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किसी ने कार्यकर्ताओं की उदासीनता की बात की तो किसी ने हार का ठीकरा भितरघातियों पर फोड़ा, यूपी में बीजेपी की हार के कारण

लखनऊ भाजपा में हार पर मंथन शुरू हो गया है। किसी ने कहा कि कई जातियां छिटकने से हार गए। कोई बोला संगठन निष्क्रिय रहा। किसी ने कार्यकर्ताओं की उदासीनता की बात की तो किसी ने हार का ठीकरा भितरघातियों पर फोड़ा। टिकटों का जल्दी घोषित होना भी कुछ लोगों ने चुनाव की हवा बिगड़ने का कारण बताया। ऐसी तमाम बातें भाजपा के अवध क्षेत्र की सीटों से हारे प्रत्याशियों ने कहीं। पार्टी द्वारा क्षेत्रवार की जा रही समीक्षा के क्रम में गुरुवार को उन्हें प्रदेश कार्यालय पर बुलाया गया था। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह ने अवध क्षेत्र के जीते और हारे प्रत्याशियों से अलग-अलग बात की। केंद्र में तीसरी बार मोदी सरकार की ताजपोशी के बाद अब यूपी में हार के कारणों की समीक्षा का सिलसिला शुरू हो गया है। पार्टी ने दो स्तर पर समीक्षा का सिलसिला शुरू किया है। एक ओर सभी प्रत्याशियों से क्षेत्रवार चर्चा कर उनकी हार के कारण पूछे जा रहे हैं। साथ ही सुधार के लिए उनके सुझाव भी लिए जा रहे हैं। इसकी शुरुआत गुरुवार को अवध क्षेत्र से हुई। अवध में शामिल 16 लोकसभा सीटों में से लखनऊ के सांसद व रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और गोंडा के सांसद व केंद्रीय राज्यमंत्री कीर्तिवर्धन सिंह और बाराबंकी की प्रत्याशी को छोड़ बाकी सभी पहुंचे। दूसरी ओर हार के जमीनी कारणों का पता लगाने के लिए एक 80 लोगों की टॉस्क फोर्स भी बनाई गई है। पार्टी सूत्रों की मानें तो कौशल किशोर, साक्षी महाराज, रेखा वर्मा, अजय मिश्रा टेनी, दिनेश प्रताप सिंह, लल्लू सिंह, राजेश वर्मा और रितेश पांडेय ने अलग-अलग चर्चा में अपनी हार के कारण बताए। सभी ने संविधान बदलने और आरक्षण खतरे में होने के विपक्षी दांव के चलते नुकसान होने की बात कही। अयोध्या के प्रत्याशी लल्लू सिंह ने पार्टी के कई लोगों पर सहयोग न करने का आरोप लगाया। कौशल किशोर, साक्षी महाराज, रेखा वर्मा, दिनेश प्रताप सिंह द्वारा भी कुछ ऐसे ही आरोप लगाए जाने की खबर है। प्रत्याशियों ने यह भी कहा कि जल्दी टिकट घोषित होने के कारण भी माहौल बिगाड़ने वालों को ज्यादा मौका मिला। वहीं चुनाव जीतने वाले हरदोई और मिश्रिख के सांसदों ने प्रदेश नेतृत्व का आभार जताया। शुक्रवार को कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र के प्रत्याशियों संग हार के कारणों पर चर्चा होनी है। आज होगी टास्क फोर्स की बैठक यूपी में चुनावी नतीजे भाजपा की अपेक्षा के प्रतिकूल रहे। अब पार्टी ने एक 80 सदस्यों वाली टास्क फोर्स बनाई है। यह टॉस्क फोर्स 15 जून से तय लोकसभा क्षेत्रों में जाएगी। एक टीम में दो सदस्य होंगे। हर टीम को दो-दो लोकसभा क्षेत्र दिए गए हैं। हर लोकसभा क्षेत्र में टीम 3 से 4 दिन रहेगी। शुक्रवार को दोपहर 12 बजे से पार्टी के प्रदेश मुख्यालय में इस टास्क फोर्स की बैठक होगी। बैठक में प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी और महामंत्री संगठन धर्मपाल सिंह मौजूद रहेंगे। टास्क फोर्स के सदस्यों को वे बिंदु बताए जाएंगे, जिन पर उन्हें अपनी रिपोर्ट तैयार करनी है। इनमें संगठन की स्थिति, सामाजिक समीकरण कैसे गड़बड़ाए, केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का असर, प्रत्याशी की स्थिति सहित अन्य बिंदु शामिल हैं। इन टीमों में प्रदेश और क्षेत्र के पदाधिकारियों के साथ ही कुछ जनप्रतिनिधियों को भी शामिल किया गया है।  

