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पश्चिम बंगाल चुनाव: TMC ने पूरी ताकत झोंकी, भवानीपुर से चुनाव लड़ेंगी ममता बनर्जी

कोलकाता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी भवानीपुर से विधानसभा चुनाव लड़ेंगी। ममता बनर्जी ने मंगलवार को प्रेस कांफ्रेंस के दौरान विधानसभा चुनाव के लिए सभी 294 प्रत्याशियों की लिस्ट जारी कर दी। टीएमसी द्वारा जारी इस लिस्ट में ममता बनर्जी समेत पश्चिम बंगाल के कई दिग्गज टीएमसी नेताओं के नाम शामिल हैं, जिन्हें उम्मीदवार बनाया गया है। बता दें कि सीएम ममता बनर्जी भवानीपुर विधानसभा सीट से भाजपा नेता सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरेंगी। वहीं, हाल ही में टीएमसी में शामिल हुए पवित्र कर को नंदीग्राम से टिकट दिया गया है, जहां उनका भी मुकाबला सुवेंदु अधिकारी से होगा। भाजपा ने सुवेंदु अधिकारी को नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों विधानसभा सीटों से टिकट दिया है। इसके साथ ही सुजापुर सीट से सबीना यास्मीन, जंगीपुर सीट से जाकिर हुसैन, सागरदिघी सीट से बायरन बिस्वास, दिनहाटा सीट से उदयन गुहा चुनाव लड़ेंगे। वहीं, सिलीगुड़ी सीट से गौतम देव चुनाव मैदान में उतरे हैं। खगराम सीट से आशीष मारजीत चुनाव लड़ेंगे। करीमपुर सीट से सोहम चक्रवर्ती चुनाव लड़ेंगे। कंडी सीट से अपूर्व सरकार चुनाव लड़ेंगे। सिताई सीट से संगीता रॉय बसुनिया चुनाव लड़ेंगी। कृष्णानगर उत्तर सीट से अभिनव भट्टाचार्य चुनाव लड़ेंगे। नवद्वीप सीट से पुण्डरीकाक्ष साहा चुनाव लड़ेंगे। वहीं, हरिन्घाटा सीट से राजीव विश्वास चुनाव लड़ेंगे। स्वरूपनगर सीट से बीना मंडल चुनाव लड़ेंगी। राजगंज सीट से सपना बर्मन चुनाव लड़ेंगी। हबरा सीट से ज्योतिप्रिया मल्लिक चुनाव लड़ेंगे। कृष्णानगर नगर दक्षिण सीट से उज्जवल विश्वास चुनाव लड़ेंगे। राणाघाट दक्षिण सीट से सौगत कुमार बर्मन चुनाव लड़ेंगे। कल्याणी सीट से अतींद्रनाथ मंडल चुनाव लड़ेंगे। इससे पहले, सोमवार को भाजपा ने 144 उम्मीदवारों की पहली लिस्ट जारी की थी, जिसमें सुवेंदु अधिकारी समेत कई दिग्गज नेताओं के नाम शामिल थे। वहीं, वाम दल ने भी अपनी लिस्ट जारी की थी। बता दें कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव दो चरणों में होंगे, पहले चरण के लिए 23 अप्रैल और दूसरे चरण के लिए 29 अप्रैल को मतदान होगा। वहीं, वोटों की गिनती 4 मई को होगी।

चुनावी सरगर्मी तेज, शुभेंदु अधिकारी के खास सहयोगी ने बदला पाला, TMC में शामिल

कोलकाता पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक अहम घटनाक्रम सामने आया है, जहां शुभेंदु अधिकारी के पूर्व वफादार माने जाने वाले नेता ने मंगलवार को तृणमूल कांग्रेस में वापसी कर ली। यह नेता पबित्र कर हैं, जो पूर्व में नंदीग्राम-2 ब्लॉक के बोयाल-1 ग्राम पंचायत के प्रधान थे। उन्होंने बीजेपी छोड़कर टीएमसी की सदस्यता ग्रहण की और यह घटना पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की मौजूदगी में हुई। TMC ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि पबित्र बीजेपी की जन-विरोधी नीतियों से असंतुष्ट होकर वापस लौटे हैं। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब राज्य में आगामी विधानसभा चुनावों की तैयारियां जोरों पर हैं और टीएमसी जल्द ही अपनी उम्मीदवारों की सूची घोषित करने वाली है। राजनीतिक हलकों में इस घटना को काफी महत्व दिया जा रहा है, क्योंकि नंदीग्राम सीट पहले से ही विवादास्पद और चर्चित बनी हुई है। पबित्र कर का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। नवंबर 2020 में उन्होंने टीएमसी छोड़कर बीजेपी का दामन थामा था। BJP में शामिल होने के बाद उन्होंने बोयाल-1 क्षेत्र में पार्टी की संगठनात्मक संरचना को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई। 2021 के विधानसभा चुनाव में उनकी मेहनत का असर दिखा, जब बीजेपी को इस इलाके में बढ़त मिली। उसी चुनाव में सुवेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को महज 1,900 से थोड़े अधिक वोटों के अंतर से नंदीग्राम सीट पर हराया था, जिसने पूरे राज्य की सियासत को हिला दिया था। पबित्र को सुवेंदु अधिकारी के करीबी सहयोगी के रूप में जाना जाता था, इसलिए उनकी टीएमसी में वापसी को एक बड़ा राजनीतिक उलटफेर माना जा रहा है। यह कदम बीजेपी के लिए नंदीग्राम जैसे संवेदनशील क्षेत्र में झटका साबित हो सकता है। TMC का झंडा लहराने वाली तस्वीर अभिषेक बनर्जी के हाथों से टीएमसी का झंडा थामते हुए पबित्र कर की तस्वीरें वायरल हो गई हैं। यह घटना उम्मीदवारों की सूची घोषणा से महज कुछ घंटे पहले हुई, जिसने राजनीतिक गलियारों में जोरदार अटकलों को जन्म दिया है। कई विश्लेषकों और नेताओं का मानना है कि टीएमसी पबित्र कर को नंदीग्राम से सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ मैदान में उतार सकती है। अगर ऐसा होता है तो यह चुनावी मुकाबला और भी रोमांचक हो जाएगा, क्योंकि दोनों नेताओं के बीच पहले से व्यक्तिगत और राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता रही है। नंदीग्राम 2021 में ममता बनर्जी की हार का प्रतीक बन चुका है और टीएमसी इसे वापस जीतकर अपनी ताकत दिखाना चाहती है। इस संभावित टक्कर से स्थानीय स्तर पर मतदाताओं की राय भी प्रभावित हो सकती है। यह घटनाक्रम बंगाल की सियासत में बदलते समीकरणों को दर्शाता है। जहां एक तरफ बीजेपी अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश में जुटी है, वहीं टीएमसी पुराने नेताओं को वापस लाकर व नए चेहरों को मौका देकर अपनी स्थिति को और सुदृढ़ करना चाहती है। पबित्र कर की वापसी न केवल नंदीग्राम बल्कि पूर्व मेदिनीपुर जिले के अन्य हिस्सों में भी टीएमसी के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। आने वाले दिनों में जब TMC की उम्मीदवार सूची जारी होगी तो इस अटकल का जवाब मिल जाएगा। फिलहाल यह कदम बंगाल की राजनीति में नया तड़का जोड़ने वाला साबित हो रहा है और सभी की निगाहें नंदीग्राम पर टिकी हुई हैं।  

