LATEST NEWS

ईरान युद्ध और BRICS की भूमिका पर सवाल, भारत के सामने संतुलन साधने की बड़ी परीक्षा

नई दिल्ली भारत ने बीते सप्ताह यह स्वीकार किया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष पर ब्रिक्स देशों के बीच साझा रुख तय करना मुश्किल है। इसकी सबसे बड़ी वजह है इस युद्ध को लेकर सदस्य देशों के अलग-अलग विचार हैं। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक बयान में कहा था कि ब्रिक्स के कुछ सदस्य देश इस संघर्ष में सीधे शामिल हैं, जिसकी वजह से समूह के लिए एक साझा रुख तय करना कठिन हो गया है। हालांकि भारत इस मुद्दे पर सहमति बनाने की कोशिश में जुटा है। गौरतलब है कि भारत इस साल इस प्रभावशाली समूह की अध्यक्षता कर रहा है। लभारत, चीन और रूस जैसे देशों वाले इस समूह का हाल के कुछ सालों में ही विस्तार हुआ है और इसमें ईरान और संयुक्त अरब अमीरात समेत कुछ अन्य देशों को शामिल किया गया है। अब ईरान बीते 2 सप्ताह से अमेरिका और इजरायल के खिलाफ युद्ध लड़ रहा है, जिससे समूह और अध्यक्ष भारत के सामने कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। ब्रिक्स के मौजूदा अध्यक्ष के रूप में भारत के सामने चुनौती है कि पश्चिम एशिया के इस संघर्ष पर ब्रिक्स का एक साझा रुख कैसे तैयार किया जाए। ब्रिक्स समूह में शुरुआत में ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे। 2024 में विस्तार कर मिस्र, इथोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात को शामिल किया गया, जबकि 2025 में इंडोनेशिया भी इसमें शामिल हो गया। ब्रिक्स एक प्रभावशाली समूह बनकर उभरा है, जिसमें दुनिया की 11 बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं वाले देश शामिल हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर बड़ा कद रखने वाला BRICS इस युद्ध पर कोई संयुक्त बयान जारी नहीं कर पाया है। भारत की BRICS अध्यक्षता के सामने चुनौती हालांकि ईरान युद्ध ने भारत की अध्यक्षता को मुश्किल स्थिति में ला दिया है। ईरान ने सीधे भारत से BRICS को सक्रिय करने की अपील की थी। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने विदेश मंत्री एस जयशंकर से संपर्क कर अमेरिका और इजरायल के हमलों और सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हत्या की निंदा करने के लिए BRICS से बयान जारी करने की मांग की थी। लेकिन अब तक ऐसा कोई संयुक्त बयान जारी नहीं हुआ है। इससे पहले 2025 में ब्राजील की अध्यक्षता के दौरान BRICS ने 12 दिन चले युद्ध में इजरायल के हमलों की निंदा करते हुए दो बयान जारी किए थे। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अध्यक्ष देश के राष्ट्रीय हित समूह की प्रतिक्रिया को प्रभावित करते हैं। संघर्ष में शामिल कई पक्षों से भारत के करीबी संबंध भारत की स्थिति इसलिए भी जटिल है क्योंकि उसके इस संघर्ष में शामिल कई देशों से करीबी संबंध हैं। भारत के इजरायल के साथ रक्षा और तकनीकी संबंध हैं। वहीं संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के साथ ऊर्जा और भारतीय प्रवासी से जुड़े महत्वपूर्ण हित हैं। इसके अलावा अमेरिका के साथ भी संबंध तेजी से मजबूत हो रहे हैं। दूसरी ओर ईरान के साथ भी भारत के लंबे समय से संबंध हैं, जिनमें चाबहार बंदरगाह परियोजना शामिल है, जो भारत को मध्य एशिया तक पहुंच देने में अहम है। BRICS के विस्तार ने भी सहमति बनाना कठिन कर दिया है। पहले पांच देशों का यह समूह अब 11 सदस्य देशों तक बढ़ चुका है और इनमें कई देशों के हित एक-दूसरे से टकराते हैं। उदाहरण के लिए ईरान के अपने ही BRICS सदस्य देशों यूएई और सऊदी अरब के साथ तनावपूर्ण संबंध हैं। ऐसे में अध्यक्ष देश के रूप में भारत किसी तरह की जबरन एकता नहीं बना सकता, बल्कि वह केवल सहमति बनने पर उसे मजबूत कर सकता है या मतभेदों को शांत तरीके से संभाल सकता है। युद्ध से BRICS की अर्थव्यवस्थाओं पर असर ईरान ने मार्च की शुरुआत से होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमलों के जरिए आवाजाही को काफी हद तक प्रभावित कर दिया है। इससे 1000 से अधिक जहाजों को देरी या रास्ता बदलना पड़ा है। यह जलडमरूमध्य वैश्विक समुद्री तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है। इसके अलावा एलएनजी, उर्वरक, अनाज और कई अन्य वस्तुएं भी इसी मार्ग से गुजरती हैं। युद्ध के कारण तेल और गैस की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है, टैंकरों का किराया बढ़ गया है और कई जहाजों को अफ्रीका के केप ऑफ गुड होप के रास्ते से गुजरना पड़ रहा है। इससे यात्रा में 10 से 14 दिन की देरी हो रही है और BRICS देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, के लिए लागत बढ़ रही है। संकट के बीच भारत की रणनीति भारत का रुख इस समय आर्थिक स्थिरता बनाए रखने और तनाव कम करने पर केंद्रित है। भारत BRICS शेरपा चैनल के जरिए सदस्य देशों के साथ लगातार बातचीत कर रहा है और कूटनीतिक स्तर पर भी संपर्क बनाए हुए है। भारतीय प्रवक्ता ने बीते दिनों कहा है कि भारत ब्रिक्स सदस्य देशों के साथ लगातार संपर्क में हैं ताकि इस संघर्ष पर कोई साझा रुख तय किया जा सके।  

