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आरएसएस ने भाजपा के साथ मतभेद की अफवाहों को किया खारिज : मोहन भागवत

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नई दिल्ली राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने भाजपा के साथ मतभेद की अफवाहों को खारिज कर दिया। इससे पहले पार्टी प्रमुख मोहन भागवत ने लोकसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत से चूक जाने के बाद अपने पहले बयान में कहा था कि एक सच्चा सेवक कभी अहंकारी नहीं होता। आरएसएस सूत्रों ने यह जानकारी दी। आरएसएस सूत्रों ने कहा कि संघ और उसके वैचारिक मार्गदर्शक भाजपा के बीच “कोई मतभेद नहीं है”, जबकि विपक्षी नेताओं सहित लोगों के एक वर्ग ने दावा किया है कि भागवत की टिप्पणी भगवा पार्टी के नेतृत्व या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लक्षित थी। उन्होंने कहा कि ऐसी टिप्पणियां अटकलें हैं और संदर्भ से हटकर कही गई हैं। मोहन भागवत का बयान सोमवार को नागपुर में एक कार्यक्रम में भागवत ने कहा, “एक सच्चा ‘सेवक’ मर्यादा बनाए रखता है। वह काम करते समय मर्यादा का पालन करता है। उसे यह अहंकार नहीं होता कि वह कहे कि ‘मैंने यह काम किया’। केवल वही व्यक्ति सच्चा ‘सेवक’ कहलाता है।” जवाब में आरएसएस सूत्रों ने कहा, “उनके (भागवत) भाषण में 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद दिए गए भाषण से बहुत अंतर नहीं था। किसी भी संबोधन में राष्ट्रीय चुनाव जैसी महत्वपूर्ण घटना का संदर्भ देना लाजिमी है।” इसका गलत अर्थ निकाला गया उन्होंने कहा, “लेकिन भ्रम पैदा करने के लिए इसका गलत अर्थ निकाला गया और इसे संदर्भ से बाहर ले जाया गया। उनकी ‘अहंकार’ वाली टिप्पणी कभी भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या किसी भाजपा नेता के लिए नहीं थी।” आरएसएस सूत्रों ने भी अपने राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य इंद्रेश कुमार द्वारा भाजपा के चुनाव प्रदर्शन को लेकर की गई आलोचना से खुद को अलग कर लिया। एक पदाधिकारी ने कहा कि यह उनकी निजी राय है और यह संगठन के आधिकारिक रुख को नहीं दर्शाता। मोदी के लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से खुश- इंद्रेश कुमार गुरुवार को जयपुर के निकट एक कार्यक्रम में कुमार ने कहा, “जिस पार्टी (भाजपा) ने (भगवान राम की) भक्ति की, लेकिन अहंकारी हो गई, उसे 241 पर रोक दिया गया, लेकिन वह सबसे बड़ी पार्टी बन गई।” उन्होंने कहा, “और जिनकी राम में कोई आस्था नहीं थी, उन्हें मिलाकर 234 पर रोक दिया गया।” उन्होंने विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ को मिली सीटों का हवाला दिया। अपनी टिप्पणी पर विवाद उत्पन्न होने के बाद कुमार ने शुक्रवार को कहा कि देश भाजपा के चुनाव प्रदर्शन और नरेन्द्र मोदी के लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने से खुश है। लोग भगवान राम के खिलाफ थे, वे सत्ता से बाहर हैं उन्होंने कहा, ”इस समय, ताजा खबर यह है कि जो लोग भगवान राम के खिलाफ थे, वे सत्ता से बाहर हैं और जो भगवान राम के भक्त थे, वे सत्ता में हैं।” उन्होंने कहा, ”पीएम मोदी के नेतृत्व में देश तरक्की करेगा।”  भागवत के भाषण को लेकर चल रही बहस के बारे में पूछे जाने पर कुमार ने कहा, “बेहतर होगा कि आप इसके बारे में संघ के अधिकृत पदाधिकारियों से पूछें।”  

मणिपुर में रुकेगी मोहन भागवत के केंद्र सरकार पर दबाव बनाने से रुकेगी मणिपुर में हिंसा : पूर्व सीएम गहलोत

