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हरियाणा में 17 अक्टूबर को नई सरकार का शपथ ग्रहण …

चंडीगढ़  हरियाणा की नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह 15 को नहीं 17 अक्टूबर को होगा। पंचकूला के सेक्टर 5 में नई सरकार का शपथ ग्रहण समारोह होगा। 17 अक्टूबर सुबह 10 बजे दशहरा ग्राउंड में हरियाणा कई नई सरकार शपथ ग्रहण समारोह होगा। पीएम मोदी समेत कई वरिष्ठ नेता इस शपथ समारोह में उपस्थित रहेंगे। मुख्यमंत्री के रूप में नायब सिंह सैनी एक बार फिर सीएम पद की शपथ लेंगे। 17 अक्टूबर को आयोजित भव्य शपथ ग्रहण समारोह में नायब सिंह सैनी दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने जा रहे हैं। शपथ ग्रहण समारोह पंचकूला में आयोजित किया जाएगा, जहां लगभग 50 हजार लोगों के उपस्थित रहने की संभावना है। समारोह में भाजपा शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्री भी शामिल होंगे। इसके अलावा कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के साथ-साथ पार्टी के वरिष्ठ नेता भी उपस्थित रहेंगे। जानकारी के अनुसार, हरियाणा सरकार की नई कैबिनेट में अनिल विज, कृष्ण लाल मिड्ढा, श्रुति चौधरी, अरविंद कुमार शर्मा, विपुल गोयल , निखिल मदान को जगह मिल सकती है। नायब सैनी ने की थी पीएम से मुलाकात गौरतलब है कि, नायब सिंह सैनी ने दिल्ली में बुधवार को प्रधानमंत्री मोदी समेत पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की थी। इसके बाद गुरुवार को उन्होंने राजधानी में केंद्रीय मंत्री और हरियाणा भाजपा के चुनाव प्रभारी धर्मेंद्र प्रधान से भी मुलाकात की थी। विधानसभा चुनाव के दौरान ही भाजपा की ओर से संकेत दिए गए थे कि अगली सरकार के भी मुखिया नायब सिंह सैनी बनेंगे। चुनाव से 6 महीने पहले नायब सैनी को बनाया गया था सीएम भाजपा ने मार्च 2024 में नायब सिंह सैनी को हरियाणा भाजपा अध्यक्ष पद से मुख्यमंत्री बनाया था। उस समय भाजपा मनोहर लाल के साढ़े नौ साल के कार्यकाल के बाद सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही थी। बता दें कि हरियाणा में भाजपा तीसरी बार सरकार बनाने जा रही है। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 48 सीटों पर जीत हासिल की है। वहीं, कांग्रेस 37 सीटों पर ही सिमटकर रह गई। इस चुनाव में जजपा और आम आदमी पार्टी का सफाया हो गया और इनेलो सिर्फ दो सीट जीतने में सफल रही। प्रदेश की तीन सीटें अन्य के खाते में गई हैं।

उमर अब्दुल्ला ने सरकार बनाने का दावा पेश किया, 14 अक्टूबर को शपथ समारोह

श्रीनगर नेशनल कांफ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने  शाम को श्रीनगर में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा से मुलाकात कर नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां)-कांग्रेस गठबंधन की सरकार बनाने का दावा पेश किया। अब्दुल्ला ने सिन्हा के साथ अपनी मुलाकात के दौरान गठबंधन सहयोगियों की ओर से समर्थन पत्र प्रस्तुत किया। अब्दुल्ला ने राजभवन से लौटने के बाद अपने आवास पर संवाददाताओं से कहा कि उन्होंने उपराज्यपाल से नई सरकार के शपथ ग्रहण की तारीख जल्द से जल्द तय करने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा, “मैंने उपराज्यपाल से मुलाकात कर नेकां, कांग्रेस, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, ‘आप’ और निर्दलीय उम्मीदवारों के समर्थन पत्र प्रस्तुत किए। सभी ने नेकां का समर्थन किया है। मैंने उनसे (राज्यपाल) जल्द से जल्द एक तारीख तय करने का अनुरोध किया ताकि शपथ समारोह हो सके और लोगों द्वारा चुनी गई सरकार काम करना शुरू कर सके।” उन्होंने कहा कि शपथ समारोह बुधवार को होने की संभावना है। जो लोग जम्मू कश्मीर की राजनीति को बहुत नजदीक से जानते हैं उन्हें लगता है कि केंद्र की बीजेपी सरकार और अब्दुल्ला परिवार एक दूसरे के नजदीक आ रहे हैं. दरअसल जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने जा रही नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने इन दिनों कई ऐसी बातें की हैं जो उपरोक्त बात की तस्दीक कर रही हैं. कश्मीर के सीएम बनने जा रहे उमर अब्दुल्ला ने गुरुवार को कहा कि उन्हें 4 निर्दलीयों का सपोर्ट मिल गया है और कांग्रेस से भी सपोर्ट की बातचीत चल रही है. इस एक लाइन ने तमाम राजनीतिक विश्लेषकों के कान ख़ड़ें कर दिए हैं. उन्हें लगता है कि कहीं उमर अब्दुल्ला के मन में कुछ और तो नहीं चल रहा है. क्योंकि इधर कम से 3 बार उमर ने ऐसी बातें कहीं हैं जिससे लोगों को लगा कि उन्‍हें अब कांग्रेस की खास जरूरत नहीं है. बल्कि वे बीजेपी के नजदीक जाने को आतुर दिख रहे हैं. बावजूद इसके कि उमर ने कई बार यह भी दोहराया है कि मैं किसी भी कीमत पर बीजेपी के साथ नहीं जा सकता हूं. पर बीजेपी समर्थकों के बीच इस बात की चर्चा खूब है कि नेशनल कांफ्रेंस पीडीपी से तो बेहतर ही है. बीजेपी जब पीडीपी चीफ महबूबा मुफ्ती के साथ सरकार बना सकती है तो नेशनल कॉन्फ्रेंस तो उससे बेहतर ही है. मुफ्ती तो कश्मीर को भारत से अलग करने की बात तक करती रही हैं जबकि नेशनल कांफ्रेंस तो काफी उदारवादी है. फारूक अब्‍दुल्‍ला सीना ठोककर कहते हैं क‍ि वे भारतीय हैं. यही नहीं उनके राम भजन भी बहुत लोकप्रिय हैं. आइये देखते हैं कि सोशल मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों में एनसी और बीजेपी के पास आने की क्यों चर्चा हो रही है? 1-क्या कांग्रेस से छुटकारा पाना चाहते हैं उमर? पिछले कुछ दिनों में उमर अब्दुल्ला के उन बयानों पर गौर करें जो इस तरह की कयासबाजी को जन्म दे रही हैं. उमर अब्दुल्ला ने गुरुवार को जब कहा कि उन्हें 4 निर्दलीयों का सपोर्ट मिल गया है और कांग्रेस से भी सपोर्ट की बातचीत चल रही है.तो लोगों को खटका कि आखिर कांग्रेस से सपोर्ट की बातचीत क्यों चल रही है? कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस दोनों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. इसमें सपोर्ट के लिए बातचीत जैसी बात कहां से आ गईं. यही नहीं इसके पहले भी उमर ने जैसी बातें की उससे यही लगता है कि उमर बीजेपी के नजदीक आना चाहते हैं. कुछ बानगी देखिए- -हमें केंद्र के साथ समन्वय बनाकर चलने की जरूरत है. जम्मू-कश्मीर के कई मुद्दों का समाधान केंद्र से लड़ाई करके नहीं हो सकता. चुनाव परिणाम आने के बाद अब्दुल्ला ने यह टिप्पणी की थी. -मैं यह सुनिश्चित करने का हर प्रयास करूंगा कि आने वाली सरकार एलजी और केंद्र सरकार के साथ अच्छे संबंधों के लिए काम करे. नई सरकार की प्राथमिकता जम्मू और कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल करना है, जिसके लिए वह दिल्ली में सरकार के साथ काम करेगी. -उमर अब्दुल्ला ने इंडिया टुडे को बताया था कि नेशनल कॉन्फ्रेंस ने कांग्रेस के साथ गठबंधन के बिना भी अच्छा प्रदर्शन किया होता. कांग्रेस के साथ गठबंधन हमारे लिए सीटों के बारे में नहीं था. हम बिना कांग्रेस के भी ये सीटें जीत सकते थे, सिवाय शायद एक के. -मुझे विश्वास है कि प्रधानमंत्री एक सम्माननीय व्यक्ति हैं, उन्होंने यहां चुनाव प्रचार करते समय राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा किया है. सम्माननीय गृह मंत्री ने भी यही कहा था. 2-नेशनल कॉन्फ्रेंस की क्या मजबूरी है केंद्र से मधुर रिश्ता नेशनल कांफ्रेंस जानती है कि द‍िल्‍ली की तरह ज्‍यादातर सत्‍ता उपराज्‍यपाल के हाथ में रहने वाली है. हर चीज के ल‍िए उन्‍हें एलजी के पास जाना होगा.मौजूदा हालात में नई राज्य सरकार काफी हद तक पावरलेस ही होगी. कानून व्यवस्था, सार्वजनिक व्यवस्था और पुलिस समेत तमाम मामलों के ल‍िए एलजी का फैसला आख‍िरी होगा. इससे टकराव की नौबत आने से बेहतर है कि आपसी रजामंदी से काम किया जाए. इससे भविष्य में बीजेपी के साथ आने का रास्ता भी खुला रहेगा.अगर साथ आते हैं तो केंद्र सरकार में भी नेशनल कांफ्रेंस को एक दो मंत्रालय संभालने का मौका मिल सकता है. कश्मीर के डिवलपमेंट के ल‍िए काफी पैसों की जरूरत है.यह बजट भी मौजूदा केंद्र सरकार के रहमोकरम पर ही निर्भर होगा. दूसरी बात यह भी है कि  एनसी के पास 42 सीटें हैं, लेकिन एनसी-कांग्रेस गठबंधन, 48 सीटों के साथ, जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 45 सीटों के आधे-अधूरे अंक से बस थोड़ा ऊपर है. अब उनके साथ 4 निर्दली भी हैं. फिर भी 90 विधायकों और 5 नियुक्त विधायकों को भी जोड़ लिया जाए तो बहुमत का आंकड़ा 48 तक पहुंच जाता है. इसलिए उमर सरकार कभी भी बहुत सेफ नहीं रहेगी. उसे अपनी मर्जी की करने के लिए बीजेपी के सहयोग की हमेशा जरूरत बनी रहेगी. 3-नेशनल कॉन्फ्रेंस का मधुर रिश्ता रहा एनडीए से फारूक अब्‍दुल्‍ला के बेटे उमर अब्‍दुल्‍ला अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं.यही कारण है कि जब उन्‍होंने मोदी सरकार की तारीफ की तो लोगों में संदेह बढ़ गया कि क्या वो बीजेपी की ओर जा सकते हैं?  नेशनल कांफ्रेंस एक ऐसी पार्टी रही है, ज‍िसका कांग्रेस और बीजेपी दोनों से रिश्ता रहा है.कांग्रेस के समर्थन से फारूक … Read more

