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संसद में होंगी प्रियंका को पति रॉबर्ट वाड्रा ने बधाई दी है तो खुद के भी संसद पहुंचने की इच्छा एक बार फिर जाहिर कर दी

नई दिल्ली कांग्रेस ने वायनाड लोकसभा सीट से प्रियंका गांधी को चुनाव लड़ाने का फैसला लिया है। इस पर उनके पति रॉबर्ट वाड्रा ने बधाई दी है तो खुद के भी संसद पहुंचने की इच्छा एक बार फिर जाहिर कर दी। उन्होंने कहा, ‘प्रियंका गांधी मुझसे पहले संसद में होंगी। जब भी सही समय होगा, मैं भी उनके रास्ते पर आगे बढ़ सकता हूं। मैं खुश हूं और मुझे भरोसा है कि वायनाड की जनता उन्हें जीत दिलाएगी।’ लोकसभा चुनाव से पहले भी कई बार रॉबर्ट वाड्रा ने चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। उन्होंने यूपी की मुरादाबाद और अमेठी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की पेशकश तक की थी। लेकिन कांग्रेस ने उनके नाम पर विचार नहीं किया। सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा ने कहा, ‘मैं सबसे पहले देश की जनता को धन्यवाद देता हूं, जिसने भाजपा को सबक सिखाया है। इन लोगों ने धर्म आधारित राजनीति की। मुझे खुशी है कि प्रियंका गांधी वायनाड से लड़ने जा रही हैं। वह संसद में होंगी। उन्हें संसद में होना चाहिए। इसलिए नहीं कि उन्होंने कैंपेन किया है बल्कि मैं भी ऐसा देखना चाहता हूं।’ प्रियंका गांधी दशकों से कांग्रेस के लिए प्रचार करती रही हैं, लेकिन 2019 के आम चुनाव में वह सक्रिय राजनीति में आई थीं। उन्हें यूपी के एक हिस्से की जिम्मेदारी मिली थी। इस बार वह अमेठी और रायबरेली पर फोकस कर रही थीं। वाड्रा ने कहा,  ‘प्रियंका गांधी को मुझसे पहले संसद में होना चाहिए। मैं भी सही समय पर उनके रास्ते पर बढ़ूंगा। मुझे खुशी है और उम्मीद है कि लोग उन्हें जिताएंगे।’ वहीं अमेठी को लेकर अपनी दावेदारी पर रॉबर्ट वाड्रा ने कहा, ‘मेरे अमेठी से चुनाव लड़ने की मांग देश भर के अलग-अलग हिस्सों से आ रही थी। लोग मेरे काम को समझते हैं और चाहते हैं कि इन्हें मौका मिले तो विकास में तेजी आए।’ हालांकि कांग्रेस ने उनकी जगह पर वफादार माने जाने वाले किशोरी लाल शर्मा को उतारा, जिन्होंने केंद्रीय मंत्री रहीं स्मृति इरानी को हरा दिया। वाड्रा को अमेठी से टिकट न मिलने पर भाजपा ने तंज कसते हुए कहा था कि उन्हें किनारे लगाया जा रहा है।  

पश्चिम बंगाल सियासत में तड़का CM बनर्जी पहुंची बीजेपी सांसद अनंत राय महाराज से मिलने

कोलकाता पश्चिम बंगाल की राजनीति में मंगलवार को एक ट्विस्ट देखने को मिला. सूबे की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सांसद से मिलने उनके आवास पहुंच गईं. बीजेपी के राज्यसभा सांसद अनंत राय महाराज ने अपने आवास पर सीएम ममता का गर्मजोशी के साथ स्वागत किया. ममता बनर्जी और बीजेपी सांसद की मुलाकात को लेकर अधिक जानकारी सामने नहीं आई है लेकिन इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में हलचल बढ़ गई है. अनंत राय महाराज उत्तर बंगाल की राजनीति का बड़ा चेहरा हैं जहां बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में तेजी से पैर जमाए हैं. अनंत उत्तर बंगाल के कूचबिहार को पृथक ग्रेटर कूच बिहार राज्य बनाने की मांग करने वाले संगठन ग्रेटर कूचबिहार पीपुल्स एसोसिएशन (जीसीपीए) के अध्यक्ष हैं. खुद को ग्रेटर कूचबिहार का महाराज बताने वाले अनंत को बीजेपी ने एक साल पहले ही पश्चिम बंगाल से राज्यसभा भेजा था. अनंत पश्चिम बंगाल से बीजेपी के टिकट पर राज्यसभा पहुंचने वाले पहले नेता भी हैं. अब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उनसे आवास पहुंचकर मुलाकात करने के बाद कयास भी लगाए जाने लगे हैं. तर्क दिए जा रहे हैं कि पिछले साल गृह मंत्री अमित शाह ने अनंत के आवास पहुंचकर उनसे मुलाकात की थी और इसके बाद बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया. अब सीएम ममता उनसे मिलने उनके आवास पहुंची हैं तो आगे क्या होगा? नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली पिछली सरकार में राज्यमंत्री रहे निशिथ प्रमाणिक भी अनंत के करीबी माने जाते हैं. निशिथ प्रमाणिक भी उसी राजबंशी समुदाय से आते हैं जिससे अनंत. राजबंशी कितने प्रभावशाली पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति की कुल आबादी में करीब 18 फीसदी से अधिक राजबंशी समुदाय की भागीदारी है. राजबंशी समुदाय अनुसूचित जाति वर्ग का सबसे बड़ा और प्रभावशाली समुदाय है. राजनीतिक लिहाज से देखें तो उत्तर बंगाल के पांच जिलों के 20 विधानसभा क्षेत्रों में राजबंशी समुदाय के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. इन पांच जिलों में कूचबिहार के साथ ही अलीपुरद्वार भी शामिल है जहां 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी अच्छा प्रदर्शन किया था लेकिन 2024 के चुनाव में पार्टी कूचबिहार लोकसभा सीट हार गई.  