अफगानिस्तान में बर्बरता बर्दाश्त नहीं– खरगे ने पाकिस्तान के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई की उठाई मांग

नई दिल्ली कांग्रेस ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल के एक अस्पताल पर पाकिस्तान के हवाई हमले की मंगलवार को निंदा की और कहा कि इस तरह की बर्बरता को विश्व स्तर पर दृढ़ता से खारिज किया जाना चाहिए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि कांग्रेस अफगानिस्तान के उन परिवारों के प्रति संवेदना प्रकट करती है जिन्होंने अपने प्रियजन को खोया है। उन्होंने ‘एक्स’ पर अपने पोस्ट में कहा, ”हम काबुल में एक अस्पताल पर पाकिस्तान द्वारा किए गए हवाई हमले के बाद जानमाल की भीषण क्षति से बहुत व्यथित हैं। इसमें लगभग 400 लोग मारे गए।” कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, ”हम मानवता के खिलाफ ऐसे कृत्यों की कड़े शब्दों में निंदा करते हैं। इस तरह की बर्बरता को विश्व स्तर पर दृढ़ता से खारिज किया जाना चाहिए और भारत को खुलकर अफगानिस्तान का समर्थन करना चाहिए।’ उन्होंने कहा, ”भारत, अफगानिस्तान के लोगों के साथ लंबे समय से मित्रता और सद्भावना का रिश्ता साझा करता है। इस कठिन क्षण में, हम अपने अफगान पड़ोसियों के साथ सहानुभूति जताते हैं और उनके राष्ट्र के लिए शांति और स्थिरता की कामना करते हैं।” काबुल में एक अस्पताल पर पाकिस्तानी हवाई हमले में 400 लोगों की मौत हो गई। अफगानिस्तान के सरकारी उप प्रवक्ता ने मंगलवार सुबह यह जानकारी दी। पाकिस्तान ने जिस अस्पताल पर हमला किया है वहां नशे के आदी लोगों का इलाज किया जाता था। अफगान सरकार के उप प्रवक्ता हमदुल्लाह फितरत ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ”सोमवार रात हुए हमले में अस्पताल का बड़ा हिस्सा तबाह हो गया है। हमले में 400 लोग मारे गए हैं, जबकि 250 लोग घायल हुए हैं।” भारत ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में एक अस्पताल पर पाकिस्तान के हमले को कायरतापूर्ण और अमानवीय कृत्य बताते हुए इसकी कड़ी निंदा की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने मंगलवार को एक बयान में कहा कि भारत सोमवार की रात काबुल के ओमिद नशा मुक्ति अस्पताल पर पाकिस्तान के बर्बर हवाई हमले की कड़ी निंदा करता है। यह हिंसा का एक कायरतापूर्ण और अमानवीय कृत्य है, जिसमें बड़ी संख्या में नागरिकों की जान चली गई। इस अस्पताल को किसी भी तरह से सैन्य लक्ष्य नहीं माना जा सकता है। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान अब इस नरसंहार को सैन्य अभियान का नाम देने की कोशिश कर रहा है। प्रवक्ता ने कहा कि पाकिस्तान द्वारा किया गया यह घृणित आक्रमण अफगानिस्तान की संप्रभुता पर एक स्पष्ट हमला है और क्षेत्रीय शांति तथा स्थिरता के लिए सीधा खतरा है। यह पाकिस्तान के लगातार लापरवाह व्यवहार और अपनी आंतरिक विफलताओं को सीमा पार हिंसा के बढ़ते हिंसक कृत्यों के माध्यम से छिपाने के बार-बार किए जाने वाले प्रयासों को दर्शाता है।

Bengal Polls 2026: TMC का बड़ा फैसला, ममता बनर्जी नंदीग्राम से नहीं लड़ेंगी चुनाव

कोलकाता बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए विपक्षी भाजपा द्वारा पहली सूची जारी करने के अगले दिन सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने भी मंगलवार को अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी। मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने अपने कालीघाट स्थित आवास से दोपहर में राज्य की कुल 294 में से 291 सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की। राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से पिछली बार की ही तरह तीन सीटें दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र की सहयोगी पार्टी (जीटीए प्रमुख अनित थापा) के लिए छोड़ी गई है, इसलिए उन पर टीएमसी ने उम्मीदवार नहीं उतारे हैं। भवानीपुर में कड़ी टक्कर उम्मीदवारों की सूची जारी करने के मौके पर तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने घोषणा की कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बार अपनी पारंपरिक सीट कोलकाता के भवानीपुर से ही चुनाव लड़ेंगी। भवानीपुर में ममता बनर्जी का मुकाबला भाजपा नेता व विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी से होगा। भाजपा ने सुवेंदु को इस बार दो विधानसभा सीटों- नंदीग्राम के अलावा भवानीपुर से उम्मीदवार बनाया है। पार्टी ने इस बार नंदीग्राम से सुवेंदु अधिकारी के खिलाफ पवित्र कर को टिकट दिया है। बताते चलें कि ममता 2021 के पिछले विधानसभा चुनाव में भवानीपुर से नहीं लड़कर नंदीग्राम सीट से चुनाव लड़ी थीं, जहां बेहद करीबी मुकाबले में उन्हें सुवेंदु से 1956 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। युवा चेहरों को मिला मौका ममता ने 2021 में अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर से पार्टी के वरिष्ठ नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय को उम्मीदवार बनाया गया था। नंदीग्राम में हार के पश्चात ममता बाद में भवानीपुर से उपचुनाव में जीत दर्ज की थीं। इधर, पार्टी द्वारा जारी सूची में सामाजिक संतुलन पर जोर दिया गया है। घोषित उम्मीदवारों में इस बार 52 महिलाएं, 78 अनुसूचित जाति, 17 अनुसूचित जनजाति और 47 मुस्लिम समुदाय के उम्मीदवार शामिल हैं। टीएमसी ने इस बार कई नए और युवा चेहरों को मौका देते हुए कई मौजूदा विधायकों व कई मंत्रियों के टिकट भी काटे हैं। साथ ही कई विधायकों का सीट भी बदल दिया गया है। बताते चलें कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस 2011 से लगातार बंगाल की सत्ता पर काबिज है। क्रिकेटर व मंत्री मनोज तिवारी का टिकट कटा है।  