असम : हर एक विधानसभा क्षेत्र को 40 हजार सदस्य बनाने का लक्ष्य रखने को कहा था

गुवाहाटी असम भाजपा अपने वर्तमान सदस्यता अभियान के तहत 60 लाख नए सदस्य बनाने के 100 प्रतिशत लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। लेटेस्ट आंकड़ों के अनुसार, असम में भाजपा की सदस्यता 58 लाख का आंकड़ा पार कर गई है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि राज्य इकाई ने हर एक विधानसभा क्षेत्र को 40 हजार सदस्य बनाने का लक्ष्य रखने को कहा था। कुल 126 विधानसभा क्षेत्रों में से 91 ने पहले ही यह लक्ष्य पूरा कर लिया है। उन्होंने कहा, “हमें पूरे असम में बेहतरीन प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं। इस त्योहारी सीजन में भी लोग हमारी पार्टी में शामिल हो रहे हैं। यह वाकई अभूतपूर्व है। केंद्रीय नेता भी हमारे प्रदर्शन से बहुत खुश हैं।” वहीं असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “असम के 91 विधानसभा क्षेत्रों में अब ‘बीजेपी सदस्यता 2024’ के तहत 40 हजार से ज्यादा सदस्य शामिल हुए हैं। बेहाली, करीमगंज उत्तर और मजबत निर्वाचन क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं को 40 हजार से ज्यादा सदस्य बनाने में उनकी कड़ी मेहनत के लिए बधाई। 58.31 लाख नए सदस्यों के साथ असम भाजपा अपने निर्धारित लक्ष्य के 100 प्रतिशत के करीब है।” राज्य में भाजपा नेता सदस्यता अभियान में 18 से 25 वर्ष की आयु के युवाओं पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। सीएम सरमा ने पहले कहा था, “हमारी पार्टी कॉलेज या विश्वविद्यालय चुनाव नहीं लड़ती है। हालांकि, उन्हें हमारी पार्टी का सदस्य बनाने में कोई रोक नहीं है। मैं ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं से अपील करता हूं कि वे भाजपा में युवाओं को शामिल करने पर जोर दें। वे भविष्य में इस देश के लिए हमारे मिशन को आगे बढ़ा सकते हैं।” इस बीच, बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष ने कहा कि असम देश में पार्टी के सदस्यता अभियान में 85 प्रतिशत लक्ष्य पूरा करके देश में सबसे आगे है।  

हरियाणा विधानसभा के चुनाव परिणाम के मायावती बोली अब कभी किसी भी दल के साथ बसपा गठबंधन नहीं करेगी

नई दिल्ली  बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अध्यक्ष मायावती ने शुक्रवार को गठबंधन को लेकर बड़ा निर्णय लिया। बसपा प्रमुख ने सोशल मीडिया पर इस बात के संकेत दिए हैं कि उनकी पार्टी अब भविष्य किसी दल के साथ गठबंधन नहीं करेंगी। उन्होंने कहा कि हरियाणा विधानसभा के चुनाव परिणाम और इससे पहले पंजाब चुनाव के कड़वे अनुभव के मद्देनजर क्षेत्रीय पार्टियों से भी अब आगे गठबंधन नहीं होगा। जबकि, एनडीए और इंडिया गठबंधन से दूरी पहले की तरह ही जारी रहेगी। मायावती ने सोशल मीडिया पर एक के बाद एक कई पोस्ट कर इसकी जानकारी दी। बसपा चीफ मायावती ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, ”यूपी सहित दूसरे राज्यों के चुनाव में भी बीएसपी का वोट गठबंधन की पार्टी को ट्रांसफर हो जाने, किंतु उनका वोट बीएसपी को ट्रांसफर कराने की क्षमता उनमें नहीं होने के कारण अपेक्षित चुनाव परिणाम नहीं मिलने से पार्टी कैडर को निराशा और उससे होने वाले मूवमेंट की हानि को बचाना जरूरी है। इसी संदर्भ में हरियाणा विधानसभा के चुनाव परिणाम और इससे पहले पंजाब चुनाव के कड़वे अनुभव के मद्देनजर आज हरियाणा और पंजाब की समीक्षा बैठक में क्षेत्रीय पार्टियों से भी अब आगे गठबंधन नहीं करने का निर्णय लिया गया है, जबकि भाजपा/एनडीए और कांग्रेस/इंडिया गठबंधन से दूरी पहले की तरह ही जारी रहेगी।” एक अन्य पोस्ट में उन्होंने लिखा, ”देश की एकमात्र प्रतिष्ठित अम्बेडकरवादी पार्टी बीएसपी और उसके आत्म-सम्मान एवं स्वाभिमान मूवमेंट के कारवां को हर प्रकार से कमजोर करने की चौतरफा जातिवादी कोशिशें लगातार जारी हैं, जिस क्रम में अपना उद्धार स्वयं करने योग्य व शासक वर्ग बनने की प्रक्रिया पहले की तरह ही जारी रखनी जरूरी।” आखिर में मायावती ने लिखा, ”बीएसपी विभिन्न पार्टियों/संगठनों व उनके स्वार्थी नेताओं को जोड़ने के लिए नहीं, बल्कि ’बहुजन समाज’ के विभिन्न अंगों को आपसी भाईचारा और सहयोग के बल पर संगठित होकर राजनीतिक शक्ति बनाने और उनको शासक वर्ग बनाने का आंदोलन है, जिसे अब इधर-उधर में ध्यान भटकाना अति-हानिकारक।” बता दें कि हरियाणा विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने इंडियन नेशनल लोकदल (आईएनएलडी) के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ा था। जहां भाजपा 48, कांग्रेस ने 37 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं, बसपा अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी। हालांकि, इनेलो ने बसपा के साथ मिलकर दो सीटों पर जीत हासिल की। बसपा को कुल 1.82 फीसदी वोट हासिल हुए हैं।    