कांग्रेस 99 पर क्या पहुंची, आतंकवादी समूह सक्रिय हो गए- बीजेपी

 नई दिल्ली भाजपा ने आतंकवादी संगठनों को मुंहतोड़ जवाब देने का दावा करते हुए कहा है कि कांग्रेस 99 पर क्या पहुंची देश में आतंकवादी समूह फिर से सक्रिय हो गए हैं। फैजाबाद में भाजपा की हार के बाद जैश-ए-मोहम्मद अयोध्या में राम मंदिर को उड़ाने की धमकी देने लगा है। भाजपा के आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने शनिवार को एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “कांग्रेस 99 पर क्या पहुंची, आतंकवादी समूह सक्रिय हो गए। एक तरफ विपक्ष फैजाबाद में भाजपा की हार का जश्न मना रहा है तो दूसरी तरफ जैश-ए-मोहम्मद अयोध्या में राम मंदिर को उड़ाने की धमकी दे रहा है। कांग्रेस की तरह, उन्हें भी जल्द ही एहसास होगा कि 99 पर कोई केवल ‘नैतिक’ जीत का ही दावा कर सकता है, सरकार बनाने का नहीं। मुंहतोड़ जवाब मिलेगा।” लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार के अयोध्या से हारने के बाद और पूरे देश के नतीजे आने के बाद से ही विपक्षी दल लगातार भाजपा की जीत पर सवाल उठा रहे हैं। अयोध्या की हार को भाजपा के लिए बड़ी हार बताते हुए विपक्षी दल लोकसभा में भाजपा की सीटों की संख्या कम होने पर भी कटाक्ष कर रहे हैं। उनका दावा है कि यह भाजपा की नैतिक हार है। उल्लेखनीय है कि पिछले कुछ दिनों में जम्मू कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं में भी बढ़ोतरी देखी गई है। आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने अयोध्या में राम मंदिर को बम से उड़ाने की धमकी दी है। आतंकी धमकी के मद्देनजर अयोध्या में सुरक्षा-व्यवस्था और मजबूत कर दी गई है।

17 जून को भोपाल में भाजपा कार्यालय में मनाया जाएगा जश्न, मप्र के सभी 6 केंद्रीय मंत्री आएंगे

भोपाल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की नरेंद्र मोदी सरकार में मध्य प्रदेश से बनाए गए 6 मंत्री रविवार को एक साथ भोपाल में भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश कार्यालय में एकत्रित होंगे, जहां संगठन की ओर से सभी केंद्रीय मंत्रियों का स्वागत किया जाएगा। पार्टी के इस कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डॉ. वीरेंद्र कुमार, दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया, केंद्रीय जनजातीय कार्य राज्यमंत्री दुर्गादास उईके, राज्य मंत्री महिला एवं बाल विकास सावित्री ठाकुर और एल मुरुगन (मप्र से राज्यसभा सदस्य) का प्रदेश भाजपा की ओर से सार्वजनिक अभिनंदन किया जाएगा। अभिनंदन कार्यक्रम कार्यक्रम में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा, प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद सहित सभी वरिष्ठ पदाधिकारी उपस्थित रहेंगे। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा ने बताया कि मोदी सरकार में प्रदेश से बनाए गए सभी मंत्रियों का प्रदेश की जनता के साथ औपचारिक परिचय कराने की दृष्टि से संगठन द्वारा अभिनंदन कार्यक्रम रखा गया है। सभी केंद्रीय मंत्रियों ने दी सहमति सभी केंद्रीय मंत्रियों ने इसकी सहमति भी दे दी है। प्रदेश भाजपा कार्यालय में यह कार्यक्रम शाम छह बजे आयोजित किया जाएगा। शर्मा ने कहा कि मध्य प्रदेश एकमात्र ऐसा राज्य है जहां से दो-दो नए आदिवासी चेहरे को मोदी कैबिनेट में स्थान दिया गया है। कोर कमेटी की बैठक में संकल्प पत्र पर चर्चा भाजपा की कोर कमेटी की बैठक भी 17 जून को बुलाई गई है। इसमें भाजपा के संकल्प पत्र के मुद्दों पर भी चर्चा होगी। सत्ता- संगठन में समन्वय से लेकर मंत्रियों के कामकाज और लोकसभा चुनाव में उनके प्रदर्शन पर भी कोर ग्रुप चर्चा करेगा। इसी दिन संगठन से जुड़ी अन्य बैठकें भी होंगी।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में अकेले लड़ सकती है बीजेपी