बंगाल की सियासत गरमाई: ममता बनर्जी और शुभेंदु अधिकारी आमने-सामने, सीट का ऐलान

कोलकाता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और नेता विपक्ष शुभेंदु अधिकारी के बीच सीधा चुनावी मुकाबला तय हो गया है। भाजपा ने सोमवार को बंगाल में 144 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की थी। इसमें शुभेंदु अधिकारी का भी नाम था। उन्हें नंदीग्राम सीट से उतारा गया है, जहां से उन्होंने पिछली बार ममता बनर्जी को हराया था। इसके अलावा भबानीपुर से भी वह मुकाबले में उतरे हैं, जहां से फिलहाल ममता बनर्जी विधायक हैं। अब ममता बनर्जी ने भी ऐलान कर दिया है कि वह खुद भबानीपुर से ही उतरेंगी। इस तरह साफ हो गया है कि पिछली बार नंदीग्राम वाली स्थिति भबानीपुर में दोहराएगी। नंदीग्राम से ममता बनर्जी के शुभेंदु अधिकारी के मुकाबले हार जाने की काफी चर्चा हुई थी। माना जा रहा है कि इस बार भबानीपुर में हाईवोल्टेज मुकाबला देखने को मिल सकता है। ममता बनर्जी ने मंगलवार को यह भी कहा कि हम राज्य में 226 सीटें जीतकर लगातार चौथी बार सत्ता हासिल करेंगे। ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग पर भी तीखा हमला बोला है। दीदी ने कहा कि ईद से ठीक पहले बड़े-बड़े अधिकारियों के ट्रांसफर चुनाव आयोग कर रहा है। ऐसा लगता है कि बंगाल चुनाव से पहले राज्य में दंगे कराने की तैयारी है। ऐसा कुछ भी हुआ तो इसके लिए जिम्मेदार चुनाव आयोग ही रहेगा। ममता ने कहा कि भाजपा के इशारे पर चुनाव आयोग ऐसा कर रहा है। यदि राज्य में कोई भी अप्रिय घटना हुई तो उसकी जिम्मेदारी चुनाव आयोग और भाजपा की ही रहेगी। उन्होंने कहा कि पूरा खेल चुनाव आयोग भाजपा के इशारे पर कर रहा है। अच्छा तो यही होगा कि वह सीधे तौर पर भाजपा के लिए चुनाव प्रचार भी करे। इस तरह ममता बनर्जी ने संकेत दे दिए हैं कि वह चुनाव आयोग पर भी सीधे निशाना साधेंगी। पहले ही वह SIR को लेकर इलेक्शन कमिशन को टारगेट करती रही हैं। बता दें कि 2021 के विधानसभा चुनाव में भाजपा और टीएमसी के बीच हाईवोल्टेज मुकाबला हुआ था। 2021 में हाईवोल्टेज चुनाव में 77 सीटें जीती थी भाजपा यहां तक कयास लगने लगे थे कि भाजपा कहीं पहली बार सत्ता ही हासिल ना कर ले। हालांकि नतीजे आए तो भाजपा को 77 सीटें ही मिलीं। वहीं वामपंथी दलों और कांग्रेस का तो सूपड़ा ही साफ हो गया। फिर भी भाजपा के लिए यह बड़ी सफलता थी क्योंकि 2016 में उसे तीन सीटें ही मिली थीं। इस तरह 5 साल के अंदर तीन सीटों वाली पार्टी यदि 77 पर आ गई तो वह बड़ी चुनावी सफलता था। इस बार भी भाजपा टफ फाइट के मूड में नजर आ रही है और इसी क्रम में उसने करीब आधी सीटों पर उम्मीदवारों के नामों का ऐलान पहले ही कर दिया है।

जदयू को झटका: केसी त्यागी का इस्तीफा, नए सियासी सफर के संकेत

नई दिल्ली पिछले कुछ दिनों से अपनी ही पार्टी के खिलाफ बोल कर चर्चा में रहने वाले केसी त्यागी ने जनता दल यूनाइटेड से इस्तीफा दे दिया है। केसी त्यागी ने अपना इस्तीफा पत्र सोशल मीडिया पर शेयर कर साफ किया है कि वो जदयू की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे रहे हैं और आगे सदस्यता नहीं लेंगे। JDU को भेजे गए इस्तीफे में केसी त्यागी ने अपने भविष्य का प्लान भी बताया है। केसी त्यागी ने लिखा है कि 22 मार्च को वो अपने समर्थकों के साथ बैठक करेंगे। केसी त्यागी ने लिखा, ’30 अक्तूबर, 2003 को जदयू अस्तित्व में आया और समता पार्टी तथा जनता दल का विलय हुआ। उस वक्त जॉर्ज फर्नांडिस ने अध्यक्ष और मैंने महासचिव के तौर पर एक साथ काम किय। मैंने शरद यादव और नीतीश कुमार की अध्यक्षता में भी काम किया। मैं पार्टी का मुख्य प्रवक्ता और राजनीतिक सलाहकार भी रह। अब पार्टी का सदस्यता अभियान खत्म हो गया है और मैंने दोबारा पार्टी की सदस्यता नहीं ली है। नीतीश कुमार के प्रति मेरा सम्मान कभी नहीं बदलेगा।’ केसी त्यागी ने बताया है भविष्य का प्लान केसी त्यागी ने आगे लिखा, ‘मेरे कुछ राजनीतिक साथी, समर्थक और वर्करों ने 22 मार्च को एक बैठक आयोजित की है। इस बैठक में देश के राजनीतिक हालात पर चर्चा होगी। मैं जल्द ही आगे की रणनीति पर फैसला लूंगा। बता दें कि केसी त्यागी मूल रूप से उत्तर प्रदेश से आते हैं। पश्चिमी यूपी में उनके काफी समर्थक भी हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि केसी त्यागी अब उत्तर प्रदेश की राजनीति का रूख भी कर सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि केसी त्यागी की इच्छा अब यूपी की राजनीति करने की है। केसी त्यागी की गिनती जदयू के पुराने और दिग्गज नेताओं के तौर पर होती थी। केसी त्यागी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के करीबी भी माने जाते थे। वो जदयू के पक्ष में हर मंच पर मजबूती से अपनी बात भी रखते थे। इसी साल केसी त्यागी ने नीतीश कुमार को भारत रत्न दिए जाने की मांग भी उठाई थी और पीएम मोदी को खत लिखा था। हालांकि, लंबे समय से जदयू ने केसी त्यागी से दूरी बना रखी थी। इस मुद्दे पर भी जदयू ने खुद को उनसे अलग कर लिया था। केसी त्यागी ने आईपीएल में बांग्लादेशी खिलाड़ियों को हटाने के फैसला का विरोध किया था। इसके अलावा फिलिस्तीन के मुद्दे पर भी वो भारत सरकार के स्टैंड से अलग खड़े नजर आए थे। पिछले काफी समय से पार्टी केसी त्यागी को तवज्जो नहीं दे रही थी जिससे इस बात का इशारा मिल रहा था कि अब वो पार्टी में नहीं है। हालांकि, अब केसी त्यागी ने खुद जदयू से इस्तीफे का ऐलान किया है।  

पार्टी लाइन तोड़ी तो सजा तय! क्रॉस वोटिंग के बाद कांग्रेस के तीन विधायक निलंबित, सदस्यता पर तलवार