जम्मू-कश्‍मीर में कांग्रेस की स्थिति बहुत कमजोर, चार निर्दलीय विधायकों के उमर अब्दुल्ला को समर्थन दिया

श्रीनगर जम्मू-कश्मीर विधानसभा के नतीजे भी अब कांग्रेस के लिए हरियाणा जैसे ही लग रहे हैं. हरियाणा में तो कांग्रेस चुनाव ही हार गई है, जम्मू-कश्मीर में तो आधा दर्जन सीटें जीतकर भी कांग्रेस ने हार जैसी स्थिति कर डाली है. ये सब हुआ है विधानसभा चुनाव जीत कर आये चार निर्दलीय विधायकों के उमर अब्दुल्ला की पार्टी नेशनल कांफ्रेंस को समर्थन देने के ऐलान के बाद. निर्दलीय विधायकों को अपने साथ लेने का मौका तो कांग्रेस के पास भी रहा होगा – कांग्रेस अगर समय रहते अलर्ट हो जाती तो क्या निर्दलीय विधायक उसके पाले में नहीं आ सकते थे? कांग्रेस की तरफ से ऐसी चूक कोई पहली बार हुई हो, ऐसा बिलकुल नहीं है. देर से लिया गया फैसला और लक्ष्य को साधने के प्रति लापरवाही हमेशा ही कांग्रेस पर भारी पड़ी है – और जम्मू-कश्मीर का मामला बस ताजातरीन है. सवाल है कि अब क्या कांग्रेस उमर अब्दुल्ला सरकार में अपने विधायकों के लिए बेहतर मोलभाव कर सकेगी? लेकिन, ऐसी संभावना तो फिलहाल बिलकुल भी नहीं लगती. सवाल ये भी है कि क्या अपने विधायकों को सरकार में बेहतर पोजीशन न दिला पाने की कीमत तो नहीं चुकानी पड़ेगी? और कहीं ऐसा न हो कालांतर में कांग्रेस के विधायक पार्टी को पीठ दिखाकर नेशनल कांफ्रेंस में ही न चले जायें? एक संभावना ये भी तो बनती ही है. वैसे, जिन निर्दलीयों ने नेशनल कॉन्‍फ्रेंस को समर्थन दिया है, उनका NC से ही नाता रहा है. दो निर्दलीय तो ऐसे हैं, जो उमर की पार्टी में ही थे, लेकिन सीटों के बंटवारे में जब उनकी विधानसभा कांग्रेस के कोटे में चली गई तो वे बागी होकर निर्दलीय खड़े हो गए. इंदरवाल सीट से जीते प्‍यारेलाल शर्मा और सूरनकोट से से चुनकर आए चौधरी अकरम को नेशनल कॉन्‍फ्रेंस का ही विधायक माना जाना चाहिए. हां, निर्दलीय होने की वजह से उनके पास मंत्रालय पाने का भी दावा बन गया है. जम्‍मू की खातिर उमर के लिए कांग्रेस के 6 विधायकों से ज्‍यादा काम के हैं 4 निर्दलीय जम्‍मू-कश्‍मीर के चुनाव में नेशनल कॉन्‍फ्रेंस ने अपनी ज्‍यादातर सीटें घाटी में ही जीतीं. जबकि कांग्रेस तो जम्‍मू से एक भी सीट नहीं जीत पाई. यानी लग रहा था कि सूबे का सत्‍ता पक्ष कश्‍मीर घाटी के विधायकों और मंत्रियों से पटा होगा. जबकि जम्‍मू में एकतरफा जीतकर आई बीजेपी विपक्ष में होगी. लेकिन, जम्‍मू क्षेत्र के ही चारों निर्दलीय विधायकों ने नेशनल कॉन्‍फ्रेंस को समर्थन देकर आगे आने वाली सरकार में घाटी और जम्‍मू के बीच संतुलन स्‍थापित करने की उम्‍मीद जगा दी है. उमर अब इन निर्दलीय विधायकों के भरोसे ये कह सकते हैं कि उनके पक्ष में जम्‍मू का प्रतिनिधित्‍व करने वाले सदस्‍य भी शामिल हैं. हालांकि, नेशनल कॉन्‍फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन में तय यही हुआ था कि कांग्रेस जम्‍मू का मोर्चा संभालेगी और नेशनल कॉन्‍फ्रेंस घाटी की चुनावी चुनौती से निपटेगी. नेशनल कॉन्‍फ्रेंस ने तो अपना कमिटमेंट पूरा किया, बल्कि जम्‍मू में भी कुछ सीटें जीतीं. जबकि कांग्रेस का जम्‍मू में सूपड़ा साफ हो गया. उसे जो 6 सीटें मिली हैं, वह भी घाटी में ही मिलीं. कोई भी फैसला लेने में हीलाहवाली बहुत भारी पड़ती है जम्मू-कश्मीर के नतीजे हरियाणा विधानसभा चुनाव में बुरी तरह झुलस चुकी कांग्रेस के लिए मरहम का काम कर रहे थे. क्योंकि नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन को बहुमत हासिल हो गया था. जम्‍मू-कश्‍मीर में 42 सीटें हासिल करने वाले उमर अब्‍दुल्‍ला ने 4 निर्दलीयों का समर्थन हासिल करके सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत जुटा लिया है. अब कांग्रेस का समर्थन मिलना बस औपचारिकता भर ही है. सरकार बनाने की उठापटक में कांग्रेस की आरामतलबी उसे भारी पड़ गई. जाहिर है, सरकार में जो रुतबा कांग्रेस को मिलता, उस पर 4 निर्दलीयों ने पहले दावा कर दिया है. इस स्थिति में अब फर्क तभी आएगा जब उप राज्यपाल के 5 विधायकों के मनोनयन से बहुमत का आंकड़ा 48 हो जाएगा – फिर भी निर्दलीयों के आगे कांग्रेस विधायकों की हैसियत कम ही रह जाएगी. राजनीतिक समीकरण बदल जाने का सीधा प्रभाव ये होगा कि कांग्रेस के लिए अपने विधायकों को सरकार में सही पोजीशन दिला पाना मुश्किल हो जाएगा – और ऐसे में विधायकों के टूट जाने का खतरा भी मंडराने लगा है.    कांग्रेस बार बार एक जैसी गलती क्यों करती है 1. हरियाणा में कांग्रेस की ये लगातार तीसरी हार है. 2014 में तो सत्ता परिवर्तन हुआ था, लेकिन 2019 में तो कांग्रेस के पास सत्ता में वापसी का अच्छा मौका था. पिछली बार न तो बीजेपी को बहुमत मिला था, न ही कांग्रेस को – और दुष्यंत चौटाला किंगमेकर बन कर उभरे थे. बीजेपी ने दुष्यंत चौटाला की जेजेपी को साध लिया, और कांग्रेस चूक गई. 2. गोवा और मणिपुर में 2017 के चुनाव में तो कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी, लेकिन दोनो राज्यों में पिछड़ जाने के बावजूद अगर बीजेपी सत्ता पर काबिज होने में सफल रही तो उसके लिए कांग्रेस ही जिम्मेदार थी. तब कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह गोवा के प्रभारी हुआ करते थे, और कांग्रेस की सरकार न बनवा पाने का खामियाजा भी उनको भुगतना पड़ा था. उसके बाद तो दिग्विजय सिंह को दरकिनार ही कर दिया गया था, और नर्मदा परिक्रमा की बदौलत साल भर बाद ही मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में उनकी वापसी हो सकी थी. गोवा की 40 में कांग्रेस ने 17 विधानसभा सीटें जीती थी, लेकिन 13 सीटों वाली बीजेपी ने निर्दलीयों को साथ लेकर सरकार बना लिया था – और वैसे ही मणिपुर में भी 28 सीटों वाली कांग्रेस को पछाड़ कर 21 विधायकों के साथ बीजेपी ने सरकार बना लिया था. 3. कांग्रेस नेतृत्व ने 2018 में नॉर्थ ईस्ट में वैसा ही रवैया दिखाया. 60 सीटों वाली मेघालय विधानसभा में बहुमत के लिए 31 विधायक चाहिये थे. 21 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी, जिसे महज 10 विधायकों की जरूरत थी. लेकिन, 2 सीटें जीतने वाली बीजेपी ने ऐसा ताना बाना बुना कि गठबंधन की सरकार बन गई, और कांग्रेस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही. निर्दलीय विधायकों के फैसले में बीजेपी का कितना रोल? सवाल तो ये भी उठ रहा है कि जम्मू-कश्मीर में निर्दलीय विधायकों के उमर अब्दुल्ला … Read more