रूस ने ठहराया BRICS को ताकतवर विकल्प, अमेरिका पर कटाक्ष: ‘यहां कोई हुक्म नहीं चलता’

मास्को  रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने हाल ही में अमेरिका और पश्चिमी देशों के समूह नाटो के काम करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए उन पर निशाना साधा है। लावरोव ने कहा है कि ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) ज्यादातर मामलों में सर्वसम्मति के आधार पर फैसले करते हैं, जबकि नाटो के फैसले अमेरिका पर निर्भर करते हैं। लावरोव ने रूस के एक यूट्यूब चैनल एमपाशिया मनुची प्रोजेक्ट के साथ बातचीत में कहा, “ज्यादातर मामलों में अंतरराष्ट्रीय समझौतों का पालन किया जाता है। जब बात हमारे पश्चिमी साथियों की हो तब नहीं, बल्कि जब उन प्रतिनिधियों की होती है जिन्हें हम वैश्विक बहुमत कहते हैं। ब्रिक्स, एससीओ, और सोवियत के बाद वाले सीएसटीओ, ईएईयू, और सीआईएस जैसे समूहों में आम सहमति ज़्यादातर बनी रहती है।” उन्होंने कहा, “ यहां आप नाटो की तरह आसानी से फैसले नहीं ले सकते, जहां अमेरिकी कहते हैं ‘चुप रहो’ और सबको पता है कि यह सब कैसे काम करता है।” लावरोव ने आगे कहा कि यूरोपीय संघ भी फैसलों पर असर डालता है। यूरोपीय संघ की तरह, जहां ब्रसेल्स में बिना चुने हुए नौकरशाह देश की चुनी हुई सरकारों को बताते हैं कि क्या करना है, कैसे बर्ताव करना है, किसके साथ व्यापार करना है और किसके साथ नहीं करना है। हमारे हंगरी के साथियों ने ब्रसेल्स के हाल के गलत कामों पर साफ और समझने लायक टिप्पणी की है।” बता दें कि हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान ने दिसंबर 2025 में कहा था कि यूरोपीय संघ यूक्रेनी संघर्ष को लंबा खींचने के लिए व्यवस्थित तरीके से कानून को रौंद रहा है। उन्होंने कहा कि यूराेपीय संघ में कानून का राज “ब्रसेल्स की तानाशाही” से बदल गया है। इससे पहले ने लावरोव ने रूसी तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाकर प्रतिस्पर्धियों को दबाने के लिए अमेरिका पर ‘अनुचित तरीकों’ का इस्तेमाल करने का आरोप भी लगाया। लावरोव ने एक इंटरव्यू में कहा, ”अमेरिका भारत और अन्य ब्रिक्स सदस्यों जैसे प्रमुख रणनीतिक साझेदारों के साथ हमारे व्यापार, निवेश सहयोग और सैन्य-तकनीकी संबंधों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है।”