मुंबई 2024 लोकसभा चुनावों के बाद से महाराष्ट्र में उथल-पुथल की अटकलें लग रही है। अब सामने आया है कि लोकसभा चुनावों में करारी शिकस्त का सामना करने के बाद बीजेपी विधानसभा चुनावों में अकेले चुनाव लड़ सकती है। सूत्रों के अनुसार पार्टी ने राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव अकेले लड़ने की संभावनाओं का आकलन करने के लिए एक आंतरिक सर्वेक्षण कर रही है। यह सर्वेक्षण लोकसभा चुनावों में अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ मिलकर निराशाजनक प्रदर्शन के बाद हो रहा है। उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र में लोकसभा की सीटों की संख्या सबसे ज्यादा है। उत्तर प्रदेश में 80 और महाराष्ट्र में 48 सीटें हैं। इनमें बीजेपी को सिर्फ 9 पर जीत मिली है। बीजेपी के आंतरिक सर्वे करवाने की चर्चा ऐसे वक्त पर सामने आई है जब आरएसएस से जुड़े रहे एक नेता ने अजित पवार से गठजोड़ करने पर सवाल खड़े किए हैं। क्या है बीजेपी की तैयारी? लोकसभा चुनावों में बीजेपी ने 28 सीटों पर कैंडिडेट उतारे थे। इनमें उसे सिर्फ 9 पर जीत मिली है। राज्य में इस साल अक्टूबर में विधानसभा प्रस्तावित है। ऐसे में पार्टी आगे की रणनीति बनाने में जुटी है। सूत्रों के अनुसार बीजेपी ने 2019 के विधानसभा चुनावों में राज्य की 106 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। पार्टी ने आगे की रणनीति को तय करने के लिए इन्हीं 106 विधानसभा क्षेत्रों में एक आंतरिक सर्वेक्षण शुरू किया है। सूत्रों की मानें पार्टी ने अभी तक अजित पवार को छोड़ने पर फैसला नहीं किया है, लेकिन पार्टी मौजूदा मूड और सीटों को अकेले ही बरकरार रखने की चुनौतियों का आकलन कर रही है। अगर पार्टी विधानसभा चुनावों में अकेले जाने का फैसला करती है, तो जमीनी हकीकत का अध्ययन करने के लिए जल्द ही शेष 182 विधानसभा क्षेत्रों में भी इसी तरह के सर्वेक्षण शुरू किए जाएंगे। महाराष्ट्र में विधानसभा की कुल 288 सीटें है। सरकार बनाने के लिए 145 सीटें चाहिए। सर्वेक्षण में क्या-क्या है? बीजेपी के एक सूत्र ने कहा कि ये सर्वेक्षण यह पता लगाने के लिए शुरू किए गए हैं कि पार्टी अकेले कैसे बहुमत हासिल करेगी। इसके अलावा सर्वेक्षण में यह भी सामने आए कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना के साथ गठबंधन में भाजपा कैसा प्रदर्शन करेगी? सर्वेक्षण यह भी पता लगाएगा कि क्या एनसीपी के साथ गठबंधन जारी रहना चाहिए या फिर नहीं। 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की सीटें 23 के मुकाबले घटकर 9 पर आ गईं, जबकि शिवसेना ने 7 और एनसीपी ने एक सीट जीती, जिससे महायुति की कुल ताकत 17 हो गई, जबकि महा विकास आघडी को 31 सीटें मिली हैं। सूत्रों कहा कहना है कि यह सर्वेक्षण आरएसएस पत्रिका द ऑर्गनाइजर द्वारा यह सुझाव दिए जाने से बहुत पहले शुरू किए गए थे कि अजीत पवार को एनडीए में शामिल करने के बीजेपी के कदम ने पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित किया है। द ऑर्गनाइजर में प्रकाशित एक लेख में आरएसएस के वरिष्ठ नेता रतन शारदा ने लिखा था कि महाराष्ट्र बीजेपी और एकनाथ शिंदे के पास राज्य में आराम से बहुमत था। उन्होंने लिखा था कि पार्टी ने अजित पवार को साथ लेकर अपनी ब्रैंड वैल्यू खो दी। लेख पर क्या बाेले नेता? महाराष्ट्र भाजपा प्रवक्ता केशव उपाध्याय का कहना है कि द ऑर्गेनाइजर स्वतंत्र विचारों की पत्रिका है। बीजेपी हर अखबार के संपादकीय का सम्मान करती है। बीजेपी हर जीत और हार के बाद मंथन करती है और उसके आधार पर पार्टी आगे की रणनीति तय करती है। उन्होंने विधानसभा चुनाव में बीजेपी के एनसीपी से अलग होने की संभावना पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया। अजित पवार की अगुवाई वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल ने कहा कि यह लेख भाजपा का आधिकारिक रुख नहीं है। इसके किसी भी पदाधिकारी ने कोई बयान नहीं दिया है। यह एक व्यक्तिगत विचार है। हर एक बात पर हमें स्पष्टीकरण या प्रतिक्रिया की जरूरत नहीं है। महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने पिछले सप्ताह पार्टी की हार की जिम्मेदारी लेते हुए सरकार से इस्तीफा देने की घोषणा की थी। तब उन्होंने कहा था कि महायुति को 43.6 प्रतिशत वोट मिले हैं, जबकि महा विकास अघाड़ी को 43.9 प्रतिशत वोट मिले हैं। बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद उपमुख्यमंत्री बने रहने का फैसला किया था।

संघ ने लोकसभा चुनाव में कोई हस्तक्षेप नहीं किया, जो दिख रहा है बात उससे कहीं कुछ ज्यादा है?

