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नीतीश को तेजस्वी ने जहरीली शराब पर 12 सवालों से घेरा, कहा-100 से अधिक मौत और ठहाका लगाते CM

पटना बिहार के छपरा, गोपालगंज और सीवान में जहरीली शराब कांड पर नेता प्रतिपक्ष और लालू यादव के पुत्र तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर बड़ा जुबानी हमला बोला है। उन्होंने कहा है कि प्रदेश में शराब पीने से एक सौ से अधिक लोगों की मौत हो गई है और नीतीश कुमार पटना की सड़कों पर ठहाका लगा रहे हैं। सोशल मीडिया के माध्यम से नीतीश कुमार का एक फोटो शेयर करते हुए तेजस्वी यादव ने बिहार सीएम पर 12 सवालों से हमला बोला है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर तेजस्वी यादव ने पोस्ट डाला है। उन्होंने लिखा है, “जहरीली शराब से 100 से अधिक हत्या होने के बाद भी पटना के बीचों-बीच ठहाके लगाकर हंसते मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री! संवेदना तक व्यक्त नहीं करने वाले तीसरे नंबर की पार्टी के मुख्यमंत्री का इतनी मौतों पर हँसना और हँसाना बिहारियों एवं लोकतंत्र को चिढ़ाना है। इतनी बड़ी घटना होने के बावजूद CM का ना मीडिया से संवाद, ना जनता से संवाद, ना पीड़ितों से संवाद!” दरअसल नीतीश कुमार शुक्रवार को पटना जंक्शन के पास बन रहे मल्टीलेवल पार्किंग और अंडरग्राउंड सबवे का निरीक्षण करने पहुंचे थे। इस दौरान उनके साथ मंत्री विजय चौधरी और मंत्री नितिन नवीन भी मौजूद थे। निरीक्षण के दौरान ली गई एक तस्वीर को तेजस्वी यादव ने अपने सोशल मीडिया हैंडल एक्स पर शेयर किया है और सीएम नीतीश पर हमला बोला है। इससे पहले भी तेजस्वी यादव ने छपरा और सीवान में जहरीली शराब कांड पर नीतीश कुमार पर प्रहार किया था। एक्स पर उन्होंने कहा कि शराबबंदी नीतीश कुमार के संस्थागत भ्रष्टाचार का एक छोटा सा नमूना है। अगर शराबबंदी हुई है तो इसे पूर्ण रूप से लागू करना सरकार का दायित्व है लेकिन मुख्यमंत्री की वैचारिक और नीतिगत अस्पष्टता, कमजोर इच्छाशक्ति तथा जनप्रतिनिधियों की बजाय चुनिंदा अधिकारियों पर निर्भरता के कारण आज बिहार में शराबबंदी सुपरफ्लॉप है। सत्ताधारी नेताओं-पुलिस और शराब माफिया के नापाक गठजोड़ के कारण बिहार में 𝟑𝟎 हज़ार करोड़ से अधिक का अवैध शराब का काला बाजार फला-फूला है। तेजस्वी यादव ने लिखा है कि अगर शराबबंदी के बावजूद बिहार में 𝟑 करोड़ 𝟒𝟔 लाख लीटर शराब की कागजों में बरामदगी दिखायी जा रही है। एक ईमानदार वरीय पुलिस अधिकारी के अनुसार इसमें भी घपला है क्योंकि अवैध शराब की तस्करी के लिए पुलिस अधिकारी शराब पकड़ने/पकड़वाने का ढोंग रचते है जैसे कि 𝟐𝟎 ट्रक शराब बिहार में घुसाने पर एक टूटा-फूटा ट्रक पकड़वाते है। उसमें भी शराब की बजाय कुछ और द्रव्य पदार्थ होता है। अगर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी होशमंद है तो इन सवालों का जवाब दें। 𝟏. अगर प्रतिवर्ष इतनी बड़ी मात्रा में शराब बरामद हो रही तो उसके दोषी कौन? 𝟐. सरकारी गुलाबी फ़ाइलों के अनुसार अवैध शराब से मरने वालों की संख्या 𝟑𝟎𝟎 से अधिक है लेकिन हक़ीक़त इससे विपरीत है, अब तक हजारों लोगों की अवैध शराब के कारण मौत नहीं बल्कि हत्या हुई है। इनका हत्यारा कौन और दोषी कौन? दोषियों पर क्या कारवाई हुई? 𝟑. क्या अब तक आज तक किसी बड़े पुलिस अधिकारी/पुलिस अधीक्षक पर कभी कोई कारवाई हुई? 𝟒. अगर पटना में शराब मिलती है तो उसका मतलब है 𝟓-𝟔 जिला पार कर यहाँ तक शराब पहुँची है, तो फिर यह उन सभी 𝟓-𝟔 जिलों की पुलिस की नाकामी है या नहीं? 𝟓. जानकारों के मुताबिक़ शराब माफिया मुख्यमंत्री से रिटायर्ड अधिकारी के मार्फ़त सीमावर्ती जिलों के पुलिस अधीक्षकों के पदस्थापन में खुली बोली के अंतर्गत पोस्टिंग करवाता है अर्थात् किस जिला में कौन अधिकारी जाएगा इसका चयन भी शराब माफिया ही करता है। क्या यह आरोप सही नहीं है? 𝟔. क्या यह सही नहीं है कि बिहार में शराबबंदी के बाद से अगस्त 𝟐𝟎𝟐𝟒 तक मद्यनिषेध विभाग की ओर से निषेध कानूनों के उल्लंघन से संबंधित कुल 𝟖.𝟒𝟑 लाख मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें कुल 𝟏𝟐.𝟕 लाख लोगों को अब तक गिरफ्तार किया गया है। 𝟕. मुख्यमंत्री बतायें कि गिरफ़्तार लोगों में अधिकांश गरीब व वंचित वर्गों से ही क्यों है? 𝟖. अब तक 𝐃𝐒𝐏 अथवा उससे ऊपर के स्तर के कितने अधिकारियों को सजा मिली? कितने बर्खास्त हुए? 𝟗. प्रतिदिन पुलिस और उत्पाद विभाग की ओर से करीब 𝟔𝟔𝟎𝟎 छापेमारी होती है उसके बावजूद भी शराब की अवैध तस्करी जारी है तो इसका दोषी कौन? 𝟏𝟎. क्या गृहमंत्री सह मुख्यमंत्री इसकी ज़िम्मेवारी लेंगे? 𝟏𝟏. क्या यह संयोग है अथवा प्रयोग कि शराबबंदी में अधिकांश जदयू के नेता/कार्यकर्ता पकड़ाए जा रहे है? 𝟏𝟐. मुख्यमंत्री बतायें कि बिहार के हर चौक-चौराहों पर शराब के ठेके किसने खुलवाये?

