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मुख्यमंत्री डॉ. यादव हुए किरण कवच शिविर के समापन में हुए शामिल

भोपाल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव पुलिस सामुदायिक भवन पुलिस लाइन में आयोजित निःशुल्क 15 दिवसीय आत्म रक्षा प्रशिक्षण ‘किरण कवच शिविर’ के समापन में शामिल हुए। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने शिविर में प्रशिक्षित बेटियों से भेंट कर मातृशक्ति को देश निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने पर नमन किया। नृत्याराधना नृत्य मंदिर संस्थान  द्वारा निःशुल्क 15 दिवसीय आत्म रक्षा प्रशिक्षण किरण कवच शिविर आयोजित किया गया था। कार्यक्रम में कौशल विकास एवं रोजगार राज्यमंत्री एवं जिले के प्रभारी मंत्री श्री गौतम टेटवाल , विधायक उज्जैन उत्तर श्री अनिल जैन कालूहेड़ा, जनप्रतिनिधि श्री संजय अग्रवाल, श्री रवि सोलंकी उपस्थित रहे।

प्रदेश के कई जिलों में बरसेंगे बादल, जानें कैसा रहेगा आगामी 2 दिनों का मौसम

लखनऊ उत्तर प्रदेश में एक बार फिर मौसम का मिजाज बदलने वाला है। राज्य के पूर्वी हिस्सों में आंशिक रूप से बादल छाए रहेंगे। कुछ स्थानों पर हल्की से मध्यम वर्षा की संभावना है, विशेष रूप से पूर्वांचल, गोरखपुर, बलिया, देवरिया, सिद्धार्थनगर और आसपास के जिलों में। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अधिकांश हिस्सों में मौसम शुष्क रहेगा। तापमान में सामान्य वृद्धि देखने को मिलेगी। मौसम जानकारों के मुताबिक पूर्वी उत्तर प्रदेश में कुछ स्थानों पर गरज-चमक के साथ बौछारें पड़ सकती हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गर्म और शुष्क हवाएं चलने की संभावना है। जबकि बुंदेलखंड, प्रयागराज, कानपुर, झांसी और आगरा मंडलों में लू चलने की संभावना, दोपहर के समय सतर्क रहने की आवश्यकता। वहीं गोरखपुर, बलिया, मऊ, देवरिया और कुशीनगर में हल्की से मध्यम बारिश के साथ कहीं-कहीं बिजली गिरने की संभावना। ग्रामीण क्षेत्रों में खुले में न रहें। मौसम विभाग ने लू प्रभावित क्षेत्रों में दोपहर 12 से 4 बजे तक बाहर निकलने से बचने की बात कही है। मौसम विभाग ने किसानों को फसल सुरक्षा के लिए निचले क्षेत्रों में जलनिकासी की व्यवस्था सुनिश्चित करने की सलाह दी है।

पहली एसी तीर्थयात्री ट्रेन को हरी झंडी दिखाकर रामेश्वरम के लिए रवाना करेंगे सीएम भजनलाल शर्मा

जयपुर राजस्थान सरकार की वरिष्ठ नागरिक तीर्थयात्रा योजना के तहत रामेश्वरम के लिए पहली बार एसी ट्रेन शुक्रवार 6 जून को जयपुर से रवाना होगी। सुबह 11:30 बजे दुर्गापुरा रेलवे स्टेशन से रवाना होने वाली इस ट्रेन को मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा हरी झंडी दिखाकर रवाना करेंगे। इस अवसर पर देवस्थान विभाग के केबिनेट मंत्री जोराराम कुमावत भी मौजूद रहेंगे। इस ट्रेन के जरिए छह जिलों के कुल 776 वरिष्ठ नागरिक तीर्थयात्री रामेश्वरम की यात्रा पर जा रहे हैं। ये यात्री वर्ष 2024-25 के शेष बचे 7200 लाभार्थियों में शामिल हैं। इनमें जयपुर व दौसा जिले से 450, सीकर, अलवर व झुंझुनू से 150 तथा भरतपुर जिले से 176 यात्री हैं। भरतपुर जिले के यात्री सवाई माधोपुर रेलवे स्टेशन से ट्रेन में सवार होंगे। देवस्थान विभाग ने इस एसी ट्रेन को खास रूप से सजवाया है। प्रत्येक डिब्बे को राजस्थान की धार्मिक, सांस्कृतिक और पर्यटन धरोहरों की थीम पर डिजाइन किया गया है। डिब्बों पर राज्य के प्रमुख मंदिरों, दुर्गों, लोकनृत्य, त्योहारों और अभयारण्यों की झलक देखने को मिलेगी। इस बार ट्रेन में गोवा के प्रसिद्ध गिरिजाघरों को भी शामिल किया गया है। साथ ही यात्रियों की सुविधा के लिए तीर्थ स्थलों के संकेतक और साफ-सफाई की भी विशेष व्यवस्था की गई है। देवस्थान मंत्री जोराराम कुमावत ने जानकारी दी कि बजट वर्ष 2025-26 के तहत 50 हजार वरिष्ठ नागरिकों को तीर्थयात्रा करवाई जाएगी। इसमें से 6 हजार वरिष्ठजन हवाई मार्ग से और 44 हजार एसी ट्रेनों के माध्यम से यात्रा करेंगे। जुलाई से योजना की शुरुआत की जाएगी। इसके लिए ऑनलाइन आवेदन पोर्टल का अपडेट कार्य पूरा हो गया है और जल्द ही इसे शुरू किया जाएगा। इस वर्ष की यात्राओं में त्र्यंबकेश्वर, दश्मेश्वर, गोआ और आगरा जैसे नए तीर्थस्थलों को भी शामिल किया गया है।