प्रदेश पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान ने बुधनी विधानसभा से दिया इस्तीफा,जनता से की भावुक अपील

 भोपाल  मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बुधनी विधानसभा सीट से इस्तीफा देने के बाद अब हर किसी की नजर संभावित उम्मीदवार और आगामी उपचुनाव पर है।राज्य में अभी हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान विदिशा संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए हैं। वह बुधनी से भी वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में विधायक के तौर पर निर्वाचित हुए थे। कोई भी व्यक्ति एक सदन का ही सदस्य रह सकता है। लिहाजा उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे के बाद उपचुनाव होना तय हो गया है। सवाल यही है कि उपचुनाव में भाजपा यहां से किसे अपना उम्मीदवार बनाती है। कई नेता इस सीट पर अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं। बुधनी विधानसभा क्षेत्र विदिशा संसदीय क्षेत्र के तहत आता है और दोनों ही भाजपा के गढ़ माने जाते हैं। इससे पहले राज्य के छिंदवाड़ा के अमरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से विधायक रहे कमलेश शाह ने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था। अब वहां भी 10 जुलाई को मतदान होना है । भाजपा ने कमलेश शाह को एक बार फिर उम्मीदवार बनाया तो वहीं गोंडवाना गणतंत्र पार्टी भी अपना उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। कांग्रेस ने अभी तक अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। भाजपा ने अमरवाड़ा विधानसभा क्षेत्र के प्रचार के लिए 35 स्टार प्रचारकों की सूची जारी कर दी है। कांग्रेस ने अमरवाड़ा के लिए दो प्रभारी नियुक्त कर दिए हैं। इसके अलावा बुधनी के लिए भी दो प्रभारी नियुक्त किये जा चुके हैं। कुल मिलाकर लोकसभा चुनाव के बाद राज्य में उपचुनावों का दौर शुरू हो रहा है। अमरवाड़ा में चुनाव कार्यक्रम घोषित हो चुका है तो वहीं आने वाले दिनों में बुधनी विधानसभा क्षेत्र का भी चुनावी कार्यक्रम घोषित हो सकता है। इसके अलावा विजयपुर और बीना से कांग्रेस विधायकों ने भाजपा की सदस्यता ले ली है। फिलहाल उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है। उनके इस्तीफा देने के बाद वहां भी चुनाव होने तय हैं। शिवराज ने कहा कि उन्होंने पिछला विधानसभा का चुनाव मैंने रिकॉर्ड 1 लाख 5 हजार वोटों से जीता था और अभी लोकसभा में बुधनी की जनता ने मुझे 1 लाख 46 हजार वोटों से जिताया। बुधनी की जनता की सेवा मैंने पूरे मन से की है, क्योंकि जनता की सेवा ही मेरे लिए भगवान की पूजा है और इस जनता ने भी मुझे भरपूर प्यार दिया है, आशीर्वाद दिया है। जनता के इस प्यार पर मेरा पूरा जीवन न्यौछावर है और अपनी संपूर्ण क्षमता के साथ मैं जनता की सेवा में लगा रहूंगा। विज्ञापन अपने प्राणों से प्रिय जनता को बारंबार प्रणाम! बता दें शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफा देने के बाद बुधनी सीट पर उपचुनाव होना तय हो गया है। ऐसे में अब चर्चा है कि बुधनी सीट पर शिवराज का उत्तराधिकारी कौन होगा? शिवराज के बड़े बेटे कार्तिकेय का नाम भी चर्चा है। शिवराज के दो बेटों में कार्तिकेय राजनीति में सक्रिय हैं। इसके अलावा विदिशा से पूर्व सांसद रमाकांत भार्गव का नाम भी चर्चा है। भार्गव का टिकट काटकर ही शिवराज को प्रत्याशी बनाया है। ऐसे में भार्गव को भी बुधनी से विधानसभा उपचुनाव में प्रत्याशी बनाया जा सकता है।

राहुल गांधी के यूपी में वापसी , वायनाड छोड़ रायबरेली से ही सांसद बनना क्यों चुना?

लखनऊ राहुल गांधी लोकसभा चुनाव 2024 में दो सीटों से लड़े थे। एक केरल की वायनाड सीट थी, तो दूसरी यूपी की रायबरेली सीट थी। दोनों सीटों पर राहुल गांधी को जीत मिली थी। सोमवार को राहुल गांधी ने वायनाड सीट से इस्तीफा दे दिया है। अब यहां पर उपचुनाव होगा। कांग्रेस की ओर से उप चुनाव में प्रियंका गांधी को प्रत्याशी बनाया गया है। यह उनका राजनीतिक डेब्यू है, जिसको लेकर कांग्रेस अलर्ट हो गई है। आखिर राहुल गांधी ने वायनाड सीट को छोड़कर रायबरेली को ही क्यों चुना, जबकि वायनाड सीट पर 2019 में जीत मिली थी और अमेठी में हार गए थे, तो इसके पीछे कई सियासी मायने हैं। खोई जमीन बनाने पर कांग्रेस का फोकस उत्तर प्रदेश में 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन ने शानदार जीत दर्ज की। इस जीत के बाद न सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को बड़ा झटका लगा, बल्कि यूपी की राजनीति में कई तरह की चर्चाओं का जन्म हुआ। यूपी में सबसे ज्यादा 80 लोकसभा सीटे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को महज एक सीट पर संतोष करना पड़ा था, तो वहीं 2022 के विधानसभा चुनाव में काफी जद्दोजहद के बावजूद यूपी की सिर्फ दो विधानसभा सीटों पर जीत मिली थी, लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव में सपा के साथ चुनाव लड़कर कांग्रेस ने छह सीटें जीती हैं, जिसके बाद यूपी में अपनी खोई हुई राजनीति को मजबूत करने में कांग्रेस जुट गई है। यूपी में कांग्रेस ने बढ़ाई सक्रियता वैसे कांग्रेस पार्टी की यूपी में सक्रियता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता कि लोकसभा चुनाव में गांधी परिवार यूपी में बेहद सक्रिय नजर आया। प्रियंका गांधी, राहुल गांधी, राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के साथ सोनिया गांधी ने भी जनता से इंडिया गठबंधन के पक्ष में मतदान की अपील की। यहीं नहीं सोनिया ने अपने बेटे (राहुल गांधी) को रायबरेली की जनता को सौंपने की बात भी कही और बेटे के लिए प्रचार भी किया था। यूपी में मिली जीत के बाद से कांग्रेस ने यूपी में और सक्रियता बढ़ा दी है। जीत के बाद राहुल गांधी ने रायबरेली में आभार सभा की। 2027 का यूपी विधानसभा चुनाव भी सपा के साथ मिलकर लड़ने के संकेत दिए हैं। अगर ऐसा होता है, तो कांग्रेस को यूपी में फिर संजीवनी मिल जाएगी। वहीं, अगर सपा की ओर से विधानसभा चुनाव में बात नहीं बनी, तो कांग्रेस उसकी तैयारी अभी से कर दी है। 1952 से रायबरेली पर गांधी परिवार का कब्जा कांग्रेस पार्टी के इस फैसले के बाद कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। पहला ये कि राहुल गांधी ने उस सीट को चुना जहां से गांधी परिवार 1952 से जीतता आ रहा। रायबरेली से राहुल के दादा फिरोज गांधी, दादी इंदिरा गांधी और मां सोनिया गांधी पहले भी इस सीट से सांसद रह चुके हैं। इंदिरा के पति फिरोज गांधी ने 1952 में पहली बार इस सीट पर जीत दर्ज की थी। इंदिरा गांधी ने 1967 से 1977 के बीच 10 साल तक इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। हालांकि, 1977 में इंदिरा गांधी को हार मिली थी। 2004 से सोनिया ने संभाली रायबरेली की कमान 1980 में इंदिरा गांधी ने दो सीटों रायबरेली और अविभाजित आंध्र प्रदेश में मेडक से चुनाव लड़ा। दोनों सीटों पर जीत दर्ज की। इंदिरा गांधी ने रायबरेली सीट छोड़ दी और मेडक को बरकरार रखा था। 1980 के बाद से गांधी परिवार के वफादार अरुण नेहरू, शीला कौल और कैप्टन सतीश शर्मा ने 2004 तक रायबरेली से जीत हासिल की। इनके बाद सोनिया गांधी यहां से लड़ती रहीं और 2019 तक यहीं से सांसद रहीं। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में सोनिया ने इस सीट को राहुल के जिम्मे सौंपकर यहां से प्रतिधिनित्व करने का मौका दिया, क्योंकि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और पारिवारिक विरासत रायबरेली, गांधी परिवार के लिए हमेशा से एक मजबूत गढ़ रहा है। यूपी में बीजेपी को कड़ी चुनौती देना चाहते हैं राहुल राहुल गांधी का यह कदम न केवल उनकी व्यक्तिगत सियासी यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव है, बल्कि यह भारतीय राजनीति के लिए भी एक बड़ा संदेश है। यूपी, देश का सबसे बड़ा राज्य है और यहां की सियासत का राष्ट्रीय राजनीति पर गहरा प्रभाव है। राहुल गांधी का यूपी में रहकर राजनीति करना बीजेपी के लिए भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यूपी में बीजेपी की स्थिति काफी मजबूत है और इस मजबूती को 2027 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी राहुल गांधी के जरिए तोड़ने की कोशिश करेगी। वहीं, परिवार और पार्टी के वरिष्ठ नेता भी चाह रहे थे कि राहुल रायबरेली का प्रतिनिधित्व करें। इसके अलावा रायबरेली की जीत इस लिहाज से भी बड़ी है कि परिवार ने अमेठी की खोई सीट भी हासिल कर ली। माना जा रहा कि 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर यहा फैसला लिया गया है। केरल के वायनाड के बजाय उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा सीट से सांसद रहना क्यों चुना, हम इसके पांच कारण आपको बता रहें हैं… 1) यूपी में खोई जमीन पाने की उम्मीद 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में छह सीटें जीतीं. 2019 में उसे सिर्फ रायबरेली सीट पर जीत मिली थी. इंडिया ब्लॉक ने यूपी में 43 सीटें जीतीं, जिनमें से 37 समाजवादी पार्टी ने जीतीं. यह एनडीए के लिए एक बड़ा झटका था, जिसने 2019 में यूपी की 80 लोकसभा सीटों में से 62 सीटें जीती थीं. 2024 के चुनाव में, एनडीए सिर्फ 36 सीटें जीतने में कामयाब रही, जबकि बीजेपी को 33 सीटें हासिल हुईं. वोट शेयर के मामले में सबसे बड़ी हार मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को हुई. इसका वोट शेयर 19% से घटकर 9% र​ह गया.  ये वोट मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी के साथ-साथ कांग्रेस को भी मिले। अगर एसपी ने बीएसपी के वोट शेयर का 6-7% हासिल किया, तो कांग्रेस को 2-3% का फायदा हुआ. कांग्रेस को उम्मीद है कि वह उत्तर प्रदेश में दलित, मुस्लिम और ब्राह्मण वोटों का फायदा उठा सकती है. राहुल गांधी द्वारा वायनाड के बजाय रायबरेली सीट चुनने का पहला कारण यही नजर आता है.  2) रणनीति बदलाव और आक्रामक रुख 2024 लोकसभा चुनाव के नतीजे से उत्साहित … Read more