भारत का इंकार के आगे चीन और रूस का समर्थन भी फेल, पाकिस्तान को ब्रिक्स समूह में एंट्री नहीं मिली

नई दिल्ली ब्रिक्स (BRICS) बैठक खत्म होने के साथ ही इस संगठन में शामिल होने की कोशिश में लगे पाकिस्तान का सपना चकनाचूर हो गया है. चीन और रूस के समर्थन के बावजूद पाकिस्तान को ब्रिक्स समूह में एंट्री नहीं मिली है. यहां तक कि पाकिस्तान को ब्रिक्स संगठन के नए पार्टनर देशों की लिस्ट में भी जगह नहीं मिली है. वहीं, तुर्की को पार्टनर देशों में शामिल किया गया है. पाकिस्तान ने पिछले साल ब्रिक्स की सदस्यता के लिए औपचारिक तौर पर आवेदन किया था. चीन ने पाकिस्तान से किया था वादा चीन और रूस ने पाकिस्तान को ब्रिक्स में शामिल करने का समर्थन किया था. ऐसा कहा जा रहा है कि भारत ब्रिक्स में पाकिस्तान की एंट्री को लेकर बहुत ज्यादा संतुष्ट नहीं था. तेजी से बढ़ती इकॉनमी और दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा देश भारत इस समूह का संस्थापक सदस्य है जिसमें शुरू में ब्राजील (B), रूस (R), भारत (I), चीन (C) शामिल था और बाद में इसमें दक्षिण अफ्रीका जुड़ गया जिसके बाद दक्षिण अफ्रीका के नाम से उसके नाम का पहला अक्षर एस लिया गया है जिसके बाद संगठन ब्रिक्स कहलाने लगा. चीन ने पाकिस्तान को ब्रिक्स में शामिल करने का भरोसा दिया था लेकिन पाकिस्तान को ब्रिक्स तो क्या उसके पार्टनर देशों की सूची में भी जगह नहीं मिली. चीन के अलावा रूस ने भी कहा था कि वह ब्रिक्स में पाकिस्तान की सदस्यता का समर्थन करता है. पीएम मोदी ने पाकिस्तान को लेकर रूस-चीन को दिया संदेश? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि भारत ब्रिक्स में अधिक ‘पार्टनर देशों’ का स्वागत करने के लिए तैयार है लेकिन इस संबंध में फैसले सर्वसम्मति से लिए जाने चाहिए. 16वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने इशारों-इशारों में 9 सदस्यीय समूह में पाकिस्तान के प्रवेश के लिए रूस और चीन के समर्थन को लेकर भी अपना संदेश दे दिया. पीएम मोदी ने कहा कि ब्रिक्स के संस्थापक सदस्यों के विचारों का सम्मान किया जाना चाहिए. रूस और चीन के अलावा ब्रिक्स के दो अन्य संस्थापक देश भारत और ब्राजील हैं. ब्रिक्स की बैठक में पीएम मोदी ने ब्रिक्स सदस्यों से आतंकवाद और आतंकियों को पालन-पोषण करने वाली ताकतों से निपटने पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान भी किया और कहा कि इस मुद्दे पर दोहरे मानदंड की कोई जगह नहीं है. ब्रिक्स में नए सदस्यों को केवल आम सहमति से ही शामिल किया जाता है, इसलिए यह साफ था कि पाकिस्तान की सदस्यता के लिए भारत का विरोध समूह में शामिल होने की उसकी कोशिश को नाकाम कर सकता है, भले ही कुछ अन्य संस्थापक सदस्य इसके पक्ष में हों. जैसा कि उम्मीद थी कि भारत इस समूह में पाकिस्तान को शामिल करने को लेकर राजी नहीं हुआ. अधिकांश पाकिस्तानी नेताओं को उम्मीद थी कि रूस और चीन की मदद से पाकिस्तान ब्रिक्स में प्रवेश पाने में सफल हो जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हो सका. पाकिस्तान ने दी थी ब्रिक्स से जुड़ने की अर्जी पाकिस्तान ने पिछले साल ब्रिक्स की सदस्यता के लिए औपचारिक तौर पर आवेदन किया था. ब्रिक्स में शामिल होने के लिए पाकिस्तान के कुछ शीर्ष राजनयिकों ने समर्थन हासिल करने के लिए कई ब्रिक्स देशों का दौरा भी किया था. पाकिस्तान ब्रिक्स में शामिल होकर दुनिया की प्रभावशाली अर्थव्यवस्थाओं के साथ अपना गठजोड़ करना चाहता है. ब्रिक्स में शामिल होने से पाकिस्तान को आर्थिक और कूटनीतिक दोनों तरह से बहुत कुछ हासिल होगा. लेकिन भारत के लिए यह किसी भी लिहाज से फायदेमंद नहीं होता क्योंकि दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध कम से कम पिछले पांच वर्षों से अपने सबसे खराब दौर से गुजर रहे हैं. पाकिस्तान की तरफ से आतंकवाद से जूझ रहा भारत इस मोर्चे पर उसके साथ कोई संबंध नहीं चाहता है और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के लिए कजान में भारत के रुख ने यह साफ कर दिया. पाकिस्तान ने लगाया था आरोप पिछले साल जून में पाकिस्तानी विदेश विभाग ने कहा था कि चीन में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान आयोजित वार्ता में उसकी भागीदारी को ‘एक सदस्य’ द्वारा खारिज कर दिया गया था. हालांकि पाकिस्तान ने इस दौरान भारत का नाम नहीं लिया लेकिन उसने यह जरूर कहा था कि ब्रिक्स ब्लॉक को भविष्य में विकासशील दुनिया के हितों पर आधारित फैसले लेने चाहिए. लेकिन इस बार पाकिस्तान को पूरी उम्मीद थी कि भारत के विरोध के बावजूद रूस और चीन के समर्थन से उसके लिए ब्रिक्स के दरवाजे खुलेंगे. ऐसा भी कहा जा रहा था कि भारत भी पाकिस्तान की ब्रिक्स सदस्यता का शायद समर्थन कर सकता है. आपको बता दें कि सितंबर के महीने में जब रूस के उप प्रधानमंत्री एलेक्सी ओवरचुक ने पाकिस्तान की यात्रा की तो उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान ऐलान किया था कि रूस ब्रिक्स सदस्यता के लिए पाकिस्तान के आवेदन का स्वागत करता है. कई विश्लेषकों ने ब्रिक्स में पाकिस्तान की सदस्यता के लिए रूस के समर्थन को भारत-अमेरिका की करीबी के जवाब के तौर पर भी देखा. कैसे बना ब्रिक्स इस गठबंधन की शुरुआत केवल पांच देशों (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) के साथ हुई थी लेकिन पिछले साल ब्रिक्स समूह ने चार नए सदस्यों मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) को शामिल किया था जिसके बाद इसे ब्रिक्स प्लस के नाम से जाना जाने लगा. कई देश ब्रिक्स में शामिल होना चाहते हैं. पाकिस्तान भी इन देशों में से एक था. एक समूह के रूप में ब्रिक्स आज दुनिया की लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है. कई रिपोर्टों के अनुसार, जीडीपी के हिसाब से ब्रिक्स गुट के देश दुनिया भर की जीडीपी का लगभग 30 प्रतिशत हैं.  

