Janmashtami: Not Radha or Rukmini, but Sudama sits beside Krishna here; the ‘Gatthar’ trees bear witness to a 5,000-year-old friendship.
आमतौर पर देश-दुनिया के मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा देवी राधा या रुक्मिणी के साथ की जाती है, लेकिन उज्जैन से करीब 30 से 32 किलोमीटर दूर महिदपुर तहसील के नारायणा गांव में स्थिति बिल्कुल अलग और अनोखी है। यहां स्थित प्रसिद्ध नारायणा धाम विश्व का संभवतः एकमात्र ऐसा स्थान है, जहां भगवान श्रीकृष्ण के साथ उनके परम मित्र और बाल सखा सुदामा जी की पूजा की जाती है। लगभग 5,200 वर्ष पुराने इस पावन स्थल पर आज भी श्रीकृष्ण और सुदामा की निश्छल मित्रता के साक्षात प्रमाण मौजूद हैं।
कृष्ण-सुदामा की मित्रता मानकर पूजा-अर्चना करते हैं श्रद्धालु
श्रीमद्भागवत पुराण और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, कंस वध के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा उज्जैन स्थित महर्षि सांदीपनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। एक दिन गुरुमाता के आदेश पर श्रीकृष्ण और सुदामा पास के जंगल (वर्तमान नारायणा गांव) में ईंधन के लिए लकड़ियां एकत्र करने गए थे। लकड़ियां इकट्ठा करते-करते शाम ढल गई और अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बारिश से बचने के लिए दोनों मित्रों ने लकड़ियों के गट्ठर वहीं रख दिए। रात भर तेज बारिश होती रही और अगले दिन सुबह गुरु सांदीपनि दोनों बालकों को खोजते हुए जंगल पहुंचे और उन्हें वापस आश्रम ले आए। बारिश के कारण लकड़ियों के दोनों गट्ठर वहीं छूट गए। कालक्रम में भगवत् कृपा से वही लकड़ियों के गट्ठर हरे-भरे होकर ‘दिव्य वृक्ष’ के रूप में विकसित हो गए। आज 5,000 साल बीत जाने के बाद भी मंदिर परिसर के दोनों ओर ये दोनों ‘गट्ठर वृक्ष’ मौजूद हैं, जिनमें आज भी हरे-भरे पत्ते आते हैं। श्रद्धालु इन्हें कृष्ण-सुदामा की मित्रता की निशानी मानकर इनकी परिक्रमा और पूजा-अर्चना करते हैं। उपलब्ध स्थानीय रिपोर्टों में भी मंदिर के दोनों ओर लकड़ियों के गट्ठरों से बने माने जाने वाले हरे-भरे वृक्षों का उल्लेख है।
मित्रता, चने और सुदामा की दरिद्रता का प्रसंग
नारायणा धाम वही स्थान है, जहां श्रीकृष्ण-सुदामा की कथा का सबसे चर्चित प्रसंग घटा था। वन जाते समय गुरुमाता ने दोनों बालकों को रास्ते में खाने के लिए दो मुट्ठी चने दिए थे। रात में बारिश के दौरान जब श्रीकृष्ण पेड़ पर थे, तब सुदामा ने नीचे रहकर भूख लगने पर श्रीकृष्ण के हिस्से के चने भी अकेले खा लिए। जब श्रीकृष्ण ने पूछा तो सुदामा ने चने खाने की बात छिपा ली।मान्यता है कि भगवान के हिस्से का अन्न खाने के कारण ही सुदामा को जीवन में भीषण दरिद्रता का सामना करना पड़ा। वर्षों बाद जब सुदामा द्वारका पहुंचे तो द्वारकाधीश श्रीकृष्ण ने अपने मित्र का अश्रुपूर्ण नेत्रों से भव्य स्वागत किया और उनके लाए तंदुल (चावल) स्वीकार कर उनकी दरिद्रता को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।
नारायणा धाम की प्रमुख विशेषताएं और रहस्य
अक्षय कुंड: स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्तमान मंदिर का पुनर्निर्माण इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर के शासनकाल में कराया गया था। मंदिर परिसर में एक प्राचीन कुंड स्थित है, जिसके बारे में मान्यता है कि इसका जल कभी नहीं सूखता।
रहस्यमयी ‘स्वर्ण पर्वत’: मंदिर से महज 300 मीटर की दूरी पर ‘स्वर्णगिरी पर्वत’ स्थित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के चरण पड़ते ही यहां की माटी और पत्थर सोने की तरह चमक उठे थे। स्थानीय लोग बताते हैं कि साल में एक बार इस पर्वत पर अद्भुत चमक दिखाई देती है और इसके पत्थरों को थपथपाने पर विशेष प्रकार की मधुर ध्वनि सुनाई देती है।
कालगणना और प्राचीन खगोल केंद्र: पुराविद् डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार, नारायणा धाम प्राचीन काल में कालगणना का प्रमुख केंद्र था। पूर्व में कर्क रेखा यहीं से गुजरती थी। मान्यता है कि श्रीकृष्ण-सुदामा ने यहां लकड़ियों से ‘शंकु यंत्र’ बनाकर खगोलीय गणनाएं की थीं। वर्तमान में कर्क रेखा नारायणा से 18 किमी दूर ‘डोंगला’ में स्थित है, जिसकी पहचान 1985 में महान पुरातत्वविद् डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने की थी।
ऐसे मनाया जाएगा जन्माष्टमी उत्सव
हर वर्ष जन्माष्टमी के पावन अवसर पर नारायणा धाम में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ता है। देशभर से लाखों कृष्ण भक्त इस दिव्य स्थल के दर्शन करने आते हैं। जन्माष्टमी पर मंदिर परिसर को भव्य रूप से सजाया गया है। भक्त सबसे पहले भगवान श्रीकृष्ण और सुदामा के दर्शन करते हैं, जिसके बाद लकड़ियों की गठरियों से बने दोनों दिव्य वृक्षों की पूजा और परिक्रमा करते हैं। आयोजन को सुचारू और भव्य बनाने के लिए ‘श्रीकृष्ण-सुदामा उत्सव समिति’ से जुड़े लगभग 25 स्थानीय ग्रामीण दिन-रात निस्वार्थ सेवा देते हैं। जन्माष्टमी के दिन यहां कृष्ण-सुदामा की अमर मित्रता की गाथाओं का वाचन किया जा रहा है। भक्ति संगीत, महाआरती और महाप्रसाद का आयोजन होता है, जिसमें पूरा क्षेत्र कृष्ण भक्ति के रंग में सराबोर हो जाता है।