NCERT संघ के सहयोगी के तौर पर काम कर रही : जयराम रमेश

नई दिल्ली  राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की पाठ्यपुस्तकों में संशोधन को लेकर विवाद के बीच, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने  आरोप लगाया कि यह संस्था 2014 से आरएसएस की सहयोगी के रूप में काम कर रही है और संविधान पर हमला कर रही है। रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) ने नीट-2024 परीक्षा में कृपांक (ग्रेस मार्क) विवाद के लिए एनसीईआरटी को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह केवल एनटीए की अपनी नाकामियों से ध्यान हटाने की कोशिश है। कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘हालांकि यह सच है कि एनसीईआरटी अब पेशेवर संस्था नहीं रही। यह 2014 से आरएसएस से संबद्ध संस्था के रूप में काम कर रही है। अभी-अभी पता चला कि इसकी 11वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की संशोधित पाठ्यपुस्तक में धर्मनिरपेक्षता के विचार की आलोचना की गई है। रमेश ने कहा, ‘‘एनसीईआरटी का काम किताबें प्रकाशित करना है, राजनीतिक पर्चे जारी करना या दुष्प्रचार करना नहीं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘एनसीईआरटी हमारे देश के संविधान पर हमला कर रही है जिसकी प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्षता को स्पष्ट रूप से भारतीय गणतंत्र के मूलभूत स्तंभ के रूप में दर्शाया गया है। उच्चतम न्यायालय के विभिन्न निर्णयों ने स्पष्ट रूप से धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल संरचना का एक अनिवार्य हिस्सा माना है।’’ रमेश ने कहा कि एनसीईआरटी को याद रखना चाहिए कि ‘‘यह राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद है, ना कि नागपुर या नरेन्द्र शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद।’’ कांग्रेस महासचिव ने आरोप लगाया, ‘‘आज इसकी सभी पाठ्यपुस्तकें संदिग्ध गुणवत्ता वाली हैं और मेरे स्कूल के दिनों से बिल्कुल अलग हैं।’’ तृणमूल कांग्रेस के नेता साकेत गोखले ने भी एनसीईआरटी पर निशाना साधते हुए कहा, ‘‘बेशर्म राजग 1.0 सरकार’’ छात्रों से कुछ तथ्यों को छिपा रही है और दावा कर रही है कि ये तथ्य ‘‘असहज करने वाले’’ हैं। उन्होंने कहा, ‘‘इस तर्क के हिसाब से तो बच्चों को विश्व युद्ध जैसे अन्य हिंसात्मक घटनाक्रम के बारे में क्यों पढ़ाया जाए।’’ गोखले ने कहा, ‘‘क्या भाजपा और मोदी को अपराधियों तथा दंगाइयों के रूप में अपने इतिहास पर शर्म आती है? छात्रों से सच क्यों छिपाया जाए ?’’ स्कूली पाठ्यक्रम के भगवाकरण के आरोपों को खारिज करते हुए एनसीईआरटी के निदेशक ने कहा कि पाठ्यपुस्तकों में गुजरात दंगों और बाबरी मस्जिद से संबंधित संदर्भों को बदला गया है क्योंकि दंगों के बारे में पढ़ाने से छात्र ‘हिंसक और निराश नागरिक बन सकते हैं’। एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी ने एक समाचार एजेंसी के संपादकों के साथ बातचीत में कहा कि पाठ्यपुस्तकों में बदलाव वार्षिक संशोधनों के तहत किए गए हैं और इन पर विवाद खड़ा करने की जरूरत नहीं है। सकलानी ने कहा, ‘‘हमें स्कूली पाठ्यक्रमों में दंगों के बारे में क्यों पढ़ाना चाहिए? हम सकारात्मक नागरिकों का निर्माण करना चाहते हैं, ना कि हिंसक और दुखी लोगों का।’’ उन्होंने कहा, ‘‘जब वे बड़े होंगे तो इसके बारे में जान सकते हैं लेकिन स्कूली पाठ्यपुस्तकें क्यों ? जब वे बड़े हो जाएं तब उन्हें समझना चाहिए कि क्या हुआ था और क्यों हुआ था।’’   शिक्षा का निजीकरण कर रही है भाजपा सरकार : कुमारी सैलजा  कांग्रेस की वरिष्ठ नेता एवं सांसद कुमारी सैलजा ने कहा है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सरकार शिक्षा का निजीकरण कर रही है।सुसैलजा ने बयान में कहा कि प्रदेश के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के हजारों पद रिक्त पड़े हैं, पर सरकार रिक्त पदों पर भर्ती नहीं कर रही। इससे निजी स्कूलों को बढ़ावा मिल रहा है। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिये यह बड़ी समस्या बनती जा रही है क्योंकि उनके बच्चे सरकारी स्कूलों में ही शिक्षा ग्रहण करते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार ऐसे बच्चों को शिक्षा से वंचित रख कर उन्हें और ज्यादा पिछड़े रखना चाहती है। उन्होंने कहा कि हरियाणा के 2300 स्कूलों में 9995 पीजीटी शिक्षकों के रिक्त हैं। इतने पद खाली होने से यह कहा जा सकता है कि सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था लचर हो चुकी है। इससे स्पष्ट होता है कि भाजपा सरकार ने गरीब परिवारों के बच्चों को शिक्षा से वंचित रखने का षडय़ंत्र रचा हुआ है। उन्होंने कहा कि यही स्थिति उच्च शिक्षा में बनी हुई है। प्रदेश के 182 कॉलेज में प्रोफेसर के 7986 में से 4618 पद खाली पड़े हैं। इन खाली पदों ने हरियाणा के भविष्य के रास्ते को संकरा एवं अंधकारमय बना दिया है।  