Proceedings against 11 forest officers including Devanshu in scam worth Rs 7.5 crores aborted

नागपुर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के पहिए दशकों से एक लय में एक गति से चल रहे हैं. जब नए इलाकों में पैर जमाने की बात आई तो संघ हमेशा आगे रहा. यहां RSS ने पहले जमीन तैयार की, फिर बीजेपी वहां पहुंची और राजनीतिक रूप से स्वयं को समृद्ध किया. अगर दोनों संगठनों के बीच ऐसा सहज समन्वय और सामंजस्य है तो संघ परिवार की ओर से फिर असहमति के स्वर क्यों? ये असंतोष के बुदबुदाहट क्यों? और बुदबुदाहट ही क्यों इंद्रेश कुमार ने तो अब खुली घोषणा कर दी है- अहंकारियों को प्रभु राम ने रोक दिया है.   दरअसल नागपुर में एक कार्यक्रम के दौरान आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के खिलाफ जब टिप्पणी की तो इस फुसफुसाहट के स्वर तेज हो गए और ये राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई. टिप्पणियों का ये सिलसिला यहीं नहीं रुका. मोहन भागवत के बाद संघ के मुखपत्र पांचजन्य में लोकसभा चुनाव में बीजेपी के परफॉर्मेंस पर एक आलोचनात्मक लेख छपी शीर्षक था- लोकसभा चुनाव-2024/NDA: सबक हैं और सफलताएं भी. ‘आर्गनाइजर’ में भी टिप्पणी की गई. इन लेखों पर चर्चा हो ही रही थी कि संघ नेता इंद्रेश कुमार ने सार्वजनिक मंच से कहा कि ‘राम सबके साथ न्याय करते हैं. 2024 के लोकसभा चुनाव को ही देख लीजिए. जिन्होंने राम की भक्ति की, लेकिन उनमें धीरे-धीरे अंहकार आ गया. उस पार्टी को सबसे बड़ी पार्टी बना दिया. लेकिन जो उसको पूर्ण हक मिलना चाहिए, जो शक्ति मिलनी चाहिए थी, वो भगवान ने अहंकार के कारण रोक दी.’ भागवत, इंद्रेश कुमार की टिप्पणियां ऐसे समय में आई है जब इस बात पर गहन चर्चा चल रही है कि क्या आरएसएस ने वास्तव में बीजेपी से दूरी बना ली है और 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान पूरे दिल से उसका समर्थन नहीं किया है. मोहन भागवत ने आम चुनाव के बाद, जहां बीजेपी बहुमत से 30 सीटें पीछे रह गई थी, अपनी पहली टिप्पणी में प्राथमिकता के आधार पर मणिपुर के संघर्ष को समाप्त करने तथा सरकार और विपक्ष के बीच आम सहमति की आवश्यकता की बात कही थी. मोहन भागवत ने कहा था, “एक सच्चा सेवक मर्यादा बनाए रखता है, वह काम करते समय मर्यादा का पालन करता है. उसमें यह अहंकार नहीं होता कि वह कहे कि ‘मैंने यह काम किया’. केवल वही व्यक्ति सच्चा सेवक कहलाता है.” कुछ लोगों ने उनकी टिप्पणी को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आलोचना के रूप में देखा, क्योंकि प्रधानमंत्री ने कई अवसरों पर स्वयं को जनता का “प्रधान सेवक” बताया था. मोहन भागवत की हालिया टिप्पणियां, पहले की कई बार की तरह ही अस्पष्ट हैं. भागवत के बाद बोले इंद्रेश कुमार भागवत के बयान का लक्ष्य कौन है? इसका संदेश क्या है इस पर एक्सपर्ट कमेंट आ ही रहे थे कि संघ के बड़े फंक्शनरी इंद्रेश कुमार ने अपने बयान सारा धुंध साफ कर दिया. उन्होंने राजस्थान में एक बयान में स्पष्ट कहा कि अहंकारियों को प्रभु राम ने 241 पर रोक दिया है. अब ये स्पष्ट है कि संघ पब्लिक प्लेटफॉर्म पर