यूपी पुलिस में होनी है 24 हजार पदों पर सीधी भर्ती

लखनऊ  प्रदेश पुलिस में जल्द करीब 24 हजार पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी होगा। उप्र पुलिस भर्ती एवं प्रोन्नति बोर्ड ने इसकी तैयारी पूरी कर ली है। शासन की हरी झंडी मिलते ही इसका विज्ञापन जारी कर अभ्यर्थियों से ऑनलाइन आवेदन मांगे जाएंगे। सूत्राें की मानें तो आगामी 15 जून तक विज्ञापन जारी हो सकता है। पहले यह अप्रैल माह के अंतिम सप्ताह में जारी करने की तैयारी थी। डीजीपी मुख्यालय ने भर्ती बोर्ड को सिपाही के 19,220 पदों और उप निरीक्षक के 4543 पदों पर भर्ती का प्रस्ताव बीते दिनों भेजा था। इनमें सिपाही पीएसी के 9837, सिपाही पीएसी महिला वाहनी के 2282, सिपाही नागरिक पुलिस के 3245, सिपाही पीएसी/सशस्त्र पुलिस 2444, सिपाही विशेष सुरक्षा बल के 1341 और घुड़सवार पुलिस के 71 पद (कुल 19220) पद शामिल थे। इसी तरह उप निरीक्षक के 4543 पदों का प्रस्ताव भेजा गया था, जिसमें उप निरीक्षक नागरिक पुलिस के 4242 पद, उप निरीक्षक नागरिक पुलिस/प्लाटून कमांडर महिला वाहिनी बदायूं, गोरखपुर, लखनऊ के 106 पद, प्लाटून कमांडर/उप निरीक्ष सशस्त्र पुलिस के 135 पद, उप निरीक्षक/प्लाटून कमांडर विशेष सुरक्षा बल के 60 पद शामिल हैं। अब इन पदों पर भर्ती के लिए बोर्ड द्वारा विज्ञापन जारी करने की तैयारी है। बता दें कि मंगलवार को कैबिनेट ने उपनिरीक्षकों की भर्ती में तीन वर्ष की छूट देने के प्रस्ताव को मंजूरी दी है। करीब 35 लाख आवेदन आने की संभावना सिपाही और उप निरीक्षक के पदों पर भर्ती के लिए करीब 35 लाख आवेदन आने की उम्मीद जताई जा रही है। बता दें कि बीते दिनों सिपाही नागरिक पुलिस के 60,244 पदों पर सीधी भर्ती के लिए करीब 48 लाख आवेदन आए थे। इस बाद भर्तियों में अधिकांश पद पीएसी आदि के होने की वजह से 35 लाख से अधिक आवेदन होने की संभावना जताई जा रही है।

इंदौर नगर निगम शहर में निम्न दरों पर जनता को कराएँगे राइड, जल्द शुरू होगी कैब सर्विस

इंदौर एमपी के इंदौर शहर में कई कंपनियां ऑनलाइन कैब और दोपहिया उपलब्ध करवाती हैं। इसी तर्ज पर अब नगर निगम एप बेस्ड कैब सर्विस शुरू करने जा रहा है। दावा है कि इससे किफायती दाम पर बेहतर सर्विस मिलेगी।  पहले चरण में शहर से मेट्रो तक पहुंचने और यहां से जाने के लिए इसे शुरू किया जाएगा। बाद में इस सुविधा का विस्तार किया जाएगा, लेकिन इसका संचालन शहरी सीमा में ही होगा। इसमें टैक्सी के साथ ई रिक्शा को भी शामिल करना प्रस्तावित है। तैयार हो रहा एप इस सुविधा के लिए स्मार्ट सिटी एप तैयार कर रही है। पहले चरण में मेट्रो नेटवर्क से इसे जोड़ने का कारण यह है कि अभी मेट्रो ट्रेन तक आने के लिए कई लोग निजी वाहनों का उपयोग करते हैं। इन वाहनों की पार्किंग को लेकर दिक्कत होती है। यह सुविधा शुरू होने से कोई भी व्यक्ति राइड बुक कर सकता है। कई बार वाहन चालकों के दुर्व्यवहार और मनमाना किराया वसूलने की शिकायतें आती हैं। निगम की व्यवस्था में लोगों को इससे राहत मिलेगी। किराये पर होगा नियंत्रण निगम के एप पर रजिस्टर्ड वाहनों को ही बुकिंग की जानकारी मिलेगी। वे लोकेशन पर पहुंचेगे और सवारी को नियत स्थान तक छोड़ेंगे। वाहन बुक करने से लेकर यात्री को छोड़ने तक की निगरानी निगम या स्मार्ट सिटी के पास रहेगी। इससे यात्रियों से लिए जाने वाले मनमाने किराये पर नियंत्रण रहेगा। एप पर रजिस्टर्ड वाहन चालकों की पूरी जानकारी रहेगी और उनका पुलिस वेरिफिकेशन भी कराया जाएगा। निगम के वरिष्ठ अधिकारी का दावा है कि यह सेवा जल्द शुरू होगी। इससे यात्रियों को सुरक्षा और किफायती सफर की सौगात मिलेगी तो अन्य लोगों को रोजगार मिलेगा। साथ ही बेतरतीब चल रहे ई रिक्शा पर कुछ हद तक नियंत्रण किया जा सकेगा।  

डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विवि के दीक्षांत समारोह में जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य को मानद डी लिट् उपाधि प्रदान की जाएगी

सागर  लंबे इंतजार के बाद डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विवि में आयोजित 33 वां दीक्षांत समारोह की तारीख निर्धारित हो गई है। दीक्षांत समारोह 12 जून को मनाया जाएगा। समारोह में शामिल होने वाले अतिथियों के नाम की सूची अभी तय नहीं हुई है। समारोह में शिक्षाविद पद्मविभूषण जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य को मानद डी लिट् उपाधि प्रदान की जाएगी। समारोह की आवश्यक तैयारियों को लेकर कुलपति प्रो. नीलिमा गुप्ता की अध्यक्षता में बैठक हुई। बैठक में कुलपति ने आयोजन की तैयारियों के संबंध में विभिन्न समितियों के समन्वयक एवं उपसमन्वयक से चर्चा कर तैयारियों की जानकारी ली और सफल आयोजन हेतु आवश्यक दिशा-निर्देश दिए। आयोजन के मुख्य समन्वयक प्रो. नवीन कानगो ने बताया कि लगभग 1225 विद्यार्थियों ने पंजीकरण कराया है। पीजी के 426, यूजी के 482 तथा पीएचडी के 49 छात्रों सहित कुल 957 छात्र समारोह में उपस्थित रहकर उपाधि प्राप्त करेंगे।  9 से 11 जून को डिग्री फाइल का होगा वितरण दीक्षांत समारोह में भाग लेने वाले पंजीकृत अभ्यर्थियों को 9, 10 व 11 जून को सुबह 11.00 बजे से शाम 4.00 बजे के बीच गौर प्रांगण से डिग्री फाइल और ड्रेस सामग्री ( पगड़ी और स्टोल) वितरित की जाएगी। निर्धारित ड्रेस कोड (छात्र- सफेद कुर्ता और पायजामा, छात्राएं-सफेद सलवार और कुर्ता) की व्यवस्था अभ्यर्थियों को स्वयं करनी होगी। विश्वविद्यालय स्टोल एवं बुंदेली सतरंगी पगडी़ उपलब्ध कराएगा। सभी विद्यार्थी बुंदेली वेशभूषा में नजर आएंगी। दो दिन चलेगी रिहर्सल डिग्री पाने वाले अभ्यर्थी 10 एवं 11 जून को दोपहर 3 बजे गौर प्रांगण में रिहर्सल में भाग ले सकेंगे। बुंदेली सतरंगी पगड़ी, स्टोल, दीक्षांत समारोह हॉल में प्रवेश के लिए अपना प्रवेश पत्र अपनी फोटो आईडी (आधार, पैन आदि) साथ लाना होगा। विद्यार्थियों को निर्देशित किया गया है कि निर्धारित बैठक व्यवस्था का पालन करें। पंजीकृत पदक प्राप्तकर्ता, पीएचडी, पीजी, यूजी एवं पंजीकृत छात्रों के साथ आने वाले व्यक्तियों के बैठने की व्यवस्था भी गौर प्रांगण में की गई है। अद्यतन जानकारी के लिए अभ्यर्थी विश्वविद्यालय की वेबसाइट का अवलोकन करते रहें।