बीजेपी ने झारखंड विधानसभा चुनाव के लिए शिवराज सिंह चौहान को प्रभारी बनाया

नई दिल्ली लोकसभा चुनाव 2024 खत्म होते ही भाजपा ने अब विधानसभा चुनावों के लिए तैयारी शुरू कर दी है। महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए भाजपा ने चुनाव प्रभारियों की नियुक्ति कर दी है। सोमवार को पार्टी ने भूपेंद्र यादव को महाराष्ट्र का चुनाव प्रभारी घोषित किया। इसके अलावा रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को सह-प्रभारी बनाया गया है। वहीं हरियाणा की जिम्मेदारी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को मिली है और उनके साथ ही त्रिपुरा के पूर्व सीएम बिप्लब कुमार देब सह-प्रभारी बनाए गए हैं। इसी साल अक्टूबर में इन दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। पार्टी ने झारखंड के लिए शिवराज सिंह चौहान को प्रभारी बनाया है। उनके साथ सह-प्रभारी के तौर पर हिमंत बिस्वा सरमा काम करेंगे। जी. किशन रेड्डी को जम्मू-कश्मीर का चुनाव प्रभारी नियुक्त किया गया है। हरियाणा और महाराष्ट्र में कुछ महीनों के अंदर ही चुनाव होने हैं तो वहीं झारखंड में भी अगले साल जनवरी तक इलेक्शन प्रस्तावित हैं। अब तक चुनाव आयोग ने स्पष्ट तौर पर जम्मू-कश्मीर के चुनाव पर कुछ नहीं कहा है, लेकिन पिछले दिनों ही जल्द ही इलेक्शन कराने की बात कही थी। ऐसे में माना जा रहा है कि महाराष्ट्र और हरियाणा के साथ ही यहां भी चुनाव हो सकते हैं। यही वजह है कि भाजपा तैयारियों में जुट गई है। बता दें कि भूपेंद्र यादव पहले भी कई राज्यों में चुनावी रणनीतिकार के तौर पर काम कर चुके हैं। इसलिए उन्हें महाराष्ट्र जैसे राज्य का जिम्मा मिला है। वहीं मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान के लिए भी यह बड़ी जिम्मेदारी है कि वह झारखंड में चुनावी कमान संभालेंगे। गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव के नतीजे भाजपा की उम्मीदों के अनुसार नहीं आए हैं। ऐसे में विधानसभा इलेक्शन के लिए पार्टी पहले से ही तैयारियों में जुट गई है। राज्यसभा की सदस्य संख्या के लिहाज से भी इन बड़े राज्यों में चुनाव जीतना भाजपा के लिए अहम है। भूपेंद्र यादव को महाराष्ट्र की जिम्मेदारी पार्टी की तरफ से जारी प्रेसनोट में कहा गया कि बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने आगामी विधानसभा चुनाव-महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू-कश्मीर के लिए प्रदेश चुनाव प्रभारी एवं सह-प्रभारियों की नियुक्ति की है। यह नियुक्ति तत्काल प्रभाव से लागू होंगी। पार्टी ने महाराष्ट्र के प्रभारी के रूप में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को जिम्मेदारी सौंपी हैं। उनके साथ रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव सह प्रभारी होंगे। हरियाणा संभालेंगे धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को हरियाणा का प्रभारी बनाया गया है। वहीं, सांसद और त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्र बिप्लव कुमार देव राज्य के सह-प्रभारी होंगे। पार्टी ने झारखंड के प्रभारी का दायित्व केंद्रीय कृषि मंत्री और मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह को सौंपा है। झारखंड के सह-प्रभारी की जिम्मेदारी असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा के पास होगी। जी. किशन रेड्डी को जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश जम्मू एवं कश्मीर के राज्यप्रभारी के रूप में केंद्रीय मंत्री जी. किशन रेड्डी को जिम्मेदारी सौंपी गई है। महाराष्ट्र में इसी साल विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। हरियाणा में पिछली बार विधानसभा चुनाव अक्टूबर 2019 में हुए थे। ऐसे में हरियाणा में इसी साल चुनाव होने हैं। झारखंड विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल 5 जनवरी 2025 को खत्म होने वाला है। ऐसे में झारखंड में भी इसी साल चुनाव होंगे।  

संजय सिंह ने कहा कि देश में 80 सीटें जिन पर दोबारा वोटों की काउंटिंग हुई तो मोदी सरकार गिर जाएगी