स्पष्ट मैसेज देना चाहता है. इंद्रेश ने बिना लाग-लपेट के कहा, “जिस पार्टी ने (भगवान राम की) भक्ति की, लेकिन अहंकारी हो गई, उसे 241 पर रोक दिया गया, लेकिन उसे सबसे बड़ी पार्टी बना दिया गया…” उन्होंने आगे कहा, “लोकतंत्र में रामराज्य का विधान देखिए, जिन्होंने राम की भक्ति की लेकिन धीरे-धीरे अहंकारी हो गए, वो पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, लेकिन जो वोट और ताकत मिलनी चाहिए थी, वो भगवान ने उनके अहंकार के कारण रोक दी.” इंद्रेश कुमार के इस बयान का वजन इतना है कि बीजेपी की ओर से कोई भी बड़े नेता ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है. कांग्रेस, शिवसेना जैसे विपक्षी दल और बीजेपी की सहयोगी जेडीयू ने इस पर जरूर अपनी प्रतिक्रिया दी है. लेकिन संघ द्वारा अहंकारी बतलाये जाने के बाद बीजेपी ने अपनी रक्षा में कुछ खास तर्क नहीं दिए हैं. कैसे रहे हैं संघ और बीजेपी के रिश्ते? आरएसएस और बीजेपी के बीच संबंध और संघ किस हद तक इस राजनीतिक पार्टी पर प्रभाव डालता है, यह हमेशा से चर्चा का विषय रहा है. इतना ही नहीं, आरएसएस पर शोधकर लिखी गई किताब के लेखक ने इस मुद्दे को “पुरानी बात” कहकर खारिज कर दिया. लेकिन संघ-बीजेपी के इकोसिस्टम पर नजर रखने वाले लोग कहते हैं कि इस बार बात कुछ अलग है. वे भागवत की टिप्पणियों के समय की ओर इशारा करते हैं, जो एक ऐसे चुनाव के बाद आई है जिसमें भाजपा बहुमत के आंकड़े से पीछे रह गई और प्रधानमंत्री मोदी की बड़े और साहसिक निर्णय लेने की क्षमता को झटका लगा. उनका कहना है कि हाल के वर्षों में नागपुर और अहमदाबाद के बीच पर्सनैलिटी की खींचतान चल रही है, क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी की बढ़ती लोकप्रियता और उनके चुनावी वादों को पूरा करने के कारण सत्ता का केंद्र अहमदाबाद की ओर खिसक गया है. लेखक और वरिष्ठ पत्रकार दीप हलदर ने इंडियाटुडे.इन से बातचीत में कहते हैं, “आरएसएस यह बात खुलकर नहीं कहने जा रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में भाजपा की प्रभावशाली भूमिका को लेकर संघ परिवार सहज नहीं है.” हालदार कहते हैं, “यह सिर्फ़ बीजेपी की सीटों की संख्या का मामला नहीं था, बल्कि राम मंदिर और अनुच्छेद 370 जैसे वादे भी थे, जिन्हें पीएम मोदी के कार्यकाल में पूरा किया गया था. खासकर 2019 में कार्यकाल की शुरुआत से ही बीजेपी नेतृत्व संघ से सलाह नहीं ले रहा था.” गौरतलब है कि नरेंद्र मोदी आरएसएस प्रचारक रहे हैं और संघ की नजरों में वे आदर्श प्रधानमंत्री माने जाते हैं. सच्चाई तो ये है कि आरएसएस ने 2014 के आम चुनाव में उनके लिए अपने सभी सहयोगी संगठनों की ताकत लगा दी थी. हालांकि, आरएसएस-भाजपा तंत्र के करीबी एक वरिष्ठ पत्रकार ने नाम न बताने की शर्त पर इंडियाटुडे.इन को बताया कि उनका व्यापक आभामंडल और उनका सत्ता का केंद्र बन जाना नागपुर में संघ के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों को पसंद नहीं आया. बता दें कि आरएसएस राजनीति में सक्रिय भूमिका अदा नहीं करता है. इसका रोल राह दिखाने का है. अपने व्यापक नेटवर्क के जरिए यह भाजपा … Read more

