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किसान विरोधी एवं मोदी का सिंहासन बचाने वाला बजट: मल्लिकार्जुन खड़गे

Budget that is anti-farmer and will save Modi's throne: Mallikarjun Kharge

Budget that is anti-farmer and will save Modi’s throne: Mallikarjun Khargeये बहुत ही निराशाजनक बजट है, जो नरेंद्र मोदी का सिंहासन बचाने के लिए पेश किया गया है।इस बजट में किसानों के लिए MSP की गारंटी या खाद में सब्सिडी जैसा कुछ नहीं है। वहीं रेलवे में इतनी घटनाएं हो रही हैं, लेकिन रेलवे सुरक्षा, रेलवे भर्ती जैसी जरूरी चीजों की बात नहीं की गई। मोदी सरकार ने रेलवे का बजट बहुत कमजोर बनाया है।

BJP छोड़ेंगे मंत्री नागर सिंह चौहान? विभाग जाने से नाराज

Will Minister Nagar Singh Chauhan leave BJP? angry about going to department

Will Minister Nagar Singh Chauhan leave BJP? angry about going to department MP Politics: मध्य प्रदेश में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए और मंत्री बनाए गए रामनिवास रावत को वन एवं पर्यावरण विभाग दिए जाने से मंत्री नागर सिंह चौहान नाराज हैं. अब तक यह विभाग नागर सिंह चौहान के ही पास था. अब नागर सिर्फ अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के मंत्री रह गए हैं. गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में हाल ही में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में रामनिवास रावत को कैबिनेट मंत्री की शपथ दिलाई गई थी और रविवार को उन्हें वन एवं पर्यावरण विभाग आवंटित किया गया. नागर सिंह चौहान के पास वन पर्यावरण के अलावा अनुसूचित जाति कल्याण विभाग था. वर्तमान समय में वह सिर्फ एक विभाग के मंत्री हैं. कांग्रेस से आए नेता को मिली जिम्मेदारी से नाराजवन एवं पर्यावरण विभाग लेकर रामनिवास रावत को दिए जाने से नागर सिंह चौहान नाराज हैं. कैबिनेट मंत्री नागर सिंह चौहान ने सोमवार को मीडिया से बातचीत में अपनी नाराजगी साफ जाहिर की और कहा कि पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता की बजाय कांग्रेस छोड़कर आए नेता को यह जिम्मेदारी दी गई है. कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं नागर सिंह चौहान?नागर सिंह चौहान ने कहा, “वे अनुसूचित जनजाति वर्ग से आते हैं और उनके पास जो विभाग रह गया है, वह अनुसूचित जाति वर्ग का है. वे इस फैसले से काफी आहत हैं क्योंकि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने उनसे इस मसले पर कोई चर्चा नहीं की. हम आपको बता दें कि नागर सिंह चौहान की पत्नी अनीता सिंह चौहान रतलाम झाबुआ संसदीय क्षेत्र से भाजपा की सांसद हैं. मंत्री चौहान का कहना है कि वह आने वाले समय में अपने करीबियों से चर्चा करने के बाद कोई बड़ा फैसला भी ले सकते हैं.

मानसून सत्र में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने नीट पेपर लीक का मुद्दा उठाया

Leader of Opposition in Lok Sabha Rahul Gandhi raised the issue of NEET paper leak in the monsoon session

Leader of Opposition in Lok Sabha Rahul Gandhi raised the issue of NEET paper leak in the monsoon session नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने नीट पेपर लीक का मुद्दा उठाया. राहुल गांधी ने कहा कि धर्मेंद्र प्रधान खुद को छोड़कर सभी को दोषी ठहराते हैं. मुझे नहीं लगता यहां जो कुछ हो रहा है, वह उसके मूल सिद्धांतों को भी समझते हैं? लाखों लोग मानते हैं कि अगर आप अमीर हैं और आपके पास पैसा है, तो आप भारतीय परीक्षा प्रणाली खरीद सकते हैं और विपक्ष भी यही सोचता है.