SHO ने दर्ज नहीं की FIR तो दे दिया इस्तीफा, बोले- ‘ऐसी विधायकी मुझे नहीं करनी’, बाद में पलटे

सागर  सागर जिले की देवरी विधानसभा सीट से बीजेपी विधायक बृजबिहारी पटेरिया गुरुवार की रात में अचानक त्यागपत्र दे दिया था। त्यागपत्र देने के कुछ ही घंटों बाद संगठन की फटकार के बाद त्यागपत्र की बात से पीछे हट गए और धरना भी समाप्त कर दिया। पार्टी सूत्रों के अनुसार पटेरिया रात में केसली थाने में अपने समर्थकों के साथ धरने पर बैठ गए थे और अपना त्यागपत्र विधानसभा अध्यक्ष को भेजने की बात मीडिया के समक्ष कही थी। इसके बाद देर रात प्रदेश अध्यक्ष विष्णुदत्त शर्मा और संगठन सक्रिय हुए और फटकार के बाद पटेरिया धरना समाप्त करने के साथ ही एक वीडियो जारी कर त्यागपत्र की बात से पलट गए। पटेरिया ने कुछ ही घंटों के भीतर वीडियो संदेश में कहा कि स्वाभाविक है कि वो आक्रोश का विषय था। दुर्भाग्यपूर्ण क्षण था, जब मैंने आक्रोश के वशीभूत होकर वो कदम उठा लिया था। पार्टी मेरे साथ में है। माननीय मुख्यमंत्री हमारे साथ में हैं। पूरा संगठन, मंडल अध्यक्ष, वो सभी कार्यकर्ता मेरे साथ में हैं, जिन्होंने मुझे इस पद तक पहुंचाया है। अब उन सबके निर्देशों और आदेशों का पालन मैं करूंगा। माननीय अध्यक्ष जी और मुख्यमंत्री जी के आदेश का पालन करूंगा। अब इस्तीफे की कोई बात ही नहीं है। इसके पहले गुरुवार देर रात अचानक खबर आई कि पटेरिया ने विधायक पद से त्यागपत्र दे दिया है और वे सागर जिले के केसली थाना परिसर में अपने समर्थकों के साथ धरने पर बैठ गए हैं। पटेरिया केसली थाने पहुंचे थे और वहां एक पीड़ित की कथित तौर पर एफआईआर दर्ज नहीं होने के कारण उन्होंने वहीं से त्यागपत्र लिखकर विधानसभा अध्यक्ष और सचिवालय को भेज दिया था। तब उन्होंने कहा था कि जब सत्तारूढ़ दल के विधायक की बात ही नहीं सुनी जाए, तो वे ऐसी विधायिकी नहीं करना चाहते। पटेरिया के त्यागपत्र की खबर के बाद प्रदेश भाजपा संगठन और सरकारी तंत्र भी सक्रिय हुआ। देर रात प्रदेश अध्यक्ष और संगठन ने फोन पर पटेरिया को सख्ती से समझाया, तब उन्होंने तत्काल इस्तीफे की बात से पलटकर बयान जारी किया। बताया गया है कि पटेरिया को फोन पर जमकर फटकार लगाई गई। पटेरिया पहले कांग्रेस में थे और उसके टिकट पर भी दो दशक से अधिक समय पहले देवरी विधानसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। नवंबर दिसंबर 2023 का चुनाव उन्होंने देवरी से भाजपा के टिकट पर लड़ा और विजयी हुए। दो सौ तीस सदस्यीय विधानसभा में भाजपा के कुल सदस्यों की संख्या 163 है, जबकि कांग्रेस के 64 विधायक हैं। एक विधायक भारत आदिवासी पार्टी से है और दो सीट बुधनी और विजयपुर रिक्त हैं।

हरियाणा में नायब सिंह सैनी समेत मंत्रिमंडल में 14 सदस्य होंगे, मंत्रिमंडल में किसकी लगेगी लॉटरी

चंडीगढ़ हरियाणा में बीजेपी की लगातार तीसरी बार जीत के बाद अब सबकी निगाहें नई सरकार और कैबिनेट के गठन पर टिकी हैं। हरियाणा सरकार में मुख्यमंत्री सहित कुल 14 मंत्री हो सकते हैं। इसका मतलब है कि भाजपा को 11 नए चेहरों की तलाश करनी होगी, क्योंकि केवल अनिल विज ही वो सीनियर नेता हैं जिन्होंने अपनी सीट बरकरार रखी है। अनिल विज को मंत्री पद मिल सकता है। बीजेपी जाटों, ब्राह्मणों, पंजाबी और दलितों सहित राज्य की विभिन्न जातियों को ध्यान में रखकर कैबिनेट का गठन करेगी। जातिगत समीकरणों और समुदायों की मांगों को संतुलित करते हुए सरकार बनाना कोई आसान काम नहीं है। लेकिन बीजेपी ने हाल के दिनों में सफलतापूर्वक किया है। पिछले साल दिसंबर में, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव जीतने के बाद, पार्टी ने विधायकों और राज्य के नेताओं से परामर्श करने के बाद मुख्यमंत्रियों और मंत्रिमंडलों की घोषणा करने में अपना समय लिया। हरियाणा में भी इसी तरह के कदम उठाने की संभावना है। बीजेपी के पास अब दलित समुदाय से नौ विधायक हैं, आठ पंजाबी मूल के, सात ब्राह्मण और जाटों और यादवों में से प्रत्येक के छह विधायक हैं। पार्टी के पास गुर्जर, राजपूत, वैश्य और एक ओबीसी नेता भी हैं। इन दो दलित नेताओं में से एक मिल सकती है कैबिनेट में जगह इस सरकार में भाजपा के पास नौ दलित विधायक हैं, जिनमें से दो सबसे आगे हैं। एक हैं छह बार के विधायक कृष्ण लाल पंवार और दूसरे हैं दो बार के विधायक कृष्णा बेदी। पंजाबी मूल के आठ लोगों में सात बार के विधायक और पूर्व गृह मंत्री अनिल विज हैं, जो मार्च में मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने के बाद नाराज हो गए थे। यह तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर द्वारा लोकसभा सीट के लिए नामांकन दाखिल करने के बाद इस्तीफा देने के बाद हुआ था। पिछले महीने अपनी अम्बाला कैंट सीट जीतने वाले शविज ने तीसरी बार उस रिंग में अपनी टोपी फेंकी लेकिन उन्हें फिर से नजरअंदाज कर दिया गया। और यह पार्टी के लिए थोड़ी परेशानी खड़ी कर सकता है। कृष्ण मिड्ढा को क्या मिलेगी जगह जींद के विधायक कृष्ण मिड्ढा भी इस रेस में हैं, जिन्होंने लगातार तीसरी बार अपनी सीट जीती है। एक और अब तीन बार के विधायक यमुनानगर से घनश्याम दास अरोड़ा हैं। लेकिन उनकी नियुक्ति को छोड़ दिया जा सकता है क्योंकि उनकी सीट अम्बाला क्षेत्र के भीतर है। अरोड़ा को हांसी से तीन बार के विधायक विनोद भयाना के लिए नजरअंदाज किया जा सकता है। किस ब्राह्मण चेहरे को मिलेगा मौका फिर नंबर आता है ब्राह्मण को, इनमें बल्लभगढ़ से तीन बार के विधायक मूल चंद शर्मा शामिल हैं, जिन्हें मंत्रिमंडल में बरकरार रखा जा सकता है। एक और संभावित दो बार के लोकसभा सांसद अरविंद शर्मा हैं जिन्होंने गोहाना जीता। राम कुमार गौतम, जिन्होंने सफीदों को जीत दिलाई, जिसे भाजपा ने कभी नहीं जीता था। अहीरवाल बेल्ट से कौन होगा मंत्री भाजपा के लिए अहीरवाल बेल्ट के छह विधायक महत्वपूर्ण हैं जिन्होंने एक बार फिर पार्टी को भारी मतों से वोट दिया। कांग्रेस को हराने के लिए इस बार यह समर्थन महत्वपूर्ण था। इनमें बादशाहपुर से छह बार के विधायक राव नरबीर सिंह हैं। वह पहली सैनी सरकार में नहीं थे, लेकिन 2014 के चुनाव जीतने के बाद श खट्टर की अध्यक्षता वाली सरकार में थे। केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी आरती राव ने पहली बार अटेली सीट जीती है, लेकिन उनका नाम शॉर्टलिस्ट में है। साथ ही दो बार के विधायक लक्ष्मण यादव का नाम भी है। इस जाट विधायक को मिल सकती है जगह जाट हरियाणा की सबसे बड़ी उप-आबादी में से एक है। जाट नेता महीपाल ढांडा अब पानीपत (ग्रामीण) से दो बार के विधायक हैं और उनके बरकरार रहने की संभावना है। राई से दूसरी बार चुने गए कृष्ण गहलोत भी इस दौड़ में शामिल हैं। एक संभावित बड़ा नया नाम पार्टी के राज्यसभा सांसद किरण चौधरी की बेटी श्रुति चौधरी का है। अन्य संभावित उम्मीदवारों में वैश्य समुदाय के पूर्व मंत्री विपुल गोयल शामिल हैं। हरियाणा में सबसे अमीर महिला और हिसार से निर्दलीय विधायक सावित्री जिंदल ने औपचारिक रूप से भाजपा को अपना समर्थन दे दिया है। इससे उनके नए मंत्रिमंडल में शामिल होने की संभावना बढ़ गई है।