भाजपा की टीमें इसी हफ्ते लोकसभा क्षेत्रों में जाएंगी, पता लगाएगी 8% वोट कहाँ गए

नईदिल्ली यूपी के नतीजों से भाजपा परेशान है। लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हड़कंप है। पार्टी का करीब आठ फीसदी वोट चोरी हो गया है। पार्टी मंथन में जुट गई है। इस चोरी का पता लगाने के लिए स्पेशल टास्क फोर्स गठित की जा रही है। फोर्स में संगठन के पदाधिकारियों से लेकर जनप्रतिनिधि तक सबको जगह मिलेगी। सब क्षेत्र में जाएंगे। गांव-गली, मोहल्लों में जाकर पता करेंगे कि इतनी रखवाली के बावजूद आखिर वोटों की चोरी कैसे हो गई। इसमें कौन-कौन शामिल थे। केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन चुकी है। मगर यूपी को लेकर पार्टी नेतृत्व के मन में भारी टीस है। समझ नहीं आ रहा कि सुरागरशी कैसे हो ताकि देश के सबसे बड़े सूबे में पार्टी की सियासी जमीन खिसकने के कारणों का पता लग सके। यूपी की हार को लेकर दिल्ली और यूपी के अपने तर्क हैं। मगर सच्चाई यह है कि 2019 में अकेले दम पर करीब 50 फीसदी वोट लाने वाली भाजपा अबकी बार 41 फीसदी का आंकड़ा पार करते में हांफ गई। यूपी की हार से दिल्ली बेहद चिंतित है। भाजपा की टीमें इसी हफ्ते लोकसभा क्षेत्रों में भेजी जाएंगी  प्रदेश मुख्यालय में फिर प्रदेश अध्यक्ष और महामंत्री संगठन ने चर्चा की। तय किया गया है कि प्रदेश की सभी सीटों पर हार के कारणों का पता लगाने के लिए स्पेशल टीमें गठित की जाएं। इन्हें हर जिले में लोकसभा और विधानसभा स्तर तक भेजा जाए। इसके लिए 50 से 60 चेहरे चुन लिए गए हैं। इन्हें वो सारे कारण पता लगाने होंगे, जो पार्टी की हार का कारण बने। हारी सीटें जीतना तो दूर, जीती हुई सीटें तक गंवानी पड़ी। टीमें यह भी पता लगाएंगी कि आखिर पार्टी के अगड़े-पिछड़े वोट बैंक में सेंध कैसे लगी। पार्टी के पास इतना बड़ा तंत्र होने के बावजूद चूक कहां और किस स्तर पर हुई। पार्टी सूत्रों की मानें तो इसी सप्ताह टीमों को लोकसभा क्षेत्रों में भेजा जाएगा। 1962 के बाद तीसरी बार रिपीट हुई कोई सरकार “इस जनादेश के कई पहलू हैं. 1962 के बाद यह पहली बार है कि कोई सरकार अपने दो कार्यकाल पूरे करने के बाद लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटी है…” विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA को लेकर पीएम मोदी ने कहा, “पूरा गठबंधन सारे विरोधी मिलकर उतनी सीटें नहीं जीत पाए, जितनी बीजेपी ने जीती.” मोदी ने कहा कि NDA के तीसरे कार्यकाल में देश कई बड़े फैसलों का नया अध्याय लिखेगा.”  