मप्र में उठी भील प्रदेश बनाने की मांग, आदिवासी नेताओं ने बांसवाड़ा की रैली में भरी हुंकार

Demand for creation of Bhil state raised in Madhya Pradesh, tribal leaders shouted in Banswara rally

Demand for creation of Bhil state raised in Madhya Pradesh, tribal leaders shouted in Banswara rally भील प्रदेश की मांग और समुदाय के जनप्रतिनिधियों की इसे लेकर क्या सोच है? इसका मध्यप्रदेश सहित राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा ‘ SAHARA SAMACHAAR ने इसे लेकर पड़ताल की तो कई हैरान वाले तथ्य सामने आए हैं। भोपाल । राजस्थान के बांसवाड़ा में भील प्रदेश की मांग को लेकर हुए जमावड़े के बाद पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी बहुल जिलों में हलचल बढ़ गई है। अलग प्रदेश की मांग पर जनजातीय समाज के नेताओं में दो फाड़ नजर आ रही है। जहां समाज के कुछ नेता इसके समर्थन में हैं तो कुछ जनप्रतिनिधि इसे विदेशी और विघटनकारी शक्तियों की साजिश बता रहे हैं। जो भी हो, लेकिन बांसवाड़ा के भानगढ़ में हुई रैली के बाद आदिवासी प्रदेश की मांग प्रदेश में फिर जोर पकड़ रही है। भील प्रदेश की मांग के इस आंदोलन में मध्यप्रदेश को धुरी क्यों माना जा रहा है? आंदोलन का नेतृत्व करने वाले नेता मध्यप्रदेश पर सबसे ज्यादा फोकस क्यों कर रहे हैं? एक दशक से भी पहले से चल रही भील प्रदेश की मांग अचानक आंदोलन में कैसे बदली और समुदाय के जनप्रतिनिधियों की इसे लेकर क्या सोच है? इसका मध्यप्रदेश सहित राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा द सूत्र ने इसे लेकर पड़ताल की तो कई हैरान वाले तथ्य सामने आए हैं। सवाल: भील प्रदेश की मांग को लेकर राजस्थान के बांसवाड़ा में हुई आदिवासी समुदाय की रैली के बाद यह मामला क्यों चर्चा में है? पहले बताते हैं भील आदिवासी समाज की प्रदेश और देश में क्या स्थिति है। दरअसल, भील मूल रूप से जंगलों में रहने वाली जनजाति है। यह मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में निवासरत है। मध्यप्रदेश में इस जनजाति की संख्या करीब 60 लाख है। वहीं राजस्थान में 28 लाख, महाराष्ट्र में 18 लाख और गुजरात में 35 लाख भील आदिवासी हैं। यानी जनसंख्या के लिहाज से भील आदिवासी सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश में हैं। पश्चिमी मध्यप्रदेश के आलीराजपुर और झाबुआ के अलावा रतलाम, धार, बड़वानी, खंडवा, खरगोन जिले भील आबादी बाहुल्य हैं। वहीं राजस्थान के उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर और चित्तौड़गढ़ और महाराष्ट्र में जलगांव, नासिक, ठाणे, नंदूरबाग, धुलिया और पालघर में भील सबसे ज्यादा संख्या में रहते हैं। मध्य प्रदेश में भील जनजाति की आबादी 1.42 करोड़ यानी मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात प्रदेशों में भील समुदाय की आबादी। करोड़ 42 लाख से ज्यादा है। बाकी पूरे देश में भी भील आदिवासी लाखों की संख्या में बिखरे हुए हैं। सबसे ज्यादा आबादी होने की वजह से ही भील प्रदेश मुक्ति मोर्चा और आदिवासी परिवार के आव्हान पर बांसवाड़ा में समुदाय की रैली निकाली गई थी। समुदाय के लोगों ने एकजुट होकर मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र