हरियाणा विधानसभा में कांग्रेस के नेता विपक्ष का फैसला आलाकमान के द्वारा लिया जाएगा

चंडीगढ़ हरियाणा विधानसभा चुनाव के बाद विधायक दल का नेता चुनने के लिए शुक्रवार को कांग्रेस विधायकों की बैठक चंडीगढ़ में हुई।  बैठक के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने एक लाइन का प्रस्ताव रखा कि नेता विपक्ष का चयन करने का अधिकार आलाकमान को दिया जाए, जिस प्रस्ताव का अनुमोदन प्रदेश अध्यक्ष उदयभान ने किया और सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर दिया गया। इसके बाद पर्यवेक्षकों ने तमाम विधायकों से वन-टू-वन उनकी राय जानी और पूरी रिपोर्ट लेकर दिल्ली रवाना हो गए हैं। अब हरियाणा विधानसभा में कांग्रेस के नेता विपक्ष का फैसला आलाकमान के द्वारा लिया जाएगा। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री केंद्रीय पर्यवक्षेक अशोक गहलोत, एआईसीसी के कोषाध्यक्ष अजय माकन और पंजाब सीएलपी नेता प्रताप सिंह बाजवा बैठक में मौजूद थे।  

हरियाणा में भाजपा सरकार के फैसले पर भड़कीं मायावती, कहा- आरक्षण समाप्त करने की साजिश

नई दिल्ली हरियाणा की भाजपा सरकार ने पहली ही कैबिनेट मीटिंग में अनुसूचित जाति आरक्षण में उप-वर्गीकरण लागू करने का फैसला लिया है। सीएम नायब सिंह सैनी का कहना है कि इससे उन दलित जातियों को लाभ मिल सकेगा, जो अब तक आरक्षण से वंचित रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकारों को एससी आरक्षण के वर्गीकरण का अधिकार दिया था। उसी फैसले के आधार पर भाजपा सरकार ने कैबिनेट में यह निर्णय लिया है। वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती इस फैसले पर भड़क गई हैं। उन्होंने कहा कि यह आरक्षण को ही खत्म करने की साजिश का हिस्सा है। इसके अलावा समाज में बंटवारे का प्रयास है। मायावती ने भाजपा सरकार के फैसले के तुरंत बाद एक्स पर पोस्ट किया। उन्होंने लिखा, ‘हरियाणा की नई भाजपा सरकार द्वारा एससी समाज के आरक्षण में वर्गीकरण को लागू करने अर्थात आरक्षण कोटे के भीतर कोटा की नई व्यवस्था लागू करने का फैसला दलितों को फिर से बांटने व उन्हें आपस में ही लड़ाते रहने का षड्यंत्र है। यह दलित विरोधी ही नहीं बल्कि घोर आरक्षण विरोधी निर्णय है।’ यही नहीं मायावती ने भाजपा हाईकमान को भी इस फैसले को लेकर आड़े हाथों लिया। मायावती ने कहा कि हरियाणा सरकार को ऐसा करने से रोकने के लिए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के आगे नहीं आने से भी यह साबित है कि कांग्रेस की तरह बीजेपी भी आरक्षण को पहले निष्प्रभावी बनाने और अन्ततः इसे समाप्त करने के षडयंत्र में लगी है। जो घोर अनुचित व बीएसपी इसकी घोर विरोधी है। मायवाती ने कहा कि वास्तव में जातिवादी पार्टियों द्वारा एससी-एसटी व ओबीसी समाज में ’फूट डालो-राज करो’ व इनके आरक्षण विरोधी षडयंत्र आदि के विरुद्ध संघर्ष का ही नाम बीएसपी है। इन वर्गों को संगठित व एकजुट करके उन्हें शासक वर्ग बनाने का हमारा संघर्ष लगातार जारी रहेगा। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भी मायावती ने ऐतराज जताया था। उन्होंने तब केंद्र सरकार से अपील की थी कि वह अदालत में सही से पैरवी करे ताकि फैसला बदला जा सके। वहीं दलितों के ही एक वर्ग ने इस फैसले को सही करार दिया है। यहां तक कि अगस्त में ही जब एक वर्ग आरक्षण पर इस फैसले के विरोध में उतरा था तो वहीं वाल्मीकि समुदाय ने कई जगहों पर इसके समर्थन में प्रदर्शन किए थे।

नांदेड़ लोकसभा का उपचुनाव भी भाजपा बना रही हाईप्रोफाइल, पूर्व CM को ही उतारने की तैयारी

मुंबई महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के साथ ही नांदेड़ लोकसभा का उपचुनाव भी होना है। इस एकमात्र सीट के उपचुनाव को भी भाजपा हल्के में नहीं लेना चाहती और मजबूत कैंडिडेट उतारने की तैयारी है। महाराष्ट्र भाजपा के सूत्रों का कहना है कि यहां से पूर्व सीएम और राज्यसभा सांसद अशोक चव्हाण को भी उतारा जा सकता है। उनके नाम पर पार्टी में गंभीरता से विचार चल रहा है। वह कुछ महीने पहले ही भाजपा में आए थे और उन्हें राज्यसभा भेजा गया था। नांदेड़ को उनका गढ़ माना जाता है। यहां उनके अपने निजी प्रभाव और पार्टी के बड़े वोटबैंक के जरिए भाजपा को जीत की उम्मीद है। इसलिए चर्चा है कि अशोक चव्हाण को ही उतारा जा सकता है। यदि वह जीते तो फिर राज्यसभा में सूबे से किसी और नेता को भेजा सकता है। कांग्रेस ने इस सीट से पूर्व सांसद वसंत चव्हाण के बेटे रवींद्र चव्हाण को अपना कैंडिडेट घोषित किया है। भाजपा को लगता है कि कांग्रेस रवींद्र चव्हाण को उतारकर वसंत राव के निधन से मिलने वाली सहानुभूति का लाभ पा सकती है। ऐसे में भाजपा इस सीट पर टफ फाइट के मूड में आ गई है। यही वजह है कि पूर्व सीएम को ही उतारने का प्लान बन रहा है। अशोक चव्हाण के अलावा पूर्व सांसद प्रताप पाटिल चिखलिकर का नाम भी चर्चा में है। फिलहाल सभी की नजर भाजपा के कैंडिडेट पर ही है कि आखिर किसे मौका मिलता है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले ही अशोक चव्हाण ने कांग्रेस छोड़ दी थी और भाजपा में आ गए थे। उनके साथ कई समर्थक भी भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आ गए थे। हालांकि इसके बाद भी नांदेड़ सीट पर पार्टी को फायदा नहीं मिला। यहां चुनाव में कांग्रेस के वसंतराव चव्हाण ने 60 हजार से ज्यादा वोटों से भाजपा के प्रताप पाटिल चिखलिकर को हरा दिया था। इसीलिए भाजपा को अब लगता है कि अशोक चव्हाण को उतारा जाए। निजी तौर पर उन्हें उतारने से भाजपा और उनके समर्थक ऐक्टिव हो सकते हैं। इससे दोहरी ताकत मिलेगी। लेकिन उनके ना लड़ने पर समर्थकों के ऐक्टिव होने की संभावना कम रहती है। यह सीट कांग्रेस के सांसद चुने गए वसंत राव चव्हाण के निधन से खाली हुई है। ऐसे में सहानुभूति का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। लेकिन अशोक चव्हाण के जरिए भाजपा तगड़े मुकाबले की तैयारी में है।