कंगना रनौत ने ट्रंप ने पीएम मोदी को सबसे अच्छा इंसान बताते हुए उन्हें ‘टोटल किलर’ करार दिया

नई दिल्ली  अभिनेत्री से राजनेता बनीं कंगना रनौत ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक पॉडकास्ट को अपने सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर शेयर किया। इस पॉडकास्ट में ट्रंप ने पीएम मोदी को सबसे अच्छा इंसान बताते हुए उन्हें ‘टोटल किलर’ करार दिया। सोशल मीडिया प्लेटफार्म ‘एक्स’ पर पॉडकास्ट को शेयर करते हुए कंगना रनौत ने कैप्शन में लिखा, “पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्लैग्रेंट पॉडकास्ट में प्रधानमंत्री मोदी को सबसे अच्छा इंसान बताया, लेकिन साथ ही उन्हें ‘टोटल किलर’ (ऐसे शख्स जो सफल हैं, आक्रामक हैं और किसी भी स्थिति से निपटने में पारंगत) बताया। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने पाकिस्तान के खिलाफ आक्रामक जवाबी कार्रवाई की धमकी देकर उन्हें आश्चर्यचकित कर दिया, जब उन्होंने कहा कि हम उनसे निपट लेंगे, भारत ने सैकड़ों वर्षों से उन्हें हराया है। इसकी तुलना मुंबई में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की बेरुखी से करें। भारत का जिक्र करते हुए ट्रंप ने कहा कि नरेंद्र मोदी के आने से पहले भारत में हर साल पीएम बदला जाता था। वहां बहुत ज्यादा अस्थिरता थी। इसके बाद वह आए। वह महान हैं। वह मेरे मित्र हैं। बाहर से वह ऐसे दिखते हैं, जैसे वह आपके पिता हैं। वह सबसे अच्छे हैं। डोनाल्ड ट्रंप ने कॉमेडियन एंड्रयू शुल्ट्ज और आकाश सिंह के साथ ‘फ्लैग्रैंट’ नामक पॉडकास्ट में ये बातें कही। 88 मिनट लंबे साक्षात्कार के लगभग 37 मिनट तक उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के साथ अपने संबंधों का जिक्र किया। ट्रंप ने आगे कहा कि ‘हाउडी मोदी’ 2019 में टेक्सास के ह्यूस्टन में भारतीय समुदाय का एक कार्यक्रम था। एनआरजी स्टेडियम में आयोजित इस कार्यक्रम में भारी भीड़ उमड़ी और दोनों देशों के बीच संबंधों को दर्शाया गया। उन्होंने कहा कि स्टेडियम में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। लोग पागल हो रहे थे और हम घूम रहे थे..हम उनके बीच में थे, हर किसी को हाथ हिला रहे थे। आपको बताते चलें, ट्रंप इससे पहले भी कई मौके पर प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा करते हुए उन्हें ‘शानदार व्यक्ति’ बता चुके हैं।    

बीजेपी का मातृ संगठन आरएसएस जातिगत जनगणना बात के बाद अब टीडीपी ने भी मांग दोहरा दी

नई दिल्ली देश भर में राजनीतिक दल और कई सामाजिक संगठन जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं। बिहार में तो नीतीश कुमार जब आरजेडी के साथ सरकार चला रहे थे, उसी समय उन्होंने जातिगत जनगणना करा दी थी। इसके बाद से ही वह पूरे देश में ऐसा करने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा गठबंधन के एक और सहयोगी चिराग पासवान भी ऐसी मांग करते रहे हैं। यूपी से अनुप्रिया पटेल, संजय निषाद और ओपी राजभर भी यह दोहरा चुके हैं। इस बीच एनडीए सरकार के सबसे बड़े गठबंधन सहयोगी टीडीपी ने भी यह मांग दोहरा दी है। भाजपा का मातृ संगठन आरएसएस भी इसके पक्ष में बात रख चुका है। संघ का कहना था कि ऐसा किया जा सकता है, बस राजनीतिक इस्तेमाल न हो। तेलुगु देशम पार्टी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू ने दिए इंटरव्यू में जातिगत जनगणना को जरूरी बताया है। उन्होंने कहा कि कास्ट सेंसस होनी चाहिए। यह जनता की भावना है और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। नायडू ने कहा, ‘आप जातिगत जनगणना कराएं। फिर आर्थिक विश्लेषण करें। स्किल सेंसस करें। इससे आपको पता चलेगा कि किसकी क्या स्थिति है और फिर उसके आधार पर आर्थिक गैर-बराबरी दूर करने में मदद मिलेगी।’ नायडू ने कहा कि जनभावना है कि जातिगत जनगणना होनी चाहिए। यदि ऐसा है तो फिर उसका सम्मान जरूरी है। यह बात सही है कि देश में गरीबी सबसे बड़ा मुद्दा है। यहां तक कि आप निचली जाति से हैं और पैसे वाले हैं तो लोग आपका सम्मान करेंगे। समाज में आपकी इज्जत होगी। लेकिन आप भले ही ऊंची जाति के हैं, लेकिन गरीब हैं तो फिर कोई आपको महत्व नहीं देगा। यह सच्चाई है। इसलिए आर्थिक स्थिति ही समानता का सबसे बड़ा पैमाना है। इसलिए आपको समाज में संतुलन के लिए आर्थिक गैर-बराबरी खत्म करने के लिए ही काम करना होगा। बता दें कि आरएसएस ने अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की मीटिंग के बाद जातिगत जनगणना को लेकर सधा हुआ जवाब दिया था। संघ का कहना था कि यदि समाज को ऐसा लगता है तो कराई जा सकती है, लेकिन इसका प्रयोग राजनीतिक लाभ के लिए नहीं होना चाहिए। इससे समाज में वैमनस्यता बढ़ती है।