के भील आबादी बाहुल्य जिलों को जोड़कर अलग राज्य की मांग उठाई है। इस टैली के बाद राजनीतिक दलों से जुड़े भील समुदाय के जनप्रतिनिधियों लोगों में भी मतभेद सामने आ गए हैं। भाजपा नेता और थांदला के पूर्व विधायक कलसिंह भांबर ने इसे विदेशी ताकतों की साजिश बताया है तो सेलाना से निर्दलीय आदिवासी विधायक कमलेश्वर डोडियार भील प्रदेश की मांग का पुरजोर पक्ष ले रहे हैं। वहीं झाबुआ से कांग्रेस विधायक विक्रांत भूरिया ने भील प्रदेश की मांग या विरोध में कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी है। एक दशक पुरानी है मांग अब बात करते हैं अलग भील प्रदेश की मांग और अचानक उठ खड़े हुए इस आंदोलन की। भील प्रदेश की मांग एक दशक से भी पुरानी है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात से सीमावर्ती जिलों में बसे भील-भिलाला समुदाय के लोग यह मांग उठाते रहे हैं। आदिवासी समुदाय का संगठन जयस भी इस मांग के समर्थन में कई बार आंदोलन-टैलियां कर चुका है। सैलाना विधायक कमलेश्वर डोडियार ने फरवरी माह में हुए मध्यप्रदेश विधानसभा के सत्र में भी भील प्रदेश की मांग और सरकार की कार्रवाई का मामला उठाया था। अब इस समुदाय का अचानक एकजुट होना और राजस्थान के बांसवाड़ा से भील प्रदेश की मांग बुलंद करने का राजनीति पर क्या असर होगा यह तो आने वाले दिनों में ही नजर आएगा। फिलहाल आदिवासी समुदाय के सामाजिक संगठन भी इस मांग के समर्थन में उतर आए हैं। क्या कहते हैं समुदाय के जनप्रतिनिधि ? कुछ संगठन जनजाति समाज को गुमराह करने के लिए भील प्रदेश की मांग कर रहे हैं। भील प्रदेश कीमांग आज से नहीं जबसे मिशनरी इस अंचल में आए हैं तबसे शुरु हुई है। ये मांग उन्होंने रखी थी। साऊदी अरब के लोग नारा लगा रहे हैं जय जोहार का नाटा है भारत देश हमारा है। ये किसका षडयंत्र है। आज कहा जा रहा है हमारी बहन बेटियों को की मंगलसूत्र पहनना, मांग भरना हमारा रिवाज नहीं है। ये रिवाज युगों से चले आ रहे हैं। आदिवासी समुदाय युगों से हिंदू पद्धति, परम्पराओं से पूजा पाठ करता आ रहा है। हमारी संस्कृति, रीति-रिवाज उससे जुड़े हैं। भानू भूरिया, बीजेपी नेता झाबुआ मांग तो जायज हैं, लेकिन जातिगत तौर पर देखा जाए तो यह देश को तोड़ने वाला होगा। क्षेत्रीयता और भाषा के आधार पट हो तो ऐसा होना चाहिए। भील प्रदेश की मांग के आंदोलन में कुछ लोग तो ठीक हैं, लेकिन अभी ऐसा नहीं लगता कि भील प्रदेश की आवश्यकता है। विक्रांत भूरिया, कांग्रेस विधायक, झाबुआ मुझे अभी इस आंदोलन की विस्तृत जानकारी नहीं है। अलग भील प्रदेश को लेकर जो मूवमेंट शुरु हुआ है उस पर मैं फिलहाल अभी इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देना चाहता कमलेश्वर डोडियार, निर्दलीय विधायक, सैलाना बीते 12 साल से पश्चिमी मध्यप्रदेश के आदिवासी भील प्रदेश की मांग कर रहे हैं। मैंने इस संबंध में फरवरी में विधानसभा सत्र में प्रश्न लगाकर जानकारी चाही कि भील प्रदेश गठन को लेकर क्या कार्रवाई की जा रही है। इस संबंध में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने जानकारी इकट्ठा करने की सफाई दी गई। वहीं मुख्यमंत्री ने नए राज्य गठन की कार्रवाई का अधिकार केंद्र सरकार के पास होने का जबाव देकर पल्ला झाड़ लिया था।