महाराष्ट्र के बड़े राजनीतिक घराने में आपसी कलह थोड़ी कम हो सकती, राज के बेटे के लिए उद्धव करने जा रहे बड़ी पहल

नई दिल्ली महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए सभी दलों ने कमर कस ली है। इस बीच महाराष्ट्र के बड़े राजनीतिक घराने में आपसी कलह थोड़ी कम हो सकती है। खबर है कि उद्धव ठाकरे इसकी पहल करने जा रहे हैं और वह चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ रिश्ते सुधार सकते हैं। इसके तहत वह राज के बेटे अमित ठाकरे के खिलाफ कैंडिडेट नहीं उतारेंगे। ऐसा हुआ तो ठाकरे परिवार में करीब डेढ़ दशक से छिड़ा गृह युद्ध थोड़ा धीमा पड़ सकता है। जानकारी के अनुसार अमित ठाकरे माहिम विधानसभा सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। वह महाराष्ट्र नवनिर्माण विद्यार्थी सेना के अध्यक्ष हैं। अमित ठाकरे ने बीते दिनों महाराष्ट्र के कई इलाकों का दौरा किया था और पार्टी के संगठन को खड़ा करने का प्रयास किया है। वह चुनाव में भी उतरने जा रहे हैं और उद्धव ठाकरे की शिवसेना उनके खिलाफ कैंडिडेट न उतारने की तैयारी में है। मनसे के नेताओं ने अमित ठाकरे को उतारने की मांग की है और अब आखिरी फैसला राज को ही लेना है। गुरुवार रात को इस संबंध में लंबी मीटिंग हुई। वहीं चर्चा है कि यदि अमित ठाकरे को टिकट मिला तो फिर उद्धव सेना उनके सामने कैंडिडेट नहीं देगी। इसकी वजह यह है कि जब वरली सीट से आदित्य ठाकरे 2019 में वरली सीट से उतरे थे तो उनके खिलाफ मनसे ने भी कैंडिडेट नहीं दिया था। माना जा रहा है कि उद्धव ठाकरे अब उसके बदले में अमित के लिए भी ऐसा ही करने वाले हैं। इस तरह उनकी कोशिश है कि परिवार में छिड़े संघर्ष को कम किया जा सके। इससे काडर के बीच अच्छा संदेश जाएगा। खासतौर पर ऐसे वक्त में जब पार्टी विभाजित हो चुकी है और एक बड़ा खेमा एकनाथ शिंदे के साथ अलग पार्टी के तौर पर सत्ता में है। उद्धव सेना के एक नेता ने कहा कि जब आदित्य ने वरली से चुनाव लड़ा था तो राज काका ने भी कैंडिडेट नहीं दिया था। अब ऐसा ही उद्धव काका करेंगे। दरअसल 2019 के चुनाव में राज ठाकरे ने कहा कि यदि हमारे बच्चे चुनाव लड़ना चाहते हैं तो फिर उन्हें हमें आगे बढ़ने देना चाहिए। यदि आदित्य चुनाव लड़ना चाहते हैं तो फिर इसमें गलत क्या है। शिवसेना कार्यकर्ताओं का कहना है कि उद्धव ठाकरे इसके जरिए इमोशनल रणनीति बना रहे हैं। उन्हें लगता है कि इससे फैमिली की एकता का संदेश जाएगा और कार्यकर्ता एकजुट होंगे। खासतौर पर मुंबई की सीटों पर उद्धव सेना को इससे फायदे की उम्मीद है। यही नहीं चुनाव बाद जरूरत हुई तो मनसे के विधायक साथ भी आ सकते हैं।

बीजेपी महाराष्ट्र में ओबीसी, एससी और एसटी पर ही पूरा जोर लगाएगी

 मुंबई लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान कांग्रेस, सपा, आरजेडी और शरद पवार की एनसीपी जैसी पार्टियों ने प्रचार किया था कि एनडीए इसलिए 400 सीटें मांग रहा है ताकि संविधान बदल सके। इसके अलावा आरक्षण को खत्म किया जा सके। इस प्रचार ने असर भी दिखाया और माना जाता है कि इसी के चलते भाजपा 240 सीटों पर ही ठहर गई और एनडीए दलों के समर्थन से ही सरकार बन सकी। अब महाराष्ट्र में इसी दांव को भाजपा पलटने की तैयारी में है।  भाजपा और एनडीए सरकारों के मुख्यमंत्रियों की मीटिंग हो रही है। इसमें पीएम नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं। इस मीटिंग का एजेंडा ही है कि कैसे आपातकाल के 50 साल पूरे होने को संविधान हत्या के प्रयास के तौर पर याद दिलाया जाए। यही नहीं महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी भाजपा, एकनाथ शिंदे और अजित पवार की एनसीपी इस मसले को उठाने वाले हैं। इसके तहत घर घर संविधान अभियान चलाया जाएगा। इसके माध्यम से संविधान लागू होने के 75 वर्ष का स्मरण किया जाएगा। दरअसल ‘घर-घर संविधान’ अभियान के माध्यम से भाजपा चाहती है कि विपक्ष के संविधान बदलने वाले नैरेटिव की काट की जा सके। विपक्ष के इस नैरेटिव का सबसे ज्यादा नुकसान महाराष्ट्र और यूपी जैसे बड़े राज्यों में ही हुआ था। इस अभियान के माध्यम से एनडीए के दल चाहते हैं कि महाराष्ट्र के 25 फीसदी वोटों को साधा जा सके। राज्य में 16 फीसदी दलित आबादी है, जबकि 9 फीसदी संख्या आदिवासियों की है। सूबे में 29 विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति और 25 सीटें जनजाति के लिए आरक्षित हैं। भाजपा को लगता है कि ये सीटें पूरा गेम पलटने का दम रखती हैं। भाजपा सूत्रों का कहना है कि महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के सुझाव पर ही ‘घर-घर संविधान’ अभियान शुरू किया जाएगा। वह चाहते हैं कि इस अभियान के जरिए यह संदेश दिया जाए कि भाजपा कैसे संविधान को लेकर तत्पर है। ओबीसी, एससी और एसटी पर ही पूरा जोर भाजपा नेताओं का कहना है कि यह अभियान दलितों, ओबीसी और जनजाति समुदाय के बीच अच्छा संदेश देगा। पार्टी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस एवं उसके सहयोगी दलों ने इन्हीं समुदायों के बीच 2024 में भ्रम पैदा कर दिया था। महाराष्ट्र में भाजपा के दलित नेता धर्मपाल मेश्राम ने कहा कि इस बार लोकसभा चुनाव जैसी स्थिति नहीं होगी। हमारे अभियान का लाभ होगा और दलित मतदाता इस बार भाजपा के साथ फिर से आएंगे। क्या है 54 सीटों वाला प्लान, जिससे गेम पलटने की उम्मीद इस तरह भाजपा 54 आरक्षित सीटों पर फोकस कर रही है, जहां से गेम पलट सकता है। इसके अलावा ओबीसी वर्ग पर भी फोकस है क्योंकि मराठा आरक्षण आंदोलन के चलते उनके जरिए ही नुकसान की भरपाई की उम्मीद है। हरियाणा में भी भाजपा ने सामाजिक समीकरण का माइक्रो मैनेजमेंट करके जीत हासिल की थी। माना जा सकता है कि कुछ ऐसा ही प्रयास वह महाराष्ट्र में भी करना चाहती है।