ओडिशा ओडिशा में क्रॉस वोटिंग के चलते राज्यसभा चुनाव में हारने वाली कांग्रेस ने अब बागी विधायकों पर ऐक्शन लेना शुरू कर दिया है। पार्टी ने भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार दिलीप रे के लिए वोट डालने वाले तीन विधायकों को निलंबित कर दिया है। ये विधायक हैं सनाखेमुंडी रमेश चंद्र जेना, मोहाना के दसरथी गोमांगो और कटक से विधायक सोफिया फिरदौस। इन लोगों ने सोमवार को हुए राज्यसभा चुनाव में पार्टी की हिदायत के बाद भी दिलीप रे के समर्थन में वोट दिया था। इन लोगों के निलंबन की जानकारी देते हुए ओडिशा कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘कांग्रेस को धोखा देने वालों ने देश के साथ विश्वासघात किया है।’ ओडिशा कांग्रेस के मीडिया सेल के प्रभारी अरबिंद दास ने कहा कि यह निर्णय पूरी प्रक्रिया की समीक्षा करने के बाद लिया गया है। इन लोगों ने राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के हितों के खिलाफ काम किया। वह भी तब जबकि सभी विधायकों को पहले से ही हिदायत दी गई थी। उन्होंने कहा कि अब इन लोगों की विधानसभा की सदस्यता ही खत्म कराई जाएगी। इसके लिए हम स्पीकर को जल्दी ही नोटिस देने वाले हैं। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भक्त चरण दास ने कहा कि इन लोगों से ऐसी उम्मीद नहीं थी। इन विधायकों ने पार्टी के साथ गद्दारी की है। हम तय करेंगे कि कैसे संविधान की 10वीं अनुसूची के तहत इन लोगों को विधानसभा से बाहर कराया जाए। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि इस ऐक्शन की हाईकमान ने भी सराहना की है। लीडरशिप मानती है कि इन लोगों के खिलाफ ऐक्शन लिया जाना जरूरी था। इन कांग्रेस विधायकों के अलावा मुख्य विपक्षी दल बीजेडी के भी 8 विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी। इसी के चलते विपक्ष के साझा उम्मीदवार दत्तेश्वर होता की हार हो गई। होता को बीजेडी ने उतारा था, लेकिन कांग्रेस ने भी उनके समर्थन का ऐलान किया था। माना जा रहा है कि कांग्रेस ऐसा ही ऐक्शन बिहार और हरियाणा जैसे राज्यों में भी ले सकती है। बिहार में भी विपक्षी कैंडिडेट को हार मिली है, जबकि वह एक उम्मीदवार जिताने की स्थिति में आसानी से था। हरियाणा में किसी तरह जीत पाई कांग्रेस, 9 वोट थे ज्यादा हरियाणा में किसी तरह कांग्रेस के कैंडिडेट कर्मवीर सिंह बौद्ध को जीत मिल गई। फिर भी भाजपा की रणनीति के आगे पार्टी हांफती नजर आई। यहां भी 5 विधायकों ने पार्टी से अलग रुख अपनाया और क्रॉस वोटिंग कर दी। इसके अलावा 4 वोट अवैध करार दिए गए। इस तरह 37 सीटों वाली कांग्रेस के कैंडिडेट को महज 28 वोट ही मिले। ऐसी स्थिति में कांग्रेस यह पड़ताल करने में जुटी है कि आखिर हरियाणा और बिहार में किन नेताओं ने उसके ही कैंडिडेट को वोट नहीं दिया।

उद्धव ठाकरे का बड़ा बयान: धर्मांतरण विरोधी कानून के समर्थन में, क्या हिंदुत्व ने प्रभावित किया?

मुंबई  महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा उलटफेर देखने को मिल रहा है. जो उद्धव ठाकरे पिछले कुछ सालों से ‘सेकुलर’ राजनीति के पाले में खड़े नजर आ रहे थे, वे अब फिर से अपनी पुरानी राह यानी हिंदुत्व की ओर मुड़ते दिख रहे हैं. इसका सबसे बड़ा संकेत है महाराष्ट्र धर्मांतरण विरोधी बिल को उनका समर्थन. इसे राजनीतिक ‘घर-वापसी‘ भी कहा जा रहा है। उद्धव ठाकरे की राजनीति का सफर पिछले पांच सालों में किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं रहा है. साल 2019 में जब उन्होंने दशकों पुराना बीजेपी का साथ छोड़कर कांग्रेस और शरद पवार से हाथ मिलाया, तो इसे भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा ‘यू-टर्न’ कहा गया। गठबंधन बदलने के साथ ही उद्धव पर आरोप लगने लगे कि उन्होंने सत्ता के लिए बाल ठाकरे की विचारधारा को तिलांजलि दे दी है. मुख्यमंत्री रहते हुए जब पालघर में साधुओं की हत्या हुई या सावरकर के मुद्दे पर कांग्रेस ने कड़ा रुख अपनाया, तब उद्धव की चुप्पी ने उनके कट्टर समर्थक कैडर को बेचैन कर दिया. नतीजा यह हुआ कि उनके हिंदुत्व के एजेंडे पर सवाल उठने लगे. इस दौरान मुस्लिम मतदाताओं के बीच उद्धव की स्वीकार्यता जरूर बढ़ी, लेकिन उनकी अपनी मूल पहचान धुंधली होती गई। वक्फ बिल और शिंदे का प्रहार पार्टी में टूट के बाद जब वक्फ संशोधन कानून की बात आई, तो उद्धव की पार्टी (यूबीटी) ने इसका विरोध किया. इस मौके को मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने हाथ से जाने नहीं दिया. शिंदे ने सीधा हमला बोलते हुए कहा कि उद्धव अब वही भाषा बोल रहे हैं जो ओवैसी बोलते हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि उद्धव अब ‘जनाब’ सेना बन चुके हैं। महाराष्ट्र चुनाव परिणाम और हकीकत का सामना हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों ने उद्धव ठाकरे को आईना दिखा दिया. पार्टी न केवल दो फाड़ हुई, बल्कि चुनावी मैदान में भी धराशायी हो गई. मुस्लिम वोटों के भरोसे वे अपनी पुरानी जमीन नहीं बचा सके. अब जब अस्तित्व पर संकट आया है, तो उद्धव को फिर से उसी हिंदुत्व की याद आई है जिसके दम पर शिवसेना खड़ी हुई थी. धर्मांतरण विरोधी बिल का समर्थन करना इसी ‘घर वापसी’ की कोशिश का हिस्सा है. वे यह संदेश देना चाहते हैं कि भले ही वे विपक्षी गठबंधन में हैं, लेकिन हिंदुत्व के बुनियादी मुद्दों पर समझौता नहीं करेंगे। क्या है महाराष्ट्र धर्मांतरण विरोधी बिल और इसकी बारीकियां? महाराष्ट्र की देवेंद्र फडणवीस सरकार जिस धर्मांतरण विरोधी कानून को लाने की तैयारी में है, वह केवल एक कानून नहीं बल्कि देश में एक बड़ी बहस और विवाद भी है. इस बिल के जरिए सरकार राज्य में जबरन या लालच देकर कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन पर लगाम लगाना चाहती है। -बिल में अवैध धर्मांतरण की परिभाषा लंबी-चौड़ी है. जबरदस्ती. लालच. धोखा. भ्रम. प्रलोभन. गलत बयानी. दबाव. या किसी की मजबूरी का फायदा उठाना. नाबालिगों का मामला भी शामिल है। -अगर कोई शादी के जरिए धर्म बदलवाता है तो वह शादी भी रद्द मानी जाएगी. बच्चे का धर्म भी तय करने का प्रावधान है. अगर शादी अवैध तरीके से हुई तो बच्चे का धर्म मां या बाप के मूल धर्म के हिसाब से होगा। -कोई धर्म बदलना चाहे तो 60 दिन पहले जिला अधिकारी को सूचना देनी होगी. पुलिस खुद से भी कार्रवाई कर सकती है. एफआईआर कोई भी रिश्तेदार दे सकता है. मां बाप भाई बहन या खून का रिश्ता रखने वाला। -सबूत का बोझ उल्टा है. आरोपी को साबित करना होगा कि धर्मांतरण वैध था. पीड़ित को नहीं। -सजा भी भारी है. अवैध धर्मांतरण पर सात साल जेल और एक लाख रुपए जुर्माना. सामूहिक धर्मांतरण पर सात साल जेल और पांच लाख जुर्माना. दोबारा अपराध पर दस साल तक जेल हो सकती है। महाराष्ट्र सरकार का टारगेटः देवेंद्र फडणवीस और बीजेपी इस बिल के जरिए अपने कोर हिंदू वोट बैंक को यह भरोसा दिलाना चाहते हैं कि वे उनकी संस्कृति और अधिकारों के रक्षक हैं. साथ ही, इस बिल पर उद्धव ठाकरे का समर्थन हासिल करना बीजेपी की एक बड़ी रणनीतिक जीत है. इससे विपक्ष की एकजुटता में दरार भी दिखती है और उद्धव की मजबूरी भी उजागर होती है। भारत के अन्य राज्यों में क्या है धर्मांतरण विरोधी कानून की स्थिति धर्मांतरण विरोधी कानून बनाने वाला महाराष्ट्र पहला राज्य नहीं है. अब तक भारत के लगभग 10-12 राज्यों में इस तरह के कानून लागू हैं या प्रक्रिया में हैं. इनमें से ज्यादातर बीजेपी शासित राज्य हैं: उत्तर प्रदेश: यहां सबसे पहले और सबसे कड़ा कानून लाया गया. उत्तराखंड: यहां भी सख्त प्रावधान लागू हैं. मध्य प्रदेश और गुजरात: इन राज्यों ने भी अपने पुराने कानूनों को और कड़ा किया है. कर्नाटक (पिछली सरकार में) और हरियाणा: यहां भी कानून पारित किए गए हैं. उद्धव ठाकरे का इस बिल को समर्थन देना सत्ता से दोबारा करीबी बनाने की एक छटपटाहट भी हो सकती है और अपनी खोई हुई साख को बचाने का आखिरी दांव भी. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या जनता इस ‘सुविधाजनक हिंदुत्व’ पर दोबारा भरोसा करेगी? महाराष्ट्र की राजनीति अब उस मोड़ पर है जहां विचारधारा और सत्ता की भूख के बीच की लकीर बहुत पतली हो गई है. क्या उद्धव फिर से शेर की तरह दहाड़ पाएंगे या यह केवल एक चुनावी पैंतरेबाजी बनकर रह जाएगी?