दिल्‍ली आनेवाले लोगों की जेब नहीं होगी ढीली, CM रेखा गुप्‍ता देंगी सौगात, गडकरी को कहिए थैंक …

नई दिल्ली  दिल्ली की सीमाओं से MCD टोल बूथ हटाने की तैयारी है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इसके लिए जोर दिया है। दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और एलजी वीके सक्सेना भी इससे सहमत हैं। उनका मानना है कि शहर की सीमाओं पर एंट्री फीस लेने वाले बूथों को हटाने की जरूरत है। इन बूथों के कारण लोगों को परेशानी होती है और समय बर्बाद होता है। सरकार अब एमसीडी के लिए राजस्व के नए स्रोत तलाशने पर विचार कर रही है। दिल्ली की सीमाओं से टोल बूथ हटाने का सुझाव दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने केंद्रीय मंत्री के साथ बैठक में MCD के लिए राजस्व के नए स्रोत खोजने के सुझाव पर सहमति जताई। एमसीडी को एंट्री फीस से हर साल लगभग 800-900 करोड़ रुपये मिलते हैं। गडकरी ने कहा कि मुख्य मार्गों पर लगे टोल बूथ यात्रियों के लिए ‘भारी उत्पीड़न’ का कारण बनते हैं। इससे लोगों के काम के घंटे बर्बाद होते हैं और ट्रैफिक जाम लगता है। नितिन गडकरी ने इसलिए लिया अहम फैसला एक सूत्र ने बताया कि गडकरी ने दिल्ली सरकार को राजस्व के नए स्रोत खोजने का सुझाव दिया। इसमें प्रॉपर्टी डेवलपमेंट या गाड़ियों पर मामूली अतिरिक्त चार्ज शामिल हो सकता है। उन्होंने कहा कि एंट्री फीस और ग्रीन सेस की वसूली ‘खुलेआम लूट’ से कम नहीं है। उन्होंने हाइवे डेवलपमेंट में किए गए भारी निवेश पर भी प्रकाश डाला। MCD को 800-900 करोड़ रुपये का नुकसान दिल्‍ली सरकार यदि एंट्री प्‍वाइंट पर बने बूथ को खत्‍म करने की योजना पर आगे बढ़ती है तो केंद्र प्रशासित क्षेत्र के रेवेन्‍यू पर इसका व्‍यापक असर पड़ेगा. इन बूथों के जरिये MCD को सालाना 800 से 900 करोड़ रुपये का राजस्‍व हासिल होता है. ऐसे में यदि इन बूथ को हटा दिया जाएगा तो नगर निगम को तकरीबन 1000 करोड़ रुपये का रेवेन्‍यू लॉस होगा. ‘टाइम्‍स ऑफ इंडिया’ की रिपोर्ट के अनुसार, सीएम रेखा गुप्‍ता और एलजी वीके सक्‍सेना इस बात पर सहमत हैं कि MCD को आय के लिए दूसरा सोर्स ढूंढ़ना होगा, ताकि 800-900 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई की जा सके. गडकरी की सलाह केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने दिल्ली में एनवायरमेंट कंप्रेसन चार्ज (ईसीसी) यानी ग्रीन सेस और एंट्री फीस की वसूली को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है. एक उच्चस्तरीय बैठक में गडकरी ने इसे ‘पब्लिक लूट’ करार देते हुए कहा कि यह व्यवस्था यात्रियों को भारी परेशानी और देश को आर्थिक नुकसान पहुंचा रही है. उन्होंने संकेत दिया कि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) इस वसूली को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख कर सकती है. बैठक में मौजूद सूत्रों के अनुसार, गडकरी ने कहा कि दिल्ली की मुख्य सड़कों पर लगे टोल बूथ यात्रियों के लिए बड़ी मुसीबत बन चुके हैं. इससे न सिर्फ घंटों समय की बर्बादी होती है, बल्कि ट्रैफिक जाम से ईंधन की खपत और प्रदूषण भी बढ़ता है. उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि दिल्ली सरकार को नए राजस्व स्रोतों की तलाश करनी चाहिए, जैसे कि संपत्ति विकास या वाहनों पर मामूली अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है. MCD के सालाना बजट पर प्रभाव गडकरी ने जब सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही तो उपराज्यपाल वीके सक्सेना ने इसे अदालत से बाहर सुलझाने की बात कही और भरोसा जताया कि इस पर जल्द समाधान निकाला जाएगा. बैठक में नगर निगम (MCD) के अधिकारी भी मौजूद थे. उन्होंने कहा कि यदि ईसीसी और एंट्री फीस वसूली बंद की जाती है तो इसका एमसीडी के सालाना बजट पर गहरा असर पड़ेगा, जो लगभग 5,000 करोड़ रुपये का है. अधिकारियों का कहना है कि यह राजस्व उनके लिए आवश्यक सेवाएं चलाने के लिए जरूरी है. गडकरी ने बैठक में यह भी दोहराया कि केंद्र सरकार ने दिल्ली की सड़कों और हाईवे नेटवर्क के विस्तार में भारी निवेश किया है. ऐसे में इन टोलों से वसूली करना अनुचित है, खासकर जब इससे आम जनता को असुविधा हो रही हो. ऐसे एमसीडी को राजस्व की होगी प्राप्ति जब गडकरी ने कहा कि NHAI पर्यावरण मुआवजा शुल्क (ECC) या ग्रीन सेस की वसूली रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाएगी, तो सक्सेना ने जवाब दिया कि इस मुद्दे को अदालत जाए बिना भी सुलझाया जा सकता है। जल्द ही इसका रास्ता निकाल लिया जाएगा। बैठक में मौजूद MCD अधिकारियों ने कहा कि राजस्व में कमी से नागरिक निकाय के वार्षिक बजट पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ेगा, जो लगभग 5,000 करोड़ रुपये है। दिल्ली के एलजी, सीएम, मंत्रियों के साथ बैठक दिल्ली के PWD मंत्री परवेश वर्मा, पर्यावरण मंत्री मनजिंदर सिंह सिरसा और MoS (सड़क परिवहन) हर्ष मल्होत्रा भी बैठक में शामिल हुए। बैठक में सभी चल रही राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं की समीक्षा की गई। पिछले हफ्ते, दिल्ली सरकार और MCD के शीर्ष अधिकारी फिजिकल बूथों को हटाने के लिए मल्टीलेन फ्री फ्लो (MMLF) टोल और एंट्री फीस कलेक्शन सिस्टम लगाने पर सहमत हुए थे। बैठक में कई प्रोजेक्ट पर चर्चा बैठक में लिए गए निर्णयों पर अधिकारियों ने कहा कि NHAI ग्यारह मूर्ति से आईएनए से वसंत कुंज तक प्रस्तावित एलिवेटेड रोड तक एक अंडरग्राउंड लिंक (सुरंग) की संभावना तलाशने के लिए एक तकनीकी अध्ययन करेगी। एक अधिकारी ने कहा कि इससे सरदार पटेल मार्ग पर ट्रैफिक कम करने में मदद मिलेगी, जो सुबह और शाम के पीक आवर्स के दौरान पूरी तरह से जाम हो जाता है और यहां वीआईपी मूवमेंट भी बहुत होता है। CM कार्यालय ने एक बयान में यह भी कहा कि सराय काले खान को IGI एयरपोर्ट से जोड़ने वाली सुरंग के लिए भी एक व्यवहार्यता अध्ययन किया जाएगा। NHAI जल्द ही तीन NH स्ट्रेच की रिपोर्ट करेगा तैयार अधिकारियों ने कहा कि बैठक में यह भी निर्णय लिया गया कि NHAI जल्द ही तीन NH स्ट्रेच – हरियाणा-दिल्ली बॉर्डर से पंजाबी बाग (18.5 किमी), आश्रम से बदरपुर (7.5 किमी) और मेहरौली से गुड़गांव बॉर्डर (8.5 किमी) – को अपने कब्जे में लेगी और विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार करने के बाद उन्हें सिग्नल फ्री बनाएगी। उन्होंने कहा कि PWD इन राजमार्ग स्ट्रेच के किनारे सर्विस रोड और नालियों का रखरखाव करेगी।  