कांग्रेस के लिए बड़ा चैंलेंज है बुधनी उपचुनाव, बुधनी से बीजेपी के ये हैं तगड़े दावेदार

भोपाल मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिह चौहान की बुधनी विधानसभा सीट पर कांग्रेस में भी चार दावेदार सामने आए है। जानकारी के अनुसार बुधनी सीट के लिए कांग्रेस से राजकुमार पटेल, विक्रम मस्ताल, अजय पटेल और महेश राजपूत के नामों का पैनल बना है। वहीं विजयपुर में मुकेश मल्होत्रा का सिंगल नाम है। विजयपुर सीट के लिए कांग्रेस ने नाम दिल्ली भेजा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव, पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा और पूर्व विधायक शैलेंद्र पटेल ने दो दिनों तक स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ रायशुमारी की है। बीजेपी के ऐलान के बाद कांग्रेस अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर सकती है। बता दें कि बुधनी पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की परंपरागत सीट है। उनके सांसद चुने जाने के बाद यह सीट खाली हुई है। इसी तरह विजयपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत के इस्तीफे और बीजेपी में शामिल होने के बाद सीट रिक्त हुई है। दोनों विधानसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा हो चुकी है। राज्य की दोनों पार्टी बीजेपी और कांग्रेस चुनाव की तैयारी में जुट गई है। भोपाल मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिह चौहान की बुधनी विधानसभा सीट पर कांग्रेस में भी चार दावेदार सामने आए है। जानकारी के अनुसार बुधनी सीट के लिए कांग्रेस से राजकुमार पटेल, विक्रम मस्ताल, अजय पटेल और महेश राजपूत के नामों का पैनल बना है। वहीं विजयपुर में मुकेश मल्होत्रा का सिंगल नाम है। विजयपुर सीट के लिए कांग्रेस ने नाम दिल्ली भेजा है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण यादव, पूर्व मंत्री सज्जन सिंह वर्मा और पूर्व विधायक शैलेंद्र पटेल ने दो दिनों तक स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ रायशुमारी की है। बीजेपी के ऐलान के बाद कांग्रेस अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान कर सकती है। बता दें कि बुधनी पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की परंपरागत सीट है। उनके सांसद चुने जाने के बाद यह सीट खाली हुई है। इसी तरह विजयपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक रामनिवास रावत के इस्तीफे और बीजेपी में शामिल होने के बाद सीट रिक्त हुई है। दोनों विधानसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा हो चुकी है। राज्य की दोनों पार्टी बीजेपी और कांग्रेस चुनाव की तैयारी में जुट गई है। बुधनी सीट पर कांग्रेस से इन चार नामों का पैनल     राजकुमार पटेल     विक्रम मस्ताल     अजय पटेल     महेश राजपूत जानिए कांग्रेस के दावेदारों के बारे में     राजकुमार पटेल- 1993 से 1998 तक विधायक रहे उसी दौरान शिक्षा राज्यमंत्री रहे। 1998 में बडे़ भाई देवकुमार पटेल को टिकट मिला था।     विक्रम मस्ताल- टीवी सीरियल में भगवान हनुमान का रोल निभा चुके हैं। 2023 के विधानसभा चुनाव में बुधनी से प्रत्याशी रह चुके हैं।     अजय पटेल- युवा कांग्रेस के बुधनी विधानसभा के 10 साल से अध्यक्ष हैं। पिता डॉक्टर हैं। किसान परिवार से आते हैं।     महेश राजपूत- बुधनी के दो बार जनपद अध्यक्ष रहे। 2008 में कांग्रेस से चुनाव लड़ चुके हैं। विजयपुर सीट पर ये सिंगल नाम श्योपुर जिले की विजयपुर सीट पर बीजेपी की तरह कांग्रेस के संभावित दावेदारों में सिंगल नाम है। कांग्रेस के पैनल में 2023 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय लड़े मुकेश मल्होत्रा का सिंगल नाम है। मल्होत्रा 2023 के विधानसभा चुनाव में 44 हजार से ज्यादा वोट लेकर तीसरे नंबर पर रहे थे।