एक साथ हारी देवीलाल परिवार की तीन पीढ़ियां, राजनीतिक घरानों को मतदाताओं ने नकारा

चंडीगढ़ हरियाणा में लोकसभा की ही तरह 2024 के विधानसभा चुनावों के परिणाम भी आर्श्चय जनक रहे। देवीलाल की राजनीतिक विरासत के वारिस रहे ओमप्रकाश चौटाला के परिवार में 2019 में बिखराव हुआ तथा अजय की अगुवाई में दुष्यंत ने जननायक जनता पार्टी बना ली। दुष्यंत की अगुवाई में 2019 में अलग होने के बाद पहला विधानसभा चुनाव लड़ा और 10 सीटें जीतकर दुष्यंत मनोहर सरकार में डिप्टी सीएम बने। मार्च में मनोहर की जगह नायब सैनी को प्रदेश की सत्ता सौंपने के साथ भाजपा ने दुष्यंत को भी गठबंधन सरकार से अलग कर दिया। 2019 में उचाना से बांगर के शेर कहे जाने वाले बीरेंद्र सिंह की पत्नी प्रेमलता को हराकर विधानसभा पहुंचे, दुष्यंत 2024 में उचाना से अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। 2024 के चुनाव में देवीलाल परिवार की तीन पीढ़ियां एक साथ चुनाव हारी, हालांकि दो युवा चेहरे पहली बार विधानसभा पहुंचने में सफल रहे। जिनमें भाजपा छोड़कर इनेलो में आए डबवाली से आदित्य देवीलाल चौटाला व रानिया से अभय चौटाला के बेटे अर्जुन चौटाला ने जीत दर्ज की। जबकि उचाना से दुष्यंत चौटाला अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए। अर्जुन चौटाला ने देवीलाल के बेटे व अपने दादा रणजीत चौटाला तो आदित्य ने देवीलाल परिवार के सदस्य अमित सिहाग को हराया। देवीलाल परिवार से चुनाव हारने वालों में दिग्विजय चौटाला, सुनैना चौटाला का नाम भी शामिल है। राजनीतिक घरानों को मतदाताओं ने नकारा 2024 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश के बड़े राजनीतिक घरानों को प्रदेश की जनता ने नकार दिया। 2024 के चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री देवीलाल, भजनलाल, ओमप्रकाश चौटाला, बंसीलाल, राव बीरेंद्र सिंह के परिवार चुनाव लड़ रहे थे, जिनमें से तोशाम से बंसीलाल की पौत्री ने भाजपा की टिकट पर अपने कजिन कांग्रेस उम्मीदवार अनिरुद्ध चौधरी को हराया। पहली बार भाजपा की टिकट पर चुनाव मैदान में उतरी राव बीरेंद्र सिंह की पौत्री एवं केंद्रीय मंत्री राव इंद्रजीत सिंह की बेटी आरती राव चुनाव जीतने में सफल रही। उचाना में बांगड़ के शेर चौ. बीरेंद्र सिंह व देवीलाल परिवार को एक साथ हार का मुंह देखना पड़ा। यहां भाजपा की टिकट पर पहली बार चुनाव मैदान में उतरे देवेंद्र अत्री ने चौ. बीरेंद्र सिंह के बेटे कांग्रेस उम्मीदवार एवं हिसार के पूर्व सांसद बृजेंद्र सिंह को 39 वोटों से हरा दिया। यहां देवीलाल के परिवार से तीसरी बार चुनाव मैदान में उतरे दुष्यंत चौटाला 10 हजार का आंकड़ा भी नहीं छू पाए। पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल का गढ़ आदमपुर भी 2024 में ढह गया तथा भजनलाल के पौत्र एवं भाजपा उम्मीदवार भव्य बिश्नोई पहली बार चुनाव में उतरे कांग्रेस उम्मीदवार पूर्व आईएएस चंद्रप्रकाश में 565 वोटों से चुनाव हार गए। हालांकि, पंचकूला से भजनलाल के बेटे एवं पूर्व डिप्टी सीएम चंद्रमोहन कांग्रेस की टिकट पर जीतने में सफल रहे। 2024 में पूर्व मुख्यमंत्रियों व बड़े राजनीतिक घरानों के डेढ़ दर्जन से अधिक सदस्य चुनाव लड़ रहे थे। बंसीलाल और राव बीरेंद्र सिंह को छोड़ दे तो सभी को हार का मुंह देखना पड़ा।

बेटे दीपेंद्र को नहीं बना पाए मुख्यमंत्री, भूपेंद्र हुड्डा का टूटा सपना

चंडीगढ़ हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को इस बार हाथ से सत्ता जाने का गम तो है ही, साथ ही अपने सांसद बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा को मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाने की कसक भी कम नहीं है। कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में जब भी मुख्यमंत्री के पद की दावेदारी का सवाल आया, हुड्डा ने हर बार यही कहा कि वे अभी ना तो टायर्ड (थके) हुए और ना ही रिटायर्ड (सेवानिवृत्त) हुए हैं, लेकिन हुड्डा चाहते थे कि यदि उन्हें मौका मिला तो वह अपने सांसद बेटे दीपेंद्र सिंह हुड्डा के लिए कांग्रेस हाईकमान के समक्ष मुख्यमंत्री के पद की पैरवी करेंगे। सपना रह गया अधूरा मगर राज्य में हवा के बावजूद कांग्रेस सत्ता से चूक गई और हुड्डा का बेटे को मुख्यमंत्री बनवाने का ख्वाब भी अधूरा रह गया।  कांग्रेस को पूरी उम्मीद थी कि राज्य में उनकी पार्टी की सरकार बनेगी, लेकिन भाजपा ने धरातल पर ऐसा गेम पलटा कि कांग्रेस में मुख्यमंत्री बनने के दावेदारों के सारे अरमान रखे रह गए। पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के साथ कांग्रेस की दलित नेता कुमारी सैलजा ने पूरे चुनाव के दौरान अपनी मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को कमजोर नहीं पड़ने दिया। सैलजा की दावेदारी के बीच कांग्रेस महासचिव एवं राज्यसभा सदस्य रणदीप सिंह सुरजेवाला ने भी सीएम बनने की इच्छा जताई। दीपेंद्र हुड्डा ने खुद कभी नहीं की दावेदारी हालांकि, रोहतक के सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने एक बार भी अपने मुंह से ऐसा नहीं बोला कि वे मुख्यमंत्री पद के दावेदार हैं। अपने भाषणों में दीपेंद्र ने मुख्यमंत्री पद के लिए हमेशा पिता भूपेंद्र सिंह हुड्डा की दावेदारी ही पेश की। इसके विपरीत कांग्रेस में चल रही इस कलह के बीच भूपेंद्र सिंह हुड्डा अपने बेटे को मुख्यमंत्री बनाने की जोड़तोड़ में लगे रहे। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी ने जनसभाओं में दीपेंद्र के कामकाज की दिल खोलकर तारीफ की। इससे हुड्डा को अपने बेटे किए माहौल बनाने में आसानी हो गई। दीपेंद्र हुड्डा के लिए था अच्छा मौका कांग्रेस प्रभारी दीपक बाबरिया, पार्टी पर्यवेक्षक अशोक गहलोत और अजय माकन तथा संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल तक अधिकतर वरिष्ठ नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा के भरोसेमंद हैं। इसलिए उन्हें बेटे के लिए पैरवी करने में ज्यादा परेशानी नहीं आती, मगर मामला सिरे चढ़ने से पहले ही बिगड़ गया। हुड्डा की उम्र इस समय 77 साल है। भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार के पांच साल पूरे होने के बाद अब राज्य में 2029 में चुनाव होंगे। उस समय हुड्डा की उम्र करीब 82 साल होगी। ऐसे में तब की परिस्थिति के अनुमान के हिसाब से इस बार हुड्डा के लिए बेटे की पैरवी करना ज्यादा आसान रह सकता था। हुड्डा के नेतृत्व में लड़े गए 4 चुनाव हरियाणा में कांग्रेस ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में अब तक चार चुनाव लड़े हैं, लेकिन किसी भी चुनाव में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया है। साल 2005 में कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी भजनलाल के नेतृत्व में चुनाव लड़ा था और कांग्रेस को 67 सीटें मिली थी, लेकिन हाईकमान ने हुड्डा को सांसद होते हुए भी मुख्यमंत्री बना दिया था। इसके बाद साल 2009 का पहला चुनाव हुड्डा के नेतृत्व में कांग्रेस ने लड़ा। उस समय कांग्रेस को 40 सीटें मिली, जो कि पूर्ण बहुमत से छह कम थी, राजनीति के मंझे हुए खिलाड़ी हुड्डा ने अपने रणनीतिक कौशल के चलते विधायकों का इंतजाम कर लिया था और सरकार बना ली थी। इसी तरह साल 2014 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ 15 सीटों पर संतोष करना पड़ा था, जबकि साल 2019 के चुनाव में कांग्रेस की 31 सीटें आई, जो कि बहुमत से 15 सीट कम थी। इस बार साल 2024 के चुनाव में कांग्रेस की 37 सीटें आई हैं, जो कि बहुमत से 11 सीट कम हैं।