दमोह वनमंडल का एक बड़ा हिस्सा अब आधिकारिक रूप से वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व में शामिल कर लिया गया

दमोह  प्रदेश की नई पहचान बन चुका वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व अब और अधिक संगठित और सशक्त होता जा रहा है। दमोह वनमंडल का एक बड़ा हिस्सा अब आधिकारिक रूप से इस टाइगर रिजर्व में शामिल कर लिया गया है। इसके साथ ही वन विभाग के करीब 35 कर्मचारियों को भी टाइगर रिजर्व प्रबंधन के अधीन कर दिया गया है।  इन कर्मचारियों की तैनाती अब रिजर्व क्षेत्र की गश्त, निगरानी, सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में की जाएगी। यह कदम न केवल टाइगर रिजर्व की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करेगा, बल्कि इससे इको-टूरिज्म को भी बढ़ावा मिलेगा। अधिकारियों के अनुसार, आने वाले समय में यहां बाघों की संख्या बढ़ने की भी पूरी संभावना है। गौरतलब है कि वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व की घोषणा वर्ष 2023 में की गई थी। इसके बाद दमोह वनमंडल के कुछ क्षेत्रों को टाइगर रिजर्व में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी, जो अब पूरी हो चुकी है। वन प्रबंधन को मिलेगी मजबूती इस संबंध में डीएफओ दमोह ईश्वर जरांडे ने बताया कि दमोह वनमंडल के 30 से 35 कर्मचारियों को टाइगर रिजर्व में अधिकृत रूप से शामिल कर लिया गया है। इससे वन्यजीव संरक्षण के कार्यों को गति मिलेगी और टाइगर रिजर्व प्रबंधन की क्षमता भी बढ़ेगी। उन्होंने आगे बताया कि यह प्रशासनिक और मानव संसाधन स्तर पर एक महत्वपूर्ण बदलाव है, जिससे टाइगर रिजर्व की समग्र व्यवस्था और अधिक प्रभावी हो सकेगी। यह बदलाव आने वाले समय में न सिर्फ बाघों बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

प्रदेश की 413 नगरीय निकायों में भूमि विकास नियम में दिये गये प्रावधानों के अनुसार ऑनलाइन कम्पांउडिंग लागू किया गया

भोपाल प्रदेश में 413 नगरीय निकायों में यूनिफॉर्म एवं पारदर्शी तरीके भवन अनुज्ञा जारी करने के लिये ऑटोमेटेड बिल्डिंग प्लान अप्रुवल सिस्टम (एबीपीएएस) लागू किया गया है। एबीपीएएस के अंतर्गत निकाय कार्यालय में उपस्थित हुए बिना ही भवन अनुज्ञा प्राप्त किये जाने के लिये आवेदन ऑनलाइन स्वीकृत किये जाने की व्यवस्था की गई है। यह संपूर्ण प्रक्रिया बिना किसी मानव हस्तक्षेप के ऑटोमेटेड प्रोसेस से ही की जाती है। यहाँ तक की बिल्डिंग इस्पेंक्टर द्वारा स्थल निरीक्षण के समय में भी मोबाइल ऐप द्वारा ही जानकारी प्राप्त कर सिस्टम में अपलोड कर दी जाती है। अब तक करीब 3 लाख 50 हजार भवन अनुज्ञाएँ ऑनलाइन माध्यम से स्वीकृत की गई हैं। ऑटोमेटेड बिल्डिंग प्लान सिस्टम नगरीय प्रशासन एवं आवास विभाग द्वारा तैयार किया गया है। प्रदेश की 413 नगरीय निकायों में भूमि विकास नियम में दिये गये प्रावधानों के अनुसार ऑनलाइन कम्पांउडिंग (प्रशमन) लागू किया गया है। ऑनलाइन कम्पांउडिंग प्राणाली में शुल्क भी सिस्टम के द्वारा ऑटोमेटिक जनरेट किया जाता है एवं शुल्क के लिये सभी ऑनलाइन भुगतान विकल्प का उपयोग किया जाता है। ऑटोमेटेड बिल्डिंग प्लान अप्रुवल सिस्टम में नागरिक स्वयं प्लिंथ प्रमाण पत्र, सेवा प्रमाण पत्र, कार्य पूर्णता प्रमाण पत्र और अधिभोग प्रमाण पत्र ऑनलाइन प्रक्रिया द्वारा प्राप्त कर सकते है। भवन अनुज्ञा के लिये अनिवार्य दस्तावेजों की संख्या 16 से घटा कर 5 और साइट निरीक्षण चेक लिस्ट बिंदुओं को भी 43 से घटा कर 26 कर दिया गया है। फीस मेमों सिस्टम द्वारा स्वता: ही शुल्क जनरेट किया जाता है। शुल्क भुगतान के लिये सभी प्रकार के ऑनलाइन माध्यम स्वीकार किये जाते है। राज्य शासन द्वारा भवन अनुज्ञा प्रक्रिया के सरलीकरण के लिये अधिकारिता रखने वाले प्राधिकारी द्वारा समयक रूप से पंजीकृत वास्तुविद और संरचना इंजीनियर को 300 वर्ग मीटर तक के क्षेत्रफल के भू-खंडों पर भवन अनुज्ञा जारी किये जाने की शक्तियाँ प्रदान की गई है। नये नियमों के अनुसार 186 वर्ग मीटर तक के आवासीय भू-खंडों पर त्वरित डीम्ड स्वीकृति प्रक्रिया को भी सिस्टम अंतर्गत लागू किया गया है।  