BSP को प्रतिदिन घटते जनाधार का सामना करना पड़, अब उपचुनाव बड़ी चुनौती

लखनऊ लोकसभा चुनाव में जीरो पर आउट हो चुकी बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सामने उपचुनाव में अपना कुनबा बढ़ाने की एक बड़ी चुनौती आ गई है। पार्टी को प्रतिदिन घटते जनाधार का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में बसपा के लिए अपने प्रभाव को बचाने के लिए जरूरी हो गया है कि इस उपचुनाव में दलित वोटों के बीच अपनी पैठ को एक बार फिर से साबित करे। राजनीतिक जानकारों की मानें तो जिन नौ सीटों पर अभी उपचुनाव होने जा रहे हैं, उनमें से एक भी सीट पर बसपा का खाता नहीं खुला था। बसपा ने महज बलिया की रसड़ा सीट पर जीत दर्ज की थी। अब अगर 2022 के चुनावी आंकड़ों पर नजर डालें तो बसपा आंबेडकर नगर की कटेहरी सीट पर तीसरे नंबर पर आई थी। यहां उनके प्रत्याशी प्रतीक पांडेय को 58,186 वोट मिले। इस सीट पर सपा के लालजी वर्मा ने जीत दर्ज की थी। मीरापुर विधानसभा में बसपा तीसरे स्थान पर रही थी। उसके उम्मीदवार को 23,733 वोट मिले थे। इस सीट पर रालोद के उम्मीदवार चंदन चौहान ने जीत दर्ज की थी। गाजियाबाद में भी बसपा तीसरे नंबर पर थी। यहां उसके उम्मीदवार को 32,554 वोट मिले थे। यहां पर भाजपा के उम्मीदवार अतुल गर्ग को जीत मिली थी। कुंदरकी विधानसभा में भी बसपा तीसरे स्थान पर रही। उसके उम्मीदवार को 42,645 वोट मिले थे। कानपुर के सीसामऊ सीट पर बसपा चौथे नंबर पर थी। इस सीट से पार्टी के उम्मीदवार को महज 2,891 वोट मिले थे। जबकि यहां से सपा के हाजी इरफान सोलंकी ने जीत दर्ज की थी। मैनपुरी की करहल सीट पर बसपा प्रत्याशी 15,643 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर था। यहां से सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जीत दर्ज की थी। उनके सांसद चुने जाने बाद इस सीट पर चुनाव हो रहा है। इसी तरह मिर्जापुर की मझवां सीट पर भी बहुजन समाज पार्टी तीसरे नंबर पर आई थी। उसके उम्मीदवार को 52,825 वोट मिले थे। यहां से निषाद पार्टी के उम्मीदवार ने जीत दर्ज की थी। खैर सीट पर बसपा दूसरे नंबर पर थी। पार्टी के उम्मीदवार को 64,996 वोट मिले थे। इस सीट पर भाजपा के उम्मीदवार अनूप प्रधान ने जीत दर्ज की थी। फूलपुर में 32,869 वोटों के साथ बसपा तीसरे स्थान पर रही थी। यह सीट भाजपा ने जीती थी। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक वीरेंद्र सिंह रावत का कहना है कि उपचुनाव बसपा के सामने बड़ा मौका लेकर आया है। अकेले दम पर मैदान में उतरकर अपने कुछ सीटों पर उम्मीदवार भी उतारे हैं। उनके जो भी उम्मीदवार हैं वो जातीय समीकरण के सटीक हैं। नौ में से कुछ सीटें ऐसी हैं जहां पर बसपा का जनाधार ठीक रहा है। मझवां सीट पर बसपा कई बार जीत दर्ज कर चुकी है। इसी तरह मीरापुर और कटेहरी सीट बसपा के लिए ज्यादा मुफीद रही है। लेकिन वर्तमान समय में चुनाव दर चुनाव में मिली हार की वजह से उसकी हालत पतली है। बसपा को इस चुनाव में सिद्ध करना होगा। मत प्रतिशत बढ़ाकर जनाधार साबित करना होगा। इस चुनाव के जरिए ही बसपा दलित मतदाताओं का सही आकलन भी कर सकेगी। हालांकि, बसपा पहले उपचुनाव से दूरी बनाती थी। लेकिन इस बार बहुत पहले से ही तैयारी शुरू कर दी है। उन्होंने आगे कहा कि बिना किसी दल के साथ गठबंधन किए ही पार्टी अकेले दम पर मैदान में है। हालांकि, पार्टी के पास लीडरशिप का भी संकट है। इस कारण यह चुनाव उसके लिए बड़ी चुनौती है। बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल कहते हैं कि उपचुनाव में हमारी पार्टी अकेले दम पर मैदान में है। हमारी कोशिश है कि ज्यादा से ज्यादा सीट जीतकर बहन जी के हाथों को मजबूत करें। चुनाव को लेकर लगातार नेताओं की छोटी बड़ी जनसभाएं चल रही हैं। हमने कटेहरी से अमित वर्मा मझवां से दीपू तिवारी, फूलपुर में शिव बरन पासी को उम्मीदवार बनाया गया है। बचे हुए नाम एक दो दिन में आ जाएंगे। जहां-जहां चुनाव है वहां चौपाल और जनसभाएं चल रही हैं। बसपा सुप्रीमो ने कोऑर्डिनेटरों से अपने-अपने क्षेत्र की विधानसभा सीटों पर कैंप करने का निर्देश दिया है। बसपा प्रदेश अध्यक्ष ने कहा मीडिया हमको लड़ाई में नहीं दिखाती है। जबकि हमारी तैयारी सभी दलों से बहुत पहले से है। कार्यकर्ता पूरी दम से चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने बताया कि चंद्रशेखर का मीडिया हौव्वा खड़ा कर रही है। ज्ञात हो कि यूपी में निर्वाचन आयोग द्वारा तय कार्यक्रम के अनुसार 18 अक्टूबर को अधिसूचना जारी होने के साथ ही नामांकन प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। नामांकन की अंतिम तिथि 25 अक्टूबर होगी। 28 अक्टूबर को नामांकन की जांच के बाद नाम वापसी की अंतिम तिथि 30 अक्टूबर होगी। मतदान 13 नवंबर और मतगणना 23 नवंबर को होगी।    

Sameer Wankhede जल्द ही शिंदे गुट में शामिल हो कर लड़ सकते हैं मुंबई की धारावी सीट से चुनाव

मुंबई  महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के बाद सियासी सरगर्मियां तेज हो गई है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि चर्चित आईआरएस अधिकारी समीर वानखेड़े जल्द ही शिवसेना में शामिल होने वाले हैं। जानकारी के अनुसार वानखेड़े महायुति के टिकट पर चुनाव लड़ सकते हैं। दावा किया जा रहा है कि उन्हें धारावी सीट से टिकट थमाया जा सकता है। धारावी की पहचान एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती के तौर पर होती है। यहां से समीर वानखेड़े की उम्मीदवारी से पार्टी को एक नई दिशा मिलने की संभावना है। उनकी एंट्री से राजनीतिक परिदृश्य में नए समीकरण बनने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। वानखेड़े की छवि एक सख्त अधिकारी के तौर पर है। वानखेड़े ने 2 अक्टूबर, 2021 को मुंबई तट के पास लक्जरी जहाज, कॉर्डेलिया क्रूज पर ड्रग्स का भंडाफोड़ करने के लिए छापेमारी की थी और शाहरुख खान के बेटे आर्यन सहित ग्लैमर जगत के 17 से अधिक लोगों को पकड़ा था। आर्यन खान ने एक महीना जेल में बिताया, और रिहाई के बाद, एक उच्च-स्तरीय एनसीबी जांच ने निष्कर्ष निकाला कि वह निर्दोष था और उसे उस मामले में फंसाया गया था। आपको बताते चलें, महाराष्ट्र की 288 विधानसभा सीटों के लिए एक चरण में 20 नवंबर को चुनाव होंगे, जबकि 23 नवंबर को वोटों की गिनती होगी। भारत निर्वाचन आयोग के मुताबिक, महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए एक लाख से अधिक मतदान केंद्र बनाए जाएंगे। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने कहा कि ईसीआई दोनों राज्य में समावेशी और सुलभ चुनावों के जरिए सुचारू मतदान अनुभव सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है। राजीव कुमार ने बताया था कि महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में 9.63 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे, जिनमें 4.97 करोड़ पुरुष वोटर हैं, जबकि 4.66 करोड़ महिला मतदाता शामिल हैं। इसके अलावा 1.85 करोड़ युवा वोटरों की उम्र 20 से 29 साल के बीच है। वहीं, 20.93 लाख वोटर पहली बार मतदान में हिस्सा लेंगे। 12.43 लाख वोटरों की उम्र 85 साल से अधिक है। इसके साथ ही ट्रांसजेंडर मतदाताओं की संख्या भी 6,031 है।    