slot server thailand super gacor

spaceman slot gacor

slot gacor 777

slot gacor

Nexus Slot Engine

bonus new member

olympus

situs slot bet 200

slot gacor

slot qris

link alternatif ceriabet

slot kamboja

slot 10 ribu

https://mediatamanews.com/

slot88 resmi

slot777

https://sandcastlefunco.com/

slot bet 100

situs judi bola

slot depo 10k

slot88

slot 777

spaceman slot pragmatic

slot bonus

slot gacor deposit pulsa

rtp slot pragmatic tertinggi hari ini

slot mahjong gacor

slot deposit 5000 tanpa potongan

mahjong

spaceman slot

https://www.deschutesjunctionpizzagrill.com/

spbo terlengkap

cmd368

368bet

roulette

ibcbet

clickbet88

clickbet88

clickbet88

bonus new member 100

slot777

https://bit.ly/m/clickbet88

https://vir.jp/clickbet88_login

https://heylink.me/daftar_clickbet88

https://lynk.id/clickbet88_slot

clickbet88

clickbet88

https://www.burgermoods.com/online-ordering/

https://www.wastenotrecycledart.com/cubes/

https://dryogipatelpi.com/contact-us/

spaceman slot gacor

ceriabet link alternatif

ceriabet rtp

ceriabet

ceriabet link alternatif

ceriabet link alternatif

ceriabet login

ceriabet login

cmd368

sicbo online live

Ceriabet Login

Ceriabet

Ceriabet

Ceriabet

Ceriabet

casino online

clickbet88

login kudahoki88

Ceriabet

Ceriabet

Ceriabet