बक्सवाहा की जमीन के नीचे दबा है 6000 किलो हीरे का भंडार, जिसकी कीमत 70 हजार करोड़

छतरपुर  जिले से 100 किमी दूर बक्सवाहा के जंगलों में एक ऐसी खोज हो चुकी है, जो मध्य प्रदेश की तकदीर और तस्वीर बदलने का दम रखती है. 25 साल पहले बंदर डायमंड प्रोजेक्ट के तहत बक्सवाहा के जंगलों में एक सर्वे शुरू हुआ था, जिसमें जमीन के नीचे 3 करोड़ कैरेट से ज्यादा (लगभग 6000 किलो) हीरे का भंडार होने का दावा किया गया था. उस वक्त इस डायमंड डिपॉजिट की अनुमानित कीमत 55 हजार करोड़ रू आंकी गई थी, जो अब लगभग 60 से 70 हजार करोड़ रू के करीब है. अगर ये खजाना जमीन से बाहर आता तो मध्य प्रदेश की किस्मत बदल जाती. जाने देश के इस सबसे बड़े खजाने के बारे में. क्या है सबसे बड़े हीरे के भंडार की कहानी? दरअसल, मध्य प्रदेश के बक्सवाहा के जंगलों में यह सर्वे आस्ट्रेलियाई कंपनी रियोटिंटो ने कराया था. देश की सबसे बड़ा माइनिंग कंपनी रियोटिंटो ने सन् 2000 से 2005 के बीच पूरे बक्सवाहा जंगल में सर्वे कराया. एक दिन सर्वे टीम की खुशी का ठिकाना न रहा जब उन्हें किंबरलाइट पत्थरों की बड़ी-बड़ी चट्‌टानें नजर आईं. दरअसल, हीरा इसी किंबरलाइट की चट्‌टान में पाया जाता है. तब 55 हजार करोड़ थी हीरों की अनुमानित कीमत 25 साल पहले रियोटिंटो कंपनी को यहां हीरों के भंडार का पता चला था. कंपनी को यहां बड़े पैमाने पर किंबरलाइट की चट्‌टानें मिली थीं. दावा था कि जमीन के नीचे 55 हजार करोड़ तक के हीरे हो सकते हैं. दावा था कि जंगल में जमीन के नीचे साढ़े तीन करोड़ कैरेट (लगभग 6000kg) से ज्यादा के हीरे हैं. हालांकि, इसकी खोज करने वाली कंपनी 2017 में इस प्रोजेक्ट से बाहर हो गई, जिसके बाद बक्सवाहा के जगंल को सरकार ने हीरा निकालने के लिए नीलम किया था. ये प्रोजेक्ट लीज पर आदित्य बिड़ला ग्रुप की एसेल माइनिंग कंपनी को 2019 में मिला पर हाईकोर्ट ने इसपर स्टे लगा दिया था. खुदाई से पहले लगा हाईकोर्ट का स्टे छतरपुर जिले की बक्सवाहा हीरा खदान 2019 में नीलाम की गई थी. आदित्य बिड़ला ग्रुप की एसेल माइनिंग कंपनी ने 50 साल की लीज पर इसे लिया था. कंपनी को लगभग 364 हेक्टेयर जमीन मिली थी. खुदाई शुरू हो पाती उसके पहले ही पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने इसका विरोध शुरू कर दिया था. बताया गया था कि इस जंगल में 62.64 हेक्टेयर क्षेत्र हीरे निकालने के लिए चिह्नित किया गया था, पर कंपनी ने 382.131 हेक्टेयर का जंगल मांगा, जिससे बाकी जमीन का उपयोग खनन करने और प्रोसेस के दौरान खदानों से निकला मलबा डंप करने में किया जा सके. इसी दौरान हाईकोर्ट ने इसपर स्टे लगा दिया. बन जाती एशिया की सबसे बड़ी डायमंड माइन खनिज अधिकारी अमित मिश्रा के मुताबिक, ” बक्सवाहा के जंगलों में बंदर डायमंड के नाम से एक ब्लॉक बनाया गया था, जिसे रियोटिंटो कंपनी ने एक्सप्लोर किया था लेकिन रियो टिंटो उसे छोड़ कर चली गई थी. उस समय फॉरेस्ट से उन्होंने रकबा बहुत बड़ा मांगा था, जो किसी वजह से नहीं दिया गया. उसके बाद एक छोटा रकबा 364 हेक्टेयर का बनाया गया था. अगर बक्सवाहा की माइंस चलती तो एशिया की सबसे बड़ी माइंस होती, उस समय 55 हजार करोड़ के हीरे निकलने की वेल्युएशन की गई थी.” लाखों पेड़ कटने की अफवाहें थीं वहीं खनिज अधिकारी ने आगे कहा, ” 364 हेक्टेयर क्षेत्र की लीज दी गई तो अफवाहें उड़ीं कि पूरे में खुदाई होगी और लाखों पेड़ कटेंगे. ये महज अफवाह थी. अब खुदाई की आधुनिक तकनीकें आ गई हैं, ज्यादा से ज्यादा एक फुटबॉल ग्राउंड के बराबर जमीन पर ही खुदाई होती है, इससे न तो ज्यादा पेड़ कटते हैं और न वन्य जीवों को नुकसान होता है. जितने पेड़ कटते हैं उसके 10 गुने पेड़ लगवाए भी जाते है,और उनकी पूरी देखरेख की जाती है.”

नई जनगणना के सारे आंकड़े 2029 से पहले आना मुश्किल, परिसीमन में सीटें घटने को लेकर आशंकित हैं दक्षिणी राज्य