हरियाणा में कांग्रेस की हवा, प्रदीप गुप्ता समेत कई चुनावी पंडित इस बार गलत साबित हुए हैं और उनमें से एक योगेंद्र यादव भी हैं

नई दिल्ली हरियाणा विधानसभा चुनाव से पहले योगेंद्र यादव ने राज्य में कांग्रेस के आने की भविष्यवाणी की थी। यही नहीं उन्होंने कांग्रेस की हवा, आंधी और सुनामी जैसा दावा भी कर दिया था। इसे लेकर अब वह ट्रोल हो रहे हैं। प्रदीप गुप्ता समेत कई चुनावी पंडित इस बार गलत साबित हुए हैं और उनमें से एक योगेंद्र यादव भी हैं। योगेंद्र यादव ने अब बताया है कि आखिर कहां उनसे हरियाणा के माहौल को समझने में चूक हुई और कैसे भाजपा की सत्ता में वापसी हो गई। योगेंद्र यादव कहते हैं कि यह चुनाव एक टी-20 मैच की तरह था, जो आखिरी गेंद तक खेला गया और अंत में जीत भाजपा को मिली। योगेंद्र यादव ने इंडियन एक्सप्रेस के लिए लिखे लेख में कहा, ‘भाजपा और कांग्रेस के बीच वोट शेयर का अंतर 1 फीसदी से भी कम का रहा है। क्रिकेट की भाषा में बात करें तो यह टी-20 मैच जैसा था, जो दो ओवर रहते हुए ही खत्म होना चाहिए था। लेकिन यह आखिरी गेंद तक खिंच गया। अब तीन सवाल पर मंथन करना चाहिए। हमने इसे इतना आसान चुनाव क्यों माना? यह इतनी टाइट फाइट वाला संघर्ष कैसे बन गया? आखिर हरियाणा के चुनाव में कैसे हार गए?’ मुख्य तौर पर हरियाणा में कांग्रेस की नीति की भाजपा ने काट खोज ली और अपने समीकरणों के जरिए चुनाव जीत लिया। वह कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के वोट प्रतिशत में 19 फीसदी का इजाफा हुआ था। राज्य में किसान, पहलवान और जवान का नैरेटिव बना था। योगेंद्र यादव लिखते हैं, ‘मैं भी मान रहा था कि यह जो नैरेटिव बना है, उससे कांग्रेस को बढ़त मिलेगी। वह अब कमजोर नहीं होगी। ऐसा अनुमान इसलिए था क्योंकि किसान, पहलवान के नैरेटिव पर पड़ने वाला वोट जेजेपी और इनेलो को मिलता नहीं दिख रहा था। इसके अलावा राहुल गांधी के आक्रामक अभियान से ऐसा लग रहा था कि दलित वोट बड़ी संख्या में कांग्रेस को ही मिलेगा।’ लोकसभा में अच्छी बढ़त, पर विधानसभा में कैसे हार गई कांग्रेस यह स्थिति लोकसभा चुनाव में दिखी भी थी और 19 फीसदी वोट शेयर बढ़ाते हुए कांग्रेस ने भाजपा के मुकाबले एक पर्सेंट की बढ़त पा ली थी। लेकिन ऐसा लगता है कि किसान, पहलवान, संविधान और जवान के नारे ने काम नहीं किया। यही नहीं ऐसा लगा कि कांग्रेस अति-आत्मविश्वास में आ गई है। 10 साल की सरकार के खिलाफ जमीन पर ऐंटी इनकम्बैंसी थी और ऐसा लग रहा था कि भाजपा की स्थिति 2014 और 2019 के मुकाबले कमजोर होगी। यह चुनाव दो तरफा था और कांग्रेस भाजपा को मिलाकर 79 फीसदी वोट पड़ा, जो 2014 में 55 पर्सेंट ही था। कांग्रेस जाट समुदाय के भरोसे रह गई, भाजपा ने बना ली रणनीति योगेंद्र यादव लिखते हैं, ‘किसान जवान पहलवान और संविधान के नैरेटिव में यह गलती हुई। मैं भी उन विश्लेषकों में से एक था, जो मानते थे कि इसका तात्कालिक लाभ कांग्रेस को होगा। हालांकि मैंने लोकसभा चुनाव की तरह ही इस बार भी सीटों का अनुमान जाहिर नहीं किया था, लेकिन यह साफ कहा था कि कांग्रेस को फायदा मिलेगा।’ योगेंद्र यादव ने कहा कि कांग्रेस शायद जाट समुदाय पर ज्यादा निर्भर हो गई, जबकि भाजपा अपनी रणनीति पर अमल करती रही। वहीं सब कोटा वाले विवाद से उसे दलित वोटों के बंटवारे का भी मौका मिला। इसके अलावा नायब सिंह सैनी को सीएम बनाने को भी वह भाजपा की कामयाब रणनीति मानते हैं।

राहुल गांधी यह दोहराते दिखे 100 में से महज 3 फीसदी ही ओबीसी अधिकारी हैं, अब पार्टी में ही नजरअंदाज करने के आरोप

नई दिल्ली संसद में भाषण से लेकर रैलियों तक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी लगातार यह दोहराते दिखे हैं कि आखिर देश के सचिवों में से कितने ओबीसी है। वह कहते रहे हैं कि 100 में से महज 3 फीसदी ही ओबीसी अधिकारी हैं, जबकि उनकी 60 फीसदी से ज्यादा आबादी है। वह नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को ओबीसी, एससी और एसटी की उपेक्षा के आरोप में घेरते रहे हैं। लेकिन अब खुद कांग्रेस में ही इस मुद्दे पर बवाल मचा है और ओबीसी नेताओं को नजरअंदाज करने के आरोप लग रहे हैं। हरियाणा में हार के बाद राज्य में माहौल ही बदल गया है। अहीरवाल बेल्ट के सीनियर नेता कैप्टन अजय सिंह यादव ने पिछड़ों की उपेक्षा के आरोप लगाए हैं। उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया, ‘कांग्रेस को दक्षिण हरियाणा खासतौर पर गुरुग्राम, रेवाड़ी, महेंद्रगढ़ और फरीदाबाद में सिर्फ एक सीट मिली है। अहीरवाल का कांग्रेस कार्यसमिति, केंद्रीय चुनाव समिति, कांग्रेस महासचिवों और हरियाणा प्रदेश कमेटी तक में कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। ओबीसी कांग्रेस का चेयरमैन जैसे पद के पास तो कोई ताकत नहीं है। यह दंतहीन है।’ यही नहीं उनकी पोस्ट पर एक अन्य नेता डॉ. अरुणेश यादव ने भी सहमति जताई है। उन्होंने कहा कि आपने बिलकुल सही कहा है। इसके अलावा यदुवंशी कल्याण ट्रस्ट चलाने वाले संजय यादव ने भी कहा कि पिछड़ों को उनका अधिकार मिलना ही चाहिए। इस तरह कैप्टन अजय यादव की पोस्ट ने एक तरह से राहुल गांधी को आईना दिखाया है। पार्टी के भीतर ही पिछड़ों की उपेक्षा का आरोप इसलिए खास है क्योंकि राहुल गांधी लगातार आरक्षण की 50 फीसदी सीमा खत्म करने, जातिगत जनगणना कराने और पिछड़ों को नौकरशाही से लेकर राजनीति तक में मौका देने की वकालत करते रहे हैं। ऐसी स्थिति में अब कैप्टन अजय यादव का ही आरोप लगाना चिंता की बात है। दरअसल हरियाणा के नतीजों को लेकर एक राय यह भी सामने आई है कि जाटों की तुलना में कांग्रेस ने यादव, गुर्जर, सैनी, कश्यप जैसी अन्य ओबीसी बिरादरियों को कम महत्व दिया और इससे वे लोग भाजपा के साथ गए। इसके अलावा भाजपा सरकार ने अहीरवाल बेल्ट में नौकरियां भी खूब दी हैं। कैप्टन अजय यादव ने कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण नतीजों से पहले ही सीएम पद को लेकर मची खींचतान को भी माना है।