राज्यसभा चुनाव परिणाम: NDA-22, कांग्रेस-6, जानिए किसे मिला लाभ और किसे हुआ नुकसान

 नई दिल्ली बिहार, हरियाणा और ओडिशा की 11 राज्यसभा सीटों पर सोमवार को चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए के आगे विपक्षी की सारी कोशिश बेकार साबित हुईं. बीजेपी ने ऐसी रणनीति बनाई कि बिहार में आरजेडी नेता तेजस्वी यादव का असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के साथ हाथ मिलान भी काम नहीं आ सका तो ओडिशा में कांग्रेस और बीजेडी की जोड़ी भी कोई कमाल नहीं कर सकी। तीन राज्यों की 11 राज्यसभा सीटों में से एनडीए ने 9 सीटों पर जीत दर्ज की है जबकि विपक्ष को सिर्फ दो राज्यसभा सीटें ही मिल सकी है. बीजेपी ने 5 सीटें जीती हैं और उसके सहयोगियों को 4 सीट मिली है. कांग्रेस और बीजेडी एक-एक राज्यसभा सीटें जीत सकती है. राज्यसभा के ये नतीजे सोमवार को हुए चुनाव के है, लेकिन फाइनल आंकड़ा अलग है। देश के 10 राज्यों की कुल 37 राज्यसभा सीटों पर चुनाव हुए हैं, जिसमें सात राज्यों के 26 राज्यसभा सदस्य पहले ही निर्विरोध निर्वाचित चुन लिए गए थे. तीन राज्यों की 11 सीटों पर सोमवार को चुनाव हुए और उसके बाद नतीजे आए हैं. इस तरह से 37 राज्यसभा सीटों के चुनाव का फाइनल नतीजे देखें तो बीजेपी के अगुवाई वाले एनडीए ने 22 सीटें जीती हैं तो विपक्ष के खाते में 15 सीटें आईं हैं। 37 राज्यसभा सीटों का फाइनल नतीजा अप्रैल-2026 में खाली होने वाली 37 राज्यसभा सीटों के लिए चुनाव हो गए हैं और अब फाइनल नतीजे भी आ गए. 37 राज्यसभा सीटों में 26 सीटें पर पहले ही निर्विरोध सदस्यों का चुन लिया गया था, जिसमें एनडीए और विपक्ष को 13-13 सीटें मिली थी. अब सोमवार को हरियाणा, बिहार और ओडिशा की 11 राज्यसभा सीटों पर सोमवार को चुनाव हुए, जिसमें एनडीए 9 और विपक्ष दो सीटें जीती है. इस तरह से चुनाव का फाइनल स्कोर देखें तो एनडीए को 22 सीटें मिली है जबकि विपक्ष के हिस्सा में 15 सीट ही आ सकी हैं। राज्यसभा चुनाव में एनडीए को मिली 22 सीटों में देखें तो 13 सीटें बीजेपी ने जीती हैं जबकि 9 सीटें उसके सहयोगी ने जीती हैं. जेडीयू ने 2, शिंद की शिवसेना एक, अजित पवार की एनसीपी एक, पीएमके एक, AIADMK एक, यूपीपीएल एक, आरएलएसएम एक और एक सीट पर बीजेपी के समर्पित निर्दलीय उम्मीदवार ने जीती है। वहीं, विपक्ष को मिली 15 राज्यशभा सीटों के पार्टी के लिहाज से देखें तो कांग्रेस को 6 सीटें टीएमसी को 4 सीटें, डीएमके को 3 सीटें, शरद पवार की एनसीपी को एक सीटें और एक सीट बीजेडी को मिली है। राज्यसभा में किसे नफा और किसे नुकसान राज्यसभा चुनाव पहले और नतीजे आने के बाद देखते हैं तो एनडीए को 10 सीटों का फायदा हुआ और विपक्ष को 10 सीटों का नुकसान. चुनाव से पहले एनडीए के पास 12 राज्यसभा सीटें थी, लेकिन अब बढ़कर 22 हो गई हैं जबकि विपक्ष के पास 25 राज्यसभा सीटें थी, जो अब घटकर के 15 रह गई हैं। देश के 10 राज्यों की 37 राज्यसभा सीटों के आंकड़े देखें तो बीजेपी के पास 9 सीटें थी, जो अब बढ़कर 13 हो गई हैं. जेडीयू ने अपनी दोनो सीटों को बरकरार रखा है.  इसके अलावा AIADMK, ने अपनी एक सीट, पीएमके ने भी अपनी एक सीट तो आरएलएसएम ने अपनी-अपनी एक-एक सीट को बचाए रखा है। वहीं, विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक की बात करें तो 18 राज्यसभा सीटें उसके कब्जे में थी, जिसमें से 4 सीटें कांग्रेस के पास थी, जो बढ़कर अब 6 हो गई हैं. इस तरह कांग्रेस को दो सीटों का फायदा मिला है. टीएमसी ने अपनी 4 सीटें बरकार रखी हैं. डीएमके 4 सीटों से घटकर 3 पर रह गई है। आरजेडी के पास 2 सीटें थी, जो अब घटकर जीरो हो गई है. एक सीट शिवसेना (यूबीटी) और एक सीट सीपीआईएम के पास थी, लेकिन उन्हें एक सीट भी नहीं मिली. इसके चार सीटें अन्य दलों के पास थी, जिसमें दो सीटें बीजेडी के पास थी, जिसमें से एक सीट ही उसे मिल सकी. बीआरएस ने अपनी एकलौती सीट भी गंवा दी। राज्यवार राज्यसभा चुनाव के नतीजे क्या रहे? महाराष्ट्र से 7 राज्यसभा सीटों में बीजेपी को चार, एनसीपी और शिवसेना को एक-एक सीट मिली है. इसके अलावा एक सीट पर विपक्ष से शरद पवार चुने गए हैं.  बीजेपी को दो सीट का फायदा तो कांग्रेस, शिवसेना (यूबीटी) और शरद पवार की एनसीपी को एक सीट का घाटा हुआ. अजित पवार और शिंदे को एक-एक सीट का लाभ मिला। तमिलनाडु की  छह राज्यसभा सीटों पर चुनाव में डीएमके को एक सीट का नुकसान तो कांग्रेस को एक सीट का लाभ मिला है. AIADMK और पीएमके अपनी एक-एक सीट बचाने में कामयाब रहीं. पश्चिम बंगाल की 5 राज्यसभा सीटों में टीएमसी अपनी चार सीटें बचाए रखा तो बीजेपी को एक सीट का लाभ और लेफ्ट को नुकसान हुआ। बिहार की पांच राज्यसभ सीटों में जेडीयू ने अपनी दोनों सीटें बचाए रखा तो आरजेडी को 2 सीट का नुकसान. बीजेपी को दो सीट का लाभ हुआ तो उपेंद्र कुशवाहा अपनी सीट बचा लिया है.  ओडिशा की चार राज्यसभा सीटों में बीजेपी अपनी दोनों सीटें बचाए रख लिया तो बीजेडी को एक सीट का नुकसान हुआ है.  इसके अलावा एक सीट बीजेपी ने अपने समर्थन से निर्दलीय को जिता लिया. असम की तीन राज्यसभा सीटों में बीजेपी अपनी दोनों सीटें बचा ली है तो असम गढ़ परिषद के पास एक सीट का नुकसान हुआ। छत्तीसगढ़ में बीजेपी को एक सीट का फायदा तो कांग्रेस को एक सीट का नुकसान हुआ. तेलंगाना की दोनों सीटें कांग्रेस जीत ली है, उसे एक सीट का लाभ मिला है तो बीआरएस को एक सीट का नुकसान. हरियाणा की दो सीटों में बीजेपी और कांग्रेस एक-एक सीट जीती हैं, लेकि बीजेपी को एक सीट का नुकसान हुआ है.  हिमाचल में कांग्रेस को एक सीट का लाभ मिला तो बीजेपी को नुकसान। 