नई दिल्ली  केंद्र सरकार 16 जून को अगली जनगणना को लेकर अधिसूचना जारी कर सकती है। वैसे जमीन पर ‘जनगणना-2027’ की प्रक्रिया 2026 में शुरू होगी और इस तरह से इसमें छह साल की देरी होगी, जिसके लिए मुख्य तौर पर कोविड महामारी को जिम्मेदार माना जा सकता है। क्योंकि, जनगणना का काम तब जो लटका, वह लटकता ही चला गया। इस बार की जनगणना के भरोसे राजनीतिक तौर पर कम से कम दो अहम चीजें लटकी हुई हैं। एक तो कानून के मुताबिक 2026 के बाद होने वाली जनगणना को ही आधार मानकर निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन होना है। क्योंकि, देश में आबादी के हिसाब से जनप्रतिनिधियों की संख्या काफी कम है और निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या के आंकड़ों में भी बड़ी असमानताएं उभर रही हैं। दूसरी तरफ संसद ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में 33% महिला आरक्षण की व्यवस्था की है, यह भी तभी संभव है जब निर्वाचन क्षेत्रों का नए सिरे से परिसीमन हो। लेकिन, मौजूदा परिस्थितियों में कहना मुश्किल है कि यह सब 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए संभव हो सकेगा। केंद्र सरकार की घोषणा के अनुसार 1 अप्रैल, 2026 से जनगणना शुरू हो सकती है। पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, इस हिसाब से यह काम 2021 में ही हो जाना था। सरकार ने नई जनगणना के लिए 1 मार्च, 2027 को रेफ्रेंस डेट के रूप में तय किया है। मतलब, जनगणना के आंकड़ों के लिए यही तारीख आधार होगी। हालांकि, अभी यह नहीं बताया गया है कि जनगणना के आंकड़े कब जारी होंगे। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जनगणना से जुड़े सभी आवश्यक आंकड़े 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले आ जाएंगे? अगर सरकारी सूत्रों की मानें तो इसका जवाब है नहीं। मसलन, एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा है कि जातिगत आंकड़े तीन साल में जारी किए जा सकते हैं। हालांकि, यह संभावना नहीं है कि जातिगत गणना ही आरक्षण का आधार बनेगी। पिछली जनगणना में आंकड़े जारी होने में करीब दो साल लगे अगर पिछली जनगणना को देखें तो अंतिम जनसंख्या गणना के आंकड़े जारी होने में लगभग 2 साल लग गए थे। हालांकि, यह देखने वाली बात है कि क्या सरकार इसकी कोई तारीख बताती है, जब जनगणना के आंकड़े आने की संभावना है। क्योंकि, बेहतर तकनीक और डिजिटल डेटा के इस्तेमाल से अब जनगणना में उतना वक्त लगने की संभावना नहीं है, जितना की पहले लगा करता था। पिछले परिसीमन में लगा था करीब साढ़े तीन साल का वक्त मान लिया जाए कि जनगणना के आंकड़े पहले के मुकाबले जल्द भी आ जाएं और परिसीमन आयोग 2029 के चुनाव से पहले अपना काम शुरू भी कर देता है, तो भी इसे परिसीमन के काम में लंबा वक्त लग सकता है। जैसे 2001 की जनगणना के बाद 2002 में परिसीमन आयोग बना था। उसने उसी जनगणना के आंकड़ों को आधार बनाया और इसके गठन से लेकर काम पूरा करने में मोटे तौर पर साढ़े तीन साल लग गए और 2007 में जाकर काम पूरा हुआ, जो कि 2008 से प्रभावी हुआ। मतलब, 2009 के लोकसभा चुनावों इसकी ओर से किया गया बदलाव अमल में आ पाया। परिसीमन में सीटें घटने को लेकर आशंकित हैं दक्षिणी राज्य अगर राजनीतिक तौर पर देखें तो इस बार के परिसीमन को लेकर दक्षिण भारतीय राज्य पहले से ही चिंतित बैठे हुए हैं। उनको डर है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण पर बहुत काम किया है और उसे काफी नियंत्रण में रखा है। लेकिन, अगर आबादी परिसीमन की आधार बनी तो उनकी लोकसभा सीटें घट सकती हैं और बिहार और यूपी जैसे राज्यों को इसका फायदा ज्यादा सीटों के तौर पर मिल सकता है। इसलिए, परिसीमन के काम को लेकर भारी विरोध भी दिख रहा है। सरकार को यह भी देखना है कि कहीं यह मुद्दा उत्तर और दक्षिण भारतीय राज्यों में बड़ी विवाद की वजह न बन जाए। केंद्र में बीजेपी की अगुवाई वाली सरकार है, जो आंध्र प्रदेश की सत्ताधारी दल टीडीपी के समर्थन पर टिकी है। ऐसे में मोदी सरकार के लिए इसपर तेजी से बढ़ना राजनीतिक रूप से भी आसान नहीं होगा। इन सारे हालातों को देखने के बाद यही लगता है कि नई जनगणना के आंकड़े 2034 के लोकसभा चुनावों से पहले काम में आना मुश्किल है।  

वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में नंबर-1 का स्थान पर कान्हा नेशनल पार्क

मंडला टाइगर्स के लिए पूरे देश में मशहूर मध्य प्रदेश के नाम एक और बड़ी उपलब्धि है. मध्य प्रदेश का कान्हा टाइगर रिजर्व शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या के मामले में देश में नंबर वन बन गया है. वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में नंबर-1 का स्थान दिया गया है, वहीं जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क दूसरे स्थान पर आया है. बता दें कि मध्य प्रदेश का कान्हा टाइगर रिजर्व अपने टाइगर्स की लिए देश-दुनिया में जाना जाता है और यहां दूर-दूर से लोग टाइगर्स का दीदार करने आते हैं. WII की रिपोर्ट में कान्हा नेशनल पार्क नंबर-1 वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) ने देशभर के टाइगर रिजर्व और नेशनल पार्क की स्टडी की थी. यहां खासतौर पर शाकाहारी वन्यजीवों पर रिसर्च की गई. रिसर्च में पाया गया कि मध्य प्रदेश के कान्हा टाइगर रिजर्व में चीतल, गौर, सांभर, बार्किंग डीयर सहित कई अन्य शाकाहारी जानवरों की संख्या सबसे ज्यादा है. कान्हा टाइगर रिजर्व ने इस मामले में देश के अन्य टाइगर रिजर्व के साथ-साथ जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क को भी पछाड़ दिया है. इसी वजह से कान्हा टाइगर्स के लिए अनुकूल वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बताया गया कि कान्हा टाइगर रिजर्व की जैवविविधता सबसे बेहतर है. यहां सबसे ज्यादा शाकाहारी वन्यजीवों की मौजूदी टाइगर्स के संरक्षण के लिए जबर्दस्त है. ये यहां की पूरी फूड चेन के लिए अच्छा संकेत है. पिछले वर्ष की रिसर्च के आधार पर वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया ने इस रिपोर्ट को पेश किया है. 2074 वर्ग किमी में फैला है कान्हा टाइगर रिजर्व कान्हा टाइगर रिजर्व का कोर और बफर एरिया 2074.31 वर्ग किलोमीटर फैला हुआ है. इस पूरे क्षेत्र में टाइगर्स के साथ-साथ बाराहसिंघा, सांभर, चीतल, गौर, बार्किंग डीयर, लंगूर, जंगली सूअर समेत कई वन्य प्राणियों की भरमार है. शाकाहारी वन्य प्राणियों की अधिक संख्या की वजह से दूसरे मांसाहारी जीव खासतौर पर टाइगर्स के लिए ये जगह उपयुक्त है. जैव विविधता का अनूठा उदाहरण है कान्हा नेशनल पार्क कान्हा टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर पुनीत गोयल के मुताबिक, ” कान्हा टाइगर रिजर्व शाकाहारी वन्य जीव के मामले में पूरे भारत में नंबर वन है. जहां शाकाहारी वन्य जीवों की तादाद ज्यादा होती है, वहां मांसाहारी वन्य जीव भी अधिक होते हैं.यही वजह है कि कान्हा टाइगर रिजर्व जैव विविधता का सबसे अच्छा उदाहरण है.