नई दिल्ली आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सदस्य संजय सिंह ने ईवीएम के मुद्दे को लेकर कहा कि देश में करीब 80 सीटें ऐसी हैं, जिन पर दोबारा काउंटिंग हुई तो मौजूदा सरकार गिर जाएगा। उन्होंने कहा कि ईवीएम को लेकर सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग को कोई सख्त निर्णय लेना चाहिए। अन्यथा यही सिलसिला जारी रहेगा। ईवीएम को लेकर एलन मस्क द्वारा उठाए गए बयान को लेकर संजय सिंह ने सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि अमेरिका जैसा देश कह रहा है कि ईवीएम बंद होनी चाहिए। हमने कई बार ईवीएम को लेकर मांग उठाई तो मीडिया भी हमारा मजाक उड़ा लेता है लेकिन सवाल यह है कि इससे लोकतंत्र कितना मजबूत होगा। अगर ईवीएम में एक बार नहीं अनेक बार ऐसी घटनाएं हुई तो क्या यह चिंता का विषय नहीं होना चाहिए। संजय सिंह ने आगे कहा, ‘जब बटन किसी एक पार्टी के लिए दबाया जा रहा है और वोट किसी दूसरी पार्टी को जा रहा है। महाराष्ट्र में ईवीएम को ओटीपी उम्मीदवार के साले के मोबाइल पर कैसे जा रहा था। 48 वोट से उसे जीता हुआ घोषित कर दिया। शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट के जो उम्मीदवार जीत रहे थे, उन्हें हरा दिया। जबकि पहली काउंटिंग में उद्धव ठाकरे गुट के उम्मीदवार दो हजार से अधिक वोटों से जीते थे। दूसरी बार काउंटिंग में एक वोट से जीते और फिर तीसरी बार में शिंदे गुटे के प्रत्याशी को जीता दिया गया। पूरे देश के अंदर ऐसी कम से कम 80 सीटें है, जिसको लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका भी दाखिल हुई है। अगर ठीक ढंग से काउंटिंग होकर निर्णय आ जाएगा तो मौजूदा सरकार गिर जाएगी। हम सभी ने देखा कि कहीं पर लाइट बंद कराई गई। इस तरह के मामले कई जगह से सामने आए हैं।’  

अब जीतू पटवारी ने इलेक्शन कमीशन पर लगाए गंभीर आरोप

भोपाल देश में लोकसभा चुनावों के परिणामों के बाद एक बार फिर EVM को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं. इसको लेकर राहुल गांधी ने भी पहली सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट किया है. जिसमें उन्होंने EVM को ब्लैक बॉक्स बताया और कहा कि भारत जैसे देश में किसी को भी इसकी जांच करने की अनुमति नहीं है. इसके बाद सियासत तेज हो चली है. इस पूरे मामले को लेकर अब प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने भी सवाल उठाए हैं. जीतू पटवारी ने सोशल मीडिया X पर लिखा “EVM को लेकर लगातार कई सवाल उठ रहे हैं, जिसमें तर्क के साथ तथ्य भी दिए जा रहे हैं. इसमें संदेह के बाद सबूत भी दिए जा रहे हैं! लेकिन इलेक्शन कमीसन ऑफ इंडिया अभी भी चुप है. जीतू ने आगे लिखा “क्या यह चुप्पी किसी बड़ी साजिश का कारण है? EVM को लेकर लंबे समय से उठ रहा विवाद EVM को लेकर लंबे समय से कांग्रेस सवाल खड़े करती नजर आई है. विधानसभा चुनाव हो या फिर लोकसभा चुनाव हर समय कांग्रेस ने EVM पर कई तरह के सवाल खड़े किए हैं. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने तो कई बार इसको लेकर आंदोलन भी किया है. लेकिन, इस पूरे मामले पर ELON मस्क के पोस्ट के बाद राजनीति गर्मा गई है. राहुल ने EVM को बताया ब्लैक बॉक्स राहुल गांधी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि “भारत में ई. वी. एम. एक “ब्लैक बॉक्स” है और किसी को भी उनकी जांच करने की अनुमति नहीं है. हमारी चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर गंभीर चिंताएं जताई जा रही हैं. जब संस्थानों में जवाबदेही की कमी होती है तो लोकतंत्र एक दिखावा बन जाता है. और, धोखाधड़ी का शिकार हो जाता है. एलन मस्क के पोस्ट के बाद राजनीति तेज दुनिया के सबसे अमीर उद्योगपति और टेस्ला के मालिक एलन मस्क भी इससे पहले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर सवाल उठा चुके हैं. उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि हमें इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को खत्म कर देना चाहिए. मनुष्यों या एआई द्वारा हैक होने का खतरा भले ही छोटा लगे, लेकिन यह अभी भी बहुत अधिक है.  

UP में भाजपा की टास्क फोर्स तलाश रही हार के कारण, अब तक मिलीं ये 3 वजहें

लखनऊ लोकसभा चुनाव में भाजपा को उत्तर प्रदेश में करारा झटका लगा है। 2019 में उसे जहां 62 सीटें मिली थीं, वहीं 2024 के आम चुनाव में 33 पर संतोष करना पड़ा है। भाजपा उत्तर प्रदेश जैसे राज्य से 29 सीटें कम मिलने की पूरे देश में चर्चा है। अब पार्टी भी इस पर मंथन में जुटी है और पूरा फीडबैक लेने के बाद कुछ ऐक्शन हो सकता है। अब तक पार्टी नेतृत्व को प्रत्याशियों और स्थानीय नेताओं से जो फीडबैक मिला है, उसके मुताबिक सांसदों को राज्य के कर्मचारियों से सहयोग न मिलना। पार्टी कार्यकर्ताओं का ही खिलाफ हो जाना और संविधान बदलने का गलत नैरेटिव जनता के बीच चल जाना नुकसान पहुंचा गया। यही नहीं भाजपा का राज्य नेतृत्व एक विस्तृत रिपोर्ट भी तैयार कर रहा है। इस रिपोर्ट को इस सप्ताह के अंत तक हाईकमान को सौंपा जाएगा। अब तक मिली जानकारी के अनुसार भाजपा ने यूपी में हार के कारणों की विस्तृत पड़ताल के लिए एक टास्क फोर्स का भी गठन किया है। इस टास्क फोर्स को सूबे की 78 सीटों की समीक्षा का काम सौंपा गया है। सिर्फ पीएम नरेंद्र मोदी की सीट वाराणसी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की सीट लखनऊ की यह टास्क फोर्स समीक्षा नहीं करेगी। इसके अलावा सूबे की बाकी सभी 78 सीटों की समीक्षा की जाएगी। भाजपा को सबसे ज्यादा हैरानी अमेठी, फैजाबाद (अयोध्या वाली सीट), बलिया और सुल्तानपुर जैसी सीटों पर हार से है। इन सीटों को भाजपा के लिए मजबूत माना जाता था। अमेठी में स्मृति इरानी की कांग्रेस के एक आम कार्यकर्ता से हार ने पूरे नैरेटिव को चोट पहुंचाई है। इसके अलावा अयोध्या की हार भी कान खड़े करने वाली है। सुल्तनापुर में मेनका गांधी ही चुनाव हार गईं, जो लगातार जीतती रही हैं। फिर अयोध्या की जीत ने तो पूरे नैरेटिव को ही चोट पहुंचाई है। भाजपा को उस सीट पर हारना पड़ गया, जहां ऐतिहासिक राम मंदिर बना है। 500 सालों के इतिहास का चक्र जिस अयोध्या में घूमा, वहां ऐसी हार ने भाजपा को हैरान कर दिया है। आरएसएस से भी मांग रहे फीडबैक, नैरेटिव को ही पहुंची चोट अब पार्टी पूरे नैरेटिव को कैसे सेट करे और अपनी हार को कैसे पचाया जाए। इसकी तैयारी में जुटी है। सूत्रों का कहना है कि भाजपा को आरएसएस और उसके आनुषांगिक संगठनों से भी फीडबैक मिलेगा। संघ के लोगों से भी कहा गया है कि वे समीक्षा करके बताएं कि हार के क्या कारण रहे। अब तक कई उम्मीदवारों ने भाजपा की स्टेट लीडरशिप को रिपोर्ट सौंप दी है, जिसमें बताया है कि हमारी हार के क्या कारण रहे हैं। इनमें एक बड़ा कारण यह है कि सरकारी कर्मचारियों ने सांसदों का सहयोग नहीं किया है। वहीं पार्टी के ही कार्यकर्ताओं का बड़ा वर्ग खिलाफ चला गया। वहीं जाति के आधार पर ठाकुरों की रैलियों ने भी पश्चिम से पूर्व तक भाजपा को नुकसान पहुंचाया।  