बारामती उपचुनाव में सुप्रिया सुले का बड़ा कदम, सुनेत्रा पवार को दिया वॉकओवर, भाभी के खिलाफ नहीं उतरे उम्मीदवार

मुंबई  राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने कहाकि उनकी पार्टी आगामी बारामती विधानसभा उपचुनाव में डिप्टी सीएम और राकांपा नेता सुनेत्रा पवार के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगी। निर्वाचन आयोग ने रविवार को घोषणा की कि पुणे के बारामती और अहिल्यानगर के राहुरी में उपचुनाव 23 अप्रैल को होंगे। बारामती और राहुरी उपचुनाव क्रमश: पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक शिवाजी कर्डिले के निधन के कारण जरूरी हो गए हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की अध्यक्ष सुनेत्रा पवार के बारामती से उपचुनाव लड़ने की संभावना है। चुनाव पर क्या कहा सुले ने दिल्ली में पत्रकारों से कहाकि मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि राकांपा (शप) बारामती उपचुनाव नहीं लड़ेगी। हम सुनेत्रा वहिनी (भाभी) के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारेंगे। राहुरी सीट के संबंध में (विपक्षी) महा विकास आघाडी (एमवीए) के सहयोगी इस सीट पर विचार-विमर्श करेंगे और अगले कुछ दिनों में निर्णय लिया जाएगा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने रविवार को कहा था कि बारामती और राहुरी विधानसभा सीट पर उपचुनाव आम सहमति से निर्विरोध कराए जाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर मुकाबला होता है तो भाजपा इसके लिए तैयार है। साल 2024 के आम चुनावों में राकांपा (शप) प्रमुख शरद पवार की बेटी सुले ने अपने चचेरे भाई अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार को हराकर बारामती लोकसभा सीट बरकरार रखी थी, जो पहली बार चुनाव लड़ रही थीं। बाद में सुनेत्रा पवार राज्यसभा सदस्य चुनी गईं। इस साल 28 जनवरी को पुणे जिले के बारामती हवाई पट्टी के पास एक विमान दुर्घटना में उनके पति अजित पवार और चार अन्य लोगों की मौत हो गई, जिसके बाद उन्हें उपमुख्यमंत्री और राकांपा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। अजित पवार की मौत की हो जांच अजित पवार के विमान दुर्घटना की जांच के संबंध में सुले ने कहाकि वे इस मामले में पारदर्शी जांच की मांग कर रहे हैं। पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच एलपीजी की स्थिति के बारे में सुले ने कहा कि केंद्र को एक सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए और सभी को विश्वास में लेना चाहिए। उन्होंने कहाकि होटल उद्योग सहित व्यवसायों को भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बारामती की सांसद ने इस मुद्दे पर संसद में चर्चा की भी मांग की। सुले ने कहाकि मुझे आश्चर्य हो रहा है कि राज्य और केंद्र सरकार एलपीजी संकट को स्वीकार क्यों नहीं कर रही हैं। इसे दबाने की कोशिशें क्यों की जा रही हैं? इस संकट से निपटने के लिए एक व्यापक कार्य योजना तैयार की जानी चाहिए।

तीन स्कीम, तीन फैक्टर और ममता का मैजिक: पश्चिम बंगाल में टीएमसी की ताकत का राज, भाजपा कहां खड़ी?