जय श्री राम के नारे से द्वेष है वो सिर्फ रामद्रोही ही नहीं बल्कि, देशद्रोही भी हैं : विनोद बंसल

नई दिल्ली  विश्व हिन्दू परिषद के प्रवक्ता विनोद बंसल ने  कहा, जिन्हें जय राम के नारे से द्वेष है वो सिर्फ रामद्रोही ही नहीं बल्कि, देशद्रोही भी हैं। उन्होंने कहा, विडंबना देखिए, अभी तक कुछ लोगों द्वारा राम जन्मभूमि और राम मंदिर का विरोध होता था, अब राम के नाम का भी विरोध भारत में होने लग गया है। राम के इस देश में कुछ लोगों ने जैसे ‘राम’ को ही प्रतिबंधित कर दिया है। उन्होंने कहा, कुछ जिहादी तत्व ऐसे हैं, अगर उनके सामने जय राम का नारा लगा दिया तो उनका इस्लाम खतरे में आ जाता है। हमले पर उतारू हो जाते हैं, चाकूबाजी कर देते हैं। लेकिन, जो भारतीय हैं उनके पूर्वज राम ही हैं। अपने पूर्वजों को नकारने वाला भारतीय संस्कृति का नहीं हो सकता है। ऐसा संप्रदाय किस काम का जो जय राम के नारे से आहत हो जाए। उन्होंने कहा, राजनेता के बारे में समझ में आता है कि वह जय राम के नारे से आहत होता है क्योंकि, उसे अपनी कुर्सी के जाने का डर रहता है। हम लोगों को किसी मस्जिद से जय राम का नारा लगाने की जरूरत नहीं है। लेकिन, अगर नारा लगा दिया तो क्या उसे जान से मार दिया जाएगा। क्या उसे झूठे केस में फंसा दिया जाएगा। यह बिल्कुल ठीक नहीं है।    

हरियाणा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस को बड़ा झटका, कप्तान अजय सिंह यादव का इस्तीफा

चंडीगढ़ हरियाणा विधानसभा चुनावों में हार के बाद कांग्रेस पार्टी को राज्य में बड़ा झटका लगा है। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के समधी और हरियाणा के पूर्व वित्त मंत्री कैप्टन अजय सिंह यादव ने पार्टी छोड़ दी है। रेवाड़ी से खुद छह बार विधायक रहे कैप्टन अजय सिंह यादव के बेटे चिरंजीव राव इस बार चुनावों में हार गए थे। इसके बाद से कैप्टन अजय सिंह यादव काफी नाराज चल रहे थे। गुरुवार को उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ने का ऐलान कर दिया। अहीरवाल में बड़ा झटका कैप्टन का कांग्रेस को छोड़ना अहीरवाल में बड़ा झटका है। वे पार्टी के एकमात्र बड़े नेता थे। 2019 में वह कैप्टन अजय सिंह यादव गुरुग्राम से राव इंद्रजीत सिंह के खिलाफ लोकसभा चुनाव लड़े थे, हालांकि वह हार गए थे। कैप्टन अजय सिंह यादव ने ऐसे वक्त पर पार्टी छोड़ी है जब शुक्रवार को चंडीगढ़ में कांग्रेस विधायक दल के नेता का चुनाव होना है। अहीरवाल में कांग्रेस के पास एक वक्त राव इंद्रजीत सिंह और कैप्टन अजय यादव की जोड़ी थी लेकिन राव इंद्रजीत सिंह के बाद अब कैप्टन अजय सिंह यादव ने भी हाथ छोड़ दिया है। 2019 में जीते थे चिरंजीव राव विधानसभा चुनावों में पिछली बार उनके बेटे चिरंजीव राव रेवाड़ी से जीतने में सफल रहे थे। इस बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। चिरंजीव राव ने जीतने पर डिप्टी सीएम का पद लाने का दांव भी खेला था, लेकिन वह बीजेपी कैंडिडेट के सामने हार गए। इसके बाद कैप्टन अजय सिंह यादव ने संगठन में अहीरवाल की उपेक्षा का आरोप लगाया था। वर्तमान में कैप्टन अजय सिंह यादव कांग्रेस की ओबीसी सेल में राष्ट्रीय अध्यक्ष का दायित्व निभा रहे थे। हरियाणा में हार के बाद कांग्रेस विधायक दल की 18 अक्तूबर को चंडीगढ़ में बैठक होगी। इसमें नए नेता का चुनाव होगा। जो कांग्रेस विधायक दल का नेता होगा। वहीं विधानसभा में नेता विपक्ष बनेगा। कांग्रेस को इस बार चुनावों में 37 सीटों पर जीत मिली है।

भाजपा पार्टी अब महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन के साथ अपनी जीत का लक्ष्य रख रही है, महाराष्ट्र में क्या है रणनीति