प्रधानमंत्री द्वारा भारत के एमएसएमई और असंगठित व्यवसायों पर सुनियोजित ढंग से किया गया हमला एक आर्थिक तबाही: कांग्रेस

नई दिल्ली कांग्रेस ने बुधवार को आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने अपने ‘‘विनाशकारी नीति निर्धारण” से देश के विनिर्माण क्षेत्र को तहस नहस कर दिया। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने यह भी कहा कि कांग्रेस ने सरकार के आर्थिक कदमों को लेकर लगातार आगाह किया, लेकिन सरकार ने इसे अनसुना कर दिया और सूक्ष्म, लघु, मध्यम (एमएसएमई) और असंगठित व्यवसायों पर हमला किया। सुनियोजित ढंग से किया गया हमला एक आर्थिक तबाही रमेश ने एक बयान में कहा, ‘‘क्रेडिट रेटिंग कंपनी ‘इंडिया रेटिंग्स’ की एक नई रिपोर्ट ने उस बात की पुष्टि की है जिसे लेकर कांग्रेस लगातार आगाह करती आ रही है कि नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री द्वारा भारत के एमएसएमई और असंगठित व्यवसायों पर सुनियोजित ढंग से किया गया हमला एक आर्थिक तबाही है।” उन्होंने कहा, ‘‘मोदी सरकार का नीति निर्माण आम तौर पर असंगठित क्षेत्र को नज़रअंदाज़ करने वाला रहा है।” नौकरियां 2016 में 3.6 करोड़ से घटकर 23 में 3.06 करोड़ रमेश के मुताबिक, ‘‘नोटबंदी, जटिल कर संरचना और बिना तैयारी के लॉकडाउन लगाने” रूपी तीन झटके विशेष रूप से इसके विनाशकारी नीति निर्धारण की ओर ध्यान दिलाते हैं। उन्होंने दावा किया कि इन तीन झटकों के कारण असंगठित क्षेत्र के 63 लाख उद्यम बंद हुए, जिससे 1.6 करोड़ नौकरियां चली गईं। रमेश ने कहा कि यह ऐसे समय हुआ जब रिकॉर्ड संख्या में युवा श्रम बाजारों में प्रवेश कर रहे हैं जबकि मोदी सरकार नौकरियों के अवसरों को नष्ट कर रही है। उन्होंने कहा कि ‘मेक इन इंडिया’ के तमाम प्रचार, दिखावे और दावे के बावजूद विनिर्माण क्षेत्र की नौकरियां वित्त वर्ष 2016 में 3.6 करोड़ से घटकर वित्त वर्ष 23 में 3.06 करोड़ हो गईं। डॉक्टर मनमोहन सिंह ने नोटबंदी को वैधानिक लूट बताया कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि ‘‘नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री” ने भारत के विनिर्माण क्षेत्र को तहस नहस कर दिया है। रमेश ने कहा, ‘‘कांग्रेस प्रधानमंत्री को इन नतीजों को लेकर लगातार चेतावनी देती रही है। डॉक्टर मनमोहन सिंह ने ख़ुद संसद में नोटबंदी की निंदा करते हुए इसे ‘‘संगठित और वैधानिक लूट” बताया था। राहुल गांधी ने बार-बार एमएसएमई पर जीएसटी के ख़तरनाक दुष्परिणामों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए कहा है कि यह न तो अच्छा है और न सरल कर है।” उन्होंने आरोप लगाया कि 1.4 अरब भारतीय अब ‘‘नॉन-बायोलॉजिकल प्रधानमंत्री” के मित्रवादी पूंजीवाद, मनमाने नीति निर्धारण और मुद्दों को रचनात्मक रूप से हल न करने के आर्थिक दुष्परिणामों को भुगतने के लिए मजबूर हैं।

‘ED को करने दीजिए अपना काम, हम नहीं करेंगे हस्तक्षेप…’; वाल्मीकि कॉरपोरेशन घोटाले पर सीएम सिद्दरमैया का बयान

'Let ED do its work, we will not interfere…'; CM Siddaramaiah's statement on Valmiki Corporation scam

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