केरल कांग्रेस ने जी7 में पोप – मोदी की मुलाकात का मजाक उड़ाया

नई दिल्ली केरल कांग्रेस ने पोप फ्रांसिस और पीएम नरेंद्र मोदी की मुलाकात पर तंज कसा था। जब कांग्रेस को यह मजाक भारी पड़ गया तो उसने पोप से माफी मांगी है। इस मामले में भाजपा ने कांग्रेस के कमेंट पर आपत्ति जताई थी और फटकार लगाई थी। मामला यूं है कि जी-7 शिखर सम्मेलन के लिए इटली पहुंचे पीएम मोदी ने पोप फ्रांसिस से मुलाकात की थी। मुलाकात की तस्वीर को सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए कांग्रेस ने तंज कसा था- आखिरकार पोप को भगवान से मिलने का मौका मिल ही गया। हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव के लिए प्रचार करते हुए पीएम मोदी ने एक इंटरव्यू में कहा था- मुझे विश्वास है कि मुझे भगवान ने भेजा है। इसे लेकर कांग्रेस ने यह टिप्पणी की थी। कांग्रेस ने फिर एक पोस्ट में माफी मांगी है और कहा है कि किसी धर्म का तिरस्कार करना उसकी परंपरा नहीं है। लगातार तीसरी बार देश की बागडोर संभालने के बाद पीएम मोदी ने पहली विदेश यात्रा के लिए इटली का दौरा किया था। यहां जी-7 शिखर सम्मेलन के लिए पीएम मोदी इटली पीएम मेलोनी के आमंत्रण पर पहुंचे थे। यहां उन्होंने दुनियाभर के राष्ट्रप्रमुखों से मुलाकात की। इस दौरान पीएम मोदी की पोप फ्रांसिस संग भी मुलाकात की तस्वीर सामने आई। इस तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए केरल कांग्रेस ने तंज कसा था। केरल कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर पोप फ्रांसिस का वीडियो शेयर करते हुए लिखा था, “आखिरकार पोप की भगवान से मुलाकात हो गई।” कांग्रेस की इस पोस्ट पर भाजपा नेताओं ने आपत्ति जताई और कांग्रेस पार्टी को फटकार लगाई। भाजपा नेता अमित मालवीय ने कांग्रेस की पोस्ट शेयर करते हुए लिखा कि हिंदुओं का मज़ाक उड़ाने और उनकी आस्था का उपहास करने के बाद कांग्रेस में इस्लामवादी-मार्क्सवादी गठजोड़ अब ईसाइयों का अपमान करने पर उतर आया है। यह तब है, जब सबसे लंबे समय तक कांग्रेस अध्यक्ष रहीं सोनिया गांधी खुद कैथोलिक हैं। उसे माफ़ी मांगनी चाहिए। कांग्रेस को फटकार लगाने वालों में सिर्फ मालवीय ही नहीं, के सुंदरन, हाल ही में कांग्रेस से भाजपा में शामिल हुए अनिल एंटनी और केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन जैसे नेता भी थे। कुरियन ने कहा कि ययह शर्मनाक है कि कांग्रेस इस स्तर तक गिर गई है। चौतरफा घिरने और आलोचना झेलने के बाद केरल कांग्रेस की तरफ से माफीनामा भी आया। कांग्रेस ने मांगी माफी कांग्रेस पार्टी की केरल इकाई ने अगले पोस्ट में लिखा, “इस देश की पूरी जनता जानती है कि किसी भी धर्म, धार्मिक पुजारियों और मूर्तियों का अपमान और तिरस्कार करना भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की परंपरा नहीं है। कांग्रेस एक ऐसा आंदोलन है जो सभी धर्मों और आस्थाओं को एकजुट करता है और मैत्रीपूर्ण माहौल में लोगों को आगे बढ़ाता है। कोई भी कांग्रेस कार्यकर्ता पोप का अपमान करने के बारे में दूर-दूर तक नहीं सोचेगा, जिन्हें दुनिया भर के ईसाइयों के भगवान के समान मानते हैं। हालांकि, कांग्रेस को नरेंद्र मोदी का मज़ाक उड़ाने में कोई गुरेज नहीं है, जो यह कहते हैं कि वह भगवान हैं। देशवासी नरेंद्र मोदी के बेशर्म राजनीतिक खेल को पोप के अपमान के रूप में चित्रित करने की कोशिश करने वालों को समझेंगे। यदि मोदी और उनके साथियों को ईसाई समुदाय के प्रति सच्चा प्रेम है तो मणिपुर में जलाए गए चर्च पर वे चुप क्यों रहे? पहले उन्हें ईसाई समुदाय से बिना शर्त माफी मांगनी चाहिए। यदि इस पोस्ट से ईसाइयों को कोई दुख हुआ हो तो हम क्षमा मांगते हैं।”  

कांग्रेस ने कहा- एनटीए की सत्यनिष्ठा और नीट परीक्षा को आयोजित करने के तौर तरीके ‘‘गंभीर सवालों’’ के घेरे में