महाराष्ट्र महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के तारीखों के ऐलान के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी सियासी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए पूरी तरह तैयार है। हरियाणा विधानसभा चुनाव में मिली सफलता ने भाजपा के अंदर अतिरिक्त उत्साह भर दिया है और पार्टी अब महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन के साथ अपनी जीत की कहानी को आगे बढ़ाने का लक्ष्य रख रही है। भाजपा के लिए यह चुनाव न केवल राजनीतिक प्रतिष्ठा का सवाल है, बल्कि राज्य में उसकी स्थायी पकड़ को बनाए रखने का भी अवसर है।   भाजपा कैसे साधेगी गठबंधन की बिसात भाजपा इस बार महाराष्ट्र में शिंदे गुट की शिवसेना और अजित पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतर रही है। महायुति गठबंधन के रूप में ये तीनों दल एकजुट होकर 288 सीटों वाली विधानसभा में बहुमत का लक्ष्य साधेंगे। हालांकि, भाजपा की रणनीति गठबंधन के बावजूद राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनने की है और इस दिशा में वह 155 से 158 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़ा करने की योजना बना रही है। सीटों के बंटवारे और सहयोगी दलों के साथ तालमेल बनाए रखना भाजपा के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी लेकिन इसके लिए पार्टी ने गहन रणनीतिक तैयारियां शुरू कर दी हैं। उपेक्षित जातियों पर फोकस और माइक्रो मैनेजमेंट महाराष्ट्र चुनाव में भाजपा के लिए कई मुद्दे निर्णायक साबित हो सकते हैं। मौजूदा वक्त में मराठा आरक्षण राज्य में एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा है, महायुति गठबंधन के लिए चुनौतीपूर्ण रहेगा। चूंकि भाजपा इस गठबंधन का हिस्सा है इसलिए मराठा आरक्षण का समाधान निकालने में उसकी भूमिका अहम होगी। इसके अलावा, महंगाई, किसान संकट, जल संकट, और रोजगार के अवसरों की कमी जैसे मुद्दे भी चुनावी समीकरण को प्रभावित करेंगे। भाजपा इन समस्याओं का समाधान पेश कर मतदाताओं का समर्थन हासिल करना चाहेगी। क्या मिलेगा संगठनात्मक ताकत और संघ का सहयोग भाजपा के चुनावी अभियान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का सहयोग भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हरियाणा चुनाव में संघ की बढ़ी हुई भूमिका ने भाजपा को सफलता दिलाई, और अब महाराष्ट्र में भी पार्टी संघ की जमीनी संगठनात्मक ताकत का भरपूर उपयोग करने जा रही है। संघ की राज्य में मजबूत पकड़ होने के कारण भाजपा को विश्वास है कि इसे विधानसभा चुनाव में लाभ मिलेगा। इसके अलावा चुनाव प्रभारी भूपेंद्र यादव और अश्विनी वैष्णव को कार्यकर्ताओं के साथ संवाद स्थापित करने और उन्हें चुनावी तैयारी के लिए प्रेरित करने का जिम्मा सौंपा गया है। केंद्र की योजनाओं से भाजपा को उम्मीद भाजपा को केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई कई योजनाओं से भी उम्मीदें हैं। पार्टी ने राज्य में अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को सुलझाने के लिए योजनाएं शुरू की हैं जिनमें किसानों के लिए सब्सिडी, जल प्रबंधन, और रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान दिया गया है। भाजपा की कोशिश होगी कि इन योजनाओं को लेकर वह जनता के बीच विश्वास बनाए रखे और मतदाताओं का समर्थन हासिल करे। कैसा रहा भाजपा का अबतक का चुनावी प्रदर्शन महाराष्ट्र में भाजपा का पिछले एक दशक का प्रदर्शन काफी प्रभावशाली रहा है। 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने शिवसेना से अलग होकर 122 सीटें जीतीं और राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनी। इसके बाद शिवसेना और भाजपा ने मिलकर सरकार बनाई। हालांकि, 2019 के चुनाव के बाद शिवसेना ने मुख्यमंत्री पद की अदला-बदली को लेकर भाजपा से अलग होकर महा विकास आघाड़ी (एमवीए) के साथ गठबंधन किया। इसके बाद 2022 में एकनाथ शिंदे की बगावत ने एमवीए सरकार को गिरा दिया और शिंदे ने भाजपा के साथ मिलकर नई सरकार बनाई। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए महत्वपूर्ण है। हरियाणा में मिली जीत से प्रेरित होकर पार्टी महाराष्ट्र में भी अपना प्रदर्शन बेहतर करने की तैयारी में है। मराठा आरक्षण, महंगाई, किसान संकट जैसे मुद्दे चुनावी अभियान में प्रमुख होंगे और भाजपा का लक्ष्य होगा कि वह इन मुद्दों पर जनता का भरोसा जीत सके। इसके अलावा केंद्र की योजनाओं का लाभ उठाते हुए भाजपा इस चुनाव को अपने पक्ष में करने की पूरी कोशिश कर रही है। अब देखना यह होगा कि पार्टी अपनी रणनीति में कितना सही साबित हो पाती है।

37 साल से देश का कोई नेता नहीं तोड़ पाया इनका रिकॉर्ड, अब राव नरबीर सिंह भी बने हरियाणा के मंत्री

हरियाणा हरियाणा की सबसे बड़ी विधानसभा सीट से धमाकेदार जीत हासिल करने वाले राव नरबीर सिंह नायब सिंह सैनी सरकार में मंत्री बन गए हैं। उन्होंने गुरुवार को चौथी बार मंत्री पद की शपथ ली। गुरुग्राम की बादशाहपुर सीट से जीत हासिल करने वाले राव नरबीर सिंह को सियासत और शासन का लंबा अनुभव है। राव नरबीर के नाम है बड़ा रिकॉर्ड राव नरबीर सिंह ने सन 1987 में जाटूसाना (हरियाणा) और 1996 में सोहना (हरियाणा) से चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी। 1987 के पहले चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद राज्य के गृह मंत्री बने थे। 1996 में दूसरी बार जीत दर्ज करने के बाद हरियाणा सरकार में परिवहन, खाद्य और आपूर्ति और सहकारिता मंत्री का पद संभाला था। 26 साल की उम्र में राज्य गृह मंत्रालय का पद संभालने वाले देश के सबसे कम उम्र के निर्वाचित प्रतिनिधि बन गए,आज भी उनके यह रिकॉर्ड बना हुआ है। उनके पास 1996 में खेल और मुद्रण और स्टेशनरी मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार भी था। उन्होंने 2009 में गुड़गांव से लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन असफल रहे थे। भाजपा सरकार में पहले भी थे मंत्री राव नरबीर सिंह वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी के सदस्य हैं। वह एक सक्रिय सामाजिक और राजनीतिक सुधारक हैं। साल 2014 में बादशाहपुर से तीसरी बार जीत दर्ज करने बाद वह भाजपा सरकार में लोक निर्माण विभाग (बी एंड आर)और लोक स्वास्थ्य इंजीनियरिंग(जल आपूर्ति और स्वच्छता),हरियाणा विभाग में कैबिनेट मंत्री (2014-19) तक रहे थे। उन्होंने 2014 के हरियाणा विधान सभा चुनाव के दौरान बादशाहपुर विधानसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की थी। चौथी बार बने मंत्री साल 2019 में भाजपा से टिकट नहीं मिलने पर राव नरबीर सिंह ने चुनाव नहीं लड़ा था। साल 2024 में भाजपा ने बादशाहपुर से उम्मीदवार बनाया था। 60 हजार से ज्यादा वोट से जीत दर्ज करने के बाद गुरुवार को चौथी बार उन्होंने पंचकूला में आयोजित समारोह में कैबिनट मंत्री हरियाणा सरकार में शपथ ली। राव नरबीर सिंह जब-जब विधायक बने हैं, वह हर बार मंत्री बने हैं। बता दें कि राव नरबीर सिंह मोहर सिंह यादव के पोते हैं। जो सन 1942 में एमएलसी थे। भारत और पाकिस्तान के विभाजन से पहले पंजाब राज्य में थे। उनके पिता महावीर सिंह यादव भी हरियाणा राज्य में पूर्व कैबिनेट मंत्री रहे थे।

महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी में शामिल शिवसेना ने कहा- कांग्रेस जानती है कि जीत को हार में कैसे बदलना है