नई दिल्ली, कोलकाता पश्चिम बंगाल में चुनाव का ऐलान हो चुका है। 4 मई को नई सरकार बन जाएगी और उससे पहले 23 और 29 अप्रैल को मतदान होने वाला है। इस इलेक्शन को लेकर भाजपा काफी उत्साहित है और उसे लगता है कि वह 2021 के मुकाबले और मजबूत हो सकती है। वहीं ममता बनर्जी लगातार चौथे कार्यकाल के लिए मैदान में उतरेंगी। ममता बनर्जी को केंद्र सरकार से टकराव और तुनकमिजाजी के लिए जाना जाता है। 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान उन्होंने सघन प्रचार किया था और हाईवोल्टेज चुनाव में उन्होंने लगातार तीसरी बार विजय पाई थी। हालांकि वह खुद शुभेंदु अधिकारी के मुकाबले अपनी सीट नंदीग्राम में हार गई थीं। चुनाव की तारीखें आते ही एक ओपिनियन पोल भी सामने आया है, जिसमें ममता बनर्जी को बढ़त दिखाई गई है। अब सवाल है कि आखिर क्यों टीएमसी और ममता तीन कार्यकालों के बाद भी इतनी मजबूत हैं। इसके पीछे तीन योजनाओं और तीन फैक्टर को वजह माना जा रहा है। ये तीन योजनाएं हैं- लक्ष्मी भंडार, स्वास्थ्य साथी और युवा साथी। इनके माध्यम से ममता बनर्जी ने महिला, युवा और बुजुर्ग तीनों वर्ग साधने के प्रयास किए हैं। इसके अतिरिक्त उनकी कोशिश रही है कि SIR को एक बड़ा मुद्दा बना दें और वोटरों के खिलाफ इसे लेकर केंद्र सरकार के प्रति गुस्सा पैदा किया जाए। अब तीन फैक्टरों की बात करें तो पहला यह कि ममता बनर्जी की महिलाओं के बीच अच्छी पकड़ मानी जाती है। आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप कांड के मामले में भले ही उनकी पार्टी घेरे में आई थी, लेकिन अब भी महिलाओं का उन पर भरोसा दिखता है। इसके अतिरिक्त वह बांग्ला अस्मिता का सवाल उठाने में भी आगे रही हैं। इसके जरिए उन्होंने अकसर यह कोशिश की है कि किसी भी मामले को दिल्ली बनाम बंगाल की शक्ल दे दी जाए। इसके जरिए उन्होंने बांग्ला राष्ट्रवाद को मजबूत करने के प्रयास किए हैं। अब यदि भाजपा की बात करें तो उसके पास बांग्ला अस्मिता वाला कार्ड कमजोर पड़ जाता है। इसके अलावा उसके पास ममता बनर्जी जैसे एक बड़े चेहरे का अभाव है, जो पूरे राज्य में वोटरों को लुभा सके। हालांकि टीचर घोटाला, आरजी कर रेप और मर्डर केस जैसे मामलों ने भाजपा को कुछ मुद्दे दिए हैं। इसके अतिरिक्त बंगाल में बांग्लादेशियों की अवैध घुसपैठ हमेशा से एक बड़ा मामला रहा है। ऐसे में देखना होगा कि भाजपा इस बार अपने हाथ लगने मुद्दों को किस तरह से भुना पाती है।  

बारामती में परिवार की सियासत: सुप्रिया सुले ने सुनेत्रा पवार को दिया सीधा रास्ता

नई दिल्ली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरदचंद्र पवार) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने सोमवार को कहाकि उनकी पार्टी आगामी बारामती विधानसभा उपचुनाव में डिप्टी सीएम और राकांपा नेता सुनेत्रा पवार के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारेगी। निर्वाचन आयोग ने रविवार को घोषणा की कि पुणे के बारामती और अहिल्यानगर के राहुरी में उपचुनाव 23 अप्रैल को होंगे। बारामती और राहुरी उपचुनाव क्रमश: पूर्व उपमुख्यमंत्री अजित पवार और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक शिवाजी कर्डिले के निधन के कारण जरूरी हो गए हैं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) की अध्यक्ष सुनेत्रा पवार के बारामती से उपचुनाव लड़ने की संभावना है। चुनाव पर क्या कहा सुले ने दिल्ली में पत्रकारों से कहाकि मैंने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि राकांपा (शप) बारामती उपचुनाव नहीं लड़ेगी। हम सुनेत्रा वहिनी (भाभी) के खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारेंगे। राहुरी सीट के संबंध में (विपक्षी) महा विकास आघाडी (एमवीए) के सहयोगी इस सीट पर विचार-विमर्श करेंगे और अगले कुछ दिनों में निर्णय लिया जाएगा। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने रविवार को कहा था कि बारामती और राहुरी विधानसभा सीट पर उपचुनाव आम सहमति से निर्विरोध कराए जाने के लिए हरसंभव प्रयास किया जाएगा, लेकिन उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर मुकाबला होता है तो भाजपा इसके लिए तैयार है। साल 2024 के आम चुनावों में राकांपा (शप) प्रमुख शरद पवार की बेटी सुले ने अपने चचेरे भाई अजित पवार की पत्नी सुनेत्रा पवार को हराकर बारामती लोकसभा सीट बरकरार रखी थी, जो पहली बार चुनाव लड़ रही थीं। बाद में सुनेत्रा पवार राज्यसभा सदस्य चुनी गईं। इस साल 28 जनवरी को पुणे जिले के बारामती हवाई पट्टी के पास एक विमान दुर्घटना में उनके पति अजित पवार और चार अन्य लोगों की मौत हो गई, जिसके बाद उन्हें उपमुख्यमंत्री और राकांपा का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। अजित पवार की मौत की हो जांच अजित पवार के विमान दुर्घटना की जांच के संबंध में सुले ने कहाकि वे इस मामले में पारदर्शी जांच की मांग कर रहे हैं। पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच एलपीजी की स्थिति के बारे में सुले ने कहा कि केंद्र को एक सर्वदलीय बैठक बुलानी चाहिए और सभी को विश्वास में लेना चाहिए। उन्होंने कहाकि होटल उद्योग सहित व्यवसायों को भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बारामती की सांसद ने इस मुद्दे पर संसद में चर्चा की भी मांग की। सुले ने कहाकि मुझे आश्चर्य हो रहा है कि राज्य और केंद्र सरकार एलपीजी संकट को स्वीकार क्यों नहीं कर रही हैं। इसे दबाने की कोशिशें क्यों की जा रही हैं? इस संकट से निपटने के लिए एक व्यापक कार्य योजना तैयार की जानी चाहिए।  

पश्चिम बंगाल चुनाव में रालोजपा की तैयारी, 100 सीटों पर अकेले मैदान में उतरेगी: राजकुमार राज

कोलकाता राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के झारखंड प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार राज ने कहा कि आगामी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में अपने दम पर 100 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। राज ने बताया कि पार्टी पश्चिम बंगाल में अपने संगठन को लगातार मजबूत कर रही है और प्रदेश अध्यक्ष सोमनाथ पांडे के नेतृत्व में राज्य भर में रैली और बैठकों का आयोजन किया जा रहा है। पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में पार्टी अपने उम्मीदवार उतारेगी राज ने बताया कि इसी क्रम में 29 मार्च को बांकुरा में पार्टी की ओर से एक विशाल जनसभा आयोजित की जाएगी, जिसमें पार्टी के कई केंद्रीय नेता शामिल होंगे। उन्होंने कहा कि वह स्वयं झारखंड से सह-प्रभारी के रूप में इस कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे। राज ने कहा कि पश्चिम बंगाल में पद्म भूषण से सम्मानित स्वर्गीय रामविलास पासवान के समर्थकों की बड़ी संख्या है, जिसका लाभ पार्टी को आगामी विधानसभा चुनाव में मिलने की उम्मीद है। झारखंड से सटे पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में पार्टी अपने उम्मीदवार उतारेगी। इनमें पुरुलिया, बांकुरा, मेदिनीपुर, खड़गपुर और आसनसोल प्रमुख रूप से शामिल हैं। राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी भाजपा के साथ है राज ने आगे कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी भारतीय जनता पार्टी के साथ है, लेकिन संगठन के विस्तार और मजबूती के उद्देश्य से पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी। राज ने दावा किया कि पार्टी ने अधिकतर सीटों पर मजबूत उम्मीदवार तैयार किए हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि आगामी विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी न सिर्फ अपना खाता खोलेगी बल्कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराएगी।  