जयपुर. पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मणिपुर हिंसा पर RSS प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार पर निशाना साधा है। गहलोत ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा कि मणिपुर हिंसा की उपेक्षा को लेकर भागवत का बयान बहुत देर से आया है। उन्होंने कहा कि पिछले एक साल में केंद्र सरकार ने मणिपुर में हो रहे आंतरिक संघर्ष और हिंसा को गंभीरता से नहीं लिया है। गहलोत ने कहा कि मणिपुर एक छोटा राज्य है, लेकिन भारत का अभिन्न अंग है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कभी मणिपुर जाने का प्रयास नहीं किया, जबकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कई बार मणिपुर का दौरा किया। गहलोत ने भागवत से आग्रह किया कि वह केंद्र सरकार पर दबाव बनाएं, ताकि मणिपुर में हिंसा को रोका जा सके। केंद्र सरकार निष्क्रिय गौरतलब है कि मणिपुर में लंबे समय से जातीय और सामुदायिक हिंसा की घटनाएं हो रही हैं, जिनमें कई लोगों की जान गई है और हजारों लोग विस्थापित हुए हैं। अशोक गहलोत ने इन हालातों पर केंद्र सरकार की निष्क्रियता की आलोचना की। भागवत से केन्द्र सरकार को मजबूर करने की अपील की है कि वह मणिपुर पर ध्यान दें। भागवत का बयान ऐसे समय आया है, जब मणिपुर में शांति बहाल करने की मांग तेजी से बढ़ रही है। गहलोत के अनुसार, केन्द्र सरकार की लापरवाही ने मणिपुर की स्थिति को और गंभीर बना दिया है और इसे तुरंत सुधारने की आवश्यकता है। इस मुद्दे पर गहलोत का बयान एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा रहा है।

आरएसएस चीफ ने कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान मर्यादा की जरूरत थी जो नहीं रखी गई

नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन  भागवत ने चुनाव के दौरान होने वाली बयानबाजी को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा कि हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों ने मर्यादा नहीं रखी। नागपुर में हुए आरएसएस के कार्यक्र में उन्होंने कहा, असली जनसेवक वही है जो अहंकार नहीं दिखाता और सार्वजनिक जीवन में काम करते हुए भी मर्यादा बनाए रखता है। उन्होंने कहा, चुनाव संपन्न हो गए, परिणाम और सरकार भी बन गई लेकिन उसकी चर्चा अभी तक चल रही है। जो हुआ वह क्यों हुआ। उन्होंने कहा, यह अपने प्रजातांत्रिक देश में पांच वर्ष में होने वाली घटना है जो कि होती है। देश के  संचालन के लिए यह महत्वपूर्ण है। लेकिन हम यही चर्चा करते रहें इतना महत्वपूर्ण नहीं है। समाज ने अपना मत दे दिया और उसके अनुसार अब काम हो रहा है। संघ के लोग इसमें नहीं पड़ते। हम अपना कर्तव्य करते रहते हैं। संघ प्रमुख ने कहा, जो वास्तविक सेवक है उसकी एक मर्यादा रहती है। काम करते सब लोग हैं लेकिन कार्य करते समय वह मर्यादा का पालन भी करता है। जैसा तथागत ने भी बताया है कि कुशलस्य उपसंपदा। शरीर को भूखा नहीं रखना है लेकिन कौशल पूर्वक जीविका कमानी है। इससे दूसरों को धक्का नहीं लगना चाहिए। यह मर्यादा निहित है। इसी तरह की मर्यादा के साथ हम लोग काम करते हैं। काम करने वाला मर्यादा का ध्यान रखता है। जो मर्यादा का पालन करता है उसमें अहंकार नहीं आता और  वही सेवक कहलाने का अधिकारी है। भागवत ने कहा कि चुनाव में स्पर्धा रहती है इसलिए किसी को पीछा रहने का काम होता है। लेकिन इसमें भी मर्यादा है। असत्य का उपयोग नहीं करना चाहिए। संसद में बैठकर सहमित बनाकर चलाने के लिए चुनाव होते हैं। चित्त अलग-अलग होने के बाद भी साथ ही चलना है। सबका चित्त एक जैसा नहीं हो सकता इसलिए बहुमत का प्रयोग किया जाता है। सिक्के के दोनों पहलू होते हैं इसीलिए संसद में सत्ता और प्रतिपक्ष की व्यवस्था है। भागवत ने कहा, प्रचार के दौरान मर्यादा का ध्यान नहीं रखा गया। यह भी नहीं सोचा गया कि इससे समाज में मनमुटाव पैदा हो सकता है। बिना कारण संघ को भी इसमें खींचा गया। तकनीक का सहारा लेकर असत्य बातों को प्रसारित किया गया। क्या विद्या और विज्ञान का यही उपयोग है। ऐसे देश कैसे चलेगा। मैं विरोधी पक्ष नहीं प्रतिपक्ष कहता हूं। उसे विरोधी नहीं मानता।उसका भी विचार होना चाहिए। चुनाव लड़ने में मर्यादा का पालन नहीं हुआ। भागवत ने कहा, सरकार बन गई। वही सरकार फिर से आ गई। 10 सालों में बहुत कुछ अच्छा हुआ। हमारे देश में आर्थिक स्थिति अच्छी हुई। सामरिक स्थिति पहले से अधिक अच्छी है। दुनियाभर में प्रतिष्ठा बढ़ी है। कला और खेल के क्षेत्र  में हम सब लोग आगे बढ़े हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हम चुनौतियों सो मुक्त हो गए हैं। अभी आवेश से मुक्त होकर आगे वाली बातों का विचार करना है। मणिपुर पर भी बोले मोहन भागवत मणिपुर को लेकर मोहन भागवत ने कहा कि देश में शांति की जरूरत है। एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है। उससे पहले 10 साल एकदम शांत रहा। लेकिन फिर ऐसा लगा कि पुराना जन कल्चर समाप्त हो गया। अचानक वहां उपजी या उपजाई गई कलह अब तक चल रही है। उसका ध्यान कौन देगा। प्राथमिकता देकर उसपर विचार करना चाहिए।    

लोकसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों ने मर्यादा नहीं रखी, चुनाव प्रचार पर मोहन भागवत की नसीहत

नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने चुनाव के दौरान होने वाली बयानबाजी को लेकर बड़ी बात कही है। उन्होंने कहा कि हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों ने मर्यादा नहीं रखी। नागपुर में हुए आरएसएस के कार्यक्र में उन्होंने कहा, असली जनसेवक वही है जो अहंकार नहीं दिखाता और सार्वजनिक जीवन में काम करते हुए भी मर्यादा बनाए रखता है। उन्होंने कहा, चुनाव संपन्न हो गए, परिणाम और सरकार भी बन गई लेकिन उसकी चर्चा अभी तक चल रही है। जो हुआ वह क्यों हुआ। उन्होंने कहा, यह अपने प्रजातांत्रिक देश में पांच वर्ष में होने वाली घटना है जो कि होती है। देश के  संचालन के लिए यह महत्वपूर्ण है। लेकिन हम यही चर्चा करते रहें इतना महत्वपूर्ण नहीं है। समाज ने अपना मत दे दिया और उसके अनुसार अब काम हो रहा है। संघ के लोग इसमें नहीं पड़ते। हम अपना कर्तव्य करते रहते हैं। संघ प्रमुख ने कहा, जो वास्तविक सेवक है उसकी एक मर्यादा रहती है। काम करते सब लोग हैं लेकिन कार्य करते समय वह मर्यादा का पालन भी करता है। जैसा तथागत ने भी बताया है कि कुशलस्य उपसंपदा। शरीर को भूखा नहीं रखना है लेकिन कौशल पूर्वक जीविका कमानी है। इससे दूसरों को धक्का नहीं लगना चाहिए। यह मर्यादा निहित है। इसी तरह की मर्यादा के साथ हम लोग काम करते हैं। काम करने वाला मर्यादा का ध्यान रखता है। जो मर्यादा का पालन करता है उसमें अहंकार नहीं आता और  वही सेवक कहलाने का अधिकारी है। भागवत ने कहा कि चुनाव में स्पर्धा रहती है इसलिए किसी को पीछा रहने का काम होता है। लेकिन इसमें भी मर्यादा है। असत्य का उपयोग नहीं करना चाहिए। संसद में बैठकर सहमित बनाकर चलाने के लिए चुनाव होते हैं। चित्त अलग-अलग होने के बाद भी साथ ही चलना है। सबका चित्त एक जैसा नहीं हो सकता इसलिए बहुमत का प्रयोग किया जाता है। सिक्के के दोनों पहलू होते हैं इसीलिए संसद में सत्ता और प्रतिपक्ष की व्यवस्था है। भागवत ने कहा, प्रचार के दौरान मर्यादा का ध्यान नहीं रखा गया। यह भी नहीं सोचा गया कि इससे समाज में मनमुटाव पैदा हो सकता है। बिना कारण संघ को भी इसमें खींचा गया। तकनीक का सहारा लेकर असत्य बातों को प्रसारित किया गया। क्या विद्या और विज्ञान का यही उपयोग है। ऐसे देश कैसे चलेगा। मैं विरोधी पक्ष नहीं प्रतिपक्ष कहता हूं। उसे विरोधी नहीं मानता।उसका भी विचार होना चाहिए। चुनाव लड़ने में मर्यादा का पालन नहीं हुआ। भागवत ने कहा, सरकार बन गई। वही सरकार फिर से आ गई। 