भारत ने रूस के साथ 5वीं पीढ़ी के फाइटर जेट प्रोजेक्ट छोड़ा, भारतीय वायु सेना को 2035 से पहले नहीं मिल पाएंगे

नई दिल्ली लड़ाकू विमानों की कमी से जूझ रहा भारत पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान बनाने को मंजूरी दे चुका है. लेकिन, ये विमान भारतीय वायु सेना को 2035 से पहले नहीं मिल पाएंगे. प्रोडक्शन शुरू करने से पहले विमान को अभी डिजाइन, विकास और परीक्षण की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा, जो एक बड़ी चुनौती वाला और समय खाने वाला काम है. ऐसे में भारत सरकार के सामने तुरंत इस जरूरत को पूरा करने की चुनौती है. भारतीय एयरफोर्स अब सार्वजनिक तौर पर फाइटर जेट की कमी की बात करने लगी है. दरअसल, चीन और पाकिस्तान से दो मोर्चों पर चुनौतियों का सामना कर रही इंडियन एयरफोर्स को अपनी लड़ाकू क्षमता बनाए रखने के लिए फाइटर जेट्स की 42 स्क्वायड्रन की जरूरत है. एक स्क्वायड्रन में 18 विमान होते हैं. लेकिन, मौजूदा वक्त में एयरफोर्स के पास 32 स्क्वायड्रन बचे हैं. दूसरी तरफ चीन और पाकिस्तान की एयर फोर्स अब पांचवीं पीढ़ी के विमानों से लैस हो रही है. ऐसे में चुनौती तो है. हालांकि, इस चुनौती को सरकार और वायुसेना दोनों समझती है और इसके लिए उचित कदम भी उठाए जा रहे हैं. चुनौती का दूसरा पहलू खैर, आज हम इस चुनौती की नहीं बल्कि इससे जुड़े एक अन्य पहलू की बात कर रहे हैं. इसे पहलू भी नहीं बल्कि एक चूक कही जा सकती है. दरअसल, भारत सरकार ने 2007 में रूस के साथ पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट के निर्माण के लिए एक अंतर सरकारी समझौता किया था. इस समझौते के तहत रूस में सुखोई फाइटर जेट बनाने वाली कंपनी और भारत की सरकारी कंपनी एचएएल एक पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट का विकास करने वाली थी. इस प्रोजेक्ट को ब्रह्मोस मिसाइल की तरफ आगे बढ़ाना था. ज्ञात हो कि बीते दिनों ऑपरेशन सिंदूर में पाकिस्तान की एयरफोर्स की कमर तोड़ने वाली ब्रह्मोस मिसाइल को रूस के साथ ही मिलकर डेवलप किया गया था. रिपोर्ट के मुताबिक भारत और रूस ने जिस पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट की कल्पना की थी वह एक स्टील्थ जेट था. उसमें दो इंजन लगाए जाने थे. उसको हवाई, जमीनी और नौसैनिक टारगेट्स को नष्ट करने के लिए बनाया जाना था. इसके लिए भारत ने 2006 में ही अपनी एक टीम रूस भेज दी थी. समझौते के बाद दिसंबर 2008 में फाइटर जेट की डिजाइन और दिसंबर 2010 में खर्च को लेकर समझौते भी हो गए. भारत और रूस ने 6-6 अरब डॉलर के निवेश से 154 विमानों के उत्पादन की योजना बनाई. परियोजना में आने लगी अड़चनें भारत ने रूस से इस परियोजना की तकनीकी समानता और सोर्स कोर्ड साझा करने की मांगी की. सोर्स कोड किसी विमान में सॉफ्टवेयर नियंत्रण प्रणाली होती है. उसी के जरिए भविष्य में विमान में किसी बदलाव को अंजाम दिया जा सकता है. लेकिन, रूस ने इस सोर्स कोड को देने से इनकार कर दिया. फिर बातचीत हुई और इसके लिए रूस ने अतिरिक्त 7 अरब डॉलर की राशि की मांग की. विमानों की संख्या, सोर्स कोड, तकनीकी हस्तांतरण जैसे मुद्दों पर असहमति के कारण 2016 तक भारत की इस परियोजना में दिलचस्पी कम हो गई. फिर भारत ने 2018 में आधिकारिक तौर पर इस परियोजना से निकलने की घोषणा कर दी. भारत ने देसी एएमसीए प्रोग्राम पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया. इसके साथ ही एयरफोर्स की तत्कालिक जरूरतों को पूरा करने के लिए फ्रांस से 36 राफेल विमान खरीदे गए. जिस पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट परियोजना से भारत बाहर हुआ उस पर रूस ने काम जारी रखा. फिर यह सुखोई-57 के रूप में सामने आया. इस विमान में कई ऐसी चीजें हैं जो भारत की जरूरतों के अनुकूल है. इस तरह रूस पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट बनाने वाला तीसरा मुल्क बन गया. इससे पहले अमेरिका और चीन के पास पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट हैं.   अब दोनों की मजबूरी 2018 से 2025 आते-आते काफी चीजें बदल चुकी हैं. एक तरफ भारत को इस वक्त पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट्स की सख्त जरूरत है. वहीं यूक्रेन युद्ध के कारण रूस की आर्थिक स्थिति पूरी तरह चरमरा गई है. वह पैसे के अभाव में इस फाइटर जेट्स का उत्पादन नहीं कर पा रहा है. अभी तक वह इसका केवल 40 यूनिट ही बना पाया है. ऐसे में वह भारत को अब सोर्स कोड और तकनीक ट्रांसफर के साथ इसे देना चाहता है. भारत की जरूरत के हिसाब से बनने वाले फाइटर जेट को सुखोई-57ई नाम दिया गया है. उसने इसका उत्पादन भी भारत ने करने की बात कही है. इसे एचयूएल के मौजूदा प्लांट में आसानी से बनाया भी जा सकता है. क्या एफ-35 और जे-20 से कमतर है सुखाई-57 परियोजना से बाहर निकलने के वक्त से कुछ जानकार इस फाइटर जेट्स की कमी को उजागर करते रहे हैं. द हिंदू और द इंडियन एक्सप्रेस अखबार की कुछ रिपोर्ट को मानें तो वायु सेना ने इस फाइटर जेट्स की रडार क्रॉस-सेक्शन और स्टील्थ क्षमता पर सवाल उठाया था. भारत ने इस विमान में ऐसे 43 तकनीकी सुधार की मांग की थी, जिसे रूस ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया था. राजनीतिक कारण एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत ने रूस के साथ संबंधों को संतुलित करने के लिए पश्चिमी देशों के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाया. इसके पीछे का एक कारण चीन के साथ रूस का गठजोड़ रहा है. रूस और चीन के बीच लगातार मजबूत होते गठजोड़ के कारण भारत चिंतित रहता है. ऐसे में भारत को डर था कि रूस कहीं इस पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट की तकनीक को चीन के साझा न कर दे.