सिंधिया की जगह पर प्रदेश से कौन जाएगा राज्यसभा? केपी यादव की दावेदारी पर भारी पड़ सकते ये तीन नाम

भोपाल लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद अब प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर में बड़ा बदलाव हो गया है। कहीं विधानसभा सीटें रिक्त हो गई हैं, तो कहीं राज्यसभा सीटों पर भी निर्वाचन होगा। सत्तारूढ़ भाजपा सहित कांग्रेस भी अपनी रणनीति बनाने में जुट गई है। ऐसे में एक सीट काफी चर्चा का विषय बनी हुई है। वह है मध्य प्रदेश की राज्यसभा सीट, जो कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद रिक्त हो गई है। अब इस रिक्त सीट पर उपचुनाव होना है। ऐसे में सवाल है कि भाजपा की तरफ से ज्योतिरादित्य सिंधिया की जगह कौन लेगा? दावेदारों के नाम सामने आने लगे है। भाजपा के खाते में तय है यह सीट मध्य प्रदेश में वर्तमान में विधानसभा में सदस्य संख्या के हिसाब से देखा जाए तो खाली होने वाली राज्यसभा की सीट फिर भाजपा के खाते में जाना तय मानी जा रही है। भाजपा इस सीट से किसी वरिष्ठ नेता को राज्यसभा भेजने का मन बना रही है। इससे पहले फरवरी 2024 में मध्य प्रदेश में हुए राज्यसभा चुनाव में भाजपा ने दलित, ओबीसी और महिला कार्ड खेला था। इस बार भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में मध्य प्रदेश के किसी सामान्य वर्ग के नेता को प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। ऐसे में इस बार संभावना जताई जा रही है कि ठाकुर या ब्राह्मण कोटे से यह पद भरा जा सकता है। पूर्व सांसद केपी यादव रेस में आगे हालांकि गुना लोकसभा सीट से पूर्व सांसद केपी यादव का टिकट काटकर ज्योतिरादित्य सिंधिया को टिकट दिया गया था। लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान अशोक नगर में केंद्रीय मंत्री अमित शाह एक सभा में पूर्व सांसद केपी यादव को दिल्ली ले जाने का संकेत दे चुके हैं। इससे अनुमान लगाया जा रहा है कि भाजपा यादव को राज्यसभा का टिकट दे सकती है। ऐसे में सबसे पहली दावेदारी केपी के नाम की है, लेकिन वे ओबीसी वर्ग से आते हैं। अप्रैल में ये गए हैं राज्यसभा गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के 5 राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल 2 अप्रैल 2024 को समाप्त हुआ था। इसमें भाजपा के चार सांसद धर्मेंद्र प्रधान, डॉ. एल मुरुगन, अजय प्रताप सिंह और कैलाश सोनी थे, जबकि कांग्रेस के राजमणि पटेल राज्यसभा सांसद थे। तब भाजपा ने 4 सीटों में से 3 पर ओबीसी से बंशीलाल गुर्जर, दलित समाज से उमेश नाथ महाराज और महिला कोटे से माया नारोलिया को उम्मीदवार बनाया और राज्यसभा में भेजा। डॉ मुरुगन को फिर से मध्यप्रदेश के कोटे से राज्यसभा में भेजा था। इस बार जातीय समीकरण के हिसाब से अब ठाकुर या ब्राह्मण को मौका दिया जा सकता है। यह नाम सबसे उपर पूर्व मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा, राम मंदिर अभियान के प्रमुख नाम पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया और शिवराज सिंह चौहान के लिए विदिशा से सीट छोड़ने वाले पूर्व सांसद रमाकांत भार्गव का नाम सबसे उपर है। अगर सामान्य कार्ड नहीं चला तो पूर्व सांसद केपी यादव के नाम पर विचार किया जाएगा।   जातीय समीकरण पर होगा ध्यान माना जा रहा है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की खाली लोकसभा सीट पर बीजेपी जातीय समीकरणों को ध्यान में रखते हुए ही अपने प्रत्याशी का चयन करेगी. क्योंकि हाल ही में तीन राज्यसभा सीटों पर भी बीजेपी जातीय समीकरणों का पूरा ध्यान रखा था. पार्टी ने तीन राज्यसभा सीटों पर ओबीसी, अनुसूचित जाति और महिला प्रत्याशी को मौका दिया था. ऐसे में माना जा रहा है कि बीजेपी इस बार किसी सवर्ण को मौका देगी. इसके अलावा बीजेपी किसी नए और चौंकाने वाले चेहरे को भी मौका दे सकती है. पवैया और भार्गव भी दावेदार इसके अलावा पूर्व मंत्री जयभान सिंह पवैया और पूर्व सांसद रमाकांत भार्गव भी दावेदार हैं. क्योंकि सिंधिया के बीजेपी में आने के बाद उनके समर्थक भी बड़ी संख्या में भाजपा में आए थे. ऐसे में जयभान सिंह पवैया लंबे समय से न तो कोई चुनाव लड़ पाए और न ही उन्हें पार्टी में कोई दूसरा मौका मिला था. जबकि वह बीजेपी के फॉयरब्रांड नेता माने जाते हैं. पवैया बजरंग दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रह चुके हैं  और राम मंदिर आंदोलन के दौरान सक्रिए थे. ऐसे में माना जा रहा है कि पार्टी उन्हें राज्यसभा भेज सकती है. वहीं एक और दावेदार विदिशा के पूर्व सांसद रमाकांत भार्गव हैं, भार्गव ने अपनी सीट पूर्व सीएम के लिए खाली की थी. ऐसे में माना जा रहा है कि बीजेपी सर्वण चेहरे के तौर पर उन्हें भी भेज सकती है. 