हरियाणा हरियाणा विधानसभा चुनाव में हार के बाद INDIA अलायंस के सदस्य कांग्रेस पर सवाल उठाने लगे हैं। महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी में शामिल शिवसेना (उद्धव बालासाहब ठाकरे) ने कह दिया है कि कांग्रेस जानती है कि जीत को हार में कैसे बदलना है। पार्टी ने हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ नेता भूपेंद्र हुड्डा पर भी सवाल उठाए हैं। वहीं, उद्धव सेना का कहना है कि कांग्रेस नेताओं को हरियाणा के नतीजों से बहुत कुछ सीखना है। मुखपत्र सामना में प्रकाशित संपादकीय के अनुसार, ‘हरियाणा और जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव के नतीजे भाजपा-कांग्रेस के लिए चौंकानेवाले हैं। हरियाणा में कांग्रेस की हार की वजह फाजिल आत्मविश्वास और स्थानीय नेताओं की नाफरमानी को माना जा रहा है। कोई भी मजबूती से नहीं कह रहा था कि हरियाणा में दोबारा भाजपा की सरकार आएगी। कुल मिलाकर माहौल यह था कि कांग्रेस की जीत एकतरफा होगी; लेकिन जीत की पारी को हार में कैसे बदला जाए यह कांग्रेस से ही सीखा जा सकता है। हरियाणा में भाजपा विरोधी माहौल था।’ गठबंधन धर्म संपादकीय में कहा गया, ‘हरियाणा में कांग्रेस ने ‘आप’ समेत कई घटकों को दूर रखा, क्योंकि उन्हें सत्ता में हिस्सेदारी नहीं चाहिए थी। इस खेल में पूरा राज्य ही हाथ से निकल गया। जम्मू-कश्मीर में ‘इंडिया’ गठबंधन की जीत हुई। हरियाणा में सिर्फ कांग्रेस पीछे हटी। ‘इंडिया गठबंधन’ के लिए तस्वीर अच्छी नहीं, लेकिन ध्यान कौन देगा?’ हरियाणा में कांग्रेस ने अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ा था। कांग्रेस के आरोप दोहराए मतगणना के दौरान कांग्रेस ने चुनाव आयोग की वेबसाइट पर धीरे आंकड़े अपडेट होने के आरोप लगाए थे। हालांकि, आयोग ने इससे इनकार कर दिया था। अब सामना में कहा गया है, ‘कांग्रेस जगह-जगह जलेबियां-लड्डू बांटने लगी; लेकिन अगले ही घंटे में भाजपा ने बढ़त बना ली और कांग्रेस पिछड़ गई। चुनाव आयोग ने बाद में वोटों की गिनती भी मंद कर दी। ऐसा क्यों हुआ? जब कांग्रेस हर जगह आगे चल रही थी तो वोटों की गिनती और ‘अपडेट’ की गति अचानक धीमी क्यों हो गई? कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने भी चुनाव आयोग पर आरोप लगाया है। ऐसे में हरियाणा में भाजपा की जीत संदिग्ध हो गई है।’ क्या रहे नतीजे जून में लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद हरियाणा में भाजपा और कांग्रेस के बीच हुई पहली बड़ी सीधी लड़ाई में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा ने 90 में से 48 सीट पर जीत दर्ज की जबकि 2019 में उसे 41 सीट मिली थी। कांग्रेस ने 37 सीटों पर जीत हासिल की है। खास बात यह है कि भाजपा और कांग्रेस का मत प्रतिशत लगभग बराबर रहा। दोनों दलों ने क्रमशः 39.94 प्रतिशत और 39.04 प्रतिशत मत प्राप्त किया। कांग्रेस ने जहां मत प्रतिशत में 11 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी की, वहीं भाजपा के मत प्रतिशत में तीन प्रतिशत की वृद्धि हुई।

नायब सिंह सैनी और उनकी कैबिनेट ने शपथ ली तो अरविंद शर्मा को भी मंत्री बनाया गया, यहां की जलेबी हुई थी मशहूर

गोहाना गोहाना की विशाल जलेबी और हरियाणा चुनावों के बीच एक मीठा संबंध बन गया था। पूरे चुनाव के दौरान इसकी खूब चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने चुनावी भाषणों में इसका जिक्र किया था। हलांकि जिस दिन नतीजे सामने आए उस दिन यह सीट भाजपा की झोली में गई। अरविंद शर्मा यहां से विधायक बने। आज जब नायब सिंह सैनी और उनकी कैबिनेट ने शपथ ली तो अरविंद शर्मा को भी मंत्री बनाया गया। डॉ. अरविंद शर्मा 1996 में सोनीपत लोकसभा सीट से निर्दलीय चुनाव जीतकर सियासी दिग्गजों को चौंका दिया था। इसके बाद वे कांग्रेस में शामिल हो गए और करनाल से 2004 और 2009 में फिर सांसद बने। 2014 में कांग्रेस छोड़कर बसपा में चले गए। हालांकि वह विधानसभा चुनाव भी हार गए। 2019 में वह भाजपा में शामिल हुए। भाजपा ने रोहतक लोकसभा सीट से उन्हें उम्मीदवार बनाया। उन्होंने कांग्रेस के दीपेंद्र हुड्डा को 7503 मतों से हराया। 2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें गोहाना से उम्मीदवार बनाया। उन्होंने तीन बार के कांग्रेस विधायक जगबीर मलिक को चुनाव हराया। गोहाना की मशहूर जलेबी को 1958 में मातू राम गोहाना में लेकर आए थे। अब इसे मातू राम की तीसरी पीढ़ी चला रही है। जलेबी शुद्ध देसी घी से बनाई जाती है। ये कुरकुरी और रसभरी होती है और हर का वजन लगभग 250 ग्राम होता है। यह मिठाई एक हफ्ते से अधिक समय तक रखी जा सकती है। चुनावों के दौरान नेताओं की ओर से भारी ऑर्डर आते हैं, जबकि उनमें से कुछ लोग मिठाई खाने के लिए गोहाना की दुकान पर जाना पसंद करते हैं। राहुल ने किया था जिक्र गोहाना में एक चुनावी रैली में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने प्रसिद्ध जलेबी निर्माता मातू राम हलवाई का डिब्बा दिखाते हुए इस बात पर जोर दिया कि उनकी जलेबी पूरे देश में बेची जानी चाहिए और निर्यात की जानी चाहिए। इससे अधिक रोजगार के अवसर पैदा होंगे। लोकसभा चुनाव में PM ने साधा था निशाना इससे पहले, मई में गोहाना में लोकसभा चुनाव के लिए एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष पर निशाना साधने के लिए मातू राम की जलेबी का जिक्र किया था। विपक्षी इंडिया गठबंधन पर हमला करते हुए मोदी ने तब कहा था कि अगर वे सत्ता में आते हैं तो उनके पास पांच साल में पांच प्रधानमंत्री बनाने का फॉर्मूला है। उन्होंने कहा, उनसे पूछो क्या प्रधानमंत्री का पद हमारी मातू राम की जलेबी है? चौधरी देवीलाल भी जलेबियों के शौकीन रहे पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल भी मातू राम की जलेबियों के शौकीन थे। हरियाणा चुनाव के दौरान मुख्यमंत्री नायब सैनी और कांग्रेस नेता दीपेंद्र हुड्डा कुछ देर के लिए इस दुकान पर रुके थे।

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