10 सालों में बहुत कुछ अच्छा हुआ। हमारे देश में आर्थिक स्थिति अच्छी हुई। सामरिक स्थिति पहले से अधिक अच्छी है। दुनियाभर में प्रतिष्ठा बढ़ी है। कला और खेल के क्षेत्र  में हम सब लोग आगे बढ़े हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हम चुनौतियों सो मुक्त हो गए हैं। अभी आवेश से मुक्त होकर आगे वाली बातों का विचार करना है। मणिपुर पर भी बोले मोहन भागवत मणिपुर को लेकर मोहन भागवत ने कहा कि देश में शांति की जरूरत है। एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है। उससे पहले 10 साल एकदम शांत रहा। लेकिन फिर ऐसा लगा कि पुराना जन कल्चर समाप्त हो गया। अचानक वहां उपजी या उपजाई गई कलह अब तक चल रही है। उसका ध्यान कौन देगा। प्राथमिकता देकर उसपर विचार करना चाहिए।

‘शांति के पथ से लड़खड़ा रहा मणिपुर ‘, मोहन भागवत बोले

 नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को संघर्षग्रस्त पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर की स्थिति पर चिंता जताई। मणिपुर पिछले साल तीन मई से बड़े पैमाने पर अशांति से प्रभावित है। मोहन भागवत ने नागपुर में आरएसएस प्रशिक्षुओं (ट्रेनी) के एक समूह को संबोधित करते हुए कहा, “मणिपुर एक साल से शांति का इंतजार कर रहा है। हिंसा को रोकना होगा और इसे प्राथमिकता देनी होगी।” मणिपुर हिंसा पर मोहन भागवत की टिप्पणी लोकसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के छह दिन बाद आई है। उन्होंने देश में हाल के चुनावों के दौरान गलत बयानबाजी के लिए आधुनिक प्रौद्योगिकी के दुरुपयोग पर भी अपनी नाराजगी व्यक्त की। मोहन भागवत ने विपक्ष का नाम लिए बगैर संविधान में बदलाव और पिछड़ी जाति के समुदायों के लिए आरक्षण खत्म करने के विपक्ष के आरोपों का जिक्र किया। उन्होंने आगे कहा, “हमने कई क्षेत्रों में प्रगति की है जैसे- अर्थव्यवस्था, रक्षा, खेल, संस्कृति, प्रौद्योगिकी आदि। इसका मतलब यह नहीं है कि हमने सभी चुनौतियों पर काबू पा लिया है। चुनावी अभियान के दौरान ‘शालीनता और मर्यादा’ का अभाव था, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।” उन्होंने उम्मीद जताई की कि संसद में सौहार्दपूर्ण माहौल रहेगा। कम्पटीशन की संभावना है, लेकिन इसे युद्ध में नहीं बदलना चाहिए। आरएसएस प्रमुख ने यह भी कहा कि चुनाव आम सहमति बनाने की एक प्रक्रिया है। मोहन भागवत ने कहा कि संसद के दो पक्ष हैं, इसलिए किसी भी सवाल के दोनों पहलुओं पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने बीते दस सालों में सरकार की भूमिका की भी सराहना की। साथ ही कहा कि भारत ने आर्थिक मोर्चे, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और शिक्षा के क्षेत्र में सफलता हासिल की है। भारत ने हर चुनौती को स्वीकार किया है और कठिनाइयों पर विजय प्राप्त की है। अब चुनाव खत्म हो चुके हैं, इसलिए ध्यान देश के सामने मौजूदा चुनौतियों की तरफ होना चाहिए और उन पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। आरएसएस प्रमुख ने देश के लोगों से पारिवारिक मूल्यों को बनाए रखने का आह्वान किया।

