विष्णुदेव साय को सीएम बनाकर समूचे आदिवासी समुदाय को यह संदेश दिया गया है कि आदिवासी भी हिंदू ही हैं और वो हमारे लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं। इसी तरह मप्र में बिल्कुल अप्रत्याशित चेहरे डॉ. मोहन यादव को सीएम बनाकर यूपी और बिहार के यादवों को भी संदेश दिया गया है कि वो क्षेत्रीय पार्टियों के मोह से उबरें और भाजपा से जुड़ें। मप्र और राजस्थान में दलित डिप्टी सीएम बनाकर बहनजी मायावती और उनकी पार्टी के समर्थकों को संदेश है कि भाजपा में दलितों के लिए भी पूरी जगह है। दिलचस्प बात यह है कि विस चुनाव के दौरान तीनों राज्यों में कांग्रेस पूरे समय ओबीसी जातिजनगणना का मुद्दा उठाती रही, लेकिन जिस तेलंगाना में वह स्पष्ट बहुमत के साथ चुनाव जीती, वहां उसने किसी ओबीसी के बजाए रेवंत रेड्डी के रूप में एक अगड़े को ही मुख्यमंत्री बनाया। 26 विपक्षी दलों के इंडिया गठबंधन की आगामी बैठक 19 दिसंबर को होनी है। उसमें लोकसभा सीटों के बंटवारे के किसी फार्मूले पर बात होती है या नहीं, यह देखने की बात है। लेकिन हो भी गया तो थके चेहरों और सतही जोश से लोकसभा चुनाव की जंग कैसे जीती जाएगी, यह देखने की बात है। बहरहाल चुनाव रणविजय शास्त्र की क्लास में भाजपा से कुछ तो सबक लेने ही चाहिए।

भारतीय जनता पार्टी नए व समर्पित कार्यकुशल लोगों को जिम्मेदारी देने में अग्रिम. 

The Bharatiya Janata Party is ahead in entrusting responsibilities to new and dedicated Party Workers. अनुपम सचान, सहारा समाचार   भोपाल..जब विधानसभा का चुनाव किसी मुख्यमंत्री के नाम के बगैर लड़ा जा रहा था तब यह चर्चा रही कि क्या इस बार भाजपा अपना मुख्यमंत्री कोई नया चेहरा लेकर आएगी मोहन यादव का मुख्यमंत्री पद पर आसीन होना, देश को व प्रदेश को कई संदेश देता है. एक तो यह कि भाजपा एक अनुशासित पार्टी है जिसका कोई भी कार्यकर्ता किसी भी पद तक अपने सम्मान एवं परिश्रम के आधार पर दायित्व पा सकता है भारतीय जनता पार्टी नए व समर्पित कार्यकुशल लोगों को जिम्मेदारी देने में अग्रिम है छत्तीसगढ़ के लिए चुने गए मुख्यमंत्री विष्णु देव साय जिन्होंने सरपंच बनने से लेकर लोकसभा और अब प्रदेश में मुख्य के पद को संभाला है यही संदेश देता है राजस्थान के लिए चुने गए मुख्य मंत्री भजन लाल शर्मा जो राजस्थान विधान सभा सांगानेर विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं  जब द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति पद को संभाला तब भी देश को यही संदेश मिला था राजनीति सत्ता का अहंकार नहीं सेवा का माध्यम है मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह की जो मृदुल छवि थी. वह छवि बरक़रार है और जैसा कुशल नेतृत्व उन्होंने किया, उसके प्रशंसक कम नहीं हैं यही उम्मीद अब प्रदेश की जनता करती है एबीवीपी से अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत करके वह संघटन में दी सेवाओं के अनुभव एवं उच्च शिक्षा मंत्री के बाद अब मोहन यादव मध्यप्रदेश को अपने विशिष्ट कौशल से देश प्रदेश को संपन्नता वह सुशासन से धड़कता हृदय देश बनाने में कोई कमी नहीं रखेंगे। भारत अब अच्छे से महसूस करता है कि यदि केंद्र में प्रखर राष्ट्रप्रेमी शासक आसीन हो तो प्रदेश में भी लीक से हटकर साम्प्रदायिक जातिवादी और क्षेत्रीय मानसिकता से ऊपर उठकर मुख्यमंत्री चुना जाता है। तुष्टीकरण की राजनीति से देश अब मुक्त हो चला है और युवाओं को राजनीति में आकर काम करना एक अच्छा विकल्प दिखने लगा है।

राष्ट्रीय करणी सेना प्रमुख श्री सुखदेव सिंह गोगामणि की जयपुर में गोलीमार कर हत्या.

National Karni Sena Chief Mr. Sukhdev Singh Gogamani was shot dead in Jaipur. जयपुर। बहुत ही दुखद घटना 05/12/2023 को राष्ट्रीय करणी सेना प्रमुख श्री सुखदेव सिंह गोगामणि की जयपुर में गोलीमार कर हत्या कर दी गई है उनका इस तरह आकस्मिक निधन पूरे राजपूत समाज की अपूरणीय क्षति है पुलिस को सूचना मिलने पर पुलिस घटनास्थल पर पहुंची तब तक आरोपी भाग गए। मामले की पुलिस प्रशासन ने एफआईआर दर्ज की एवं आरोपियों की तलाश शुरू कर दी। वहीं लोगों ने राज्यशासन और प्रशासन से मांग है कि इस जघन्य हत्याकांड को अंजाम देने वाले अपराधियों को फांसी की सजा दी जाए।

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