देश में पीएम मोदी की लहर, हर चुनाव में भाजपा को मिलेगा समर्थन: कंगना रनौत

शिमला एनडीए के सांसदों ने असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में होने वाले विधानसभा चुनावों में जीत का दावा किया है। उन्होंने कहा कि जनता को पता है कि कौन सी सरकार इनका विकास कर सकती है, इसीलिए एनडीए को जिताएगी। भाजपा सांसद कंगना रनौत ने चुनावी तारीखों की घोषणा के बाद कहा, “हम निश्चित रूप से जीतेंगे। सारे कार्यकर्ता इस काम में जुट गए हैं और हर जगह हम भाजपा का परचम लहराएंगे।” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में नई परियोजनाओं का उद्घाटन हो रहा है और जनता को भरोसा रखना चाहिए। महंगाई और एलपीजी संकट से संबंधित अफवाहों को गलत बताते हुए जनता से प्रधानमंत्री पर विश्वास रखने की अपील की। कंगना ने कहा कि जनता विपक्ष के बहकावे में नहीं आने वाली है। जनता को एनडीए की सरकार और प्रधानमंत्री पर विश्वास है। विपक्ष को जनता के हित में सोचना चाहिए। एलपीजी आपूर्ति को लेकर केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने कहा कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए वैकल्पिक उपाय तलाश रही है। विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि उन्हें आलोचना करने के बजाय जनता के खाने-पीने के मामलों में सहयोग देना चाहिए। सुरेश गोपी ने पश्चिम एशिया के मुद्दे के कारण उत्पन्न कठिनाई का हवाला देते हुए जनता से संयम और अच्छे नतीजों की प्रतीक्षा करने का आग्रह किया। पश्चिम बंगाल चुनाव की तैयारियों और प्रशासनिक निर्णयों पर केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने चुनाव आयोग की तारीफ की। उन्होंने कहा कि कुछ अफसर ईडी की छापेमारी में बाधा डालने का प्रयास कर रहे हैं और ऐसे अफसरों को हटाना जरूरी था। उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर आरोप लगाया कि वह प्रशासनिक पदों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हित में करती हैं। भाजपा पूरी तरह तैयार है और पश्चिम बंगाल में सरकार बनाने के लक्ष्य के प्रति आश्वस्त है। केंद्रीय मंत्री रामदास आठवले ने कहा कि भाजपा इन राज्यों में उम्मीदवार उतारेगी या समर्थन देगी और उम्मीद है कि एनडीए सत्ता में आएगा। आठवले ने असम और पुडुचेरी में पुनः जीत की उम्मीद जताई और पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु व केरल में भी अच्छे प्रदर्शन की संभावना व्यक्त की।

अनंत सिंह का राजनीति से रिटायरमेंट का ऐलान, बोले- “अब चुनाव नहीं लड़ूंगा, बच्चों को सौंपूंगा राजनीति की कमान”

पटना: बिहार में राज्यसभा चुनाव के दौरान बाहुबली नेता अनंत सिंह वोट डालने के लिए पहुंचे.  मतदान करने के बाद वो फिर से जेल लौट गए. इस दौरान उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए कई अहम बयान दिए. अनंत सिंह ने  ऐलान किया कि अब वे आगे कोई चुनाव नहीं लड़ेंगे. उन्होंने कहा कि अब उनके बच्चे ही राजनीति में आगे बढ़ेंगे और चुनाव लड़ेंगे. बताया जा रहा है कि नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की चर्चा के बाद ही अनंत सिंह ने यह फैसला लिया है. फिलहाल उनके इस बयान से बिहार की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है. अनंत सिंह ने दावा किया कि एनडीए के सभी पांचों उम्मीदवार चुनाव जीतेंगे. उन्होंने कहा कि गठबंधन मजबूत है और सभी प्रत्याशियों की जीत तय मानी जा रही है. मुख्यमंत्री पद को लेकर भी अनंत सिंह ने बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि निशांत कुमार में मुख्यमंत्री बनने के सभी गुण मौजूद हैं. हालांकि बिहार का अगला मुख्यमंत्री कौन होगा, यह फैसला बड़े नेता करेंगे. पिछले साल मिली थी धमाकेदार जीत बता दें कि पिछले साल बिहार विधानसभा चुनाव में अनंत सिंह को धमाकेदार जीत मिली थी. उन्होंने मोकामा सीट से 28,206 वोटों के अंतर से जीत हासिल की थी. अनंत सिंह ने आरजेडी की उम्मीदवार वीणा देवी को हराया था. अनंत सिंह को 91,416 वोट मिले, जबकि वीणा देवी को 63,210 वोट मिले. जेल में रहने के बावजूद अनंत सिंह ने ये चुनाव जीता था. 3 फरवरी 2026 को उन्हें जेल से पुलिस की गाड़ी में बिहार विधानसभा लाया गया. जहां उन्होंने विधायक पद की शपथ ली. शपथ लेने के बाद उन्हें फिर से जेल वापस ले जाया गया. अनंत सिंह क्यों हैं जेल में? अनंत सिंह इस समय जेल में हैं. उन पर प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी के समर्थक दुलार चंद यादव की हत्या के मामले में शामिल होने का आरोप है. 1 नवंबर 2025 को बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उन्हें गिरफ्तार किया गया था. ये गिरफ्तारी उनके समर्थकों और यादव के लोगों के बीच हुई झड़प के बाद हुई, जिसमें दुलार चंद यादव की मौत हो गई थी. पटना की एक अदालत ने उन्हें बेऊर जेल में न्यायिक हिरासत में भेज दिया. नवंबर 2025 में स्पेशल MP-MLA कोर्ट ने उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी. अब इस फैसले को पटना हाई कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी की जा रही है. अनंत सिंह का चुनावी सफर अनंत सिंह ने 2005 में जेडीयू (JD(U)) के टिकट पर मोकामा सीट से पहली बार विधायक का चुनाव जीता था. इसके बाद वह कुल 6 बार विधायक चुने जा चुके हैं. उन्होंने 2005, 2010, 2015, 2020 और 2025 में चुनाव जीता. अलग-अलग चुनावों में उन्होंने कभी किसी पार्टी के टिकट पर तो कभी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत हासिल की.     2005 – पहली बार मोकामा से विधायक बने (JDU के टिकट पर)     2010 – दूसरी बार जीत हासिल की (JDU)     2015 – तीसरी बार जीत (निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में)     2020- चौथी बार जीत (RJD के टिकट पर)     2022-आर्म्स केस में सजा के बाद उनकी सदस्यता चली गई. इस दौरान उनकी पत्नी नीलम देवी ने उपचुनाव जीतकर सीट बरकरार रखी.     2025- छठी बार मोकामा सीट से जीत (JDU). जबकि वे उस समय जेल में थे और RJD की वीणा देवी को करीब 28,206 वोटों से हराया.  

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