नई दिल्ली कांग्रेस ने रविवार को कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) की सत्यनिष्ठा और राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) को आयोजित करने के तौर तरीके ‘‘गंभीर सवालों’’ के घेरे में हैं। पार्टी महासचिव जयराम रमेश ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘मैं 2014 और 2019 के बीच संसद की स्वास्थ्य और परिवार कल्याण संबंधी स्थायी समिति का सदस्य था। मैं उस समय नीट के लिए मिलने वाले व्यापक समर्थन को याद करता हूं। लेकिन ऐसे सांसद भी थे, विशेष रूप से तमिलनाडु से जिन्होंने चिंता जताई थी कि नीट से सीबीएसई के छात्रों को लाभ मिलेगा और दूसरे बोर्ड एवं स्कूलों से आने वाले विद्यार्थियों को नुकसान पहुंचेगा।’’ उन्होंने कहा, ‘‘मुझे अब लगता है कि इस सीबीएसई संबंधी मुद्दे पर उचित विश्लेषण की जरूरत है। क्या नीट भेदभावपूर्ण है? क्या गरीब तबके के विद्यार्थियों को अवसरों से वंचित किया जा रहा है? महाराष्ट्र जैसे अन्य राज्यों ने भी नीट को लेकर गंभीर संदेह व्यक्त किया है।’’ रमेश ने कहा कि राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की सत्यनिष्ठा और नीट को जिस तरह से डिजाइन और आयोजित किया जाता है उसके तरीकों पर भी गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कांग्रेस महासचिव ने दावा किया कि पिछले दशक में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने अपना पेशेवर रवैया स्वयं खत्म कर दिया है।उन्होंने कहा, ‘‘उम्मीद है कि नई स्थायी समितियां गठित होने पर नीट, एनटीए और एनसीईआरटी की गहन समीक्षा करेगी। इसे सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।’’ नीट परीक्षा पांच मई को 4,750 केंद्रों पर आयोजित की गई थी और इसमें करीब 24 लाख अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया था। परिणाम 14 जून को घोषित होने की उम्मीद थी, लेकिन उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन पहले ही पूरा हो जाने के कारण परिणाम चार जून को घोषित कर दिए गए। बिहार में प्रश्नपत्र लीक होने तथा इस प्रतिष्ठित परीक्षा में अन्य अनियमितताओं के आरोप लगे हैं। केंद्र और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने बृहस्पतिवार को उच्चतम न्यायालय को बताया कि उन्होंने एमबीबीएस और ऐसे अन्य पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए परीक्षा देने वाले 1,563 उम्मीदवारों को दिए गए कृपांक रद्द कर दिए हैं। इस संबंध में केंद्र ने कहा है कि उनके पास या तो दोबारा परीक्षा देने या समय की हानि के लिए दिए गए कृपांक को छोड़ने का विकल्प होगा। कांग्रेस ने शुक्रवार को इस मामले पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ‘‘चुप्पी’’ को लेकर सवाल उठाया था और कहा था कि केवल उच्चतम न्यायालय की निगरानी वाली जांच ही लाखों युवा छात्रों के भविष्य की रक्षा कर सकती है।  

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का दावा है कि एनडीए सरकार ज्यादा दिन नहीं चलेगी और ये कभी भी गिर सकती है

बंगलूरू कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का दावा है कि एनडीए सरकार ज्यादा दिन नहीं चलेगी और ये कभी भी गिर सकती है। खरगे ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी को अपने सहयोगियों को एकजुट रखने में काफी परेशानी हो रही है। खरगे बोले-कभी भी गिर सकती है ये सरकार बंगलूरू में मीडिया से बात करते हुए मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा कि ‘एनडीए सरकार गलती से बनी। मोदी जी के पास जनादेश नहीं है, यह अल्पमत की सरकार है। यह सरकार कभी भी गिर सकती है। उन्होंने कहा, ‘हम चाहते हैं कि यह जारी रहे, यह देश के लिए अच्छा हो, हमें देश को मजबूत बनाने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।’ उल्लेखनीय है कि 543 सदस्यों वाली लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 272 है, लेकिन भाजपा बहुमत के आंकड़े से काफी पीछे रही और 240 सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी। ऐसे में सरकार बनाने के लिए भाजपा एनडीए गठबंधन के सहयोगियों पर निर्भर है। जिनमें 16 सीटें जीतने वाली तेदेपा, 12 सीटें जीतने वाली जदयू और एकनाथ शिंदे की शिवसेना (7) और लोजपा (5) प्रमुख हैं। खरगे के बयान पर एनडीए का पलटवार खरगे के बयान पर जदयू ने पलटवार किया है और उनसे पूछा कि जब कांग्रेस ने गठबंधन की सरकार बनाई थी, तब उनके प्रधानमंत्री का स्कोर कार्ड क्या थे? बता दें कि साल 1991 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने भी इतनी ही सीटें जीतीं थी, जितनी भाजपा ने 2024 में जीती हैं। बिना किसी स्पष्ट बहुमत के कांग्रेस ने पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में अल्पमत की सरकार बनाई थी। हालांकि पीवी नरसिम्हा राव ने छोटी पार्टियों को तोड़कर अपनी अल्पमत की सरकार को दो साल में ही बहुमत की सरकार बना लिया था।  

कांग्रेस नेता राहुल गांधी दोनों जगह से जीत कर लोकसभा पहुंचे, अब उन्हें फैसला करना है वायनाड या रायबरेली?

Will Rahul Gandhi become the new face of farmer strategy? Such is the preparation to bring private bill on MSP

नई दिल्ली कांग्रेस नेता राहुल गांधी सोमवार को फैसला कर लेंगे कि वो वायनाड रखेंगे या रायबरेली। वो दोनों जगह से जीत कर लोकसभा पहुंचे हैं। कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि राहुल गांधी सोमवार को अपने फैसले की जानकारी देंगे। राहुल गांधी ने दोनों सीटों पर भारी मतों से जीत दर्ज की है। राहुल गांधी फिलहाल वायनाड से लोकसभा सदस्य थे। लोकसभा चुनाव 2024 में इसी सीट से चुनाव लड़ कर वो फिर जीत गए। राहुल गांधी रायबरेली सीट से भी चुनावी मैदान में उतरे और जीत हासिल की। इस सीट को गांधी परिवार की पारंपरिक सीट माना जाता है। आखिरी बार इस सीट का प्रतिनिधित्व उनकी मां सोनिया गांधी ने किया था। सोनिया गांधी ने इस सीट से चुनाव नहीं लड़ा, वह राज्यसभा सदस्य बन गई हैं। राहुल गांधी बुधवार को अपने निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं का आभार जताने के लिए पहुंचे थे। यहां पर उन्होंने कहा था कि वह दुविधा में हैं कि कौन सी सीट रखें और कौन सी सीट छोड़ दें। उन्होंने कहा कि वह जो भी फैसला लेंगे, उससे सभी खुश होंगे। इस बयान के बाद अटकलें तेज हो गईं कि उनकी बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को यहां से चुनावी मैदान में उतारा जा सकता है। कलपेट्टा में एक जनसभा में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और कन्नूर से लोकसभा सदस्य के. सुधाकरन ने बुधवार को कहा था, “राहुल गांधी पार्टी के हित में वायनाड सीट खाली करेंगे।” हालांकि, कांग्रेस विधायक और पूर्व राज्य मंत्री एपी अनिल कुमार ने कहा कि सभी लोग चाहते हैं कि राहुल गांधी वायनाड सीट बरकरार रखें।