भाजपा का अगला अध्यक्ष कौन, यूपी में साख लौटाना बड़ी चुनौती, विनोद, संतोष, ठाकुर, ओम माथुर, और स्मृति ईरानी के नाम चर्चा में

नई दिल्ली  नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरी बार शपथ ग्रहण लेने के बाद अब भाजपा के नए अध्यक्ष की चर्चा शुरू हो गई है। अध्यक्ष कौन बनेगा इसकी अटकलें तेज हो गई हैं। 2019 लोकसभा चुनाव के बाद जगत प्रकाश नड्डा जनवरी 2020 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे। नड्डा का बतौर बीजेपी अध्यक्ष कार्यकाल जनवरी 2023 में खत्म हो गया। हालांकि, लोकसभा चुनाव को देखते हुए उनके कार्यकाल को जून 2024 तक बढ़ा दिया गया था। चुनाव बाद नड्डा को नरेंद्र मोदी सरकार की कैबिनेट में जगह दी गई है। माना जा रहा है कि बीजेपी के एक व्यक्ति एक पद की नीति के तहत पार्टी जल्द ही अपना नया अध्यक्ष तय करेगी। हाल ही में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयानों के बाद माना जा रहा है कि अध्यक्ष पद के चुनाव में अब संघ की ही चलेगी। विनोद, अनुराग, ओम और स्मृति के नामों की चर्चा नड्डा के बाद पहले तो अध्यक्ष पद के लिए मध्यप्रदेश के पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव और हरियाणा के पूर्व सीएम मनोहर लाल खट्टर के नाम भी चर्चा में थे। मगर, इन तीनों को मंत्रिमंडल में शामिल किए जाने के बाद अब इनकी चर्चाओं पर विराम लग गया है। अब भाजपा अध्यक्ष पद की दौड़ में पार्टी महासचिव विनोद तावड़े, बीएल संतोष, अनुराग ठाकुर, के लक्षमण, ओम माथुर, सुनील बंसल के अलावा स्मृति ईरानी के नाम भी आगे चल रहे हैं। मोहन भागवत के बयान के बाद बीजेपी अध्यक्ष के चुनाव में संघ की भूमिका की चर्चा तेज हो गई है इस बार भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में संघ की चलेगी दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर राजीव रंजन गिरि के अनुसार, भाजपा भले ही राजनीतिक पार्टी हो, मगर संगठन में हमेशा संघ की ही चलती है। क्योंकि इसे चलाने वाले लोग ज्यादातर संघ से ही जुड़े होते हैं। मोहन भागवत ने हाल ही में बयान दिया था कि एक सच्चा सेवक मर्यादा का पालन करता है। जिसमें मैंने किया का भाव नहीं होता, अहंकार नहीं होता, केवल वही व्यक्ति सही अर्थों में सेवक कहलाने का अधिकारी होता है। माना जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व को लेकर भागवत यह बयान बेहद मायने रखता है। ऐसे में आगामी वक्त में पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में संघ की भूमिका काफी अहम मानी जा रही है। भाजपा को आरएसएस का राजनीतिक संगठन माना जाता है, ऐसे में संघ अब नहीं चाहेगा कि आगामी विधानसभा चुनावों में पार्टी का प्रदर्शन खराब हो। विनोद तावड़े प्रभावशाली महासचिव, संघ से जुड़ाव महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रह चुके तावड़े को बीएल संतोष के बाद सबसे ज्यादा प्रभावशाली महासचिव माना जाता है। उनके पास दो दशक का संगठन का अनुभव है। वह बचपन से ही संघ से जुड़े हुए हैं। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से अपनी राजनीति की शुरुआत करने वाले तावड़े के नाम पर इसलिए भी मुहर लग सकती है, क्योंकि इसी साल महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं। लक्ष्मण का नाम ओबीसी दावेदारों में आगे नड्डा के बाद भाजपा अध्यक्ष की इस रेस में बीजेपी ओबीसी मोर्चा चीफ के लक्ष्मण का नाम भी चर्चा में हैं। तेलंगाना से आने वाले लक्ष्मण बेहद कर्मठ और जुझारू जाने जाते हैं। दक्षिण के राज्यों में आंध्र प्रदेश के बाद तेलंगाना पर बीजेपी सबसे ज्यादा ध्यान दे रही है। बंसल की अगुवाई में ओडिशा में बीजेपी का परचम बीजेपी अध्यक्ष की रेस में सुनील बंसल का नाम भी सामिल है, जो वर्तमान में महासचिव हैं। अमित शाह के चहेते बंसल पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और ओडिशा जैसे तीन राज्यों के इंचार्ज भी हैं। उन्हीं की अगुवाई में बीजेपी ने ओडिशा में शानदार प्रदर्शन किया और नवीन पटनायक सरकार को चारों खाने चित कर दिया। बीएल संतोष पर्दे के पीछे के रणनीतिकार भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बीएल संतोष आरएसएस के बड़े प्रचारक भी रह चुके हैं। बीएल संतोष को बीजेपी में यह पद तब मिला, जब 13 वर्षों से यह पद संभाल रहे रामलाल की विदाई हुई। बीएल संतोष को परदे के पीछे रणनीति बनाने में माहिर माना जाता है। ओम माथुर गुजरात के प्रभारी, पीएम मोदी के चहेते राजस्थान से राज्यसभा सदस्य और भैरों सिंह शेखावत के शिष्य ओम माथुर भी बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने की दौड़ में हैं। पीएम मोदी के चहेते माथुर को चेहरे पर मुस्कुराहट के साथ अपनी बात कहने के लिए जाना जाता है। ओम माथुर आरएसएस के सक्रिय प्रचारक रहे हैं और पीएम मोदी के गृह राज्य गुजरात के प्रभारी भी रह चुके हैं। अनुराग ठाकुर को यूथ विंग के अध्यक्ष पद का अनुभव हिमाचल प्रदेश के हमीरपुर से सांसद अनुराग ठाकुर का नाम भी भाजपा अध्यक्ष पद के लिए चर्चा में है। हमीरपुर लोकसभा सीट से पांच बार के सांसद अनुराग ठाकुर को इस बार मोदी मंत्रिमंडल में जगह नहीं दी गई है। इससे भी उनको पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाए जाने की चर्चाओं ने जोर पकड़ा। अनुराग ठाकुर यूथ बीजेपी के अध्यक्ष के रूप में काम कर चुके हैं। वह बीसीसीआई के संयुक्त सचिव भी रह चुके हैं। स्मृति ईरानी का नाम भी रेस में, पहली महिला अध्यक्ष संभव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी कई सभाओं में महिला वोटर्स की वकालत करते आ रहे हैं। उन्होंने अपनी लगातार तीन बार की जीत में महिलाओं की भूमिका भी मानी है। वहीं, भाजपा ने संगठन में भी महिला सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए व्यापक संपर्क अभियान की योजना बनाने जा रही है। वैसे भी महिला आरक्षण अधिनियम लागू हो गया तो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 फीसदी सीटें आरक्षित होंगी। इस बार अध्यक्ष पद के लिए स्मृति ईरानी के नाम की भी चर्चा है। अमेठी की पूर्व सांसद रहीं स्मृति को इस बार कैबिनेट में जगह नहीं मिली है, ऐसे में भाजपा अध्यक्ष के लिए उनका नाम भी आगे चल रहा है। अगर, ऐसा होता है तो वह भाजपा की पहली महिला अध्यक्ष बन सकती हैं। अध्यक्ष पद से पहले राज्यों में होंगे संगठन चुनाव भाजपा अपने नए अध्यक्ष के चुनाव से पहले नए सदस्यता अभियान की शुरुआत करेगी और उसके बाद राज्यों में संगठन के चुनाव कराएगी। दरअसल, तय नियमों के मुताबिक अध्यक्ष चुनने से पहले कम से कम 50 फीसदी राज्यों … Read more

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