‘मोदी के कामों ने किया प्रेरित’, भाजपा में शामिल हुईं केरल की पहली महिला आईपीएस अधिकारी

तिरुवनन्तपुरम  केरल की पहली महिला आईपीएस अधिकारी आर. श्रीलेखा ने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया। 2020 में केरल फायर एंड रेस्क्यू सर्विस के महानिदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुईं श्रीलेखा केरल की पहली महिला डीजीपी रैंक की अधिकारी भी थीं। श्रीलेखा एक लेखिका भी हैं। भाजपा में शामिल होने के बाद, श्रीलेखा ने मीडिया से बातचीत में कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के करिश्मे ने उन्हें पार्टी में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। मुझे भाजपा की विचारधारा पर भरोसा है। उन्होंंने कहा कि मैं तीन हफ़्ते तक सोचने के बाद भाजपा में शामिल हो रही हूं। तीन हफ़्ते पहले भाजपा ने मुझसे पार्टी में शामिल होने के लिए संपर्क किया था। मैं सेवा में एक निष्पक्ष अधिकारी रही हूं। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद अपने अनुभव के आधार पर, मुझे एहसास हुआ कि लोगों की सेवा करने का यही सबसे अच्छा तरीका है। वहीं केरल बीजेपी अध्यक्ष के. सुरेंद्रन ने श्रीलेखा को एक बहादुर अधिकारी बताते हुए कहा कि पूर्व आईपीएस अधिकारी केरल से परिचित थीं और उन्होंने पुलिस में कई सुधार किए। उन्होंने पुलिस बल में महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी। श्रीलेखा ऐसे समय में भाजपा में शामिल हुई हैं जब केरल में एडीजीपी एमआर अजीत कुमार की हाल के वर्षों में आरएसएस नेताओं के साथ बैठकों पर बहस हो रही है। वह पूर्व डीजीपी जैकब थॉमस के बाद सेवानिवृत्ति के बाद पार्टी में शामिल होने वाली दूसरी पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं। फरवरी 2021 में भाजपा में शामिल होने के बाद, जैकब थॉमस ने इरिंजालकुडा विधानसभा क्षेत्र से राज्य विधानसभा चुनाव लड़ा था लेकिन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के आर. बिंदु से हार गए थे। 1987 बैच की आईपीएस अधिकारी श्रीलेखा के अपने करियर के अंत में केरल की माकपा सरकार के साथ संबंध तनावपूर्ण हो गए थे। अपने सेवानिवृत्ति के दिन, उन्होंने डीजीपी-रैंक के अधिकारियों को दी जाने वाली औपचारिक विदाई पार्टी और गार्ड ऑफ ऑनर से परहेज किया था। तिरुवनंतपुरम की रहने वाली श्रीलेखा सिविल सेवा में शामिल होने से पहले एक कॉलेज लेक्चरर और एक बैंक अधिकारी थीं। उन्होंने विभिन्न जिलों में एसपी और बाद में डीआईजी और आईजी के रूप में कार्य किया। केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर रहते हुए उन्होंने चार साल तक सीबीआई के साथ काम किया था। उन्होंने नौ पुस्तकें भी लिखी हैं।

बीजेपी सरकार से अच्छे रिश्तों से ही जम्मू-कश्मीर को फायदा: उमर अब्दुल्ला

श्रीनगर  जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव जीतते ही उमर अब्दुल्ला का बड़ा बयान सामने आया है। उन्होंने कहा है कि पहली ही कैबिनेट बैठक में जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने वाला प्रस्ताव पारित किया जाएगा। नेशनल कॉन्फ्रेंस के उपाध्यक्ष उमर अब्दुल्ला ने कहा कि मुझे उम्मीद है कि सरकार गठन के बाद पहली बैठक में मंत्रिमंडल, राज्य का दर्जा बहाल करने के लिए केंद्र पर दबाव डालने के वास्ते एक प्रस्ताव पारित करेगा। इसके बाद सरकार इस प्रस्ताव को प्रधानमंत्री के पास भेजेगी। जम्मू-कश्मीर चुनाव में पूर्व राज्य का दर्जा बहाली मुद्दा सबसे बड़ा था। एनसी-कांग्रेस के घोषणापत्र में भी इसका वादा किया गया था। उमर अब्दुल्ला ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि दिल्ली के विपरीत जम्मू-कश्मीर में सरकार सुचारू रूप से काम कर पाएगी। उन्होंने कहा, ‘हमारे और दिल्ली के बीच एक फर्क है। दिल्ली कभी एक राज्य नहीं रहा। किसी ने दिल्ली को राज्य का दर्जा देने का वादा नहीं किया। जम्मू-कश्मीर 2019 से पहले राज्य था। हमसे प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और अन्य वरिष्ठ मंत्रियों ने राज्य का दर्जा बहाल करने का वादा किया, जिन्होंने कहा है कि जम्मू-कश्मीर में तीन कदम उठाए जाएंगे – परिसीमन, चुनाव और फिर राज्य का दर्जा।’ केंद्र के प्रति उमर का रुख नरम उमर अब्दुल्ला ने कहा, ‘परिसीमन हो गया, अब चुनाव भी हो गए हैं। इसलिए केवल राज्य का दर्जा देना बाकी है जिसे जल्द ही बहाल किया जाना चाहिए।’ यह पूछे जाने पर कि जम्मू-कश्मीर सरकार और केंद्र के बीच समन्वय कितना जरूरी है, इस पर उन्होंने कहा कि नई दिल्ली से टकराव लेकर कुछ भी हासिल नहीं किया जा सकता। एनसी नेता ने कहा, ‘पहले सरकार बनने दीजिए। यह सवाल मुख्यमंत्री से पूछा जाना चाहिए। नयी दिल्ली के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध होने चाहिए। मेरी उन्हें (मुख्यमंत्री) सलाह होगी कि हम केंद्र के साथ टकराव करके किसी भी मुद्दे का समाधान नहीं कर सकते।’ ‘केंद्र से अच्छे रिश्ते जम्मू-कश्मीर के लिए फायदेमंद’ अब्दुल्ला ने कहा, ‘ऐसा नहीं है कि हम भाजपा की राजनीति स्वीकार करेंगे या भाजपा हमारी राजनीति स्वीकार करेगी। हम भाजपा का विरोध करते रहेंगे लेकिन केंद्र का विरोध करना हमारी मजबूरी नहीं है।’ उन्होंने कहा, ‘केंद्र के साथ अच्छे रिश्ते रखना जम्मू-कश्मीर और उसके लोगों के लिए फायदेमंद होगा। लोगों ने टकराव के लिए वोट नहीं किया है। जम्मू-कश्मीर के लोगों ने इसलिए वोट दिया है क्योंकि वे रोजगार चाहते हैं, वे विकास चाहते हैं, वे राज्य का दर्जा बहाल कराना चाहते हैं, वे बिजली तथा अन्य समस्याओं से छुटकारा चाहते हैं और नयी दिल्ली से टकराव करके इनका समाधान नहीं निकलेगा।’ विधायक दल की बैठक आज अब्दुल्ला ने कहा कि एनसी सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू करने के लिए गुरुवार को विधायक दल की एक बैठक बुलाई गई है। इसके बाद गठबंधन के सहयोगियों की बैठक होगी जिसमें गठबंधन का नेता चुना जाएगा और फिर हम सरकार गठन का दावा जताने के लिए राज भवन जाएंगे। मुझे उम्मीद है कि अगले कुछ दिन में नई सरकार बन जाएगी। पीडीपी से गठबंधन पर क्या बोले उमर अब्दुल्ला? यह पूछने पर कि क्या पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) गठबंधन सरकार का हिस्सा होगी, इस पर एनसी नेता ने कहा कि अभी तक इस पर कोई चर्चा नहीं हुई है। उन्होंने कहा, ‘पीडीपी ने हमसे या हमने उनसे कोई संपर्क नहीं किया है। इस चुनाव के नतीजों को देखते हुए मुझे लगता है कि कुछ अंदरुनी चर्चा चल रही होगी। मुझे लगता है कि चुनावी नतीजे उनके लिए झटका हैं।

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