ममता सरकार और राजभवन के बीच जारी टकराव की वजह से नवनिर्वाचित दो विधायकों की शपथ पर ‘ग्रहण’ लगा

कोलकाता ममता सरकार और राजभवन के बीच जारी टकराव की वजह से नवनिर्वाचित दो विधायकों की शपथ पर ‘ग्रहण’ लगा हुआ है। कहा जा रहा है कि नवान्न यानी राज्य सचिवलाय राज्यपाल सीवी आनंद बोस से बचने की कोशिश में है। हालांकि, शपथ को लेकर विधानसभा सचिवालय के नए कदम के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज है। नतीजे घोषित होने के 10 दिन बीत जाने के बाद भी दोनों नवनिर्वाचित विधायकों को शपथ नहीं दिलाई गई है। पहले पता चला कि संसदीय कार्य मामलों के कार्यालय ने परंपरा के मुताबिक इस संबंध में राजभवन से संपर्क किया था, लेकिन राजभवन की ओर से कोई जवाब नहीं मिला। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार शपथ समारोह के प्रबंधन को लेकर संसदीय कार्य मामले के कार्यालय से राज्यपाल को लिखित पत्र भेजने की परंपरा है और उसके आधार पर राज्यपाल संविधान के अनुच्छेद 188 के अनुसार इस संबंध में निर्णय लेते हैं। लेकिन, बारानगर और भागवानगोला के दो नवनिर्वाचित विधायकों की शपथ के लिए संसदीय मामलों के कार्यालय ने राजभवन को कोई पत्र नहीं भेजा है। बल्कि पत्र विधानसभा सचिवालय की ओर से भेजा गया है। इसके बाद हालिया राजभवन और राज्य सचिवालय विवाद से नई जटिलताएं सामने आ गई हैं। संसदीय परंपरा के अनुसार, उप-चुनाव के मामले में राज्यपाल विधानसभा स्पीकर या अपनी पसंद के किसी व्यक्ति को शपथ दिलाने के लिए नियुक्त कर सकते हैं। लेकिन राज्यपाल और ममता सरकार के बीच टकराव के कारण पूर्व राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने इस व्यवस्था को बदल दिया था। स्पीकर के साथ मतभेद के कारण उन्होंने डिप्टी स्पीकर को यह जिम्मेदारी देकर एक असाधारण निर्णय लिया था। इस पर उस समय प्रशासनिक और राजनीतिक स्तर पर लंबी बहस चली थी। नवान्न ने इस बार अलग राह अपनाई है। सूत्रों के अनुसार संसदीय कार्य विभाग के कार्यालय ने इस संबंध में पत्र तो तैयार कर लिया, लेकिन राजभवन को नहीं भेजा है। संसदीय विभाग के अनुरोध पर विधानसभा सचिवालय ने शपथ ग्रहण के लिए राज्यपाल को पत्र भेजा है। राजनीतिक खेमे का मानना है कि ममता सरकार का यह कदम राज्यपाल के खिलाफ हाल ही में लगे आरोपों का नतीजा है। हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा चुनावों के प्रचार के दौारन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने खुद राज्यपाल पर उंगली उठाते हुए सार्वजनिक सभाओं कहा था कि अगर राज्यपाल बैठक बुलाई तो वह राजभवन नहीं जाएंगी।

उद्धव ठाकरे और शरद पवार ने कहा- पार्टी छोड़कर दूसरे गुटों में शामिल ‘बागियों को वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता’

मुंबई शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे और राकांपा (SP) सुप्रीमो शरद पवार ने पार्टी छोड़कर दूसरे गुटों में शामिल होने वाले नेताओं को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि बागियों को पार्टी में वापस लेने का सवाल ही नहीं उठता। गौरतलब है कि एकनाथ शिंदे के विद्रोह के बाद जून 2022 में शिवसेना विभाजित हो गई थी। वहीं पिछले साल जुलाई में आठ विधायकों के साथ अजीत पवार के राज्य सरकार में शामिल होने के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी दो गुटों में टूट गई थी। हालांकि, लोकसभा चुनाव में उद्धव और शरद गुट की ही पार्टियो ने बेहतर प्रदर्शन किया, जिसके बाद से अटकलें लगाई जा रही हैं कि प्रतिद्वंद्वी गुटों के कुछ नेता वापस लौटना चाहते हैं। ‘कोई सवाल ही नहीं’ लोकसभा नतीजे घोषित होने के बाद शनिवार को महाविकास अघाड़ी की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में उद्धव ठाकरे और शरद पवार, दोनों ने स्पष्ट रूप से कहा कि विद्रोही नेताओं को वापस लेने का कोई सवाल ही नहीं है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनावों में पारनेर विधायक नीलेश लंके अजित पवार गुट से शरद पवार के नेतृत्व वाले गुट में चले गए थे और अहमदनगर से मौजूदा भाजपा सांसद सुजय विखे पाटिल को हराकर जीत हासिल की थी। एनडीए का प्रदर्शन रहा खराब इसी तरह, बजरंग सोनावणे ने भी अजीत पवार के नेतृत्व वाली राकांपा छोड़ दी और राकांपा (SP) के टिकट पर बीड से लोकसभा चुनाव लड़ा। उन्होंने राज्य की पूर्व मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता पंकजा मुंडे को हराया। दूसरी ओर, राज्य में भाजपा की सीटें 2019 के मुकाबले 23 से घटकर इस बार नौ हो गईं, जबकि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और अजीत पवार की राकांपा को क्रमशः सात और एक सीट पर जीत से संतोष करना पड़ा। समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार 9 जून को नरेंद्र मोदी सरकार के शपथ ग्रहण के बाद कथित तौर पर सत्तारूढ़ भाजपा के सहयोगी दल एनसीपी और शिवसेना के भीतर बेचैनी है। अजीत पवार गुट को स्वतंत्र प्रभार के साथ राज्य मंत्री का एक पद देने के लिए कहा गया था, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया। वहीं, सात सांसदों वाली शिंदे के नेतृत्व वाली सेना के केवल एकमात्र सांसद प्रतापराव जाधव को राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में केंद्र सरकार में शामिल किया गया था।

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