बकायेदारों के खिलाफ विद्युत वितरण कंपनी की भोपाल में कार्रवाई जारी, 100 करोड़ रुपये से अधिक का बिल बकाया

भोपाल चिराग तले अंधेरा वाली कहावत तो आपने सुनी होगी..अब देख भी लीजिए. तेजी से उभरते मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में बिजली विभाग को लंबा पलीता लगा रहा है. बिजली बिलों का बकाया अब खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है. अकेले शहर में घरेलू उपभोक्ताओं पर 100 करोड़ रुपये से अधिक का बिल बकाया है. हैरानी की बात तो ये कि इनमें से 86 उपभोक्ताओं पर 1 लाख रुपये से अधिक का बकाया है. बिजली वितरण कंपनी (डिस्कॉम) के अनुसार, इनमें से अधिकांश मामलों में कोई न कोई विवाद है. कई केस अदालतों में विचाराधीन हैं. सबसे अधिक बकाया एक घरेलू उपभोक्ता पर 4.21 लाख रुपये का सामने आया है. यह उपभोक्ता कटारा हिल्स वितरण क्षेत्र की एक कॉलोनी में रहता है. फिर भी कनेक्शन चालू TOI की रिपोर्ट के अनुसार, कटारा हिल्स वाले उपभोक्ता का मई महीने का चालू बिल 2,246 रुपये था, जिस पर 5,199 रुपये विलंब शुल्क और 4.15 लाख रुपये का पुराना विवादित बकाया जुड़कर कुल देय राशि 4,21,079 रुपये हो गई. मामला अदालत में लंबित होने के कारण बिजली कनेक्शन चालू है. इस मामले में डिस्कॉम के अधिकारियों का कहना है कि सामान्य स्थिति में यदि किसी घरेलू उपभोक्ता पर 5,000 रुपये से अधिक बकाया होता है तो उसका कनेक्शन काट दिया जाता है. लेकिन, जिन उपभोक्ताओं के बिल विवादित है या न्यायिक प्रक्रिया में है, उनके खिलाफ तत्काल कोई कार्रवाई नहीं हो पाती. छोटे बकायदार भी करीब 37 हजार 1 लाख रुपये से अधिक बकाया रखने वालों के बाद सबसे बड़ी संख्या उन उपभोक्ताओं की है, जिन पर 10,000 से 1 लाख के बीच की राशि बकाया है. ऐसे उपभोक्ताओं की संख्या 16,681 है. इनमें से किसी पर 99,797 रुपये तो किसी पर 10,001 रुपये तक का बकाया है. इसके अलावा 19,704 उपभोक्ता ऐसे भी हैं, जिन पर 5,000 से 10,000 रुपये तक की राशि लंबित है. बिजली कंपनी इस काम में लगी विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी राशि का बकाया होना बिजली वितरण व्यवस्था और बिल वसूली प्रक्रिया में गहराते संकट की ओर संकेत करता है. यदि विवादों और अदालती मामलों का शीघ्र समाधान नहीं किया गया तो यह बकाया राशि और बढ़ सकती है. डिस्कॉम की ओर से फिलहाल ऐसे उपभोक्ताओं से संपर्क कर विवाद सुलझाने और समझौते की कोशिश की जा रही है. वहीं, अधिकारियों ने संकेत दिए कि सरकार से नीति-निर्माण स्तर पर भी हस्तक्षेप की मांग की जाएगी.

विश्व पर्यावरण दिवस पर जबलपुर केंद्रीय जेल में अनूठा आयोजन, बंदियों ने किया पौधारोपण व गाजरघास सफाई अभियान

A unique event was organized in Jabalpur Central Jail on World Environment Day, prisoners did plantation and carrot grass cleaning campaign जितेन्द्र श्रीवास्तव विशेष संवाददाताजबलपुर | विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर केंद्रीय जेल जबलपुर में एक सराहनीय पहल देखने को मिली। जेल अधीक्षक श्री अखिलेश तोमर के मार्गदर्शन में जेल परिसर को हराभरा और स्वच्छ बनाने के लिए व्यापक पर्यावरणीय गतिविधियों का आयोजन किया गया। इस मौके पर उप जेल अधीक्षक प्रशासन मदन कमलेश, उप जेल अधीक्षक श्रीमती रूपाली मिश्रा, सहायक जेल अधीक्षक हिमांशु तिवारी सहित समस्त अधिकारी-कर्मचारी व बंदियों ने मिलकर जेल परिसर में पौधारोपण किया। बंदियों की भागीदारी से संवरा परिसरइस अभियान की सबसे खास बात यह रही कि इसमें जेल के बंदियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उन्होंने न सिर्फ पौधे लगाए, बल्कि परिसर के आसपास उग आए हानिकारक गाजर घास को उखाड़कर नष्ट किया। कल्याण अधिकारी श्रीमती सरिता घारू, लिपिक उपेन्द्र त्रिवेदी व अन्य कर्मचारियों की देखरेख में यह सफाई अभियान सफलता से संपन्न हुआ। गाजर घास मिट्टी की उर्वरता को कम करने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक मानी जाती है, ऐसे में इसका सफाया एक आवश्यक कदम था। जेल अधीक्षक ने दिया पर्यावरण सरंक्षण का संदेशइस अवसर पर जेल अधीक्षक अखिलेश तोमर ने कहा, “विश्व में लगातार घटते जंगलों के कारण प्रदूषण व तापमान में वृद्धि हो रही है। इसका प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे शरीर और मानसिक स्वास्थ्य पर देखने को मिल रहा है। ऐसे में पेड़ लगाना और पर्यावरण की रक्षा करना हम सबका नैतिक कर्तव्य है।” उन्होंने सभी को वर्ष भर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में छोटे-छोटे कदम उठाने की प्रेरणा भी दी। सकारात्मक सोच और जिम्मेदारी की मिसालकेंद्रीय जेल में आयोजित यह अभियान न केवल पर्यावरण के प्रति जागरूकता का प्रतीक बना, बल्कि समाज से अलग-थलग पड़े बंदियों के भीतर एक नई सोच और जिम्मेदारी का भाव भी उत्पन्न किया। इस आयोजन से यह संदेश भी गया कि समाज के हर वर्ग को मिलकर धरती को हरा-भरा और स्वच्छ बनाने की दिशा में प्रयास करना चाहिए।

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