मणिपुर एक साल से देख रहा शांति की राह, प्राथमिकता से हल करना होगा विवाद: मोहन भागवत

नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने मणिपुर की हिंसा और चुनाव को लेकर बड़ी बातें कही हैं। मणिपुर को लेकर भागवत ने कहा देश में शांति  चाहिए। जगह-जगह और समाज में कलह नहीं चलता। एक साल से मणिपुर शांति की राह देख रहा है। उससे पहले 10 साल शांत रहा। पुराना जन कल्चर समाप्त हो गया, ऐसा लगा। अचानक जो कलह वहां उपजी या उपजाई गई उसकी आग में अभी तक चल रहा है। त्राहि त्राहि कर रहा है। उसका ध्यान कौन देगा। प्राथमिकता देकर उसपर विचार करना कर्तव्य है। उन्होंने कहा, भले घर की महिला शराब पीकर कार चलाती है और लोगों को रौंद देती है। तो हमारी संस्कृति कहां है। संस्कृति के वाहक हम लोग उसकी परवार करेंगे तभी सामंजस्य बना रहेगा। इसलिए जो संस्कृति हमें सिखाती है उसे आगे की पीढ़ी तक पहुंचने का प्रश्न खड़ा हो गया है। जिन्होंने उसको त्याग दिया वे खुश नहीं हैं। चुनाव को लेकर क्या बोले भागवत मोहन भागवत ने चुनाव को लेकर कहा कि यह एक सहमित बनाने की प्रक्रिया है। संसद में किसी भी प्रश्न के दोनों पहलू सामने आए इसलिए ऐसी व्यवस्था की गई है। चुनाव प्रचार में जिस प्रकार एक दूसरे को लताड़ना, तकनीक का दुरुपयोग, असत्य का प्रसारित किया जाता है, वह ठीक नहीं है। विरोधी की जगह प्रतिपक्षा कहना उचित होगा। चुनाव के आवेश से मुक्त होकर देश के सामने उपस्थित समस्याओं पर विचार करना होगा। प्रचार में इस बात का भी ध्यान नहीं रखा गया कि ऐसा करने पर समाज में मनमुटाव बढ़ सकता है। संघ को भी उसमें घसीटा गया। तकनीक का भी दुरुपयोग किया गया। आधुनिक तकनीक का उपयोग असत्य परोसने के लिए किया गया। ऐसे देश कैसे चलेगा। आखिरकार सबको देश ही चलाना है। लोग विरोधी पक्ष कहते हैं, मैं प्रतिपक्ष कहता हूं। उसका भी विचार होना चाहिए। चुनाव लड़ने में मर्यादा होती है जिसका पालन नहीं हुआ। देश के सामने चुनौतियां समाप्त नहीं हुई। वही सरकार फिर से आई। पिछले 10 सालों में बहुत कुछ अच्छा हुआ। दुनिया जिस आधार पर आर्थिक स्थिति का मापन करती है. उसके हिसाब से आर्थिक स्थिति सुधरी है। दुनियाभर में देश की प्रतिष्ठा बढ़ी है। कला और संस्कृति के क्षेत्र में हम आगे बढ़ रहे हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम चुनौतियों से मुक्त हो गए हैं। अभी चुनाव के आवेश से मुक्त होकर आने वाली बातों का विचार करना है।

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